एक इश्किया ग़ज़ल , जो लिखनी तो बहुत पहले चाहिए थी , लेकिन लिखी आज है ।
आप जब से मन को छलने लगे ख्वाब तब से दिल में पलने लगे ।
डूब कर हुस्न में यूँ खोये रहे
साथ दोस्तों का भी खलने लगे ।
प्यार में तेरे यूँ नाकाम हैं
काम सारे कल पे टलने लगे ।
छोड़ कर दुनिया को तेरे लिये
आँख बंद कर हम तो चलने लगे ।
ग़ैर नज़र जो उठे उनकी तरफ
डाह से दिल अपना जलने लगे ।
लालची तो इतने ना थे कभी
नोट फिर क्यों पर्स में गलने लगे ।
प्यार में जो 'तारीफ' बने "तरु"
फूल पतझड़ में भी खिलने लगे ।
( तरु = लव टरी )
( चौधराइन को समर्पित , जिनका आज जन्मदिन है )।
बीस साल बाद एक बार फिर श्रीमती जी का जन्मदिन दशहरे के दिन आया है ।
नोट : ग़ज़ल को सीधी सादी, सरल भाषा में लिखा है । क्या करें , टेढ़ी मेढ़ी कठिन भाषा आती भी नहीं ।
बीस साल बाद एक बार फिर श्रीमती जी का जन्मदिन दशहरे के दिन आया है ।
नोट : ग़ज़ल को सीधी सादी, सरल भाषा में लिखा है । क्या करें , टेढ़ी मेढ़ी कठिन भाषा आती भी नहीं ।


