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Thursday, July 5, 2018

न जाने क्यों ---


जाने क्यों ,
बारिश का मौसम है , पर बरखा नहीं आती !
बदल तो आते हैं पर , काली घटा नहीं आती।

जाने क्यों ,
आंधियां चलती हैं पर , अब पुरवाई नहीं चलती,
मौसम बदलता है पर , अब तबियत नहीं मचलती।  

जाने क्यों ,
आसमान दिखता है पर , अब नीला नज़र नहीं आता।
जंगल है ये कंक्रीट का , यहाँ कोई मोर नज़र नहीं आता।     

जाने क्यों ,
लाखों की भीड़ है , पर इंसान अकेला है।
मकां तो शानदार है , पर घर इक तबेला है।

जाने क्यों ,
विकास तो हुआ है , पर हम विकसित नहीं हुए।
स्कूल कॉलेज अनेक हैं , पर हम शिक्षित नहीं हुए।
  
जाने क्यों ,
धर्म के चक्कर में , हम अधर्मी हो गए।
इंसानियत को भूले , और हठधर्मी हो गए।  

जाने क्यों ,
हम समझदार तो हैं , पर ये बात समझ नहीं पाते।
एक दिन खाली हाथ ही जाना है, छोड़ के धन दौलत और रिश्ते नाते। 

फिर भी जाने क्यों ,
हम व्यस्त हैं,  अस्त व्यस्त होने में।
और मस्त हैं ,  मोह माया का बोझ ढोने में। 
जाने क्यों , जाने क्यों !




Sunday, August 18, 2013

ई है मुंबई नगरिया , तू देख बबुआ --- १२ साल बाद !


इत्तेफ़ाक से ईद के दिन हम पहुंचे मुंबई, जहाँ हमारा जाना पूरे १२ वर्ष बाद हुआ. इन बारह वर्षों में हमने  पहली बार रेल यात्रा भी की. किसी भी राजधानी ट्रेन में यह हमारी पहली यात्रा थी. अवसर था हमारी बेटी का मुंबई आई आई टी में एम् बी ऐ का दीक्षांत समारोह जो १० अगस्त को होना था। बस या ट्रेन का सफ़र हमें हमेशा ही लुभाता रहा है. खिड़की के पास बैठकर बाहर का नज़ारा देखते हुए हम घंटों बिता सकते हैं. इस सफ़र में भी दिल्ली से निकलते ही बहुत खूबसूरत नज़ारे देखने को मिले क्योंकि बरसात के मौसम में सारी पृथ्वी हरी भरी नज़र आ रही थी. जब तक अँधेरा नहीं हो गया , हम हरियाली का आनंद लेते रहे. 

ईद के दिन १० बजे तक हम घर पहुँच गए थे. छुट्टी का दिन था , इसलिए मुंबई घूमने के लिए सबसे उपयुक्त दिन था. घुमाने की जिम्मेदारी भी बिटिया की ही थी , इसलिए उसके कहे अनुसार हम ऑटो / टैक्सी पकड़ते रहे और एक ही दिन में लगभग सारी मुंबई  घूम ली.

सबसे पहले पहुंचे आर्थर रोड जहाँ समुद्र किनारे घूमने का अच्छा इंतज़ाम था लेकिन सफ़ाई कुछ ख़ास नहीं थी. एक पार्क था -- जोगर्स पार्क -- जो दोपहर को बंद था. इसलिए ऑटो पकड़ हम वहां से बांद्रा पहुँच गए, जहाँ सड़क पर एक जगह ऐसे भीड़ लगी थी जैसे कोई तमाशा हो रहा हो.  सैंकड़ों लोग और दसियों ओ बी वैन खड़ी थी किसी सीधे प्रसारण के लिए.       



ऑटो से उतरने के बाद हमने जानना चाहा कि क्या माज़रा है !




लेकिन सभी देखने में ही इतने व्यस्त थे कि खुद ही  मशक्कत करनी पड़ी यह पता लगाने के लिए कि चक्कर क्या है !




अंत में हमारे कैमरे ने ही पकड़ लिया कि अरे यह तो मन्नत है -- शाहरुख़ खान का बंगला। हालाँकि  बाहर से देखकर हमें तो निराशा ही हुई. सारे बंगले को सफ़ेद और हरी चद्दरों से ढक दिया गया था. आगे के हिस्से पर टिन शेड लगे थे. बाहर से सिर्फ गेट ही दिख रहा था. लेकिन एक बार टी वी पर देखा था , अन्दर से बेहद खूबसूरत है किंग खान का बंगला। यहाँ लोग ईद के अवसर पर शाहरुख़ और अन्य मेहमानों के दीदार की उम्मीद में खड़े थे.    




भीड़ से बचकर हम तो शाहरुख़ की गली के आगे समुद्र में उतर गए , पेंट ऊपर चढ़ाकर और भुट्टे खाकर। वैसे इतने स्वादिष्ट भुट्टे हमने पहले कभी नहीं खाए थे.




यहाँ से सी लिंक रोड से होते हुए हमें जाना था चौपाटी।




रास्ते में दिखा एंटिला -- बहुत भीड़ भाड़ वाला क्षेत्र लेकिन महंगा -- सड़क से हटकर बना है. इसके आगे अन्य भवन होने से सड़क से छुपा रहता है. जाने क्या ख़ास बात है !




बहुत पहले जब चौपाटी आए थे तब यह जोहड़ का किनारा सा लगा था. लेकिन अब पहले से काफ़ी बेहतर है. ईद होने के कारण खूब भीड़ थी. ज्यादातर मुस्लिम लोग ही पिकनिक मना रहे थे. सही मायने में आम आदमी , जिनकी बहुतायत थी. लेकिन उम्र और ओहदे के तहत अब ऐसी भीड़ में हम स्वयं को अज़नबी सा ही महसूस करते हैं. जाने क्यों , थोड़ा दुःख सा भी होता है. हालाँकि छोटी छोटी बातों से लोगों को खुश होते देखकर मन को सुकून सा भी मिलता है.      




यहाँ मेरीन ड्राइव पर सड़क और समुद्र के बीच बने चौड़े फुटपाथ पर सैर करते लोग और चबूतरे पर बैठकर समुद्र से आती ठंडी हवा का आनंद लेते हुए घंटों बिताना यहाँ के लोगों का खास शौक लगता है. यहाँ की एक विशेषता यह है कि यहाँ हर वर्ग के लोग वॉकिंग या जॉगिंग के लिए आते है. मुंबई में आर्थिक भेद भाव कम ही नज़र आता है. लेकिन रेत में पड़ी गन्दगी को देखकर स्वदेश में होने का अहसास सदा याद दिलाता रहता है, कि हम अभी भी विकासशील ही हैं.
  



टैक्सी पकड़ी और आ गया -- गेटवे ऑफ़ इंडिया ! सारे दिन सफ़ेद लिबास का बोलबाला रहा. ईद के दिन बच्चे और युवाओं समेत बड़े बूढ़े, सभी सफ़ेद कपड़ों में नज़र आ रहे थे। लगभग सभी के पास मोबाईल कैमरे जिनसे तरह तरह के पोज मारकर फोटो खिंचवाते लोगों को देखकर हंसी भी आती और आनंद भी. एक ज़माना था जब हम रील ख़त्म होने के डर से फोटो लेने में बड़ी अहतियात बरतते थे. लेकिन अब ज़ाहिर है , न रील ख़त्म होने का डर , न रील धुलवाने का इंतज़ार। इसलिए अब लोग फ़ोटो खींचते हैं और सबसे पहला काम करते हैं देखने का. सचमुच ज़माना बदल गया है.     




यहाँ सर घुमाते ही नज़र आता है -- होटल ताज़महल। वही ताज़महल जहाँ क़रीब ५ साल पहले २६/११ को धांय धांय की आवाज़ के बीच इतिहास में आतंकवाद का सबसे भयंकर रूप देखने को मिला था. हमारे पीछे होटल का जो कोना दिखाई दे रहा है , वह तब धू धू कर जल रहा था. पास से देखने पर मरम्मत के निशान साफ दिखाई देते हैं जो शायद सदा याद दिलाते रहेंगे कि इस ईमारत ने इन्सान के हाथों कितनी मार खाई है.

मुंबई में मौसम दिल्ली की अपेक्षा ज्यादा सुहाना लगा. थोड़ी थोड़ी देर में बारिश आकर उमस को ख़त्म कर देती है. सारे समय छाये बादलों ने सूरज की गर्मी से हमें बचाए रखा. हालाँकि , हर समय गीलेपन का अहसास भी होता रहा जो हमें बुरा नहीं लगा.

मुंबई में आवागमन के लिए ऑटो और टैक्सी की सुविधा भी बहुत सुविधाजनक है. बिना हील हुज्ज़त किये मीटर डाउन कर चल देते हैं , मंजिल की ओर. साथ ही , लोकल ट्रेन्स तो जैसे मुंबई की जान हैं. खचाखच भरी लोकल में यात्रा करने की आदत सी पड़ जाती है. हालाँकि हमारे जैसे तो बेचारे फस्ट क्लास में ही ट्रेवेल कर सकते हैं. सेकण्ड क्लास में ट्रेवेल करने पर और लोग ही हमारी ओर ऐसे देख रहे थे जैसे उन्हें हम पर दया आ रही हो कि बेचारे कहाँ फंस गए. लेकिन हमने भी यह अनुभव करने की ठान रखी थी.

यहाँ की सबसे अच्छी बात यह लगी कि यहाँ रात भी रात नहीं लगती। लगता है , मुम्बईकर कम ही सोते हैं.

          
नोट : मुंबई में तीन रहे लेकिन किसी से भी संपर्क करना संभव नहीं था. ऐसे में कुछ मित्रों को शिकायत भी हो सकती है. या शायद न भी हो !    




Saturday, October 27, 2012

मौसम और मच्छरों की मार -- डेंगू बुखार ...


देश में , विशेषकर दिल्ली, एन सी आर और मुंबई में डेंगू बुखार के बढ़ते प्रकोप से और यश चौपड़ा की अकस्मात् मृत्यु से डेंगू बुखार से सावधान रहना समय की मांग है. इस वर्ष बरसात  का मौसम देर तक चलने की वज़ह से डेंगू भी देर से फैला है. जनता को जागरूक करने के लिए सरकार ने काफी प्रयास किये हैं जिनमे रेडियो , टी वी आदि पर विज्ञापन के अलावा अस्पतालों में रोगियों को पर्चे बांटे जाते हैं जिनमे डेंगू से बचाव के तरीके बताये जाते हैं . आइये जानते हैं , डेंगू से कैसे बचाव किया जा सकता है : 

डेंगू बुखार एक वायरल बुखार है जो एडीज इजिप्टाई नाम के मच्छर के काटने से फैलता है. डेंगू का वायरस मच्छर की लार से मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है और रक्त में फैलकर अपना प्रभाव दिखाता है. अक्सर यह मच्छर  साफ़ लेकिन स्टेगनेंट पानी में पाया जाता है . यह दिन के समय काटता है .  

डेंगू बुखार के लक्षण : 

डेंगू बुखार तीन तरह से प्रस्तुत होता है. 

१)  डेंगू बुखार : तेज बुखार , सर दर्द , आँखों के पीछे दर्द , जोड़ों और मांस पेशियों में दर्द और शरीर पर लाल दाने आदि आम लक्षण होते हैं . अक्सर इसे अन्य वायरल फीवर से अलग पहचानना मुश्किल होता है. लेकिन खांसी और जुकाम , गला ख़राब आदि नहीं होता.  

२) डेंगू हेमरेजिक फीवर : इसमें बुखार के साथ शरीर से रक्त श्राव होने लगता है जैसे उलटी में खून , पेशाब में खून या नाक से रक्त श्राव आदि. यह तभी होता है जब रक्त में प्लेटलेट्स की कमी हो जाती है . यह डेंगू का एक चिंताज़नक लक्षण है और रोगी को तुरंत अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है.  

३) डेंगू शॉक सिंड्रोम :   इस अवस्था में बुखार के बाद रोगी का ब्लड प्रेशर अचानक बहुत कम हो जाता है जिससे सभी अंगों पर प्रभाव पड़ सकता है . यह एक इमरजेंसी होती है . यदि तुरंत सही इलाज उपलब्ध न हो तो रोगी की मृत्यु भी हो सकती है. यह डेंगू का सबसे ख़राब रूप है.     

डेंगू बुखार में निम्न परिस्थितियों में विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है जब डॉक्टर से परामर्श करना अनिवार्य होता है : 

* बच्चे , बूढ़े और गर्भवती महिलाएं , डायबिटिज , क्रॉनिक लीवर या किडनी रोग . 
* अचानक पेट में तेज दर्द , लगातार उल्टियाँ , रक्त श्राव , लो ब्लड प्रेशर , बेहोशी या गफ़लत की हालत. 
* जाँच करने पर ब्लड प्रेशर में बदलाव , नाड़ी की गति का अत्यधिक तेज होना , प्लेटलेट्स की संख्या २०००० से कम होना और रक्त श्राव . 

डेंगू होने पर क्या करें :   

* बुखार के लिए सिर्फ पेरासिटामोल की गोली ही लें . एस्प्रिन और अन्य दर्द निवारक दवाओं का सेवन न करें . 
* उचित मात्रा में पानी और अन्य तरल पदार्थ लेते रहना चाहिए ताकि पानी की कमी न हो. 
* उपरोक्त खतरे के लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर की सलाह लें .   
* नीम हकीम और चमत्कारिक डॉक्टरों के चक्कर में न पड़ें . उचित अस्पताल में ही इलाज कराएँ .
* डेंगू का न ही कोई उपचार है , न कोई वैक्सीन। लेकिन सपोर्टिव इलाज से ही रोगी पूर्णतया ठीक हो जाते हैं।

निदान :  

* आम तौर पर डेंगू रोगी के लक्षण देखकर ही पता चल जाता है विशेषकर जब बुखार के साथ रैश भी नज़र आए। 
* प्लेटलेट काउंट्स --    डेंगू बुखार में  प्लेटलेट्स  संख्या सामान्य से कम हो जाती है। लगातार गिरती संख्या डेंगू के पक्ष में जाती है . यदि 20, 000  से कम हो तो अस्पताल में भर्ती हो जाना चाहिए। 10000 से नीचे प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की ज़रुरत पड़ती है।   
* एलाइजा टेस्ट और डेंगू सिरोलोजी : आई जी एम् एंटीबोडीज का रक्त में पाया जाना डेंगू का एक्टिव इन्फेक्शन दर्शाता है। जबकि आई जी जी एंटीबोडीज का होना पुराना संक्रमण दर्शाता है।

डेंगू से बचाव के तरीके : 

* सबसे ज़रूरी है घर के आस पास साफ सफाई रखना और कहीं भी पानी जमा न होने देना। कूलर , बर्तन , गमले आदि में पानी जमा न होने दें।  गर्मियों में कूलर में सप्ताह में एक बार एक बड़ा चम्मच टेमीफौस ग्रेनुल्स डालें या फिर मिटटी का तेल भी डाल सकते हैं।
* दिन में पूरी बाजु की कमीज़ पहने। जहाँ तक हो सके शरीर को ढक कर रखें।
* मच्छर मार दवा का स्प्रे भी लाभदायक रहता है।

नोट: डेंगू होने पर घबराएँ नहीं। जब तक ऊपर बताये गए गंभीर लक्षण नज़र नहीं आते , तब तक घर में रह कर भी इलाज़ कराया जा सकता है। डेंगू में प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की ज़रुरत तभी पड़ती है जब प्लेटलेट काउंट्स 10000 से कम हो या  रक्त श्राव होने  लगे। बचाव के लिए प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की ज़रुरत नहीं  होती।

डेंगू और चिकनगुनियामें थोडा सा ही अंतर होता है .चिकनगुनिया में जोड़ों में दर्द ज्यादा होता है और लम्बे समय तक रह सकता है। दोनों का इलाज एक जैसा ही है।