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Saturday, June 22, 2024

सावधानी नहीं तो रंग में भंग पक्का....

सावधानी में ही समझदारी है। यदि उचित जानकारी ना हो तो ना केवल निराशा हाथ लग सकती है, बल्कि परेशानी भी हो सकती है। 

हमने जब सिक्किम का प्रोग्राम बनाया, तब किसी जानकार ने बताया था कि सिक्किम में जून के महीने में नहीं जाना चाहिए, विशेषकर मिड जून के बाद, क्योंकि उसके बाद भारी बारिश होने लगती है और भूस्खलन का खतरा निरंतर बना रहता है जो कभी कभी बहुत खतरनाक हो सकता है। हमने भी देखा कि 12 जून के बाद होटल आसानी से और सस्ते मिल रहे थे। यानी सीजन खत्म। इसीलिए सोच समझकर हमने मई की बुकिंग कराई, भले ही थोड़ा ज्यादा खर्च करना पड़ा। 

आज ही पेपर में पढ़ा कि कल नॉर्थ सिक्किम में भारी बारिश के कारण हुए भूस्खलन के कारण जान माल का काफी नुकसान हो गया। करीब 2000 यात्री अभी भी फंसे पड़े हैं। ज़ाहिर है, किसी दूर दराज के क्षेत्र में जाने से पहले वहां की पर्याप्त जानकारी ले लेनी चाहिए। 

अब चलते चलते बताते चलें कि दार्जिलिंग से बागडोगरा वापस आने वाला रूट सबसे खूबसूरत और मजेदार रहा। घनी हरियाली और ऊंचे ऊंचे पेड़ों से ढके पहाड़ से होती हुई सुंदर सड़क पर ट्रैफिक भी ना के बराबर था। पहाड़ खत्म होने के बाद मीलों तक फैले चाय के बागान देखकर आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हो रही थी। पता चला वे बागान किसी कंपनी के थे । 

पूरे रास्ते में बस एक ही ढाबा मिला जहां से हमने लंच के लिए आलू परांठे पैक करा लिए क्योंकि यह भी पता लगा लिया था कि एयरपोर्ट पर खाने की कोई विशेष सुविधा नहीं है। वैसे भी ढाई सौ रुपए की बासी सैंडविच से तो 50 रुपए का ताजा आलू परांठा एक बेहतर विकल्प था। ढाबेवाले ने पैक भी इतना अच्छा किया कि परांठे 3 घंटे बाद भी piping hot निकले। इसके बाद एयरलाइन का कॉरपोरेट मील भी फीका लगा था। 

गर्मियों के सीजन में लोग गर्मी से राहत पाने के लिए पहाड़ों की ओर कूच करते हैं लेकिन पहाड़ों का ही तापमान बढ़ा देते हैं। कोई हैरानी नहीं कि अब वहां भी पंखे ही नहीं, ए सी भी चलने लगे हैं। जाने कब तक पहाड़ ये बोझ सहन कर पाएंगे !

Tuesday, June 11, 2024

सिक्किम दार्जिलिंग यात्रा ...

 सिक्किम, दार्जिलिंग का संक्षिप्त लेखा जोखा:

पिछले पचास सालों में हमने देश के लगभग सभी हिल स्टेशंस की यात्रा की है। उत्तर, दक्षिण, पश्चिम के सभी और उत्तर पूर्व में गंगटोक और दार्जिलिंग। लेकिन इन सब में से जहां सबसे ज्यादा हरियाली दिखती है वे उत्तर पूर्व में स्थित सिक्किम, और पश्चिमी बंगाल के पर्वतीय स्थल दार्जिलिंग और कलिंपोंग। आइए आपको संक्षिप्त में बताते हैं यहां कब, क्यों और क्यों नहीं जाना चाहिए। 

गंगटोक:

सिक्किम की राजधानी गंगटोक यहां का सबसे लोकप्रिय टूरिस्ट स्टेशन है। यहां का मुख्य आकर्षण है यहां का MG रोड यानि माल रोड। बिलकुल यूरोपियन शहरों जैसा माल रोड इतना साफ सुथरा है जितना देश में कहीं और देखने को नहीं मिलेगा। पक्की टाइल्ड सड़क पर ट्रैफिक की अनुमति नहीं है, बीसियों बेंच बैठकर सुस्ताने के लिए, अनेक डस्टबिंस और कूड़ा डालने पर जुर्माना इस शहर को बहुत खूबसूरत बनाता है। 

यहां घूमने के लिए विशेष तौर पर नथुला पास का डे ट्रिप है जो अपने आप में एक अद्भुत अनुभव है। लेकिन यहां जाने के लिए परमिट लेना पड़ता है जो आपकी टैक्सी वाला ही लेता है लेकिन आपसे 5000 रुपए चार्ज करता है। इसी के रास्ते में छांगू लेक आती है जहां फोटो लेने के अलावा और कुछ खास नहीं है करने के लिए। युवा दंपत्ति और बच्चे अवश्य याक की सवारी और कॉस्ट्यूम पहनकर फोटो खिंचवाते हुए नजर आ जाएंगे। यहां टैक्सी बहुत महंगी हैं। अधिकांश गाड़ियां इनोवा चलती हैं जिनका एक दिन का किराया 6000 से 7000 तक होता है। नथुला ट्रिप 12000 में पड़ेगा। 

इसके अलावा यहां देखने के लिए कई मोनेस्ट्री हैं जो सब लगभग एक जैसी ही होती हैं। शहर में ट्रॉली की सवारी अवश्य रोमांचक लगती है। 

गंगटोक में सीजन में भीड़ बहुत होती है, इसलिए ट्रैफिक भी बहुत होता है। सारा ट्रैफिक छोटी छोटी संकरी गलियों से होकर ही गुजरता है। लेकिन कुछ प्रशासन का प्रबंधन, कुछ लोगों का अनुशासन, दोनों मिलकर ट्रैफिक को आसानी से मैनेज कर लेते हैं। 

सिक्किम जाने के लिए सबसे बढ़िया मौसम अक्टूबर या फिर जनवरी फरवरी रहेगा, क्योंकि इस समय मौसम साफ होता है और दूर हिमालय पर्वत की विभिन्न चोटियां साफ दिखाई देती हैं। बेशक अप्रैल से मई में सबसे ज्यादा भीड़ होती है गर्मी से बचने के लिए। लेकिन मध्य जून के बाद बिलकुल नहीं जाना चाहिए क्योंकि भारी बारिशों में भूस्खलन की घटनाएं होती रहती हैं जो जानलेवा भी हो सकती हैं। यदि कहीं फंस गए तो घंटो नहीं बल्कि पूरे दिन फंसे रहना पड़ सकता है, क्योंकि यहां कोई बाईपास या विकल्प नहीं होता। 

अगली पोस्ट में दार्जिलिंग की वास्तविक स्थिति के बारे में अवश्य पढ़िएगा।

Thursday, October 5, 2017

एक अलग सा अनुभव -- लेह लद्दाख यात्रा ---






देश भ्रमण में पर्वतीय भ्रमण सर्वोत्तम होता है क्योंकि पहाड़ों की शुद्ध और ताज़ा हवा हमारे तन और मन को तरो ताज़गी से भर देती है। दिल्ली जैसे प्रदूषित शहर में रहने वालों के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वर्ष में एक या दो बार पहाड़ों की सैर पर निकल जाएँ ताकि फेफड़ों को कुछ राहत मिल सके। हमारे देश में जहाँ सभी पर्वतीय भ्रमण स्थल लगभग एक जैसे हरे भरे लेकिन कम ऊँचाई पर हैं , वहीँ एकमात्र लद्दाख क्षेत्र ऐसा पर्वतीय स्थल है जहाँ पहाड़ एकदम सूखे , नंगे , वृक्षरहित और ऊंचे हैं। इसीलिए लद्दाख के दुर्गम लेह शहर में हर वर्ष लाखों सैलानी यात्रा करने जाते हैं और कई तरह की कठिनाइयां उठाते हुए भी आनंदित महसूस करते हैं। 

लेह जाने के लिए सबसे बढ़िया मौसम मई जून से लेकर मध्य अक्टूबर तक रहता है।  इसके बाद बर्फ़बारी और सर्दियाँ बहुत बढ़ जाती हैं और लगभग सभी होटल्स और अन्य सुविधाएँ बंद हो जाती हैं। यहाँ जाने के लिए दो रास्ते हैं -- हवाई यात्रा या सड़क द्वारा।  सड़क से दो जगहों से जाया जा सकता है -- एक मनाली से और दूसरा श्रीनगर से।  दोनों ही दशाओं में एक रात रास्ते में रुकना पड़ता है।  लेकिन हवाई ज़हाज़ से मात्र सवा घंटे में लेह पहुँच जाते हैं। सड़क द्वारा यात्रा का एक लाभ यह रहता है कि आप रास्ते भर एक से एक सुन्दर पहाड़ और घाटियां देख पाते हैं जबकि हवाई यात्रा में आपको आसमान से बर्फ से ढके पहाड़ अपनी पूरी सुंदरता में दिखाई देते हैं। इसलिए सबसे बढ़िया है कि आप सड़क द्वारा जाएँ और हवाई ज़हाज़ से वापस आएं। इससे आपको जलवायु-अनुकूलन में भी सहायता मिलेगी और पर्वत दर्शन भी बेहतर होगा। 

लेह शहर की ऊँचाई ११००० -१२००० फुट के करीब है।  यानि यह आम हिल स्टेशंस की अपेक्षा दुगनी ऊँचाई पर है। इसलिए यहाँ जाने से पहले कुछ बातों का विशेष ख्याल रखना पड़ता है। यहाँ सबसे ज्यादा कठिनाई होती है ऊँचाई के कारण होने वाली ऑक्सीजन की कमी। ऑक्सीजन की कमी के कारण आप भयंकर रूप से बीमार पड़ सकते हैं और कभी कभी तो यह जानलेवा भी हो सकता है।  इसे हाई ऑल्टीट्यूड सिकनेस कहते हैं।  यह तीन प्रकार से हो सकती है :
१ )   हाई ऑल्टीट्यूड सिकनेस -- यह आम तौर पर बहुत से लोगों को पहाड़ों पर जाने से हो जाता है।  इसमें लक्षण हलके ही होते हैं जैसे सर दर्द होना , जी मिचलाना , उलटी , भूख न लगना और नींद न आना। अक्सर यह एक दिन में ठीक भी हो जाता है।
२ ) पल्मोनेरी इडीमा ( pulmonary edema ) -- इसमें ऑक्सीजन की कमी के कारण साँस फूलने लगता है और साँस लेने में कठिनाई भी हो सकती है। यह फेफड़ों में पानी भरने के कारण होता है।  इसलिए ऑक्सीजन की कमी होते ही तुरंत कृत्रिम ऑक्सीजन साँस के साथ लेना आवशयक हो जाता है।  इसके लिए सभी होटलों में ऑक्सीजन सिलेंडर मिलते हैं।  लेकिन ज्यादा होने पर अस्पताल में भर्ती भी होना पड़ सकता है जहाँ हाइपरबारिक ऑक्सीजन से इलाज किया जाता है। कभी कभी आराम न होने पर हेलीकॉप्टर द्वारा ऐसे रोगी को निचले क्षेत्र में भी भेजना पड़ जाता है।  इसके लिए सेना की सहायता लेनी पड़ती है लेकिन कम ऊँचाई पर आते ही यह रोग स्वत: ठीक हो जाता है। हालाँकि आपका घूमने का प्रोग्राम तो खराब हो ही जाता है।
३ ) सेरिब्रल इडिमा ( cerebral edema ) -- यह सबसे खतरनाक हालात होती है।  इसमें व्यक्ति को दिमाग में सूजन आने से बेहोशी होने लगती है और एक बार बेहोश हुए तो करीब ५० % लोगों को दोबरा होश नहीं आता। इसलिए तुरंत चिकित्सीय सहायता से दिमाग की सूजन को ठीक करने का प्रयास करना पड़ता है।      

ऑक्सीजन की कमी से बचने के उपाय :
* यदि संभव हो तो आप सड़क यात्रा करते हुए लेह जाएँ।  इससे आपको जलवायु का अभ्यस्त होने में सहायता मिलेगी।
* diamox २५० mg की एक गोली सुबह शाम यात्रा से दो दिन पहले शुरू कर दें और २-३ दिन बाद तक और खाएं। इससे इस रोग के लक्षण काफी हद तक नियंत्रण में रहते हैं। हालाँकि यह कैसे काम करती है , यह साफ़ नहीं है।  लेकिन निश्चित ही प्रभावशाली है। 
* लेह पहुँच कर पहले दिन सिर्फ आराम करें और कोई भी थकाने वाला काम न करें।
* पानी पीते रहें लेकिन बहुत ज्यादा भी न पीयें।
* उचित मात्रा में खाना भी अवश्य खाएं , हालाँकि आपको भूख का अहसास नहीं होगा।
* सिगरेट , शराब आदि का सेवन बिलकुल न करें।
ऐसा करने से आने वाले दिनों में आप स्वस्थ रहेंगे और लेह दर्शन का भरपूर आनंद उठा पाएंगे।

लेह में सुविधाएँ :

लेह पहुंचकर भले भी आपको सब कुछ सूखा सूखा सा लगे लेकिन यहाँ शहर में सब सुख सुविधाएँ उचित दाम पर उपलब्ध हैं।  अच्छे साफ सुथरे होटल्स , उत्तर भारतीय स्वादिष्ट खाना , नहाने के लिए प्रचुर मात्रा में गर्म पानी और मार्किट में सभी वस्तुएं मिल जाती हैं।  यहाँ के लोग मूलत: बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं और बहुत शांतिप्रिय हैं। प्रसन्नचित्त , सहयतापरक और ईमानदार लोगों से आपको कोई कठिनाई महसूस नहीं होगी। अधिकांश अच्छे होटल्स पुराने लेह रोड पर बने हैं जो मेन बाजार के बहुत करीब हैं जहाँ आप शाम के समय अच्छा समय बिता सकते हैं।

लेह लद्दाख दर्शन अगली पोस्ट्स में।     

Friday, October 10, 2014

मुम्बई से दमन , एक सप्ताहंत यात्रा ---


दिल्ली के आस पास २०० से ३०० किलोमीटर की दूरी पर अनेक पर्यटक स्थल हैं जहां देश विदेश से सैलानी घूमने के लिये आते हैं ! दिल्ली वालों के लिये भी ये स्थल अच्छे वीकेंड एस्केप का काम करते हैं ! इसी तरह मुम्बई के आस पास भी कुछ स्थान ऐसे हैं जहां मुम्बईकार सप्ताहांत मज़े से बिताकर तरो ताज़ा महसूस कर सकते हैं ! इन्ही मे से एक है , केन्द्रीय शासित प्रदेश दमन !  



मुम्बई से दमन की दूरी मात्र १८० किलोमीटर है ! यहाँ जाने के लिये आपको राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर ८ पर जाना पड़ेगा जो मुम्बई से अहमदाबाद को जाता है ! रास्ते मे ३-४ टॉल प्लाज़ा मिलेंगे जहां आपको टॉल टैक्स देना पड़ेगा ! लेकिन हाईवे बहुत अच्छा बनाया गया है और बहुत ही खूबसूरत हरी भरी वादियों से होता हुआ गुजरता है ! इसलिये जल्दी ही आप टॉल की मार को भूल जाते हैं ! 




दोनो ओर छोटे छोटे हरे भरे पहाड़ विभिन्न आकृतियों मे आपका मन मोह लेते हैं ! महाराष्ट्र गुजरात बॉर्डर पर आपको गाड़ी का एंट्री पास भी बनवाना पड़ेगा ! अन्तत: वापी नाम के शहर से बायीं ओर मुड़कर करीब १२ किलोमीटर के बाद आप पहुंच जाते हैं दमन ! यूं तो यह एक छोटा सा कस्‍बा जैसा ही है लेकिन समुद्र किनारे अनेकों होटल और रिजॉर्ट्स बने हैं जहां ठहरना अपने आप मे एक अनुपम अनुभव होता है ! अधिकतर होटल्स देवका बीच रोड़ पर बने हैं जिनमे रेस्ट्रां समुद्र किनारे इस तरह बनाये गए हैं कि आप खाते पीते हुए समुद्र की लहरों का आनंद ले सकते हैं !     


लेकिन यह तभी संभव है जब समुद्र मे पानी हो ! चौंकिये मत , पहली नज़र मे आपको ऐसा ही लगेगा ! दिन के समय समुद्र का तल काफी नीचे हो जाता है जिससे पानी किनारे से २००-३०० मीटर दूर चला जाता है ! और आपको दिखाई देते हैं ये काले काले पत्थर जिनके बीच कहीं कहीं थोड़ा सा पानी ऐसे नज़र आता है जैसे समुद्र मे भी सूखा पड़ गया हो !  




लेकिन यदि दिल मे उमंग हो और अपनों का साथ हो तो रेगिस्तान मे भी आनंद मनाया जा सकता है ! घूमने वाले पत्थरों और रेतीले पानी को पार कर दूर समुद्र किनारे तक पहुंच ही जाते हैं ! विशेषकर शाम के समय नज़ारा अद्भुत होता है जब अरब सागर मे पश्चिम की ओर सूर्य की लालिमा समुद्र की लहरों के साथ अठखेलियाँ करने लगती है ! सैलानी इस अलौकिक दृश्य को आँखों मे भरकर भाव विभोर हो जाते हैं ! 



सूरज के ढलने के साथ ही समुद्र तल उपर उठने लगता है और पानी का स्तर भी बढ़ने लगता है ! अब सभी किनारे की ओर प्रस्थान करने लगते हैं ! हालांकि मौज मस्ती के मूड मे आये कुछ युवा लोग पानी के किनारे बैठ कर बीयर का सेवन करते नज़र आते हैं , लेकिन शाम के समय जब पानी का स्तर बढ़ने लगता है , तब ऐसा दुस्साहस करना एक मूर्खतापूर्ण कदम साबित हो सकता है ! 



बीच पर बने सभी होटल्स मे रेस्ट्रां समुद्र की ओर बनाये गए हैं ताकि खाने पीने के साथ साथ आप समुद्र से आती शीतल हवा का भी आनंद ले सकें ! शाम के समय यहाँ संगीत और ग़ज़लों के स्वर भी गूँजने लगते हैं ! सभी रेस्ट्रां मे बार भी उपलब्ध हैं ताकि इनहॉउस ही मदिरापान का लुत्फ़ उठाया जा सके ! हालांकि दमन मे मुम्बई की अपेक्षा शराब बहुत सस्ती है लेकिन बार मे तो रेट महंगे ही मिलेंगे ! फिर भी पीने वालों को रेट नहीं टेस्ट की फिक्र होती है जो यहाँ पूर्ण होती है ! 



रात मे समुद्र तल इतना उपर आ चुका होता है कि पानी अब किनारे तक पहुंच चुका होता हैं ! यह एक अज़ब नज़ारा होता है कि जहां दिन मे दूर दूर तक पत्थर दिखाई देते हैं , वहीं सवेरा होने पर पानी ही पानी दिखाई देता है !  


हालांकि दो दिन का ब्रेक भी आपमे नई चुस्ती और स्फूर्ति का संचार कर सकता है और आप एक अच्छा सप्ताहंत मना सकते हैं , लेकिन यदि आप बीच और समुद्र मे नहाने के शौकीन हैं तो दमन मे बीच निराश ही करेगी ! यहाँ सिर्फ दो ही बीच हैं और दोनो ही काले रंग के पथरीले रेत और रोड़ियों से भरी हैं ! साथ ही पत्थरों के बीच पानी मे नहाना निश्चित ही खतरनाक है ! लेकिन यह शौक पूरा करने के लिये यहाँ एक वाटर पार्क है जिसमे कृत्रिम बीच बनाई गई है जहां आप समुद्र की लहरों का मज़ा ले सकते हैं जैसे टोरंटो के वंडरलेंड मे है ! इसके अलावा दमन मे कुछ विशेष नहीं है ! 
लेकिन निराश मत होइये , यदि आप प्रकृति के बीच घूमने के शौकीन हैं तो अगली पोस्ट पढ़ना मत भूलियेगा ! 


Sunday, July 27, 2014

हर सुबह की शाम होती है, लेकिन हर शाम के बाद सुबह भी आती है ---


रोजमर्रा की भाग दौड़ की ज़िदगी से हटकर यदि कुछ दिनों  के लिये भी आप शहर से दूर किसी पर्वतीय स्थल पर चले जाएं , तो तन और मन मे नई ऊर्ज़ा और स्फूर्ति का संचार हो जाता है 


पर्वतों की रानी मसूरी मे एक सुहानी सुबह , धुंध भरी ! वृक्ष भी जैसे मिलकर हमारा मनोरंजन करने के लिये तैयार थे !  




लेकिन शाम का धुंधलका सूर्य और बादलों के साथ आंख मिचौली खेलता हुआ , पर्वतीय धरा पर अपना रंगई जादू बिखेर रहा था ! 




पर्वतों मे कुछ ही दिन का आराम और सुबह की सैर , और रास्ते मे खोखे की चाय , जीवन को असली आनंद से भर देती है ! 




इस छोटे से स्तूप को अक्सर हम मिस कर जाते थे ! लेकिन देखिये तस्वीर मे कितना भव्य लग रहा है ! 





ये टेढ़े मेढ़े पहाड़ी रास्ते हमे बताते हैं कि जिंदगी कभी सीधी नहीं चलती ! इसमे ना जाने कितने मोड़ , उतार चढ़ाव और पड़ाव आते हैं !   




हमारे लिये तो हर यात्रा एक हनीमून जैसी होती है ! फिर आपकी शादी को तीन दिन हुए हों या तीस साल , क्या फर्क पड़ता है ! यह फोटो एक नवविवाहित युग्ल द्वारा ली गई है ! 




इस वृक्ष ने हमे सिखाया कि कैसे हर विपरीत परिस्थिति का सामना करते हुए अपने अस्तित्व को कायम रखा जा सकता है ! बहारें फिर भी आती हैं , फिर भी आयेंगी , बस हौसला बनाये रखना आवश्यक होता है ! 





अब पहाड़ी पर्यटक स्थलों पर भी ध्यान दिया जा रहा है ! यह अच्छी बात है ! 





दिल को सकूं पहुंचाती एक और सुहानी शाम ढलने वाली है !  




अगली भोर ने फिर अपनी सुंदरता बिखेर दी ! 




यहाँ मौसम भी घड़ी घड़ी अंगडाई लेता है ! कभी धूप कभी छाँव ! यही तो खूबसूरती है मसूरी की ! 




शहर मे ही घना जंगल हो तो वायु भी शुद्ध ही होती है ! बस इसे अशुद्ध ना कर दें , यह हमारा फ़र्ज़ है ! 





एक पैरामिलिट्री फोर्स के गेट के पास से मसूरी का यह नज़ारा बड़ा मनमोहक होता है ! कुछ देर तक निहारने के बाद जब हमने एक ज़वान से फोटो लेने का अनुरोध किया तो उसने बड़े प्यार से कहा कि सर मैं तो कब से इंतज़ार कर रहा था कि आप मुझे फोटो खींचने के लिये कहें ! फिर उसने धड़ाधड़ कई फोटो खींच डाले ! शायद उसे हम मे अपने माँ पिता नज़र आ रहे थे !  





हर सुबह की शाम होती है ! लेकिन हर शाम के बाद सुबह भी आती है ! यही संदेश देती हुई इस शाम के सुनहरे नज़ारे को आँखों मे भरकर हमने अगले दिन दिल्ली के लिये प्रस्थान करने की तैयारी की , मन मे एक बार फिर मसूरी आने की तमन्ना के साथ ! 

Sunday, May 18, 2014

जब हम रात के अंधेरे मे सुनसान सड़क पर फंस गए थे --- एक संस्मरण !


सन १९८१ की बात है. हम नए नए डॉक्टर बने थे . तभी कुछ मित्रों ने वैष्णों देवी जाने का प्रोग्राम बना लिया . एक चार्टर्ड बस कर मित्र समूह और कुछ अन्य परिवारों से बस भरी और रात के समय हम रवाना हो गए कटरा की ओर . रात मे १४ किलोमीटर की ट्रेकिंग , फिर आइस कोल्ड वाटर मे स्नान कर , भीड़ मे लाइन लगाकर गुफा मे प्रवेश और अंत मे क्या देखा , यह सोचते हुए वापसी , सब कुछ बड़ा एडवेन्चरस और मनोरंजक लगा था . बस मे भी क्योंकि युवाओं की भरमार थी , इसलिये पूरा सफ़र भी मज़ेदार रहा . 

लेकिन वापसी मे विचार बना कि चलो अमृतसर मे स्वर्ण मंदिर होकर आया जाये . शाम ढल चुकी थी , रात का खाना भी नहीं खाया था . प्रोग्राम यही था कि अमृतसर चलकर ही भोजन करेंगे . कटरा से निकलकर जल्दी ही सड़क सुनसान होने लगी थी . धीरे धीरे अंधेरा भी होने लगा था . युवा दिलों ने अंताक्षरी खेलनी शुरू कर दी . भक्ति भावना के बीच थोड़ी मस्ती भावना किसी को भी बुरी नहीं लग रही थी . सभी एन्जॉय कर रहे थे . तभी सरपट दौड़ती बस अचानक एक झटके के साथ रुक गई . उस वक्त रात के करीब ८ बजे थे . बाहर घनघोर अंधकार था . सड़क पर भी कहीं कोई लाइट नहीं थी . दूर दूर तक बस अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा था . ड्राईवर ने नीचे उतरकर चेक किया और बताया कि गाड़ी के इंजिन मे कोई पार्ट टूट गया है जो ठीक नहीं हो सकता . अब सुबह होने पर गेराज को ढूंढा जायेगा . तब तक वहीं रुकना पड़ेगा . 

यह सुनकर सब सकते मे आ गए . हालांकि खाना किसी ने नहीं खाया था , लेकिन सबके पास खाने का समान था . इसलिये खाने की चिंता किसी को नहीं थी . हमने भी उदारता दिखाते हुए सबसे पूछा कि यदि किसी को खाने के लिये कुछ चाहिये तो हमसे ले सकता है . लेकिन किसी को ज़रूरत नहीं थी , इसलिये हम अपना सा मूँह लेकर बैठ गए . आखिर सबने अपना अपना खाना निकाला और भोजन किया . लेकिन फिर जल्दी ही समस्या आई कि अब क्या किया जाये . बाहर ठंड थी , इसलिये गाड़ी के शीशे बंद थे . ऐसे मे लोगों ने सोना शुरू कर दिया . जल्दी ही सारी बस खर्राटों से गूंज रही थी . जिंदगी मे इतने विविध प्रकार के खर्राटे हमने कभी ना सुने थे , ना फिर कभी कही सुने . लेकिन थोड़ी देर बाद अंदर सांस घुटने लगा तो हमने सोचा कि चलो बाहर निकलकर देखते हैं . लेकिन बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी . 

एक तो ठंड , उपर से बारिश और घनघोर अंधेरा. ट्रैफिक भी बिल्कुल नहीं था . बिल्कुल सुनसान सड़क पर आधी रात मे हम समझ नहीं पा रहे थे कि जाएं तो कहाँ जाएं . यह भी नहीं पता था कि आस पास क्या है , है भी या नहीं . थोड़ा डर भी लगने लगा था . हालांकि उस वक्त पंजाब मे डर की कोई बात नहीं थी . किसी तरह तड़प तड़प कर रात गुजारी . सुबह हुई तो पता चला कि हम एक सुनसान इलाके मे खड़े थे जहां दूर दूर तक कोई इंसानी बस्ती नहीं थी . एक ट्रक वाले से पता चला कि वहां से दो किलोमीटर दूर एक ढाबा है जिस पर चाय मिल सकती है . अब तक सबके नक्शे ढीले हो चुके थे . अब हमारे चाय के प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया गया और हम भी रॉबिन हुड की तरह दिलेर होकर निकल पड़े ढाबे की ओर . हम तीन चार लड़कों ने एक बाल्टी मे चाय भरी , ढाबे मे जितनी भी ब्रेड थी , सभी थैले मे भरी और एक ट्रक मे लिफ्ट लेकर पहुंच गए अपनी बस मे जहां सब बेसब्री से हमारा या यूं कहिये चाय नाश्ते का इंतज़ार कर रहे थे . अब सबने चाय और ब्रेड ऐसे खाई जैसे बरसों के भूखे हों . दिन के ढाई बजे बस ठीक हुई और हम रात के दस बजे अमृतसर पहुंचे . हमारी किस्मत अच्छी थी या ये कहें कि गुरुद्वारे के लोग अच्छे थे , उन्होने हमे बंद होने के बावज़ूद अंदर प्रवेश करने दिया और हम पूरा गोल्डन टेम्पल देख सके . साथ ही हरमिंदर साहब के दर्शन भी कर सके . 

यह समय समय की ही बात होती है कि यही पृथ्वी कभी स्वर्ग , कभी नर्क नज़र आने लगती है . लेकिन स्वर्ग को नर्क मे परिवर्तित करने वाले भी हम ही होते हैं . यदि सौहार्दपूर्वक रहा जाये तो यही पृथ्वी स्वर्ग से कम नहीं है .   





Wednesday, March 12, 2014

यूँ तो अपने घर में भी है रोटी --- एक यात्रा संस्मरण !


देश विदेश में भ्रमण करने के बावज़ूद बैंगलोर कभी जाना नहीं हो पाया था।  इत्तेफ़ाक़ से यह अवसर मिला जब अभी बेटे के पास जाना हुआ। ऐसे में हम तो जो टिकेट सबसे सस्ती मिलती है , उसे ही बुक करा देते हैं।  संयोगवश इस बार आना जाना दोनों ही एयर इण्डिया से हुआ। जाते समय तो प्लेन साधारण सा ही था लेकिन वापसी में एयर इण्डिया का ड्रीमलाइनर  विमान मिला जिसमे बैठकर एक बार तो आनन्द आ गया।

एयर इण्डिया का एक लाभ तो यह मिलता है कि इसकी उड़ान टी- ३ से उड़ती है।  इसलिए एयरपोर्ट पर ही आधे पैसे वसूल हो जाते हैं।  उस पर फलाइट के दौरान जैसा भी सही , लेकिन खाना मुफ्त में मिलता है।हमें तो बैठते ही वो दिन याद आ गए जब पहली बार और तद्पश्चात एयर इण्डिया से यात्रा करते थे और बैठते ही सुन्दर सी विमान परिचारिका एक  ट्रे में टॉफियां और इयर प्लग लेकिन सेवा में हाज़िर हो जाती थी।  फिर टेक ऑफ़ करते ही पहले गर्मागर्म तौलिया हाथ मुँह पोंछने के लिए हाज़िर होता था।  और फिर खाना।  इस तरह एक महाराजा की तरह ही आपको ट्रीट किया जाता था।  लेकिन अब न महाराजा रहा , न वो आवभगत।  फिर भी , एयर इण्डिया से सफ़र करना एक सुखद अनुभव ही रहा।

यूँ तो बैंगलोर को देश  का आई टी हब कहा जाता है।  इसलिए उत्तर भारत से बहुत से युवा जॉब करने यहाँ आते हैं।  लेकिन यह  शहर बाकि बड़े शहरों की अपेक्षा थोड़ा महंगा है।  एयरपोर्ट से निकलते ही सड़क के दोनों ओर बहुत खूबसूरत हरियाली और फूलों की सजावट मिली।  हालाँकि प्री पेड़ टैक्सी बहुत महँगी थी , लेकिन बाहर टैक्सियों के रेट अपेक्षाकृत कम थे।  लेकिन शहर से दूर होने की वज़ह से समय और पैसा अतिरिक्त ही लगा।

यहाँ घूमने के लिए नेट पर कुछ स्थल अपनी पसंद के ढूंढें और हम पहुँच गए इस पैलेस में जिसे वड़ियार राजाओं ने बनवाया था।  महल में प्रवेश टिकेट ही इतना महंगा था कि एक बार तो सोचना पड़ा।  लेकिन फिर २२५ रूपये प्रति व्यक्ति देकर महल देखने का प्रलोभन छोड़ना असम्भव ही था।  आखिर , देखकर निराश तो नहीं ही हुए।  



बाहर लॉन से महल का दृश्य।





महल का एक कक्ष जो बैठक जैसा था।  गाइड के रूप में ऑडियो यंत्र दिए गए थे जिसमे रिकॉर्ड किये गए सन्देश द्वारा हर कक्ष के बारे में बताया गया था।




खूबसूरती से सजे आँगन में रखा एक आसन , सोफेनुमा।




मुख्य प्रवेश द्वार के सामने बना है यह बड़ा हॉल जिसमे शादियां होती हैं।  इसकी सजावट भी बेहद सुन्दर थी।





महल के बाहर लॉन में यह पेड़ सैकड़ों वर्ष पुराना लगता है।  इसने अपने अंदर कई और छोटे पेड़ छुपाये हुए हैं जिन्हे यह संरक्षण प्रदान करता है।

पेलेस से लौटे समय विधान सभा भवन आता है जो मेंन रोड पर ही है।



यह विधान सभा का नया भवन है।  पुरनी बिल्डिंग भी साथ ही है।





विधान सभा भवन के बाहर पेड़ों की छटा।


बैंगलोर की एक विशेषता तो यह लगी कि यहाँ कहीं भी हमें झुग्गी झोंपड़ी या अनधिकृत आवासीय कॉलोनी दिखाई नहीं दी , न ही कोई स्लम दिखा। सभी शहरों की तरह यहाँ भी एक महात्मा गांधी रोड़ है जो काफी आधुनिक साज सज्जा से परिपूर्ण है।  यह हैरानी की ही बात थी कि देश की राजधानी में भी एम् जी रोड है लेकिन वह महात्मा गांधी नहीं बल्कि मेहरौली गुडगाँव रोड कहलाती है। क्या महात्मा गांधी के नाम पर दिल्ली में इतना रोष है ?

परिवहन के रूप में यहाँ भी दिल्ली जैसी लो फलोर बसें थी लेकिन उनका किराया बहुत ज्यादा था।  टैक्सी सिर्फ फोन पर बुकिंग से ही मिलती हैं जिनका किराया भी ज्यादा ही लगा।  लेकिन सड़क पर ऑटो अवश्य मिल जाते हैं परन्तु वे कभी मीटर से चलने को राज़ी नहीं होते।  फल , सब्ज़ियाँ , दूध , खाने पीने की सभी चीज़ें दिल्ली के मुकाबले महँगी हैं।

लेकिन जो बात सबसे अच्छी है वो है यहाँ का मौसम।  लगता है यहाँ गर्मी तो कभी पड़ती ही नहीं , न ही ज्यादा ठण्ड होती है। शायद इसका कारण है इसकी समुद्र तल से ऊंचाई जो करीब ९०० मीटर है जबकि दिल्ली की ऊंचाई २०० मीटर ही है।  इसलिए यहाँ सुबह शाम मौसम बहुत सुहाना रहता है।  ठंडी हवायें जब लहरा कर आती हैं तो सारी महंगाई भूल सी जाती है।  यहाँ वायु प्रदुषण भी बहुत कम लगा। पानी और बिजली की किल्लत भी नज़र नहीं आई। लोग भी दिल्ली के मुकाबले ज्यादा सभ्य लगे।  सडकों पर थूकना भी दिखाई नहीं दिया।  विशेष तौर पर एक बात अच्छी यह लगी कि यहाँ लगभग सभी हिंदी समझते भी हैं और बोलते भी हैं।  एक ग्राहक को दुकानदार से हिंदी में बात करते हुए देखकर अति प्रसन्नता हुई क्योंकि दोनों ही दक्षिण भारतीय थे।

लेकिन वापस आते समय यही महसूस हुआ कि जहाँ हमारे पडोसी बैंगलोर से आकर दिल्ली में बसे हैं , वहीँ दिल्ली वाले जॉब करने बैंगलोर जा रहे हैं। आखिर घर में भी होती है रोटी ! लेकिन लगता है , समय के साथ यह परिवर्तन भी अनिवार्य है अब तो जिसके साथ ही जीना है।




Sunday, September 22, 2013

एक दिन अवध के नाम जहाँ लोग करते थे पहले आप , पहले आप --


आज से लगभग तीस वर्ष पहले जब पहली बार एयर इंडिया के महाराजा से हवाई यात्रा की थी तब स्वयं को एक वी आई पी जैसा महसूस किया था. यह एयरलाइन भी तब यात्रियों के साथ शाही मेहमान की तरह ही व्यवहार करती थी. सबसे पहले तो विमान में बैठते ही अत्यंत सुन्दर परियों सी एयर होस्टेस के दर्शन होते थे. फिर वो अपने सुन्दर हाथों से टॉफी परोसती थीं. हमें याद है जब पहली बार हमने हवाई यात्रा की और एयर होस्टेस जब एक ट्रे में इयर प्लग और टॉफियाँ लेकर आई तब हमने तो डरते डरते एक ही टॉफी उठाई, लेकिन साथ वाली सीट पर बैठे एक महानुभव ने जब मुट्ठी भरकर टॉफियाँ उठाई तब एयर हॉस्टेस ने उसे अजीब सी निगाहों से देखा था. उसके बाद आरंभिक औपचारिकताओं के बाद जब प्लेन उड़ान भर चुका और बेल्ट खोलने का संकेत हुआ तो फ़ौरन एयर हॉस्टेस प्लेट में कुछ लेकर हाज़िर थी. हमने सुना था कि एयर इंडिया वाले उड़ान के दौरान बहुत खातिरदारी करते हैं. लेकिन जब प्लेट में अनेक क्रीम रोल्स रखे नज़र आये तो यह देखकर बड़ी हैरानी हुई कि खाने की शुरुआत क्रीम रोल से ! लेकिन जब हाथ में आया तब समझ में आया कि वे सफ़ेद रंग के रोल्स खाने के क्रीम रोल्स नहीं बल्कि मूंह पोंछने के लिए गर्म गीले तौलिये थे. खैर , हाथ मूंह पोंछकर हम खाने के लिए तैयार थे और खाना भी खूब खिलाया गया. 

लेकिन अभी जब एक बार फिर एयर इंडिया से यात्रा करने का अवसर मिला तो लगा कि वक्त कितना बदल गया है. एयर हॉस्टेस तो अब भी थीं लेकिन आकर्षक सिर्फ साड़ियाँ ही थीं. खाने पीने के नाम पर बस एक दो सौ एम् एल की जूस की बोतल और दो बिस्कुट। दो सौ एम् एल की पानी की बोतल भी बस मांगने पर ही. वापसी में तो बिस्कुट की जगह २ ५ ग्राम भुनी हुई मूंगफली जिसे खाकर सभी ऐसे आनंदित हो रहे थे जैसे रेगिस्तान में बिसलेरी मिल गई हो. लगता है अब वो दिन भी दूर नहीं जब अगली बार भुने हुए चने खाकर ही संतोष करना पड़ेगा।                 
 


अगली सीट की बैक पर लगे मोनिटर में यह सन्देश उड़ान के पूरे समय आता रहा. लेकिन गंतव्य शहर आ गया पर कार्यक्रम आरम्भ नहीं हुआ. आखिर आते जाते दोनों समय द्वार पर हाथ जोड़े खड़ी एयर हॉस्टेस की मधुर मुस्कान से ही महाराजा होने का क्षणिक अहसास हुआ.

बेड टी घर पर , नाश्ता और लंच लखनऊ में , फिर डिनर वापस घर आकर. अक्सर ऐसा कार्यक्रम कॉर्पोरेट जगत में देखा जाता है. लेकिन कुछ ऐसा ही हुआ हमारे साथ , जीवन में पहली बार. गुजरे ज़माने में नवाबों की नगरी लखनऊ के बारे में सुना था कि यह कोई विशेष शहर नहीं। हालाँकि लखनवी तहज़ीब के बारे में बहुत सुना था. लेकिन पता चला कि सुश्री मायावती जी ने इस शहर की कायापलट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।       


गोमती नदी के किनारे बने डॉ भीम राव अम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल द्वार से होकर नदी पार कर पहुँचते हैं धोलपुर पत्थर से बने  स्थल पर.



गोमती नदी के पार एक बहुत बड़े क्षेत्र में बना है यह पत्थरों का शहर जो निश्चित ही देखने में बड़ा चक्षु प्रिय लगता है. इस भवन में बना है एक ऑडिटोरियम।



नदी के किनारे किनारे यह सड़क जिसके दोनों ओर शाम के समय बैठकर निश्चित ही रोजमर्रा की भाग दौड़ की जिंदगी से काफी राहत मिलती होगी।

इसी के दूसरी ओर कई दुकानें बनाई गई थी जो अब खाली पड़ी थी. पता चला यहाँ शाम को शानदार मेला सा लगता है. वास्तव में यह स्थान लखनऊ वासियों के लिए एक नया जीवन दान देने वाला लगता है.

बेशक इसे बनाने में सरकार या यूँ कहिये की पब्लिक फंड को भारी मात्रा में लगाया गया होगा। लेकिन अब इन्हें यूँ बेकद्री से पड़े देखकर आजकल की राजनीति पर क्षोभ ही होता है. राजनीतिक पार्टियों के  बीच फंसकर यदि कोई बेवकूफ़ बनता है तो वह आम जनता ही है. नेता लोग तो अपने व्हिम्स और फेंसी के तहत अपनी मनमर्जी करते हैं और जनता बेचारी खड़ी बस तमाशा देखती रह जाती है.