Monday, October 9, 2017

लेह दर्शन -- दूसरा दिन :

लेह पहुँचने पर पहला दिन आराम करते हुए ही बिताना चाहिए ताकि आप अपने शरीर को जलवायु अनुसार ढाल सकें। इससे आपको ऊँचाई के कारण होने वाली कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा। दूसरे दिन नाश्ते के बाद आप निकल पड़ते हैं लेह के स्थानीय स्थलों के दर्शन के लिए।



लेह शहर लेह घाटी में बसा हुआ है। इसके चारों ओर हलके भूरे रंग के नंगे पहाड़ दिखाई देते हैं।




लेकिन घाटी और शहर में हरियाली है। शहर में होटलों की बहुतायत है और हर बजट के लोगों के लिए यहाँ आवास उपलब्ध है। 




लेह बाज़ार :  यहाँ जितनी साफ़ सफाई नज़र आई , इतनी किसी और हिल स्टेशन पर कभी नहीं दिखी। बीच में पक्का फर्श और बैठने के लिए बेंच बने हैं जिसके दोनों ओर दुकानों की कतारें हैं जिनमे लगभग हर तरह का सामान मिलता है।  हालाँकि सारा सामान श्रीनगर या दिल्ली आदि से ही आता है। इसलिए सामान्य से ज़रा ज्यादा दाम पर ही मिलेगा। यहीं पर एक गुरुद्वारा , मस्जिद , पोस्ट ऑफिस , बैंक और पर्यटन सूचना केंद्र भी हैं।   



पहले दिन के टूर के आरम्भ में सबसे पहले आप पहुंचते हैं , लेह श्रीनगर राजमार्ग पर बने सेना द्वारा नियंत्रित 'हॉल ऑफ़ फेम' जो वास्तव में इस क्षेत्र में शहीद हुए सैनिकों का स्मृति स्थल है।  यहाँ एक म्यूजियम है जहाँ सेना की चौकसी से सम्बंधित सभी उपकरण प्रदर्शित किये गए हैं और ऐतिहासिक घटनाओं का विवरण दिया गया है।




बाहर खुले अहाते में शहीद स्मारक और शहीदों की याद में पत्थर भी लगाए गए हैं। आप स्वयं ही शहीदों की याद में नतमस्तक हो जाते हैं। यहाँ ८० रूपये का एंट्री टिकट है।



चारों और खूबसूरत पहाड़ियों से घिरा यह स्थल बेहद मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है।





लेह से २५ मील दूर इसी हाइवे पर बना है गुरुद्वारा पत्थर साहब।  कहते हैं यहाँ गुरु नानक जी ने तपस्या की थी लेकिन एक राक्षस लोगों को बहुत तंग करता था। एक बार उसने एक बहुत बड़ा पत्थर लुढ़का कर नानक जी को मारने का प्रयास किया लेकिन उनके प्रताप से पत्थर पिघल कर मोम जैसा नर्म हो गया। राक्षस ने जब पैर मारा तो उसका पैर पत्थर में धंस गया जो आज भी वहां मौजूद है।   




यहाँ से थोड़ा सा आगे जाने पर एक जगह आती है जिसे मेग्नेटिक हिल कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि यहाँ सड़क पर एक सुनिश्चित जगह पर गाड़ी न्यूट्रल में खड़ी करने पर वह अपने आप ऊपर की ओर चलने लगती है।  हालाँकि ऐसा लगा नहीं क्योंकि उस स्थान के दोनों ओर ढलान नज़र आ रही थी और गाड़ियां भी स्थिर ही थीं। 





आगे जाकर सैम वैली के रास्ते में आता है जंस्कार और इंडस ( इन्दु ) नदियों का संगम जो ऊँचाई से बहुत खूबसूरत दिखाई देता है। यहाँ राफ्टिंग भी कराई जाती है और चाय पानी का इंतज़ाम है। 





वापसी में लेह एयरपोर्ट के पास है स्पितुक मोनास्ट्री जिसकी ऊँचाई से चारों घाटी और पहाड़ों का अद्भुत दृश्य नज़र आता है।  यहीं पर काली माता का मंदिर भी है जिसमे लोग तेल की बोतल , जूस आदि चढ़ाते हैं।  हालाँकि यहाँ कोई पंडित या संरक्षक नज़र नहीं आया। तेल की बोतलों के भंडार देखकर बड़ा अजीब लगा लेकिन स्थानीय लोगों की मान्यताओं के आगे नतमस्तक होना ही पड़ता है।   सामने लेह एयरपोर्ट नज़र आ रहा है।




दोपहर तक वापस आकर होटल में खाना खाकर धूप में बैठने का भी अपना ही आनंद था।



शाम के समय सूर्यास्त से पहले ८ किलोमीटर की दूरी पर एक पहाड़ी पर बने स्पितुक गोम्पा अवश्य जाना चाहिए।  यहाँ से चारों ओर की पहाड़ियों पर पड़ती सूर्य की किरणें और उनसे बदलता रंग बेहद खूबसूरत लगता है।  साथ ही इंडस रिवर और घाटी की हरियाली देखकर मन प्रसन्न हो जाता है।

इसके अलावा लेह बाजार के छोर पर बस्ती की गलियों से होकर एक रास्ता जाता है लेह पैलेस के लिए जो एक ऊंची पहाड़ी पर बना ९ मंज़िला भवन है जिसे लकड़ी से बनाया गया है और दीवारों पर मिटटी का लेप है।  यहाँ से भी घाटी का दृश्य बहुत सुन्दर और मनभावन होता है। रात में स्वादिष्ट खाने के बाद आराम कर हम तैयार हो जाते हैं नुब्रा वैली के लिए प्रस्थान करने के लिए। 



3 comments:

  1. मैगनेटिक हिल में हमें भी ऐसा कुछ नहीं लगा था। हम तो बाइक पर थे ढलान साफ दिखती है। हो सकता है हवाई जहाज में कुछ फर्क पडता हो।

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  2. बहुत सुंदर चित्रण

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (10-10-2017) को
    "थूकना अच्छा नहीं" चर्चामंच 2753
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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