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Saturday, July 1, 2017

ब्लॉग दिवस पर ब्लॉग्स पर ब्लॉगर्स की वापसी पर सभी को बधाई ---


हमने ब्लॉगिंग की शुरुआत की थी १ जनवरी २००९ को जब नव वर्ष की शुभकामनाओं पर पहली पोस्ट लिखी थी एक कविता के रूप में। फिर ५ -६ वर्ष तक जम कर ब्लॉगिंग की और ५०० से ज्यादा पोस्ट्स डाली।  लेकिन फिर फेसबुक ने कब्ज़ा कर लिया और सब ब्लॉगर्स फेसबुक पर आ गए और ब्लॉग्स सूने हो गए। इस बीच हमने भी अपने चिकित्सीय जीवन के ३५ वर्ष पूरे किये और अंतत: ३० अप्रैल २०१६ को सरकारी सेवा से सेवानिवृत हो गए। उस समय तो कुछ यूँ महसूस हुआ कि --

एक बात हमको बिलकुल भी नहीं भाती है,
कि आजकल ६० की उम्र इतनी जल्दी आ जाती है !

लेकिन फिर यह भी महसूस हुआ कि ---

मोह जब टूटा तो हमने ये जाना ,
कितना कम सामान चाहिए , जीने के लिए।

लेकिन बहुत से लोग ऐसे हैं जो जिंदगी भर चिपटे रहते हैं पैसे कमाने की होड़ से।  उनको देखकर ज़ेहन में ये पंक्तियाँ आती हैं --

भरी जवानी में धर्म कर्म करने लगे हैं ,
मियां जाने किस जुर्म से डरने लगे हैं।
साथ लेकर जायेंगे जैसे जो था कमाया ,
बक्सों में सारा ऐसे सामान भरने लगे हैं।

लेकिन हमने तो यही देखा है कि रिटायर होने के बाद इंसान की आवश्यकताएं एकदम से कम हो जाती हैं।

तन पर वस्त्र हों और खाने के लिए दो रोटी ,
फिर बस नीम्बू पानी चाहिए पीने के लिए।

लेकिन फिर एक प्रॉब्लम अवश्य सामने आने लगती है।  होता ये हैं कि अब जब भी हम घर से बाहर निकलते हैं और कोई मिलता है तो एक ही सवाल पूछता है --  आजकल क्या कर रहे हो ? आरम्भ में तो हम कहते रहे कि भई बहुत काम किया , अब थोड़ा आराम किया जाये।  लेकिन धीरे धीरे यह सवाल हमें भी खटकने लगा।  इसलिए हमने भर से बाहर निकलना ही बंद कर दिया।  लेकिन फिर एक और मुसीबत आ गई।  अब पत्नी शाम को घर आते ही पूछने लगी
कि बताइये , आज दिन भर क्या किया। अब यह तो हमारी स्वतंत्रता और पुरुषत्व दोनों पर आघात सा लगता था।  इसलिए हमने एक दिन जिम ज्वाइन कर लिया।  अब जब पत्नी पूछती है तो हम कहते हैं -- देखिये आपके जाने के एक घंटे बाद हम जिम गए , दो घंटे जिम में लगाए , फिर घर आकर एक घंटे बाद नहाकर खाना खाया और तीन घंटे के लिए सो गए। इस तरह बज गए शाम के चार और दिन पूरा।  लेकिन पत्नी तो पत्नी होती है।  अब उनका अगला सवाल होता है कि बताओ , कितनी मसल्स बनी ।  अब हम उन्हें कैसे समझाएं कि रोम एक दिन में नहीं बसा था। अरे भई भूतपूर्व जवान की मसल्स हैं , सोचते समझते धीरे धीरे ही बनेंगी।

वैसे जिम का नज़ारा भी बड़ा अजीब होता है। युवा लड़के , लड़कियां , गृहणियां , कुछ मोटे पेट वाले थुलथुल अधेड़ आयु के लोग , सब किस्म के प्राणी मिल जायेंगे बिगड़ी हुई फिगर को संवारने में जुटे हुए। अधिकतर लड़कियां तो ऐसा लगता है कि टाइम पास करने ही आती हैं। लेकिन युवक अवश्य मेहनत करते हुए मसल्स बनाने में गंभीर नज़र आते हैं। सबसे ज्यादा अजीब लगता है ट्रेनर्स को देखकर।  बेचारे ३० तक की गिनती इंग्लिश में सीख कर सारे दिन दोहराते रहते हैं जैसे स्कूल में पहली दूसरी क्लास में रटाया जाता था। कई बार दिलचस्प दृश्य भी देखने में आ जाते हैं। जैसे --  

सुन्दर मुखड़ा देखकर ज़िम ट्रेनर के चेहरे पर चमक आ गई ,
पहली बार आई लड़की की भोली सूरत उसके मन को भा गई।
उसने अपने हाथों से पकड़ कर उसको एक घंटा कसरत कराई ,
पर दिल टूट गया जब जाते जाते अपने पति का पता बता गई !

खैर अब हम दोस्तों को तो यही सुनाते हैं --

एक मित्र मिले बोले भैया , आजकल किस चक्कर में रहते हो ,
इस महंगाई में बिना जॉब के , कैसे गुजर बसर करते हो !
क्या रखा है बेवज़ह घूमने में , कुछ तो काम काज करो ,
कब तक खाली घर बैठोगे , कुछ तो शर्म लिहाज़ करो ।
हम बोले किया काम ताउम्र , अब तो पूर्ण विराम करो ,
इस दौड़ धूप में क्या रखा है , आराम करो आराम करो।

बचपन से लेकर जवानी , गृहस्थी , सरकारी नौकरी का कार्यकाल , सब पूरे हुए। अब वानप्रस्थ आश्रम में आकर वन के लिए तो प्रस्थान नहीं करना है , लेकिन मुक्त और स्वच्छंद भाव से विभिन्न कार्यकलापों द्वारा जनमानस के हित में कार्य करते रहने का संकल्प लिया है जिसे पूरा करना है। अपना तो यही कहँ अहइ कि --- हँसते रहो , हंसाते रहो।  क्योंकि ---

जो लोग हँसते हैं , वे अपना तनाव भगाते हैं ,
जो लोग हंसाते हैं , वे दूसरों के तनाव हटाते हैं।
हँसाना भी एक परोपकारी काम है दुनिया में ,
इसलिए हम तो सदा हंसी की ही दवा पिलाते हैं।

सभी को ब्लॉग दिवस , डॉक्टर्स डे , CA डे , GST और कनाडा में रहले वाले दोस्तों को कनाडा डे की बहुत बहुत बधाई।  


      

Tuesday, July 2, 2013

कुछ लोगों की वज़ह से सारे प्रोफेशन को बदनाम न करें --- डॉक्टर्स डे पर विशेष।


डॉ बी सी रॉय की याद में मनाये जाने वाले डॉक्टर्स डे पर सुबह सुबह फेसबुक पर डॉक्टर्स के बारे में मित्रों के विचार पढ़कर बड़ा मूड ख़राब हुआ। इन्हें पढ़कर हम जैसे दिल से कभी न लगाने वाले के भी दिल को सचमुच धक्का सा लगा कि मित्रगण भी डॉक्टर्स के बारे में ऐसा विचार रखते हैं। इस अवसर पर हमने भी अस्पताल में सभी डॉक्टर्स की मीटिंग बुलाई थी, संबोधित करने के लिए। आइये आपको भी अवगत कराते हैं, इस अवसर पर हुई मंत्रणा से :

मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के समय अक्सर सीनियर्स फ्रेशर्स से एक सवाल पूछते हैं -- डॉक्टर क्यों बनना चाहते हो ? इस पर अक्सर फ्रेशर्स का ज़वाब होता है -- मरीजों की सेवा करने के लिए। यह सुनकर सभी जमकर ठहाका लगाते हैं -- देखो यह देशभक्त मरीजों की सेवा करना चाहता है। फ्रेशर को उस समय इस ठहाके का अर्थ समझ नहीं आता। समझ में आता है जब वह शिक्षा पूर्ण कर सड़क पर आता है , जीविका उपार्जन के लिए।

हमने आठवीं पास कर जब नवीं कक्षा में बायोलोजी विषय चुना तब लोगों न कहा -- अच्छा डॉक्टर बनना चाहते हो ! तब जाकर हमें पता चला कि बायोलोजी लेने से डॉक्टर बनते हैं। लेकिन आजकल न सिर्फ अभिभावक बल्कि बच्चे भी पैदा होते ही करियर की बात करने लगते हैं और इसके प्रति अत्यंत जागरूक होते हैं। हालाँकि आजकल मेडिकल और इंजीनियरिंग के अलावा छात्रों के सामने और बहुत से विकल्प उपलब्ध हैं,फिर भी मेडिकल प्रोफेशन का आकर्षण अभी भी बरक़रार है। इसलिए अभी भी डॉक्टर्स को क्रीम ऑफ़ द सोसायटी कहा जाता है।

हमने जब मेडिकल में एडमिशन लिया तब कोचिंग की न सुविधा थी , न ही सामर्थ्य। लेकिन अब बच्चे को अभिभावक नवीं कक्षा से ही मेडिकल एडमिशन की कोचिंग के लिए तैयार कर देते हैं। विधालय के साथ साथ चार साल की कोचिंग बच्चों के लिए कितना बड़ा बोझ होता है , यह आसानी से समझा जा सकता है। कमरतोड़ मेहनत और लाखों रूपये खर्च करने के बाद भी एडमिशन की कोई गारंटी नहीं होती। एडमिशन हो गया तो पांच वर्ष के लिए सारी दुनिया को भूलकर किताबी कीड़ा बनना पड़ता है। इस बीच ग्रेजुएशन करते करते पी जी की तैयारी शुरू हो जाती है। फिर दो साल की कोचिंग , पी जी एडमिशन के लिए। जिसे नहीं मिलता , वह प्राइवेट अस्पताल में पैसा देकर पी जी करता है जिसके लिए कितना रुपया देना पड़ता है , यह बताना भी संभव नहीं।

तीन साल तक पी जी करने के बाद तीन वर्ष की सीनियर रेजीडेंसी करनी पड़ती है। इसके बाद एक डॉक्टर फेकल्टी या कंसल्टेंट की पोस्ट के लिए एलिजिबल होता है। इस समय तक उसकी उम्र करीब ३० वर्ष हो चुकी होती है। लेकिन सरकारी अस्पताल में मुश्किल से १ % लोगों को जॉब मिलता है। बाकि सभी प्राइवेट अस्पतालों की ओर रुख करते हैं जहाँ आजकल डी एम् / एम सी एच की डिग्री के बिना आप घुस ही नहीं सकते। यानि फिर दो साल की एक और डिग्री जिसकी सीट्स बहुत कम होती हैं। इस तरह यदि भाग्य ने पूर्ण साथ दिया तो ३५ वर्ष की आयु में एक डॉक्टर अपनी जिंदगी शुरू करता है।

जो डॉक्टर इतना सब हासिल नहीं कर पाते उनके लिए एक ही रास्ता है कि वो लाखों रूपये लगाकर एक क्लिनिक खोल कर जनरल प्रेक्टिस करें जहाँ उनका कॉम्पिटिशन होता है अंगूठा छाप / झोला छाप क्वेक्स से जिन पर सरकार का भी कोई नियंत्रण नहीं है। सारे रूल्स रेगुलेशंस भी क्वालिफाइड डॉक्टर्स पर ही लागु होते हैं। दिन रात की मेहनत के बाद भी सारे डॉक्टर्स अच्छा पैसा कमा लेते हों , ऐसा भ्रम ही है।

बेशक डॉक्टर्स भी इन्सान ही होते हैं और उनकी भी ज़रूरतें वही होती हैं जो बाकि सब की होती हैं। हालाँकि भ्रष्टाचार से प्रभावित होने को कदापि सही नहीं ठहराया जा सकता, और न ही शिक्षा पर अत्यधिक खर्च होने से भ्रष्ट होने का तर्क स्वीकार्य है। फिर भी , वर्तमान परिवेश में जहाँ रोगी एक कस्टमर होता है और उसे कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट में डॉक्टर के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने का प्रावधान प्राप्त है, ऐसे में डॉक्टर का अतिरिक्त सावधान होना अनिवार्य है। नतीजन , उपचार की कीमत बढ़ जाती है। हालाँकि, डॉक्टर्स में भी ऐसे कई मिल जायेंगे जो हिप्पोक्रेटिक ओथ को भूलकर सिर्फ पैसे के पीछे दौड़ते हैं। फिर भी एक डॉक्टर ही होता है जो दर्द से तड़पते , कराहते या घायल रोगी को अपनी योग्यता से नया जीवन प्रदान करता है।

आज भले ही उपचार की अनेक तकनीक या विधाएं उपलब्ध हों , लेकिन बात जब शल्य चिकित्सा की आती है तब एक एलोपेथिक डॉक्टर निश्चित ही भगवान से कम नहीं होता। बाई पास सर्जरी हो या सिजेरियन , ऑर्गन ट्रांसप्लांट हो या डायलिसिस , आई वी एफ से संतान उत्पत्ति का सुख मिले या लासिक से दृष्टि दोष से मुक्ति , आधुनिक चिकित्सा का कोई विकल्प नहीं है। ऑपरेशन थियेटर के बाहर खड़े मरीज़ के रिश्तेदारों के लिए डॉक्टर सिर्फ और सिर्फ भगवान ही होता है क्योंकि उस समय रोगी की जिंदगी लगभग उसी के हाथों में होती है। ज़ाहिर है , रोगी को भी डॉक्टर पर विश्वास कर अपनी जिंदगी उसे सौपनी पड़ती है। अंत में किसी विरले केस को छोड़कर लगभग सभी रोगी जब निश्चेतना से बाहर आते हैं तब उसकी सांसें किसी दूसरी जिंदगी से कम नहीं होती।

अत: मित्रो , सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के वातावरण में रह कर भी डॉक्टर्स हमारे जीवन दाता होते हैं, इस बात से नकारा नहीं जा सकता। ऐसे में सिर्फ भड़ास निकालने के लिए डॉक्टर्स को दोष न देकर, आइये उस भगवान से प्रार्थना करें कि कभी इस भगवान के पास जाना न पड़े, क्योंकि यदि जाना ही पड़ा तो यही भगवान आपको उस भगवान के पास असमय जाने से रोक सकता है। लॉन्ग लिव डॉक्टर्स !             

नोट : अच्छे बुरे लोग सभी जगह होते हैं , इसलिए कुछ लोगों की वज़ह से सारे प्रोफेशन को बदनाम न करें , यही गुजारिश है ।    

   

Monday, July 19, 2010

डॉक्टर्स डे पर मिला चिकित्सा रत्न पुरस्कार ----

अक्सर यह देखने में आता है कि कोई भी एसोसिएशन अपने सदस्यों के लिए ही काम करती है । लेकिन दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन एक ऐसी संस्था है जो न सिर्फ अपने डॉक्टर सदस्यों के हित के लिए कार्य करती है , बल्कि समूचे समाज के उत्थान के लिए भी कार्यरत रहीं है ।

सन १९१४ में स्थापित दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन जल्दी ही १०० वर्ष पूरे करने की ओर अग्रसर है

दिल्ली
मेडिकल एसोसिएशन में १०,००० से भी ज्यादा डॉक्टर्स सदस्य हैं ।डॉक्टर्स के लिए नवीनतम जानकारी जुटाने से लेकर , निजी क्लिनिक्स , नर्सिंग होम्स , प्राइवेट अस्पतालों के साथ साथ सरकारी डॉक्टर्स के हितों की खातिर कार्य करना , सभी सरकारी राजकीय और राष्ट्रिय कार्यक्रमों में हिस्सा लेना और समय समय पर तरह तरह के कैम्प लगाकर जनता की सेवा करना , इस संस्था के मुख्य कार्य रहे हैं ।

यूँ तो दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन हर वर्ष बेहतर कार्य करने वाले डॉक्टर मित्रों को समय समय पर सम्मानित कर प्रोत्साहित करती रहती है । किन्तु इस वर्ष डॉक्टर्स डे पर डी एम् ए ने दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ चुनिन्दा डॉक्टर्स को एक विशेष सम्मान से सुशोभित किया --चिकित्सा रत्न पुरस्का देकर ।

चिकित्सा रत्न अवार्ड प्राप्त करने वालों में दिल्ली के सभी बड़े बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों के विश्व विख्यात चिकित्सक और सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य विभागों के उच्च अधिकारियों समेत दिल्ली के कई जाने माने डॉक्टर्स शामिल थे ।समारोह में दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के सभी हू हू उपस्थित थे ।

यह
मेरा सौभाग्य रहा कि यह सम्मान मुझे भी प्राप्त हुआ


दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ नरेंद्र सैनी पुरस्कार प्रदान करते हुए


ऐसे समारोह में अक्सर अवार्ड पाने वालों को कुछ बोलने का अवसर दिया जाता है । लेकिन समय की कमी होने की वज़ह से इसे नज़रअंदाज़ करना पड़ रहा था ।

पुरस्कार वितरण समारोह में जब हमारा नाम पुकारा गया और हम अवार्ड लेने मंच पर पहुंचे तब एक अज़ीबो ग़रीब स्थिति उत्त्पन्न हो गई । एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ सैनी ने अपने हाथ पीछे खींचते हुए कहा --आप तो लाफ्टर चैम्पियन हैं , आपको अवार्ड तब मिलेगा जब आप कुछ सुनायेंगे ।

अब इस अप्रत्याशित आक्रमण के लिए तो हम तैयार नहीं थे । फिर भी क्योंकि माइक हाथ में थमा दिया गया था , इसलिए बचने का कोई रास्ता भी नहीं था ।

सो
हमने कहा कि भाई --

जब समय की हो कमी
और सामने हो नेता या कवि
तो भूले से भी माइक न दो कभी ।

क्योंकि नेता तो फिर किसी और मीटिंग में जाने के लिए जल्दी से खिसक लेंगे , परन्तु एक कवि के हाथ में माइक आ गया तो फिर वापस लेना मुश्किल हो जायेगा ।
अब यह सुनकर वो भी घबरा गए और तुरंत माइक हम से लेकर अवार्ड हमें सौंप दिया ।

अब यह सम्मान प्राप्त करने के बाद हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है ।

लेकिन जिम्मेदारियों से क्या डरना । यही तो मनुष्य को मज़बूत बनाती हैं ।