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Monday, December 11, 2017

दोष डॉक्टर्स का नहीं , अस्पतालों का है ---


यह कहावत तो आपने सुनी ही होगी। कुछ ऐसी ही हालत हो गई है आजकल मेडिकल प्रॉफ़ेशन की।  नोबल प्रॉफ़ेशन कहलाये जाने वाले चिकित्सा जगत में डॉक्टर्स को कभी भगवान माना जाता था।  लेकिन अब नहीं , बल्कि अब तो डॉक्टर्स पर आए दिन हमले और दुर्व्यवहार होते जा रहे हैं। इसका मुख्य कारण है आम जनता के लिए समुचित चिकित्सा सम्बन्धी सेवाओं का उपलब्ध न होना। हमारे देश में मुख्य रूप से चिकित्सा सेवाएं दो तरह से प्रदान की जा रही हैं।  एक सरकारी अस्पताल और डिस्पेंसरीज।  दूसरे प्राइवेट अस्पताल , नर्सिंग होम्स और क्लिनिक्स।  लेकिन जब से निजी अस्पतालों पर कॉर्पोरेट का कब्ज़ा हुआ है तब से न सिर्फ छोटे नर्सिंग होम्स बंद हो गए हैं या बंद होने की कगार पर हैं , बल्कि इन फाइव स्टार अस्पतालों का एक छत्र राज होता जा रहा है।  अधिकांश प्राइवेट अस्पताल बड़े बिजनेस घरानों द्वारा चलाये जा रहे हैं।  उनका मुख्य उद्देश्य पैसा कमाना होता है।  बेशक , बड़ी इन्वेस्टमेंट द्वारा ये अस्पताल सब तरह के आधुनिक उपकरण और सुविधाएँ मुहैया कराने में सफल रहते हैं , लेकिन यहाँ इलाज कराना इतना महंगा पड़ता है कि या तो यह आम आदमी की पहुँच से बाहर होता है या फिर वे अपना पेट काटकर इलाज कराते हैं।

लेकिन अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर के भी जब या तो रोगी की मृत्यु हो जाती है या ज़रुरत से ज्यादा और अपेक्षित रूप से ज्यादा बड़ा बिल सामने आता है तो रोगी के सम्बन्धी दुर्व्यवहार पर उतर आते हैं।  हालाँकि लोगों को इस तरह स्वास्थ्यकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार करने का कोई अधिकार नहीं है , और मार पीट तथा तोड़ फोड़ तो निश्चित ही गैर कानूनी है।  लेकिन अक्सर भावनाओं में बहकर लोग यह धृष्टता कर बैठते हैं। रोगियों के रिश्तेदारों की इन प्रतिक्रियाओं को किसी भी रूप में सही नहीं ठहराया जा सकता और न्यायालय द्वारा उन पर यथोचित कानूनी कार्यवाई करने का प्रावधान है। लेकिन इस के बावजूद कभी कभी तोड़ फोड़ की बड़ी घटनाएं घट जाती हैं जो निंदनीय हैं।

जहाँ जनता को भी यह समझना होगा कि वास्तव में डॉक्टर्स भगवान नहीं होते।  वे केवल उपचार करते हैं और सही उपचार से अधिकांश रोगी रोगमुक्त भी हो जाते हैं।  लेकिन डॉक्टर्स किसी को भी अमर नहीं कर सकते।  डॉक्टर क्या भगवान भी किसी को अमर नहीं बनाता।  यदि ऐसा होता तो दुनिया में किसी की मृत्यु ही नहीं होती। एक डॉक्टर केवल रोग का उपचार करता है , दर्द का निवारण करता है और गंभीर रोगों का भी दवा या शल्य चिकित्सा द्वारा उपचार कर रोगी को रोगमुक्त करता है।  लेकिन जितनी आयु विधाता ने निश्चित कर दी , उस से एक दिन ज्यादा भी कोई नहीं जिन्दा रख सकता।  यह बात जनता को समझानी पड़ेगी और उन्हें समझनी पड़ेगी।

तथापि चिकित्सा जगत को भी अपनी कार्यप्रणाली में कुछ सुधार लाना आवश्यक हैं। अति आधुनिक कॉर्पोरेट अस्पतालों को सिर्फ अपने आर्थिक लाभ के बारे में न सोचकर , अपने सामाजिक उत्तरदायित्त्व के बारे में भी सोचना होगा। यदि पैसा ही कमाना है तो और बहुत से व्यवसाय हैं।  कम से कम चिकित्सा को धंधा और अस्पतालों को पैसा कमाने की मशीन तो न बनाया जाये। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि कोई भी डॉक्टर जान बूझ कर कभी किसी रोगी के साथ लापरवाही नहीं बरतता।  बल्कि सरकारी हो या प्राइवेट , हर डॉक्टर के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक और सुखद अनुभव होता है जब उसका रोगी उसके उपचार से ठीक हो जाता है। रोगी का सही उपचार करना सभी डॉक्टर्स के लिए एक चुनौती होती है जिसे स्वीकार करना एक डॉक्टर का पेशा ही नहीं बल्कि धर्म होता है और हर डॉक्टर उसे बखूबी निभाने की कोशिश करता है।

यहाँ सरकार की भी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। भले ही आम आदमी के लिए सरकारी अस्पतालों में मुफ्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध है , लेकिन एक ओर रोगियों की बढ़ती संख्या और दूसरी ओर स्टाफ और सुविधाओं की कमी , सरकारी अस्पतालों में उपचार में बाधा उत्पन्न करते हैं। यदि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर्स और अन्य कर्मियों की संख्या समुचित हो तो किसी को भी उपचार से वंचित न होना पड़े।  दूसरी ओर प्राइवेट अस्पतालों में इलाज बहुत महंगा पड़ता है।  हालाँकि , अधिकांश बड़े प्राइवेट अस्पतालों को सरकार से भूमि कम दाम पर उपलब्ध कराई गई है , ताकि वे गरीबों का इलाज नियमनुसार निशुल्क कर सकें , लेकिन सरकार इस नियम को लागु करने में लगभग विफल रही है। इसलिए सभी अस्प्तालों में २५ % बाह्य विभाग और १०% बेड्स गरीबों के लिए उपलब्ध होने का प्रावधान होने के बावजूद , बहुत कम रोगी ही इसका लाभ प्राप्त करने में सफल रहते हैं। 

इस मामले में मीडिया का रोल भी बहुत महत्त्वपूर्ण रहता है।  अक्सर मीडिया एक छोटी सी घटना को बहुत बड़ी दुर्घटना का रूप देकर सनसनी फ़ैलाने का प्रयास करता है।  यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। मीडिया को अपना उत्तरदायित्त्व समझते हुए जिम्मेदारी से काम करना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि प्रचंड प्रतिस्पर्धा के ज़माने में समाचारों को बढ़ चढ़ कर दिखाना जैसे उनकी मज़बूरी सी बन गई है।   

कहते हैं शराब ख़राब नहीं होती , खराबी पीने वाले में होती है।  यदि कोई पीकर उधम मचाये या नाली में गिरा मिले तो यह पीने वाले की कमी है।  इसी तरह चिकित्सा जगत में अक्सर डॉक्टर्स का कोई कसूर नहीं होता। जहाँ सरकारी डॉक्टर्स को अत्यधिक रोगियों की संख्या का सामना करना पड़ता है , वहीँ प्राइवेट अस्पतालों में डॉक्टर्स को प्रबंधन की अनुचित मांगों को मानते हुए विवशतापूर्ण वातावरण में काम करना पड़ता है। इसीलिए अक्सर सरकारी अस्प्तालों में इलाज में कमी और प्राइवेट अस्पतालों में अनावश्यक टैस्ट्स और ओवर ट्रीटमेंट का आरोप लगाया जाता है। लेकिन यदि कहीं कमी रहती है तो वो क्रमश: सरकार और कॉर्पोरेट में मालिकों के प्रबंधन और कार्य प्रणाली में होती है। इसलिए किसी भी दुर्घटना या इलाज में कौताही के आरोप पर डॉक्टर्स के विरुद्ध आँख बंद कर कार्यवाई करना अनुचित और दुर्भाग्यपूर्ण लगता है। डॉक्टर्स समाज का सबसे ज्यादा शिक्षित और प्रशिक्षित हिस्सा है।  इन्हे यूँ बदनाम न किया जाये और जीवन भर के कठिन परिश्रम का ऐसा इनाम न दिया जाये कि उन्हें समाज में लज़्ज़ित होना पड़े।

यहाँ यह कहना सर्वथा अनुचित नहीं होगा कि डॉक्टर्स को भी हिप्पोक्रेटिक ओथ के अंतर्गत अपने कर्तव्य का पालन करते हुए समाज और रोगियों की सेवा में तत्पर रहते हुए ईमानदारी और श्रद्धापूर्वक अपना काम करना चाहिए।  

Sunday, July 29, 2012

क्या हो , जब आना चाहे और आ ना पाए --- एक समस्या जो पुरुषों में कॉमन है !

इन्सान पर तरह तरह के प्रैशर होते हैं -- बचपन से लेकर बुढ़ापे तक . बचपन में पढाई का प्रैशर , ज़वानी में ज़वानी का , किसी को अत्यधिक काम का प्रैशर , किसी को काम न मिलने का। किसी को कमाई का प्रैशर , किसी को कमाई को छुपाने का , किसी को ब्लड प्रैशर , किसी को दिमागी प्रैशर। 

लेकिन कुछ प्रैशर ऐसे भी ओते हैं जो आए तो मुसीबत ,न आए तो मुसीबत। 

सुबह सुबह एक दिन जब अस्पताल पहुंचा तो देखा , कहीं से कराहने की आवाज़ आ रही थी। ध्यान से देखने पर पता चला -- एक वृद्ध गेट के सामने झाड़ियों में बैठा था और कराह रहा था। उसकी स्थिति और परिस्थिति देखकर हम समझ गए -- यह भी प्रैशर में है।  लेकिन प्रैशर था कि कम ही नहीं हो रहा था। बेचारा दर्द के मारे कराह रहा था। 

ज़रा सोचिये , आपको अचानक शौच या मूत्र आ जाए और आप कर ही न पायें। यूँ तो प्रकृति ने इन्हें थामे रखने के लिए उपयुक्त प्रबंध किये हैं लेकिन एक सीमा के बाद थामे रखना असंभव हो जाता है। लेकिन एक स्थिति ऐसी भी होती है जब आप करना तो चाहते हैं, उपयुक्त स्थान भी मिल जाता है , लेकिन फिर भी मूत्र वित्सर्जन नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति अक्सर पुरुषों के साथ आती है। 

क्या कारण होते हैं इस स्थिति के ?

अक्सर मूत्र या मूत्र नली में संक्रमण से ऐसी स्थिति आती है जब जलन की वज़ह से मूत्र वित्सर्जन में दिक्कत आती है। लेकिन वृद्ध पुरुषों में एक विशेष स्थिति होती है जिसे हम कहते हैं --प्रोस्टेट एनलार्जमेंट। यानि प्रोस्टेट के बढ़ने से पेशाब में रुकावट पैदा होने लगती है जो अक्सर ५५-६० की उम्र से ऊपर के लोगों को होती है। 

चित्र गूगल से साभार

प्रोस्टेट :

यह पुरुषों के शरीर में मूत्र नली के साथ एक ग्रंथि होती है जिससे एक विशेष श्राव निकलता है जिससे मूत्र मार्ग गीला रहता है। वीर्य का करीब २० % भाग प्रोस्टेट में बनता है। प्रोस्टेट वीर्य को स्टोर करके भी रखता है। लेकिन समय के साथ इसका साइज़ बढ़ता जाता है और एक समय ऐसा आता है जब यह पेशाब में रुकावट पैदा करने लगता है। इसे बी एच पी कहते हैं -- बिनाइन हाइपरप्लेजिया ऑफ़ प्रोस्टेट। यह बढती उम्र के साथ अवश्यम्भावी है। लगभग आधे मर्दों को ५० वर्ष की आयु तक पहुँचने पर यह समस्या आ सकती है। समय के साथ प्रोस्टेट का साइज़ बढ़ता जाता है। ७० -८० की उम्र तक इसमें कैंसर बनने की सम्भावना भी बढ़ जाती है। इसमें कैंसर बनने की सम्भावना उम्र के साथ बढती रहती है। ८० वर्ष की आयु के ८० % लोगों को प्रोस्टेट कैंसर हो सकता है। हालाँकि यह बहुत धीरे धीरे होता है , इसलिए पता भी नहीं चलता। अक्सर यह पोस्ट मॉर्टम पर ही पता चलता है। लेकिन कभी कभी यह तेजी से भी बढ़ सकता है जो खतरनाक हो सकता है। 

बी एच पी के लक्षण :

प्रोस्टेट बढ़ जाने से पेशाब करने में दिक्कत होने लगती है। जहाँ पहले आपको पेशाब करने में २-३ मिनट्स लगते थे , अब यह समय बढ़ने लगता है। पेशाब की धार भी पतली और एक से ज्यादा हो सकती है। लेकिन सबसे मुख्य लक्षण है -- पेशाब की शुरुआत होने में देरी -- यानि आप करना तो चाहते हैं लेकिन पेशाब हो ही नहीं रहा , जैसा इस वृद्ध के साथ हो रहा था। ऐसे में यदि प्रैशर ज्यादा हो या ब्लैडर फुल हो तो दर्द के मारे जान सी निकल जाती है। 
फ़ुल ब्लैडर में रुकावट होने पर एक इमरजेंसी की स्थिति बन जाती है। ऐसे में अक्सर मरीज़ को अस्पताल आना पड़ता है। 
अन्य लक्षण हैं -- पेशाब बार बार आना , अचानक प्रैशर बन जाना , रात में बार बार पेशाब के लिए उठना, जलन होना आदि।  

यदि पेशाब रुक जाए तो क्या करें ?

यूरिनल में रिलैक्स होकर बैठने या खड़े होने की कोशिश करें। अक्सर बहते पानी की आवाज़ से मदद मिलती है। पेट के निचले हिस्से पर गर्म कपड़ा रखने से भी पेशाब आने में सहायता मिलती है। 
इमरजेंसी होने पर तो अस्पताल जाना ही पड़ेगा। 
अस्पताल में पहले कैथिटर डालकर पेशाब निकाला जाता है। लेकिन कभी कभी कैथिटर भी नहीं घुस पाता। ऐसे में सीधे ब्लैडर में सूई डालकर प्रैशर कम किया जाता है। लम्बे समय के लिए कैथिटर डालकर छोड़ दिया जाता है। बेशक रोगी के लिए अत्यंत कष्टदायक स्थिति होती है। 

उपचार :

प्रोस्टेट का साइज़ पढने पर इसका ऑपरेशन आवश्यक हो जाता है। इसके लिए आजकल कई तकनीक हैं जिसमे चीर फाड़ नहीं करनी पड़ती। हालाँकि अत्यधिक बढ़ने पर ओपन ऑपरेशन ज़रूरी हो सकता है। 

आजकल सबसे पहले दवाओं से उपचार करते हैं जिनके परिणाम काफी अच्छे हैं और सर्जरी को टाला जा सकता है।
बिना सर्जरी किये भी कई तकनीक हैं जिनसे प्रोस्टेट को जला दिया जाता है जिनमे प्रमुख हैं -- लेज़र , ऊष्मा या विकिरण द्वारा प्रोस्टेट का इलाज। 

ट्रांस युरेथ्रल रिसेक्शन ऑफ़ प्रोस्टेट में पेशाब के रास्ते नली डालकर प्रोस्टेट को खुरच कर निकाल दिया जाता है। 

लेकिन साइज़ ज्यादा बड़ा होने या कैंसर होने पर ओपन सर्जरी की ज़रुरत पड़ सकती है। 

प्रोस्टेट कैंसर :

इसकी जाँच के लिए ५० से ऊपर के सभी पुरुषों को पी एस ऐ ( PSA ) की रक्त जाँच करानी चाहिए , विशेषकर यदि कोई लक्षण हों। बढ़ा हुआ पी एस ऐ कैंसर की सम्भावना को उजागर करता है। ऐसे में तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। 

कैसे बचें :

प्रोस्टेट कैंसर अमेरिका और यूरोप में बहुतायत में पाया जाता है जहाँ यह दूसरे नंबर पर आता है , फेफड़ों के कैंसर के बाद। इसमें रैड मीट और अत्यधिक शराब के सेवन का रोल होता है , साथ ही जेनेटिक कारण भी होता है। शुक्र है , एसिया और हमारे देश में यह विरला ही होता है। इसका एक कारण शाकाहारी भोजन और सादा जीवन हो सकता है। 

एक दिलचस्प पहलु :

ऐसा माना गया है , नियमित रूप से इजेकुलेशन करते रहने से प्रोस्टेट कैंसर होने की सम्भावना काफी कम हो जाती है। हालाँकि अनेक पार्टनर्स के साथ सम्भोग करने से सम्भावना बढती है। इसलिए एक विवाहित पुरुष के लिए ज़रूरी है , गीतानुसार ब्रह्मचर्य का पालन करना यानि संबंधों में नैतिक ईमानदारी बरतना। 
यह अलग बात है , एक उम्र के बाद पति पत्नी में भी यौन सम्बन्ध धीरे धीरे कम हो जाते हैं। लेकिन यह तो आप पर ही निर्भर करता है , आप अपने आप को कितना ज़वान या बूढा समझते हैं !


Saturday, July 2, 2011

डॉक्टर साहब , गैस सर में चढ़ जाती है --

एक चिकित्सिक के पास प्रतिदिन ऐसे रोगी भी आते हैं जिनकी स्वास्थ्य समस्या कुछ और होती है और रोगी बयाँ कुछ और करता है । ऐसी स्थिति में डॉक्टर का अनुभव ही होता है जो गलत उपचार से बचाता है ।

आइये देखते हैं ये कैसी कैसी स्थितियां होती है :

१) गैस सर में चढ़ जाती है :

अक्सर मरीज़ शिकायत करते हैं --डॉक्टर साहब , पेट में गैस बनती है और सर में चढ़ जाती है ।

असलियत में iऐसी न कोई गैस होती है , न कोई स्थिति । यह या तो मरीज़ का वहम होता है या उसे कोई और मानसिक तौर पर समस्या होती है जैसे एन्जाईटी।

पेट में गैस दो तरह से पैदा होती है । एक -- खाने के साथ हवा का प्रवेश । यह डकार के रूप में बाहर आती है ।
दूसरी खाने की पाचन क्रिया में और आंतों में मौजूद जीवाणुओं की प्रतिक्रिया से बनती है ।
इसके निष्कासन के बारे में फिल्म दबंग में सलमान खान द्वारा बोले गए डाय्लोग्स में सम्पूर्ण जानकारी मिलती है ।

पेट में अत्याधिक गैस बनना खाने की किस्म और मात्रा पर बहुत निर्भर करता है ।
लेकिन सबसे ज्यादा कॉमन कारण हैं --पेट में संक्रमण ।
अक्सर पेट में या तो कीड़े होते हैं या अमीबिक इन्फेक्शन होता है । हमारे देश में अधिकतर लोगों को यह शिकायत होती है ।
आखिर गोल गप्पे या चाट पापड़ी तो सभी खाते हैं ।


२) हड्डियों में बुखार रहता है ।

यह शिकायत ओ पी डी में बहुत सुनने को मिलती है । विशेष रूप से निम्न आय वर्ग की महिलाओं में ।

हकीकत : ऐसा कोई बुखार नहीं होता । बुखार होने पर त्वचा का तापमान बढ जाता है । आंतरिक सोफ्ट टिस्युज का तापमान भी बढ़ता है ।
लेकिन ऐसा नहीं होता कि हड्डियों का तापमान बढ़ जाए और त्वचा का सामान्य रहे ।

कारण : अक्सर ऐसे मरीजों को सामान्य कमजोरी होती है , या हाथ पैर में दर्द रहता है । विटामिन्स की कमी भी हो सकती है ।

३) बुखार में ठंडे पानी की पट्टियाँ करना : इसे कोल्ड स्पॉन्जिंग या हाइड्रोथेरपी कहते हैं ।

अक्सर यह सलाह दी जाती है कि बुखार में ठंडे पानी की पट्टियाँ करनी चाहिए ।

भ्रान्ति : I--ठंडा पानी

दरअसल बुखार में ठंडा पानी इस्तेमाल नहीं करना होता । स्पॉन्जिंग के लिए कक्ष के तापमान वाला सादा पानी लेना चाहिए ।

कुछ लोग अत्याधिक ठंडा पानी या बर्फ का प्रयोग करते हैं जो सर्वथा अनुचित है । इससे त्वचा की नसें सिकुड़ जाती हैं और लाभ की बजाय हानि हो सकती है ।

बुखार में स्पोंजिंग से त्वचा पर पानी की जो पर्त बनती है , वह शरीर से ऊष्मा लेकर वाष्पित होती है । यह वाष्पन ही त्वचा को ठंडा कर बुखार उतारने में सहायक होता है ।

भ्रान्ति II --पानी की पट्टी

स्पोंजिंग के लिए लोग अक्सर रुमाल या कोई कपडा लेकर पानी में भिगोकर , तह बनाकर माथे पर रख देते हैं । यह तरीका आंशिक रूप से ही फायदेमंद होता है ।

सही तरीका है --कपडे को सादे पानी में भिगोकर , हल्का सा निचोड़कर पूरे शरीर को पोंछें । इसे लगभग १० मिनट तक बार बार करने से बुखार नीचे आ जायेगा ।

स्पॉन्जिंग करने से निश्चित ही आराम मिलता है । हालाँकि दिन में कई बार करना पड़ सकता है ।

अब एक काम की बात :

उपरोक्त बातें न तो कोई सरकारी डॉक्टर बताएगा न प्राइवेट डॉक्टर । सरकारी डॉक्टर के पास टाइम नहीं होता और प्राइवेट तो कमाता ही ऐसे मरीजों से है । लेकिन इसका सबसे ज्यादा दुरूपयोग करते हैं--क्वैक्स ( नीम हकीम यानि नकली डॉक्टर )।


Thursday, November 11, 2010

चिकित्सा जगत की कुछ ख़ास चटपटी खबरें---

आज प्रस्तुत हैं चिकित्सा जगत की कुछ ख़ास चटपटी ख़बरें ।

* आपको जिन्दगी में चिकनगुन्या बुखार एक बार , डेंगू चार बार और मलेरिया बार बार हो सकता है । यह कहना है डॉ के के अगरवाल का ।

* चिकनगुनिया और डेंगू में एक अंतर है जोड़ों के दर्द का जो चिकनगुन्या में हफ़्तों , महीनों या साल तक भी रह सकता है ।

* डेंगू में एस्पिरिन कभी नहीं लेनी चाहिए , यदि ले रहे हैं , तो बंद कर देनी चाहिए । बुखार के लिए पेरासिटामोल ही काफी है ।

* पीलिया कोई बीमारी नहीं है । यह किसी बीमारी का लक्षण है ।

* गर्भवती महिला में आयोडीन की कमी से होने वाला बच्चा मंद बुद्धि हो सकता है । इसलिए आयोडीन युक्त नमक ही खाएं ।

* यदि किसी को अचानक हार्ट अरेस्ट हो जाये तो सी पी आर में माउथ टू माउथ साँस देते हैं । लेकिन अस्पताल से बाहर सिर्फ सी आर ही काफी है । यानि माउथ टू माउथ साँस की ज़रुरत नहीं है ।

* बोटोक्स के इंजेक्शन सिर्फ झुर्रियां मिटाने के ही काम नहीं आते । इनसे क्रोनिक माइग्रेन को ठीक किया जा सकता है । इसे ३ महीने में एक बार लगाया जाता है । हालाँकि महंगा तो पड़ता है ।

* हमारे देश की जनसँख्या सन २०४५ के बजाय २०७० तक स्थायी हो पाएगी । उस समय यह होगी १७० करोड़ ।
यह कहना है हमारे स्वास्थ्य मंत्री जी का ।

* नींद की गोलियों की एक बोतल पर लेबल --सावधान ! इनके सेवन से नींद आ सकती है ।

अंत में :

पत्नी , पति से : क्या बात है आजकल आप एक दो घंटे के बजाय ५-६ घंटे ब्लोगिंग करते रहते हैं ?
पति : क्या करूँ , आजकल ऑफिस का कंप्यूटर खराब पड़ा है ।
ज़रा सोचिये कहीं आप ही वो पति तो नहीं !

नोट : उपरोक्त ख़बरें विभिन्न इ मेडिकल जर्नल्स से ली गई हैं ।