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Tuesday, October 10, 2017

अभी से सचेत जाइये , वरना फिर आप ही कहेंगे , ये डॉक्टर बहुत लूटते हैं ---

दो सत्य लघु कथाएं :   
१ )
कॉलेज के दिनों में हमें भी धूम्रपान की आदत लग गई थी। दिसंबर १९८३ में मारुती गाड़ियां आने के बाद दिल्ली में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।  १९९० में जब हमारी पहली गाड़ी मारुती ८०० आई तब तक दिल्ली में लगभग दस लाख वाहन हो चुके थे और उत्सर्जन पर कोई भी नियंत्रण न होने के कारण दिल्ली में लगातार बढ़ता हुआ वायु प्रदुषण चरम सीमा पर पहुँच गया था। तब न PUC होते थे और न ही गाड़ियों में उत्सर्जन मानक। ऐसे में अक्सर शाम के समय दिल्ली के मुख्य चौराहों पर धुंए का बादल सा छा जाता था।  ऐसे ही एक दिन जब हमने दिल्ली के सबसे ज्यादा व्यस्त चौराहों  में से एक ITO पर रैड लाइट होने पर स्कूटर रोका तो देखा कि धुआं इतना ज्यादा था कि अपनी ही साँस कड़वी सी लग रही थी।  तभी हमने देखा कि एक और स्कूटरवाला आकर रुका और रुकते ही उसने तुरंत जेब से निकाल कर सिगरेट जलाई।  यह देखकर हमें लगा कि यह कैसा बंदा है , बाहर का धुआं कम था जो यह सिगरेट का धुआं भी फेफड़ों में भर रहा है ! तभी हमें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ और उसके बाद हमने फिर कभी धूम्रपान नहीं किया।  अभी इतवार को जब हमने अपना PFT कराया तो बिलकुल नॉर्मल निकला। 
२ )
एक बार गौतम बुद्ध कहीं जा रहे थे थे।  रास्ते में डाकू उंगलीमाल आ गया।  वह लोगों को लूट कर उनकी एक उंगली काट कर अपने गले में माला बनाकर पहनता था। जैसे ही उसने बुद्ध को देखा तो जोर से बोला -- ठहर जा।  बुद्ध ने कहा -- मैं तो ठहर गया , तू कब ठहरेगा ! अंत में जब गौतम बुद्ध ने उसे बात का मर्म समझाया तो वह सदा के लिए लूटपाट को छोड़कर शरीफ इंसान बन कर रहने लगा ।

आज दिल्ली में उस समय की दस गुना यानि करीब एक करोड़ गाड़ियाँ हैं।  कई कारणों से दिल्ली में प्रदुषण दशहरे के बाद ही बढ़ने लगता है।  इस भयंकर वायु प्रदुषण से बदलते मौसम में लाखों लोगों को स्वास रोग होने लगते हैं।  कृपया सिर्फ एक मिनट साँस रोककर देखिये कि आपको कैसा लगता है। हम जीवन भर साँस लेते रहते हैं लेकिन कभी उसका पता नहीं चलता।  जिसे दमा जैसी साँस की बीमारी होती है , उसे एक एक साँस के लिए न सिर्फ अथक प्रयास करना पड़ता है बल्कि घोर कष्ट भी उठाना पड़ता है।  स्वास रोग न जात पात देखता है , न धर्म। आपकी क्षणिक मिथ्या ख़ुशी दूसरों के लिए जीवन भर का रोग न बने , इतना प्रयास तो हम कर ही सकते हैं। अभी से सचेत जाइये , वरना फिर आप ही कहेंगे , ये डॉक्टर बहुत लूटते हैं।       

Monday, November 7, 2016

क्या भगवान भी दिल्ली वालों को किसी बात की सजा दे रहा है ...


एक बेहद ख़तरनाक़ यात्रा वृतांत :

यह इत्तेफ़ाक़ ही रहा कि दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रदुषण वाले दिन हमें किसी काम से चंडीगढ़ / मोहाली जाना पड़ा। यूँ तो हमें लॉन्ग ड्राइव पर जाना सदा ही पसंद रहा है और गए हुए भी डेढ़ साल हो गया था।  लेकिन दिल्ली और हाइवेज पर फैली धुएं की चादर को देखकर हाइवे पर जाना बेहद खतरनाक हो सकता है , इसका आभास कई दिनों से अख़बारों में आने वाली ख़बरों से हमें भलि भांति था।  लेकिन काम की अत्यावश्यकता को देखते हुए जाना भी मज़बूरी ही थी। हालाँकि सुबह जाकर शाम तक वापस आना , एक ही दिन में खुद करीब ६००  किलोमीटर ड्राइव करना कोई आसान काम नहीं लगता। कोहरे की वजह से दृश्यता बहुत कम हो जाती है , और ऐसे में हाइवे ड्राइविंग बेहद खतरनाक हो जाती है।

इसलिए ज्यादा जल्दी न कर हम सुबह ७ बजे ही घर से निकले।  जैसा कि अनुमान था , जी टी रोड पर दिल्ली हरियाणा बॉर्डर तक काफी धुंधलका था लेकिन ड्राइव करने में ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही थी।  लेकिन बॉर्डर पार करते ही , जैसे ही खुले खेतों के दर्शन हुए , धीरे धीरे धुंध बढ़ने लगी।  अब स्मॉग की जगह शुद्ध धुंध ने ले ली थी ।  सभी गाड़ियों वाले हेड लाइट्स और डिस्ट्रेस  सिग्नल ऑन कर चलने लगे। स्पीड कम होने लगी और दृष्टि भी। धुंध के झोंके गाड़ी की  ओर ऐसे आ रहे थे जैसे बारिश की बौछार आती हैं। कुछ समय बाद धुंध इतनी गहरी हो गई कि गाड़ी के शीशे के आगे भी कुछ नहीं दिख रहा था। दायीं लेन में चलते हुए साइड में डिवाइडर ज़रा सा दिख रहा था , जिसके सहारे हम धीरे धीरे गाड़ी चला पा रहे थे।  फिर एक के बाद एक एक्सीडेंट के नज़ारे दिखने लगे।

उस समय हमारी हालत बिलकुल उस पॉयलेट जैसी हो गई थी जिसने कुछ दिन पहले ज़ीरो विजिबलिटी में विमान को सिर्फ अंदाज़े से हवाई पट्टी पर उतार दिया था और कोई नुकसान नहीं हुआ था।  अब तो हमें यह भी लगने लगा था कि ऐसा ही रहा तो वापस कैसे आएंगे।  रात होना तो निश्चित था , फिर अँधेरा और धुंध दोनों मिलकर कहर ढा देंगे।  खैर किसी तरह धीरे धीरे लगभग रेंगते हुए साढ़े तीन घंटे में जब करनाल पहुंचे तो कुछ कुछ दिखना शुरू हुआ।  लेकिन जो दिखाई दिया , वह तो और भी ज्यादा खतरनाक था। पूरे करनाल बाइपास पर जगह जगह एक्सीडेंट हुई गाड़ियां पड़ी थीं। अधिकांश बुरी तरह से टूटी फूटी हुई।  एक जगह तो करीब १०० मीटर तक गाड़ियों के पुर्जे बिखरे पड़े थे।  ऐसा लग रहा था , मानो वहां कोई रॉयट्स ( दंगे ) हुए हों। सिर्फ खून कहीं नहीं दिखा , यह देखकर हमने सोचा कि चलो शुक्र है कि शायद किसी को चोट तो नहीं लगी होगी।

करनाल के बाद वातावरण साफ होने लगा और अम्बाला तक जाते जाते बिलकुल साफ हो गया।  चंडीगढ़ और मोहाली तो ऐसे साफ चमक रहे थे जैसे वहां कभी कोहरा होता ही न हो। वहां कोई सोच नहीं सकता था कि हम कैसे रास्ते से निकल कर आये हैं। वापसी में फिर करनाल तक रास्ता साफ मिला।  लेकिन उसके बाद शाम भी ढल गई , अँधेरा बढ़ने लगा था और कोहरा भी।  लेकिन विजिबलिटी इतनी थी कि ड्राइविंग में कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई। हमने भी श्रीमती जी को हाइवे पर ड्राइविंग का शौक पूरा करने का पूरा अवसर देते हुए दोनों ओर आधा रास्ता ड्राइव करने दिया। अंतत: रात के साढ़े आठ बजे हम घर पहुँच गए।

आज सुबह जब अख़बार खोला तो पता चला कि उन एक्सीडेंट्स में दस लोगों की मौत हो गई और ३०-४० लोग घायल हुए।  और इतनी ही गाड़ियां चकनाचूर हो गई थी। घंटों ट्रैफिक जैम भी रहा। बस शुक्र रहा कि हम बाल बाल बचते हुए सकुशल घर पहुँच गए। वापसी में रास्ते में अनेकों जगह खेतों में आग लगी देखी जिनसे निकलता हुआ धूंआं प्रदुषण फैला रहा था। यह साफ ज़ाहिर था कि पंजाब हरियाणा का यह धुआं हवा की दिशा के कारण दिल्ली की ओर ही आ रहा था , जबकि चंडीगढ़ और मोहाली का क्षेत्र साफ बचा हुआ था। क्या भगवान भी दिल्ली वालों को किसी बात की सजा दे रहा है ? ज़रा सोचिये ज़रूर।              

   

Wednesday, November 2, 2016

दीवाली कैसे मनाएं ताकि प्रदुषण से बच पाएं ---


पिछले एक सप्ताह से हम दीवाली पर ही लिखे जा रहे हैं। बेशक दीवाली एक ऐसा हर्ष उल्लास का पर्व है जिसे छोटे बड़े , गरीब अमीर और हर जाति और धर्म के लोग बड़े शौक और चाव से मनाते हैं। दशहरा से लेकर दीवाली तक बाज़ारों की रौनक , घरों की साफ़ सफाई और लोगों का आपस में मिलना और मिलकर उपहारों का आदान प्रदान जीवन में एक नया उत्साह और स्फूर्ति भर देता है।
दीवाली पर सारा जहाँ रौशन हो जाता है और बहुत खूबसूरत लगता है , भले ही बिजली की लड़ियाँ चाइनीज ही क्यों न हों। आखिर रात भर रंग बिरंगी लाइट्स की रिम झिम देखते ही बनती है। दीये और मोमबत्ती तो पल दो पल की रौशनी देते हैं , फिर अमावस्य का घनघोर अंधकार। इसलिए बिजली से चलने वाली विद्युत शमा से रौशन जहान एक रात के लिए तो ज़न्नत सा ही लगने लगता है।
लेकिन कुछ सही नहीं है तो वो है पटाखों और बमों से होने वाला वायु और ध्वनि प्रदुषण। सब कुछ जानते हुए भी पढ़े लिखे लोग भी स्वार्थ के वशीभूत होकर भावनाओं में बहकर अच्छे बुरे के ज्ञान को भूल जाते हैं और इस धरा को विष धरा बनाने पर तुल जाते हैं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि दशहरा की तरह हम दीवाली की आतिशबाज़ी भी निर्दिष्ट स्थान पर सामूहिक रूप से मनाएं। साथ ही इन सभी स्थलों पर बड़े बड़े एयर प्यूरीफायर लगा दें जिससे कि सारा प्रदुषण साथ साथ ही ख़त्म किया जा सके। इस तरह कम लागत में दीवाली पर शारीरिक और मानसिक दीवाला निकलने से बच पाएंगे हम।


Wednesday, February 3, 2016

जीवन के संघर्ष में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए परिवार और वाहन नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है ---


आज से ऑटो एक्सपो ( वाहन मेला ) शुरू हो रहा है।  वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा लग रहा है जैसे कोई बच्चे पैदा करने का कैम्प लग रहा हो। आज जहाँ देश की सबसे बड़ी समस्या बढ़ती हुई आबादी है , वहीँ दिल्ली की समस्या वाहनों की बढ़ती संख्या से फैलता प्रदुषण है।  लेकिन ऑटो मैनुफैक्चरिंग कंपनियों को सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब होता है।  उनके लिए तो सबसे बड़ी चिंता इस बात की रहती है कि कैसे वाहनों की बिक्री में वृद्धि दिखाएँ। यानि यदि गत वर्ष ५०००० वाहनों की बिक्री हुई तो इस वर्ष का लक्ष्य ६०००० होना चाहिए। यही कारण है कि दिल्ली में वाहनों की संख्या चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती जा रही है। देखा जाये तो ऑटो कम्पनियाँ लोगों की आदत और शहर की हालत बिगाड़ने में लगी हुई हैं।

अब समय आ गया है कि जहाँ एक ओर बढ़ती आबादी को रोकने के लिए 'वन चाइल्ड नॉर्म ' यानि 'एकल बाल परिवार' आवश्यक है , वहीँ दूसरी ओर वाहनों की बिक्री पर भी सीमा निर्धारित होनी चाहिए।  प्रत्येक कंपनी को मार्किट शेयर अनुसार एक निश्चित संख्या तक ही वाहनों की बिक्री की अनुमति होनी चाहिए। भले ही पूर्व में परिवार नियोजन कार्यक्रम फेल हो गया हो , लेकिन जीवन के संघर्ष में अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए परिवार और वाहन नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है।

वर्ना जैसा कि किसी शायर ने कहा था कि :

होश आये भी तो क्योंकर तेरे दीवाने को ,
एक जाता है तो दो आते हैं समझने को।  

यही सिलसिला चलता रहेगा।  और सारे प्रयोग असफल होते रहेंगे।

Wednesday, November 14, 2012

दे दनादन -- चाइनीज़ बमों से मारे हिन्दुस्तानी मच्छर !


इस वर्ष दीवाली से ठीक पहले सप्ताहंत आने से दीवाली मनाना थोड़ा आसान रहा .  अक्सर इन दिनों में सडकों और बाज़ारों में  भारी भीड़ रहती है जिससे अक्सर भारी जाम लग जाते हैं।  घंटों जाम में फंसे रह कर जश्न मनाने का जोश ही ठंडा पड़ जाता है। ऐसा लगता है जैसे सारा शहर ही सडकों पर निकल पड़ा हो। 
आइये देखते देखते हैं ,  दीवाली के विविध आयाम :            


शनिवार : को अस्पताल में आधी छुट्टी होती है। 


अस्पताल में स्टाफ  ने कमरों को खूबसूरती से सजाकर रंग जमा दिया। ऊपर लैब का एक दृश्य।





हमारे कार्यालय को भी तबियत से सजाया गया था।
ऐसे में हमने भी स्टाफ के लिए एक छोटी सी पार्टी आयोजित कर सब को खुश कर दिया। यह अलग बात है कि उन्हें बदले में हमारी कविता झेलनी पड़ी। हालाँकि यह एक छोटी सी ही कीमत थी चुकाने के लिए।


रविवार : 


शाम को सी एस ओ आई में दीवाली मेले का आयोजन किया गया था। यहाँ अन्य संसाधनों के अतिरिक्त एक ग़ज़ल संध्या का आयोजन किया गया था। दिल्ली के सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायक श्री राहत अली खान ने अपनी ग़ज़लों से सबका मन मोह लिया। 




इस बार क्लब को बहुत बढ़िया तरीके से सजाया गया था। हरे भरे लॉन और पार्किंग को खाली कराकर विस्तार से मेले का आयोजन किया गया था। खाना और पीना , दोनों बढ़िया थे। बस पीने के लिए साकी स्वयं ही बनना पड़ा। ( जूस की बात कर रहे हैं )

सोमवार : 

कई दिनों से मॉल जाने की सोच रहे थे। आखिर सोमवार तक सडकों पर यातायात कम हो गया था। इसलिए नोयडा के ग्रेट इण्डिया प्लेस मॉल की सजावट भी देखने लायक थी।  





रंग बिरंगी लाइटों से सजा मॉल ऐसा अहसास दिला रहा था जैसे हम किसी विदेशी मूल में घूम रहे हों।


हालाँकि मॉल में भीड़ भड़क्का बिल्कुल नहीं था।



हमें तो यह सकून ही दे रहा था।


छोटी दीवाली के दिन सोसायटी में भोज का इंतजाम किया गया था। अड़ोस पड़ोस के सभी पड़ोसियों से एक ही जगह मिलकर दीवाली मुबारक हो गई। फिर देर रात तक बच्चे डी जे पर थिरकते हुए मस्ती करते रहे।


दीवाली : 

सरकार ने 10 बजे के बाद पटाखे न चलने का आह्वान किया था। लेकिन-- इट हेपंस ओनली इन इण्डिया -- यहाँ सरकार की सुनता ही कौन है। रात 8 बजे तक शांति सी महसूस हो रही थी। लगा जैसे दिल्ली वाले समझदार हो गए हैं। लेकिन फिर ऐसा जुनून शुरू हुआ कि 11 बजते बजते चरम सीमा पर पहुँच गया।



हम तो अपनी बालकनी से बस उड़ते हुए धुएं को देखते रहे। ठा ठा ,  धां धां , धड़ाम की आवाज़ों के बीच देखते रहे दूसरों को फूंकते हुए, आराम से कमाए गए हराम के पैसे को . 




लेकिन दीपों और लाइटों से होती हुई जगमगाहट मन को बहुत सुख प्रदान कर रही थी।



वैसे तो दिल्ली के अस्पतालों को पटाखों से जले हुओं के इलाज के लिए पूर्ण रूप से तैयार किया गया था , लेकिन ऐसा होने से बचाना तो डॉक्टर्स के हाथ में नहीं था। कहीं कहीं दुर्घटनाएं भी हुई।




बिल्कुल साफ दिखने वाली सड़क पर अब घना धुआं छा गया था। आखिर यह तो होना ही था।
अफ़सोस तो यह है कि फूलझड़ी और अनार जिन्हें सुरक्षित माना जाता है , वे ही सबसे ज्यादा धुआं छोड़ते हैं।
हालाँकि ध्वनि प्रदूषण होता है चाइनीज़ बमों से।

आखिर हमने दिखा दिया कि हम हिन्दुस्तानी सबसे ज्यादा धार्मिक प्रवृति के लोग होते हैं। वैसे यदि आप किसी से पूछें कि आप पटाखे क्यों छोड़ रहे हैं तो शायद ही कोई इसका कारण बता पाए । ज़ाहिर है, सब छोड़ रहे हैं इसलिए हम भी छोड़ रहे हैं। बस यही मॉब मेंटालिटी हमें दूसरों से अलग बनाती है।  


Saturday, November 10, 2012

मैं तो पटाखे से ही मर जाऊँगा , बम रहने दे ---


पुरानी हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय खलनायक अजित अक्सर जब हीरो को पकड़ लेते तो कहते -- रॉबर्ट, इसे गैस चैंबर में डाल दो। कार्बन डाई ऑक्साइड इसे जीने नहीं देगी और ऑक्सीजन इसे मरने नहीं देगी। आजकल दिल्ली शहर ऐसा ही गैस चैंबर बना हुआ है। नवम्बर शुरू होते ही दिल्ली को ऐसी सफ़ेद चादर ने घेर लिया जैसी वो कौन थी जैसी पुरानी हिंदी संस्पेंस फिल्मों में दिखाई देती थी। फर्क सिर्फ इतना है कि उन फिल्मों में नकली धुंध का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन यहाँ न सिर्फ असली धुंध है बल्कि ज़हरीली भी है। दूसरे, फिल्मों में नायक सारी दीवारें तोड़कर बाहर निकल आता था, लेकिन असल जिंदगी में आम आदमी के पास बच कर निकलने का कोई रास्ता नहीं होता।  

धुंध : दरअसल इसे धुंध कहना ही सही नहीं है। इसे स्मॉग कहा जाता है। यानि यह स्मोक ( धुएं ) और फॉग ( धुंध ) का मिश्रण है। दिल्ली में सर्दी शुरू होते ही वायु में वाष्प की मात्रा बढ़ने लगती है जो धुएं से मिलकर धुंधलका बन जाती है। वायु का  बहाव न होने से यह पृथ्वी की सतह पर ही टिकी रहती है। लेकिन इस वर्ष  अमेरिका में आए सैंडी तूफ़ान की वज़ह से देश में नीलम नाम के तूफ़ान का कहर दिल्ली में भी दिखाई दे रहा है. इसकी वज़ह से वायुमंडल में अत्यधिक वाष्प आने से असमय ही यह स्थिति उत्पन्न हुई है.   

लेकिन सबसे चिंताज़नक बात यह है की इस स्मॉग में ज़हरीली गैसों की मात्रा बहुत ज्यादा पाई गई है. धूल और धूएँ के महीन कणों के अलावा नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड , कार्बन मोनो ऑक्साइड, बेंजीन और ओजोन की अत्यधिक मात्रा वायुमंडल को एक गैस चैंबर बना रही हैं। 


नतीजा : 
साँस लेने में बड़ी कठिनाई पैदा हो हो रही है. घर से बाहर निकलते ही एक घुटन सी महसूस होती है। 
* आँखों में जलन। 
* गले में खराश से लेकर साँस की परेशानी होने का खतरा बना रहता है। 
* दिल के रोगियों को विशेष खतरा हो सकता है।  

ऐसे में क्या किया जाये ? 

* जहाँ तक हो सके , घर से बाहर ही न निकलें . लेकिन यह संभव नहीं . इसलिए ज़रुरत हो , तभी बाहर जाएँ. आखिर सबसे कम प्रदुषण घर में ही हो सकता है.
* आँखों को दिन में कई बार ठन्डे पानी से धोएं . इससे जलन में आराम आएगा. 
* दिन में कई बार कुल्ला या गरारे करें जिससे गला ख़राब होने से बच सके. 
* पानी और अन्य तरल पदार्थ जैसे चाय आदि पीते रहें जिससे शरीर का हाईडरेशन बना रहे . 
* जिन्हें साँस की शिकायत  रहती हो , उन्हें मूंह पर मास्क लगाकर चलना चाहिए. 
ऐसा करने से थोड़ी राहत तो मिलेगी लेकिन यह इस समस्या का स्थायी निवारण नहीं है. इसके लिए हमें बढ़ते प्रदुषण के कारणों पर अंकुश लगाना होगा. 

प्रदुषण के कारण : 

दिल्ली में करीब २ करोड़ जनता और ७० लाख वाहन साँस ले रहे हैं . इन से निकलती गैसें वातावरण में फैलकर प्रदुषण को बढ़ा रही हैं. अब मनुष्यों की सांसों से निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड को तो नहीं रोका जा सकता लेकिन वाहनों से फैलते प्रदुषण को अवश्य रोका जा सकता है. पता चला है की दिल्ली में हर रोज करीब ११०० नई कारों का पंजीकरण होता है . इनमे से ६० % डीज़ल से चलने वाली कारें हैं . ज़ाहिर है , सी एन जी आने के बावजूद, डीज़ल वाहनों से फैलने वाला प्रदुषण अभी भी  बना हुआ है . इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने की ज़रुरत है. 

दिवाली :     

वर्तमान परिवेश में दिवाली का आना एक नासूर सा लग रहा है . ज़रा सोचिये , जब अभी साँस नहीं आ रही तो दिवाली के दिन क्या हाल होगा . दिवाली के दिन दिल्ली वाले पागल से हो जाते हैं और पटाखे और बम  छोड़ने की ऐसी होड़ सी लग जाती है की देखकर इन्सान के वहशी होने का साक्षात् प्रमाण सा दिखाई देने लगता है . ऐसे में साँस , दिल के रोगियों और अन्य गंभीर रूप से बीमार लोगों को कितनी मुश्किल होती होगी , यह कोई नहीं सोचता.
क्या अभी और कमी है प्रदुषण में जिसे दिवाली पर पूरा करने की ज़रुरत है ? 
फिल्मों के हीरो तो हीरो होते हैं, गैस चैंबर से बच निकलते हैं . लेकिन एक आम आदमी कहाँ जायेगा साँस लेने , जब प्रदुषण से साँस आनी ही बंद हो जाएगी ?    
आखिर यह भी क्या खेल हुआ , धुआं और शोर फ़ैलाने का ! 

ऐसे में एक हास्य कवि -- पोपुलर मेरठी का एक शे'र याद आता है : 

मैं हूँ जिस हाल में , ऐ मेरे सनम रहने दे , 
चाकू मत दे मेरे हाथों में , कलम रहने दे।  .
मैं तो शायर हूँ, मेरा दिल है बहुत ही नाज़ुक 
मैं पटाखे से ही मर जाऊँगा , बम रहने दे।

एक अपील : दिवाली भले ही हम हिन्दुओं का सबसे बड़ा और पावन पर्व है , लेकिन यह दिवाली यदि हम बिना बम पटाखों के मनाएं , तो शायद मानव जाति पर बहुत बड़ा उपकार होगा. वर्ना इस प्रदुषण से कई नाज़ुक दिल बीमार असमय ही राम के पास पहुँच जायेंगे . क्या बताएँगे श्री राम को उनके प्यारे देश का हाल ! 
लेकिन ये जनता है , कहाँ मानती है. क्या हुआ , ग़र पड़ोसी बीमार है. वैसे भी यहाँ पड़ोसी पड़ोसी बात ही कहाँ करते हैं . भई बम नहीं चलाये तो दिवाली क्या खाक हुई !

ऐसे में क्या सरकार कोई ठोस कदम उठाने का साहस करेगी ?  
क्यों न इस वर्ष दिवाली पर पटाखों पर टोटल बैन लगा दिया जाए !
आखिर, इस वर्ष जिन्दा रहे तो अगले वर्ष फिर दिवाली मना सकते हैं .  

नोट : इस समय स्मॉग दिल्ली तक ही सीमित नहीं है बल्कि पूरे उत्तर भारत में फैली है. इसलिए इससे निपटने का प्रयास सबको मिलकर करना होगा.