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Sunday, October 13, 2024

रावण: एक पैरोड़ी....

 रावण को जलाता हूं, रावण ही नहीं जलता,

रावण ही नही जलता। 

कोशिशे तो बहुत की हैं, परिणाम नहीं मिलता,

रावण ही नहीं जलता। 


कलियुग के ज़माने में, दिल में हैं कई पापी,

खुद से लड़े खुद ही, जीत पाए ना कदापि।

ये पापी मिटाने का, अवसर ही नहीं मिलता,

रावण ही नहीं जलता।


पल भर के लिए इसको, कोई तो समझाओ,

दम भर को ही सही, सही रस्ता दिखलाओ,

ये दिल का दुष्ट महमां, दिल से नहीं हिलता।

रावण ही नहीं जलता। 


हर साल जलाता हूं, रावण ही नहीं जलता,

रावण ही नहीं जलता। 

Saturday, October 20, 2018

रावण -- एक विचार ...


जलते हए रावण ने
जलाते हुए बन्दों से कहा ,
अरे आधुनिक भक्तो
हर साल मुझे जिलाते हो ,
फिर जिन्दा ही जलाते हो !
ऐसी क्या थी मेरी खता
जो इतने मुझसे हो खफा !
अधूरा सा ही तो था गुनाह
फिर क्यों करते हो मेरा दाह !
देखो अपने आस पास
कितने क़ुरावण रहते हैं !
हरण होती हैं रोज सीतायें
जिनके निशाँ तक मिट जाते हैं !
जाओ पहले किसी ऐसे एक
असुर को सज़ा दिलाकर दिखाओ !
तब ऐ कलयुगी भक्तों तुम मुझे जलाओ !

# एक विचार #

Wednesday, October 24, 2012

जल जायेगा रावण बेचारा -- क्या मन के रावण को मारा !


और एक बार फिर रावण जल जायेगा। बड़ा बेहया है ये वाला रावण। हर वर्ष जलता है , फिर अगले वर्ष पहले से भी बड़ा होकर फिर मूंह उठाकर खड़ा हो जाता है। जलाने वाले भी ऐसे हैं कि थकते ही नहीं। पूरे नौ दिनों तक विविध रूप के कर्मकांड करते हुए दसवें दिन धूम धाम से ज़नाज़ा निकालते हैं और जला कर राख कर खाक में मिला देते हैं . एक बार फिर अन्याय, अधर्म और पाप की हार होती है और न्याय, धर्म और पुण्य की जीत होती है जिसका जश्न भी तुरंत मना लिया जाता है।

यह दुनिया भी अजीब है। जब एक देश में दिन होता है , उसी समय किसी दूसरे देश में रात होती है। इसी तरह एक धर्म के पर्व दूसरे धर्मों के लिए कोई विशेष अर्थ नहीं रखते। यहाँ तक कि एक ही धर्म के लोगों में भी विविधता देखने को मिलती है। एक ही पर्व को एक क्षेत्र के लोग एक तरीके से मनाते हैं,  दूसरे क्षेत्र के लोग दूसरे प्रकार से।

अब दशहरा पर्व को ही लीजिये। समस्त उत्तर भारत में दशहरा से पहले नवरात्रे मनाये जाते हैं जिनमे लोग उपवास रखते हैं , सामान्य अन्न खाना छोड़ देते हैं , एक विशेष प्रकार के आहार पर गुजारा करते हैं। इस दिनों में सब लोग मांसाहार छोड़ शुद्ध सात्विक भोजन करने लगते हैं। यहाँ तक कि मदिरा पान पर भी स्वयंभू प्रतिबन्ध लगा देते हैं। दसवें दिन रावण की आहुति देते ही सारे प्रतिबन्ध समाप्त हो जाते हैं।

उत्तर भारत में इन दिनों में सारी पार्टियाँ, भोज और जश्न आदि स्वत: ही प्रतिबंधित हो जाते हैं। लेकिन कुछ लोग तो दिल ही दिल में एक एक दिन गिन गिन कर काटते हैं। फिर जैसे ही रावण वध होता है , सबसे पहले उसका ही जश्न मनाया जाता है। अक्सर अधिकतम पार्टियाँ नवरात्रों से एक दिन पहले और तुरंत बाद आयोजित की जाती हैं। आखिर , एक नहीं दो नहीं , पूरे नौ दिनों तक संयम जो रखना पड़ता है।

मत कहो,कि चीज़ अच्छी नहीं शराब 
बस नवरात्रों में ही होती है, यह खराब .     

दूसरी ओर बंगाली समाज इसी समय दुर्गा पूजा का पर्व मनाता है। खूबसूरत रंगों और साज सजावट से बनी दुर्गा माँ की मूर्ति की प्रतिदिन पूजा की जाती है। और अंत में उसे यमुना नदी में बहा दिया जाता है। इस बीच स्वादिष्ट पकवानों से जिव्हा की भी पूर्ण संतुष्टि का विशेष ख्याल रखा जाता है। खाने में नाना प्रकार की मच्छलियाँ और अन्य मांसाहार शौक से उदरित किये जाते हैं।

यह देखकर कई सवाल मन में उठते हैं।

* ऐसा क्यों कि इस पर्व में कुछ लोगों के लिए मांसाहार वर्जित हो जाता है,जबकि दूसरे लोग शौक से खाते हैं ?
* क्या शराब और मांसाहार इतने ख़राब हैं कि नवरात्रों में इनका सेवन वर्जित है ?
* यदि हाँ, तो फिर बाकि पूरे साल इनका सेवन क्यों किया जाता है ?
* क्या नौ दिन तक सात्विक रहकर पूरे साल के लिए आत्मिक शुद्धि हो जाती है ?

हमारे लिए तो हर दिन नया दिन और हर रात नई रात होती है। यह अलग बात है कि इन पर्वों से जीवन में विविधता आती है। औरों की खातिर हम भी इन व्यसनों से दूर रहते हैं। हालाँकि वैसे भी हम तो शुद्ध शाकाहारी हैं और मदिरापान कभी कभार ही करते हैं।

काश कि मानसिक पवित्रता का जो ज़ज्बा हम अपने पर्वों में दिखाते हैं , वही सम्पूर्ण जीवन में भी उतार लें। 

नोट : रावण वस्तुत: एक मनोदशा होती है। हमारे मन के अहंकार और हठधर्म का नाम ही रावण है। इन मनोभावों को जीतना ही वास्तविक विजय है। जो अपने मन के रावण पर विजय प्राप्त कर लेता है , वही राम कहलाने योग्य है . दशहरा की शुभकामनायें।   



Tuesday, March 6, 2012

होलिका तो होलिका , कहीं रावण भी जल न पाए --



कुछ
वर्ष पहले दिल्ली में होली के अवसर पर मौसम में हुए बदलाव पर एक कविता लिखी थी जो शायद आज भी उतनी ही तर्कसंगत लगती है


जनता को चिंता सता रही थी ,

क्योंकि होली करीब आ रही थी।
पर पानी की किल्लत थी भारी
कैसे खेलेगी होली जनता बेचारी ।

ऊपर वाले ने आसमान से देखा,
धरा पर उड़ती धूल, तालों में सूखा।
मासूम चेहरे गर्मी से झुलस रहे थे ,
नाजुक पौधे धूप में सूख रहे थे।

मैली होकर सूख रही थी गंगा,
जमना का तल भी हो रहा था नंगा।
नल के आगे झगड़ रही थी ,
शान्ति,पारो और अमीना।

नाजुक बदन कोमल हाथों में लिए बाल्टी ,
मिस नीना चढ़ रही थी जीना।


ये तो कलियुग का प्रकोप है , उपरवाले ने सोचा,
और करूणावश पसीजने से अपने मन को रोका।
पर कलियुग पर आपके कर्मों का पलडा था भारी ,
इसीलिए धरती पर उतरी इन्द्र की सवारी।

फ़िर छमछम बरसा पानी , धरती की प्यास बुझाई ,
पर होलिका दहन में बड़ी मुसीबत आई।
मिट्टी के तेल से, मुश्किल से जली होली,

हमने सोचा इस बरस होली तो बस होली।

पर देखिये चमत्कार, कुदरत ने फ़िर से बदला रूप,
और होली के दिन बिखर गई, नर्म सुहानी धूप।
फ़िर जेम्स, जावेद, श्याम और संता ने मिल कर खेली होली,
और शहर में धर्मनिरपेक्षता की जम कर तूती बोली।

युवा है कलियुग अभी, कहीं जवां हो न जाए,
और मानव के जीवन में इक दिन ऐसा आए,
कि होलिका तो होलिका, रावण भी जल न पाये।
सत्कर्मों को अपनाइए,
बस यही है एक उपाय

आप सब को एक सौहार्दपूर्ण होली की हार्दिक शुभकामनायें

Saturday, October 8, 2011

एक बार फिर व्यर्थ मारा गया --बेचारा रावण

विजयदशमी के साथ ही एक बार फिर रावण दहन संपन्न हुआ . कहीं रावण को फूंका गया , कहीं पैरों तले रौंदा गया . कहीं नेता ने मारा , कहीं राम के अभिनेता ने मारा . हर हाल में रावण को मरना पड़ा . सदियों से यही परंपरा चली आ रही है . रावण को तो मरना ही पड़ता है --बार बार, लगातार हर वर्ष .

कभी कभी सोचता हूँ क्या सचमुच रावण ने इतना बड़ा अपराध किया था जो उसे यूँ बार बार मारा जाता है .
जहाँ तक पढने सुनने में आता है , रावण एक सुशिक्षित , ज्ञानी , विद्वान पंडित था . साथ ही अति पराक्रमी , बहादुर , शक्तिशाली और वरदान प्राप्त योद्धा भी था .

उसके चरित्र में भी कोई दाग नहीं था .

उससे बस एक भूल हो गई जो उसने सीता मैया का अपहरण किया और उन्हें कैद में रखा . इसके अलावा तो कोई और अपराध नहीं किया था . उसने कभी सीता मैया को छुआ तक नहीं .

रावण अपनी जिद्द पर ज़रूर अड़ा रहा और बहुत समझाने के बावजूद भी टस से मस नहीं हुआ . अंतत : यही अहंकार उसे ले डूबा .

लेकिन क्या जब तक धरती पर जीवन रहेगा , रावण को यूँ ही मारा जाता रहेगा ?
एक छोटी सी भूल की इतनी बड़ी सजा !
या अहंकार का होना इतना बड़ा गुनाह है ?

यदि हकीकत की दुनिया में देखें तो जाने कितने ही दुष्कर्मी सड़कों पर आज़ाद घूम रहे हैं और उन्हें कोई सजा नहीं मिलती .

दिल्ली जैसे शहर में रोज लड़कियों का अपहरण होता है. रेप की कितनी ही घटनाएँ होती हैं . महिलाओं से छेड़ छाड़ तो आम बात है . कामकाजी महिलाओं का शोषण हो रहा है . दहेज़ के लालची लोगों द्वारा बहुओं को सरे आम जला दिया जाता है .

बड़े सेठों के बच्चे , नेताओं के बच्चे , आला अफ़सरों के बच्चे --शराब के नशे में सड़क पर निरीह जनता को कुचल देते हैं , रोड़ रेज़ में सरे आम हत्या कर देते हैं, शराब न मिलने पर गोली मार देते हैं .

क्या यह अहंकार की निशानी नहीं है ?

लेकिन उनके विरुद्ध अक्सर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती . उन्हें कोई सज़ा नहीं मिल पाती .
यदि मिलती भी है तो बस नाम मात्र .

बिल्ला रंगा को फाँसी हुई , लेकिन फिर सब भूल गए .

निर्दोष जनता को बम से उड़ाने वाले आतंकवादी या तो पकडे नहीं जाते या फिर उन्हें सज़ा ही नहीं हो पाती .

कुछ तो सरकारी मेहमान बन जनता के पैसे पर ऐश कर रहे हैं .

ऐसे में क्या सचमुच रावण को बार बार मार कर हम कुछ हासिल कर रहे हैं ?

लगता है , अब समय आ गया है , हम अपनी परम्पराओं का निष्पक्ष रूप से निरीक्षण करें और समयानुसार संभावित संशोधन करें .

नोट : थोड़ी देर तक धार्मिक भावनाओं और आस्थाओं को भूलकर यदि हम निष्पक्ष चिंतन करें , तो शायद कोई सार्थक बात निकल कर आए .

Wednesday, November 3, 2010

दीवाली और आज के रावण के दस रूप ---

एक बार फिर दीवाली पास आ गई है । वातावरण में पर्व का उत्साह दिखाई दे रहा है । लेकिन साथ ही जगह जगह पुलिस के बैरिकेड इस बात का अहसास दिला रहे हैं कि पांच साल पहले जो हादसा हुआ था दीवाली पर , वह फिर न हो जाए । उधर दिल्ली की मुख्य मंत्री महोदया ने फिर दिल्ली वालों से अपील की है कि दीवाली बिना पटाखों के मनाएं, ताकि इससे होने वाले शोर और प्रदूषण से बचा जा सके ।

इस अवसर पर लिखी एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

रावण वध कर विजयी भव , जब श्री राम अयोध्या आए थे ,
अधर्म पर धर्म की जीत पर, तब सबने घी के दीप जलाये थे

दीवाली का पर्व अब हो गया है धुआं धुआं ,
खोये का स्वाद भी खो गया है जाने कहाँ ,
नहीं लगती अब पटाखों की आवाज़ मधुर
जब से धमाकों में घुली है, चीख पुकार यहाँ

अब बदल गया है पर्व ये , दीवाली का पावन ,
तब कण कण में थे राम , अब जन जन में है रावण

और कौन हैं ये रावण ?

काम, क्रोध, मद , लोभ, में डूबी गहन आबादी ,
महंगाई , प्रदूषण और भ्रष्टाचार की बर्बादी ,
मासूमों का खून बहाते आतंकवादी ,
धर्म , प्रान्त और जात पात पर विष पिलाते अवसरवादी

पावन मात्रभूमि को जिसने किया कुरूप ,
यही हैं वो आज के रावण के दस रूप

किन्तु रावण भी हम हैं , और हमीं हैं राम ,
जो अंतररावण को मारे , वही कहलाए श्री राम

आइये आज यह संकल्प लें कि हम इस वर्ष भी दीवाली बिना पटाखों के मनाएंगे ताकि अपना शहर ध्वनि और वायु प्रदूषण से बचा रहे

ताकि अस्थमा और दिल के रोगी सकून से रह सकें और पूर्णतया स्वस्थ लोग भी स्वस्थ रह सकें


आप सब को दीवाली की हार्दिक शुभकामनायें