विजयदशमी के साथ ही एक बार फिर रावण दहन संपन्न हुआ . कहीं रावण को फूंका गया , कहीं पैरों तले रौंदा गया . कहीं नेता ने मारा , कहीं राम के अभिनेता ने मारा . हर हाल में रावण को मरना पड़ा . सदियों से यही परंपरा चली आ रही है . रावण को तो मरना ही पड़ता है --बार बार, लगातार हर वर्ष .
कभी कभी सोचता हूँ क्या सचमुच रावण ने इतना बड़ा अपराध किया था जो उसे यूँ बार बार मारा जाता है .
जहाँ तक पढने सुनने में आता है , रावण एक सुशिक्षित , ज्ञानी , विद्वान पंडित था . साथ ही अति पराक्रमी , बहादुर , शक्तिशाली और वरदान प्राप्त योद्धा भी था .
उसके चरित्र में भी कोई दाग नहीं था .
उससे बस एक भूल हो गई जो उसने सीता मैया का अपहरण किया और उन्हें कैद में रखा . इसके अलावा तो कोई और अपराध नहीं किया था . उसने कभी सीता मैया को छुआ तक नहीं .
रावण अपनी जिद्द पर ज़रूर अड़ा रहा और बहुत समझाने के बावजूद भी टस से मस नहीं हुआ . अंतत : यही अहंकार उसे ले डूबा .
लेकिन क्या जब तक धरती पर जीवन रहेगा , रावण को यूँ ही मारा जाता रहेगा ?
एक छोटी सी भूल की इतनी बड़ी सजा !
या अहंकार का होना इतना बड़ा गुनाह है ?
यदि हकीकत की दुनिया में देखें तो जाने कितने ही दुष्कर्मी सड़कों पर आज़ाद घूम रहे हैं और उन्हें कोई सजा नहीं मिलती .
दिल्ली जैसे शहर में रोज लड़कियों का अपहरण होता है. रेप की कितनी ही घटनाएँ होती हैं . महिलाओं से छेड़ छाड़ तो आम बात है . कामकाजी महिलाओं का शोषण हो रहा है . दहेज़ के लालची लोगों द्वारा बहुओं को सरे आम जला दिया जाता है .
बड़े सेठों के बच्चे , नेताओं के बच्चे , आला अफ़सरों के बच्चे --शराब के नशे में सड़क पर निरीह जनता को कुचल देते हैं , रोड़ रेज़ में सरे आम हत्या कर देते हैं, शराब न मिलने पर गोली मार देते हैं .
क्या यह अहंकार की निशानी नहीं है ?
लेकिन उनके विरुद्ध अक्सर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती . उन्हें कोई सज़ा नहीं मिल पाती .
यदि मिलती भी है तो बस नाम मात्र .
बिल्ला रंगा को फाँसी हुई , लेकिन फिर सब भूल गए .
निर्दोष जनता को बम से उड़ाने वाले आतंकवादी या तो पकडे नहीं जाते या फिर उन्हें सज़ा ही नहीं हो पाती .
कुछ तो सरकारी मेहमान बन जनता के पैसे पर ऐश कर रहे हैं .
ऐसे में क्या सचमुच रावण को बार बार मार कर हम कुछ हासिल कर रहे हैं ?
लगता है , अब समय आ गया है , हम अपनी परम्पराओं का निष्पक्ष रूप से निरीक्षण करें और समयानुसार संभावित संशोधन करें .
नोट : थोड़ी देर तक धार्मिक भावनाओं और आस्थाओं को भूलकर यदि हम निष्पक्ष चिंतन करें , तो शायद कोई सार्थक बात निकल कर आए .