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Wednesday, November 14, 2012

दे दनादन -- चाइनीज़ बमों से मारे हिन्दुस्तानी मच्छर !


इस वर्ष दीवाली से ठीक पहले सप्ताहंत आने से दीवाली मनाना थोड़ा आसान रहा .  अक्सर इन दिनों में सडकों और बाज़ारों में  भारी भीड़ रहती है जिससे अक्सर भारी जाम लग जाते हैं।  घंटों जाम में फंसे रह कर जश्न मनाने का जोश ही ठंडा पड़ जाता है। ऐसा लगता है जैसे सारा शहर ही सडकों पर निकल पड़ा हो। 
आइये देखते देखते हैं ,  दीवाली के विविध आयाम :            


शनिवार : को अस्पताल में आधी छुट्टी होती है। 


अस्पताल में स्टाफ  ने कमरों को खूबसूरती से सजाकर रंग जमा दिया। ऊपर लैब का एक दृश्य।





हमारे कार्यालय को भी तबियत से सजाया गया था।
ऐसे में हमने भी स्टाफ के लिए एक छोटी सी पार्टी आयोजित कर सब को खुश कर दिया। यह अलग बात है कि उन्हें बदले में हमारी कविता झेलनी पड़ी। हालाँकि यह एक छोटी सी ही कीमत थी चुकाने के लिए।


रविवार : 


शाम को सी एस ओ आई में दीवाली मेले का आयोजन किया गया था। यहाँ अन्य संसाधनों के अतिरिक्त एक ग़ज़ल संध्या का आयोजन किया गया था। दिल्ली के सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायक श्री राहत अली खान ने अपनी ग़ज़लों से सबका मन मोह लिया। 




इस बार क्लब को बहुत बढ़िया तरीके से सजाया गया था। हरे भरे लॉन और पार्किंग को खाली कराकर विस्तार से मेले का आयोजन किया गया था। खाना और पीना , दोनों बढ़िया थे। बस पीने के लिए साकी स्वयं ही बनना पड़ा। ( जूस की बात कर रहे हैं )

सोमवार : 

कई दिनों से मॉल जाने की सोच रहे थे। आखिर सोमवार तक सडकों पर यातायात कम हो गया था। इसलिए नोयडा के ग्रेट इण्डिया प्लेस मॉल की सजावट भी देखने लायक थी।  





रंग बिरंगी लाइटों से सजा मॉल ऐसा अहसास दिला रहा था जैसे हम किसी विदेशी मूल में घूम रहे हों।


हालाँकि मॉल में भीड़ भड़क्का बिल्कुल नहीं था।



हमें तो यह सकून ही दे रहा था।


छोटी दीवाली के दिन सोसायटी में भोज का इंतजाम किया गया था। अड़ोस पड़ोस के सभी पड़ोसियों से एक ही जगह मिलकर दीवाली मुबारक हो गई। फिर देर रात तक बच्चे डी जे पर थिरकते हुए मस्ती करते रहे।


दीवाली : 

सरकार ने 10 बजे के बाद पटाखे न चलने का आह्वान किया था। लेकिन-- इट हेपंस ओनली इन इण्डिया -- यहाँ सरकार की सुनता ही कौन है। रात 8 बजे तक शांति सी महसूस हो रही थी। लगा जैसे दिल्ली वाले समझदार हो गए हैं। लेकिन फिर ऐसा जुनून शुरू हुआ कि 11 बजते बजते चरम सीमा पर पहुँच गया।



हम तो अपनी बालकनी से बस उड़ते हुए धुएं को देखते रहे। ठा ठा ,  धां धां , धड़ाम की आवाज़ों के बीच देखते रहे दूसरों को फूंकते हुए, आराम से कमाए गए हराम के पैसे को . 




लेकिन दीपों और लाइटों से होती हुई जगमगाहट मन को बहुत सुख प्रदान कर रही थी।



वैसे तो दिल्ली के अस्पतालों को पटाखों से जले हुओं के इलाज के लिए पूर्ण रूप से तैयार किया गया था , लेकिन ऐसा होने से बचाना तो डॉक्टर्स के हाथ में नहीं था। कहीं कहीं दुर्घटनाएं भी हुई।




बिल्कुल साफ दिखने वाली सड़क पर अब घना धुआं छा गया था। आखिर यह तो होना ही था।
अफ़सोस तो यह है कि फूलझड़ी और अनार जिन्हें सुरक्षित माना जाता है , वे ही सबसे ज्यादा धुआं छोड़ते हैं।
हालाँकि ध्वनि प्रदूषण होता है चाइनीज़ बमों से।

आखिर हमने दिखा दिया कि हम हिन्दुस्तानी सबसे ज्यादा धार्मिक प्रवृति के लोग होते हैं। वैसे यदि आप किसी से पूछें कि आप पटाखे क्यों छोड़ रहे हैं तो शायद ही कोई इसका कारण बता पाए । ज़ाहिर है, सब छोड़ रहे हैं इसलिए हम भी छोड़ रहे हैं। बस यही मॉब मेंटालिटी हमें दूसरों से अलग बनाती है।  


Saturday, November 10, 2012

मैं तो पटाखे से ही मर जाऊँगा , बम रहने दे ---


पुरानी हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय खलनायक अजित अक्सर जब हीरो को पकड़ लेते तो कहते -- रॉबर्ट, इसे गैस चैंबर में डाल दो। कार्बन डाई ऑक्साइड इसे जीने नहीं देगी और ऑक्सीजन इसे मरने नहीं देगी। आजकल दिल्ली शहर ऐसा ही गैस चैंबर बना हुआ है। नवम्बर शुरू होते ही दिल्ली को ऐसी सफ़ेद चादर ने घेर लिया जैसी वो कौन थी जैसी पुरानी हिंदी संस्पेंस फिल्मों में दिखाई देती थी। फर्क सिर्फ इतना है कि उन फिल्मों में नकली धुंध का इस्तेमाल किया जाता था लेकिन यहाँ न सिर्फ असली धुंध है बल्कि ज़हरीली भी है। दूसरे, फिल्मों में नायक सारी दीवारें तोड़कर बाहर निकल आता था, लेकिन असल जिंदगी में आम आदमी के पास बच कर निकलने का कोई रास्ता नहीं होता।  

धुंध : दरअसल इसे धुंध कहना ही सही नहीं है। इसे स्मॉग कहा जाता है। यानि यह स्मोक ( धुएं ) और फॉग ( धुंध ) का मिश्रण है। दिल्ली में सर्दी शुरू होते ही वायु में वाष्प की मात्रा बढ़ने लगती है जो धुएं से मिलकर धुंधलका बन जाती है। वायु का  बहाव न होने से यह पृथ्वी की सतह पर ही टिकी रहती है। लेकिन इस वर्ष  अमेरिका में आए सैंडी तूफ़ान की वज़ह से देश में नीलम नाम के तूफ़ान का कहर दिल्ली में भी दिखाई दे रहा है. इसकी वज़ह से वायुमंडल में अत्यधिक वाष्प आने से असमय ही यह स्थिति उत्पन्न हुई है.   

लेकिन सबसे चिंताज़नक बात यह है की इस स्मॉग में ज़हरीली गैसों की मात्रा बहुत ज्यादा पाई गई है. धूल और धूएँ के महीन कणों के अलावा नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड , कार्बन मोनो ऑक्साइड, बेंजीन और ओजोन की अत्यधिक मात्रा वायुमंडल को एक गैस चैंबर बना रही हैं। 


नतीजा : 
साँस लेने में बड़ी कठिनाई पैदा हो हो रही है. घर से बाहर निकलते ही एक घुटन सी महसूस होती है। 
* आँखों में जलन। 
* गले में खराश से लेकर साँस की परेशानी होने का खतरा बना रहता है। 
* दिल के रोगियों को विशेष खतरा हो सकता है।  

ऐसे में क्या किया जाये ? 

* जहाँ तक हो सके , घर से बाहर ही न निकलें . लेकिन यह संभव नहीं . इसलिए ज़रुरत हो , तभी बाहर जाएँ. आखिर सबसे कम प्रदुषण घर में ही हो सकता है.
* आँखों को दिन में कई बार ठन्डे पानी से धोएं . इससे जलन में आराम आएगा. 
* दिन में कई बार कुल्ला या गरारे करें जिससे गला ख़राब होने से बच सके. 
* पानी और अन्य तरल पदार्थ जैसे चाय आदि पीते रहें जिससे शरीर का हाईडरेशन बना रहे . 
* जिन्हें साँस की शिकायत  रहती हो , उन्हें मूंह पर मास्क लगाकर चलना चाहिए. 
ऐसा करने से थोड़ी राहत तो मिलेगी लेकिन यह इस समस्या का स्थायी निवारण नहीं है. इसके लिए हमें बढ़ते प्रदुषण के कारणों पर अंकुश लगाना होगा. 

प्रदुषण के कारण : 

दिल्ली में करीब २ करोड़ जनता और ७० लाख वाहन साँस ले रहे हैं . इन से निकलती गैसें वातावरण में फैलकर प्रदुषण को बढ़ा रही हैं. अब मनुष्यों की सांसों से निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड को तो नहीं रोका जा सकता लेकिन वाहनों से फैलते प्रदुषण को अवश्य रोका जा सकता है. पता चला है की दिल्ली में हर रोज करीब ११०० नई कारों का पंजीकरण होता है . इनमे से ६० % डीज़ल से चलने वाली कारें हैं . ज़ाहिर है , सी एन जी आने के बावजूद, डीज़ल वाहनों से फैलने वाला प्रदुषण अभी भी  बना हुआ है . इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने की ज़रुरत है. 

दिवाली :     

वर्तमान परिवेश में दिवाली का आना एक नासूर सा लग रहा है . ज़रा सोचिये , जब अभी साँस नहीं आ रही तो दिवाली के दिन क्या हाल होगा . दिवाली के दिन दिल्ली वाले पागल से हो जाते हैं और पटाखे और बम  छोड़ने की ऐसी होड़ सी लग जाती है की देखकर इन्सान के वहशी होने का साक्षात् प्रमाण सा दिखाई देने लगता है . ऐसे में साँस , दिल के रोगियों और अन्य गंभीर रूप से बीमार लोगों को कितनी मुश्किल होती होगी , यह कोई नहीं सोचता.
क्या अभी और कमी है प्रदुषण में जिसे दिवाली पर पूरा करने की ज़रुरत है ? 
फिल्मों के हीरो तो हीरो होते हैं, गैस चैंबर से बच निकलते हैं . लेकिन एक आम आदमी कहाँ जायेगा साँस लेने , जब प्रदुषण से साँस आनी ही बंद हो जाएगी ?    
आखिर यह भी क्या खेल हुआ , धुआं और शोर फ़ैलाने का ! 

ऐसे में एक हास्य कवि -- पोपुलर मेरठी का एक शे'र याद आता है : 

मैं हूँ जिस हाल में , ऐ मेरे सनम रहने दे , 
चाकू मत दे मेरे हाथों में , कलम रहने दे।  .
मैं तो शायर हूँ, मेरा दिल है बहुत ही नाज़ुक 
मैं पटाखे से ही मर जाऊँगा , बम रहने दे।

एक अपील : दिवाली भले ही हम हिन्दुओं का सबसे बड़ा और पावन पर्व है , लेकिन यह दिवाली यदि हम बिना बम पटाखों के मनाएं , तो शायद मानव जाति पर बहुत बड़ा उपकार होगा. वर्ना इस प्रदुषण से कई नाज़ुक दिल बीमार असमय ही राम के पास पहुँच जायेंगे . क्या बताएँगे श्री राम को उनके प्यारे देश का हाल ! 
लेकिन ये जनता है , कहाँ मानती है. क्या हुआ , ग़र पड़ोसी बीमार है. वैसे भी यहाँ पड़ोसी पड़ोसी बात ही कहाँ करते हैं . भई बम नहीं चलाये तो दिवाली क्या खाक हुई !

ऐसे में क्या सरकार कोई ठोस कदम उठाने का साहस करेगी ?  
क्यों न इस वर्ष दिवाली पर पटाखों पर टोटल बैन लगा दिया जाए !
आखिर, इस वर्ष जिन्दा रहे तो अगले वर्ष फिर दिवाली मना सकते हैं .  

नोट : इस समय स्मॉग दिल्ली तक ही सीमित नहीं है बल्कि पूरे उत्तर भारत में फैली है. इसलिए इससे निपटने का प्रयास सबको मिलकर करना होगा.