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Sunday, March 10, 2013

फेसबुकिया ब्लॉगिंग और ब्लॉग पर फेसबुकिंग -- यही है ज़माने की चाल !


अब जब हमारे सभी ब्लॉगर मित्र बन्धु फेसबुक की ओर कूच कर चुके हैं, तो न चाहते हुए भी हम भी कुछ कुछ फेसबुकिया हो गए हैं। हालाँकि जो मज़ा यहाँ है , वह वहां कहाँ। इसलिए पिछले एक महीने में फेसबुक पर अलग अलग मूड और माहौल में जो कुछ चन्द पंक्तियाँ डाली, उन्हें यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है : 

फेसबुकिया क्षणिकाएं       

१)

२)

आज ---
सारी रात 
मेघा , गरजते रहे 
बरसते रहे ---
नयनों से 
फिर आज ,
सारी रात ---

Tuesday, May 10, 2011

प्यार , इश्क , मुहब्बत ---

मौसम भी गर्म है और माहौल भी । गर्मी को गर्मी से मारने के लिए आज प्रस्तुत हैं कुछ क्षणिकाएं , जो रोमांस पर आधारित हैं

इसे नौजवान पढेंगे तो खुश होंगे लेकिन यदि भूतपूर्व नौजवान पढेंगे तो वे और भी खुश और रोमांचित होंगे , ऐसी उम्मीद है
वैसे मेरा मानना है कि जवानी के मामले में आदमी कभी भूतपूर्व नहीं होता

) रात , चाँद और "चांदनी"

नीले आसमाँ में
बिखरी
चाँद की दूधिया
चांदनी में नहाकर
किसी धुंधली सी
याद में
डुबकी लगाने लगा
मन ।
आज फिर वो
गीत, हौले से
लबों पे उभर आया।
चंदा ओ चंदा ----


2) रूप , रूपसी और बेकसी

सोचता हूँ कहाँ होगी
कैसी होगी
क्या वैसी ही होगी ?
या फिर
वक्त की गर्म आँधियों ने
झुलसा दिया होगा
उसके रेशमी बालों को
और खींचदीं होंगी
गुलाब की पंखुड़ियों से
नर्म गुलाबी गालों पर
असंख्य आड़ी तिरछी
ज़ालिम लकीरें ।
एक तमन्ना थी
बस एक बार
उसका दीदार करूँ
पर डरता हूँ
क्या देख पाऊंगा
उस बेपनाह हुस्न पर
बेरहम वक्त की मार ।
अच्छा है जो
अंकित रहे
मानस पटल पर
वही छवि
मधुबाला की तरह ।


3) इश्क और बुढ़ापा

उनको देख जब
दिल धड़का
और
धड़कता गया
धड़कता गया
हम समझ गए
कि
मामला नाज़ुक है
फिर
सी जी किया
तो मियां
'दिल' के बीमार निकले


4 ) वक्त

बाला थी पिंकू
युवा बनी पिंकी
प्रोढ़ा हुई तो पिंको देवी कहलाई ।

वक्त ने नाम को भी नहीं बख्शा


नोट : इसे शुद्ध मनोरंजन के नज़रिए से पढ़ेंकृपया दिल पर मत लें
यदि पढ़कर कुछ याद गया हो तो बताइयेगा ज़रूर