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Wednesday, January 15, 2014

सादा और अनुशासित जीवन , खुश मिज़ाज़ रहना और समय पर टाँका लगाना ही लम्बे स्वस्थ जीवन की कुंजी है ---



आप २५ वर्ष के युवा हों या ५० वर्ष के अधेड़ , मामला जब दिल का आता है तो सभी आयु वर्ग के लोग दिल के टूटने से घायल होते हैं।  जहाँ पहले अलग अलग आयु में दिल टूटने के कारण भी अलग अलग होते थे , वहीँ आजकल ये दूरियां मिट सी गई हैं और हर आयु में दिल की स्थिति नाज़ुक सी ही बनी रहती है।  
यानि आजकल  युवाओं को भी प्रौढ़ आयु वर्ग के रोग लगने लगे हैं।  यह आधुनिक जीवन शैली का ही परिणाम है कि आजकल युवाओं को भी ह्रदयाघात ( हार्ट अटैक ) होने लगे हैं।   

क्यों होता है हृदयाघात : 

कहते हैं पेड़ अपने फल नहीं खाते , नदियां अपना पानी नहीं पीती।  लेकिन यह भी सच है कि रसोइये को भी खाना खाना पड़ता है , डॉक्टर भी बीमार पड़ते हैं। दिल का मामला भी कुछ इसी तरह का होता है।  सारे शरीर को रक्त पहुंचाने वाले दिल को स्वयं के लिए भी रक्त की आवश्यकता होती है।  



यह काम जो नसें करती हैं उन्हें कोरोनरी आर्टरीज कहते हैं।  हृदय से एओर्टा द्वारा रक्त सारे शरीर में जाता है।  इसी से निकलती हैं दो धमनियां जिन्हे दायीं और बायीं कोरोनरी आर्टरी कहते हैं।  ये अलग अलग शाखाओं में बंटकर सारे हृदय की मांसपेशियों को रक्त पहुंचाती हैं। यदि इनमे कहीं भी रुकावट पैदा हो जाये तो रक्त प्रवाह में बाधा आ सकती है जिससे पर्याप्त मात्रा में रक्त हृदय के उत्तकों तक नहीं पहुँच पाता । ऐसे में  ऑक्सीजन और ऊर्ज़ा के भूखे उत्तक चिल्लाने लगते हैं जिसे एंजाइना कहते हैं।

मूलत: एंजाइना हृदय की एक  पुकार है आपको याद दिलाने के लिए कि उसे भी खुराक चाहिए जो पूरी नहीं हो पा रही है।  यदि अब भी आपने नहीं सुना तो यह पुकार सदा के लिए शांत हो जाती है , हार्ट अटैक के रूप में।

एंजाइना के लक्षण : 

अक्सर छाती में बायीं ओर होने वाले दर्द को एंजाइना समझा जाता है।  लेकिन सिर्फ दर्द ही नहीं बल्कि किसी भी तरह की चुभन , जलन या भारीपन भी एंजाइना हो सकता है।  इसके अलावा बायीं ओर दांत में दर्द , कंधे में दर्द या बाजु में होने वाला दर्द भी एंजाइना हो सकता है।  पसलियों के बीच पेट के ऊपरी हिस्से ( एपीगेस्ट्रियम) में होने वाले दर्द या जलन को अक्सर एसिडिटी मान लिया जाता है जबकि यह भी एंजाइना हो सकता है।  दर्द के साथ यदि पसीना भी आ गया है या घबराहट होने लगी है या दिल में धड़कन महसूस हो रही है तो यह एंजाइना होने के स्पष्ट संकेत हैं।

कारण : 

हमारे शरीर की धमनियों में कॉलेस्ट्रॉल का जमाव निरंतर होता रहता है।  यह बचपन से ही आरम्भ हो जाता है। यूँ तो कॉलेस्ट्रॉल शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक पदार्थ है लेकिन इसकी अत्यधिकता भी उतनी ही हानिकारक है।  धमनियों में कॉलेस्ट्रॉल जमने से इनमे अवरुद्ध पैदा होता है जो रक्त प्रवाह को प्रभावित करता है।  रक्त प्रवाह कम होने से शरीर के विभिन्न अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।  लेकिन इसका सबसे ज्यादा कुप्रभाव  हृदय पर ही पड़ता है।  हृदय में यह एंजाइना के रूप में सामने आता है।  लेकिन यदि इस तरह की अवरुद्ध धमनी में अचानक कोई रुकावट आ जाये तो हार्ट अटैक हो जाता है। अक्सर ऐसा क्लॉट बनने से होता है।

कारक : 

हृदयाघात में फैमिली हिस्ट्री बहुत महत्त्वपूर्ण है।  यानि यदि आपके परिवार में किसी की मृत्यु हृदयाघात से हुई है या निकट सम्बन्धियों में हृदय रोग है तो आप भी रिस्क पर हैं।  इसके अलावा निष्क्रिय जीवन शैली , मोटापा , हाई बल्ड प्रेशर , डायबिटीज , हाई कॉलेस्ट्रॉल , धूम्रपान ,  मानसिक तनाव आदि ऐसे कारक हैं जो हृदयरोग को बढ़ावा देते हैं।

रोकथाम : 

नियमित व्यायाम , आहार नियंत्रण , नियंत्रित वज़न , बल्ड प्रेशर और शुगर कंट्रोल और तनाव रहित जीवन जीने से हृदयाघात की सम्भावना निश्चित रूप से कम हो जाती है। नियमित रूप से ४५ मिनट की पैदल  यात्रा सबसे बढ़िया व्यायाम है।  खाना उतना ही खाया जाये जितना आवश्यक है।  यानि सिर्फ जीने के लिए खाएं न कि खाने के लिए जीयें ।  मोटा होना सेहतमंद नहीं सेहतबंद होने की निशानी है।  धूम्रपान से हीरो नहीं ज़ीरो होने का रास्ता खुलता है। अंतत : घर का बना खाना ही सर्वोत्तम है, पिज़्ज़ा, बर्गर , मोमोज , नूडल्स आदि तत्काल आहार सेवा जीवन का अंतकाल है।   

उपचार : 

फिर भी यदि एंजाइना हो ही जाये तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।  सबसे पहले ई सी जी किया जायेगा , लेकिन एंजाइना होने पर एंजिओग्राफी लगभग आवश्यक हो जाती है।  इस टेस्ट से धमनी में रुकावट की स्थिति और गम्भीरता का पता चलता है।  यदि रुकावट चिकित्सा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण पायी जाती है तो स्टेंट डालना आवश्यक होता है।

हार्ट अटैक : 

हार्ट अटैक होने पर तुरंत पास के हॉस्पिटल में जाना चाहिए। ऐसे में एक एक मिनट कीमती होता है।  अक्सर हार्ट अटैक धमनी में क्लॉट बनने से अचानक हुई रुकावट के कारण होता है।  ऐसे में इंजेक्शन द्वारा क्लॉट को विघटित करने का प्रयास किया जाता है।  इसे थ्रोम्बोलाइजेशन कहते हैं।  क्लॉट के घुलने से बंद हुई धमनी खुल जाती है और रक्त प्रवाह होने लगता है।  इस तरह हृदय की मांसपेशियाँ मृत होने से बच जाती हैं।  यह कम एक घंटे में हो जाये तो सर्वोत्तम है , हालाँकि ३ घंटे तक भी फायदा होने की सम्भावना रहती है। लेकिन जितना जल्दी किया जायेगा ,  फायदा भी उतना ज्यादा होगा।

आधुनिक अस्पतालों में जहाँ एंजिओग्राफी की सुविधा होती है वहाँ तुरंत स्टेंट डालकर धमनियों को खोल दिया जाता है।  यह एक बढ़िया ईलाज़ है और आजकल बहुत उपयोग में लाया जा रहा है।  लेकिन दो से ज्यादा धमनियों में ब्लॉक होने पर बाईपास सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है। हालाँकि , उम्र भर दवाईयों का दास तो फिर भी होना ही पड़ता है।

इसलिए रोकथाम में ही भलाई है।  सादा और अनुशासित जीवन ,  खुश मिज़ाज़ रहना और समय पर टाँका लगाना ही लम्बे स्वस्थ जीवन की कुंजी है।   


Saturday, May 12, 2012

ज़रा संभल के --- स्वास्थ्य के मामले में चमत्कार नहीं होते .


शायद हमारा देश ही एक ऐसा देश होगा जहाँ रोगों का इलाज करने के लिए दादी नानी से लेकर साधु बाबा तक सभी चिकित्सक का काम धड़ल्ले से करते हैं . न सिर्फ मान्यता प्राप्त चिकित्सा पद्धतियाँ ही अनेक हैं , बल्कि यहाँ बिना किसी डिग्री धारण किये और बिना सरकार से मान्यता प्राप्त किये अनेकों सिद्ध पुरुष , स्व घोषित चिकित्सक और घराने/ सफ़ाखाने मोटी रकम वसूल कर धर्मभीरु और मूढमति जनता को लूटते हुए मिल जायेंगे .

आजकल टी वी पर भी ऐसे अनेकों कार्यक्रम दिखाई देने लगे हैं जहाँ कोई ज्योतिषी, पंडित जी , टेरो कार्ड रीडर , वास्तु एक्सपर्ट , साधु , बाबा या कोई भी पहचान रहित बंदा पेट के कीड़ों से लेकर कैंसर तक का शर्तिया इलाज करने का दावा करते हैं .

हमें तो सबसे ज्यादा हास्यस्पद तब लगता है जब एक ज्योतिषी अपना कंप्यूटर लेकर बैठ जाता है और फोन पर किसी की स्वास्थ्य समस्या सुनकर तुरंत computerized इलाज बता देता है .

एक हरियाणवी लाला तो हर बीमारी का इलाज घर में मिलने वाले मसालों से ही बता देता है . माना हल्दी बड़ी गुणकारी है लेकिन हर तरह के रोग इसके सेवन से ठीक हो जाते तो सैकड़ों दवा निर्माण कम्पनियाँ ( pharmaceutical firms ) बंद न हो जाएँ . ऊपर से ज़नाब हर फोन करने वाले को यह भी बताते हैं , हमारा पैकेज खरीद लो , शर्तिया फायदा होगा . पैकेज भी सौ दो सौ का नहीं बल्कि तीन से चार हज़ार रूपये का . हम तो इस कार्यक्रम को बस दो चार मिनट के लिए एक हास्य कार्यक्रम के रूप में देखते हैं .

एक और कार्यक्रम जो टी वी पर बहुत लोकप्रिय रहा है वह है किसी बाबा द्वारा आयोजित किये गए सत्संग का सीधा प्रसारण या रिकोर्ड किया हुआ प्रसारण . ऐसा कोई एक बाबा नहीं है . पिछले दस पंद्रह सालों में अनेक बाबाओं ने देश की जनता को अपनी प्रतिभा से भ्रमित कर न सिर्फ अपना दास भक्त बना लिया है बल्कि आज उनका करोड़ों का व्यापार चल रहा है . यह सोच कर भी हैरानी होती है , कैसे कोई गोल गप्पे खाकर / खिलाकर अपनी मुश्किलों का हल निकाल सकता है . लेकिन बाबा ने कहा और भक्त ने आँख बंद कर विश्वास कर लिया. आखिर एक सुखी जीवन के लिए १०००-१५००/- भला क्या मायने रखते हैं .

हमारे देशवासियों की सबसे बड़ी कमजोरी है , चमत्कारों में विश्वास रखना . हालाँकि सभी ओर से निराश होकर मनुष्य अपना विवेक खो जाता है . लेकिन आशा के विरुद्ध आस रखना कहीं न कहीं चमत्कारिक आस्थाओं को ही जन्म देता है . इन्हीं आस्थाओं और अंध विश्वास का फायदा उठाते हैं ये ढोंगी बाबा और धर्म गुरु जिनके पास निश्चित रूप से विलक्षण बुद्धि तो होती है . इस कलियुग में जो दूसरों को बेवक़ूफ़ बना सकता है , वही सिद्ध है ,वही भगवान है , उसी की पूजा होती है -- तन , मन और धन से .

आइये देखते हैं कुछ रोगों से सम्बंधित कुछ विशेष उदाहरण :

एपिलेप्सी :

कई वर्ष पहले ऋषिकेश में एक क्लिनिक का बड़ा बोलबाला था जहाँ एपिलेप्सी का इलाज किया जाता था . इसके संस्थापक और मुख्य चिकित्सक न तो डिग्रीधारी चिकित्सक थे , न मान्यता प्राप्त . फिर भी अख़बारों के मुख्य प्रष्ठ पर बड़े बड़े विज्ञापन आते थे जिनमे उन्हें राष्ट्रपति के ऑनरेरी फिजिसियन होने का दावा किया जाता था . सबसे आश्चर्यजनक बात थी तथाकथित डॉक्टर द्वारा पहली खुराक अपने हाथों से खिलाया जाने का आगृह . फिर तीन महीने की दवा एक साथ --मात्र ५०००-६००० रूपये में .
अंत में इस धोखाधड़ी का भंडा भोड़ हुआ और डॉक्टर साहब को जेल .

सत्य : एपिलेप्सी का इलाज चमत्कारिक नहीं है . एलोपेथी में कई तरह की दवाएं हैं , जिनके सेवन से तीन साल में एपिलेप्सी हमेशा के लिए ठीक हो जाती है . लेकिन ये दवाएं डॉक्टर की देख रेख में ही लेनी चाहिए क्योंकि इनके साइड इफेक्ट्स भी होते हैं जो हानि कर सकते हैं .

एस्थमा :
हैदराबादी मछली :
इसके बारे में तो सभी ने सुना होगा . एक परिवार जिन्दा मछली में कोई दवा मिलाकर रोगियों को खिलाता है . देश में अलग अलग जगह कैम्प लगाये जाते हैं जहाँ दूर दूर से निराश रोगी इलाज कराने आते हैं . जो शाकाहारी हैं या जिन्दा मछली नहीं निगल सकते , उन्हें दवा केले में मिलाकर खिलाई जाती है . इलाज भले ही मुफ्त में किया जाता हो , लेकिन लोग किराया लगाकर कैम्प तक पहुँचते हैं .
अब सोचने की बात यह है , यदि केले में लेने से उतना ही फायदा होता है जितना मछली में, तो जिन्दा मछली क्यों खिलाई जाती है . क्या है यह दवा ? कितने लोगों को फायदा हुआ है ? यह कोई नहीं जानता .

सत्य :
एस्थमा एक अनुवांशिक रोग है जो परिवारों में चलता है . इसका कोई इलाज नहीं है लेकिन सही दवाओं से नियंत्रित किया जा सकता है . यदि सही तरीके से इलाज न किया जाए तो जान भी जा सकती है , विशेष कर अक्युट अटैक में . इन्हेलर्स के इस्तेमाल से बहुत फायदा होता है . लेकिन इसका इलाज भी एक्सपर्ट की देख रेख में ही कराना चाहिए .

पीलिया ( जौंडिस ) :

यह एक वाइरल संक्रमण है जिससे लीवर ( यकृत ) की कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं . लेकिन यह सेल्फ लिमिटिंग होता है . यानि एक से डेढ़ महीने में अपने आप लीवर सेल्स पुनर्जीवित हो जाती हैं . इलाज में सिर्फ बेड रेस्ट और खाने का ध्यान रखना होता है .

लेकिन रोग को ठीक करने के लिए अनेक नीम हकीम जड़ी बूटियों से शर्तिया इलाज का दावा करते हैं . जाने माने ब्लॉगर भाई अविनाश वाचस्पति जी ने स्वयं अपनी दास्ताँ सुनाते हुए लिखा , किस तरह एक ठग ने उनसे हजारों रूपये झाड़ लिए और शरीर में जो रिएक्शन हुई उसके इलाज में उन्हें अलग से पैसा खरचना पड़ा और दर्द सहन करना पड़ा . अंत में हमारी सलाह पर उन्होंने सही जगह इलाज कराया और आज वो लगभग पूर्णतया सही हो चुके हैं .

सत्य : पीलिया का कोई इलाज नहीं होता . यह स्वत : सही हो जाता है . हालाँकि क्रॉनिक हिपेटाईटिस में इलाज ज़रूरी है जो महंगा भी है . लेकिन किसी भी झाड़ फूंस , तंत्र मंत्र या चमत्कारिक दवा के चक्कर में न पड़ें .

ऐसा नहीं है , एलोपेथी ही एक पद्धति है उपचार की . आयर्वेद और होमिओपेथी में भी कई रोगों का अच्छा उपचार होता है . हालाँकि यह क्रॉनिक रोगों में ज्यादा फायदेमंद होता है . लेकिन जो विकास एलोपेथी में हुआ है और जो क्रांतिकारी अनुसन्धान यहाँ हुआ है , उसका कोई मुकाबला नहीं है .
अक्सर रोगी यहाँ वहां से सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर गलत हाथों में अपनी जिंदगी थमा देते हैं . यह अत्यंत हानिकारक होता है . उपचार हमेशा सुशिक्षित , मान्यता प्राप्त और क्वालिफाइड डॉक्टर से ही कराना चाहिए . आखिर , यह जिंदगी एक ही बार मिलती है .

नोट : यह पोस्ट जन साधारण के हित में लिखी गई है . किसी व्यक्ति विशेष, समूह या पद्धति के विरुद्ध नहीं है . कृपया अपना विवेक इस्तेमाल करें .




Saturday, September 18, 2010

बीमारी का शर्तिया इलाज़ ---बीमार ही न पड़ें ---

यह पूरा सप्ताह अस्पताल में ही गुजरा । लेकिन एक डॉक्टर के रूप में नहीं , बल्कि अटेंडेंट के रूप में । पिताजी को गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के कारण अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा । हालाँकि अब अस्पताल के बिस्तर से मुक्ति प्राप्त कर घर आ चुके हैं , लेकिन रोगमुक्ति के लिए संघर्ष जारी है ।

पिछली पोस्ट में लिखी नज़्म , मैंने अस्पताल में अटेंडेंट के सोफा कम बेड पर बैठकर लिखी थी ।

सारे माहौल का जायज़ा लेने के बाद एक सवाल ज़ेहन में उठता है ।

सवाल : यदि आप बीमार पड़ जाएँ तो क्या करेंगे ?
ज़वाब : आप भला क्या करेंगे । जो भी करेंगे , डॉक्टर्स ही करेंगे ।
आप को तो बस डॉक्टर के पास जाना है ।

बस इतना जान लें कि डॉक्टर के पास जाना आपके हाथ में है , लेकिन वहां से आपका निकलना सिर्फ डॉक्टर के हाथ में ।
अब इलाज़ के जितने ऑप्शंस हमारे देश में हैं , उतने शायद ही किसी और देश में उपलब्ध हों ।

आपके ऑप्शंस :

१) घर में दादी नानी के नुश्खे ।
२) गली के नुक्कड़ पर बंगाली डॉक्टर की दुकान ।
३) वैध , हकीम या आर एम् पी ।
४) वैकल्पिक चिकित्सा प्रणाली के चिकित्सक जैसे आयुर्वेदिक , होमिओपेथिक , यूनानी आदि ।
५) एलोपेथिक डॉक्टर --फैमिली फिजिशियन । या फिर स्पेशलिस्ट्स , सुपर स्पेशलिस्ट्स और सुपर सुपर स्पेशलिस्ट्स ।

लेकिन यदि आपको अस्पताल में भर्ती करने की नौबत आ जाये तो क्या विकल्प हैं ?

सरकारी अस्पताल :

जहाँ आपको मिलेंगी हर जगह लम्बी लम्बी कतारें , भीड़ भाड़ , गंदगी का साम्राज्य , वार्ड्स में एक बिस्तर पर दो दो तीन तीन मरीज़ , पूरे वार्ड में बस एक या दो नर्सें , मुश्किल से ढूंढें से मिलते डॉक्टर जो बात बात पर डांट लगायें, टेस्ट्स की रिपोर्ट के लिए लम्बा इंतजार , मिल जाये तो गनीमत । ए सी की छोडिये , यदि आपके सर पर पंखा चल रहा हो तो बड़ी बात है । हर कोने में पान की पीक जैसे सारे पान चबाने वाले यहीं पैदा होते हैं ।

यहाँ इलाज़ कराना , सच में सबके बस की बात नहीं । बहुत बड़ा ज़िगर चाहिए , इसके लिए ।

प्राइवेट अस्पताल :

छोटे नर्सिंग होम से लेकर फाइव स्टार कॉर्पोरेट अस्पताल --ज़ाहिर है जितना गुड डालो , उतना ही मीठा होता है ।
यहाँ देखेंगे चमचमाते फर्श और दीवारें , कोई भीड़ नहीं , सेन्ट्रल ए सी , प्राइवेट रूम में सभी आधुनिक सुविधाएँ , एक बेड के लिए एक नर्स , आनन फानन में सब काम हो जाएँ । अदब से बात करते डॉक्टर्स ।

लेकिन बस यहीं तक ठीक है । एक बार आप भर्ती हो जाएँ , फिर देखिये क्या क्या होता है ।

* सबसे पहले जाते ही सारे टेस्ट्स --भले ही आपने दो दिन पहले कराए हों ।
* एक बार रेजिडेंट डॉक्टर द्वारा देख लेने और हिस्ट्री शीट भरने के बाद शुरू होता है , एक से बड़े एक स्पेशलिस्ट का आवागमन :

कार्डियोलौजिस्ट : वह आपकी ई सी जी से लेकर ईको तक सब जांच कर बताएगा कि आपका हार्ट ठीक है ।

डाईबीटोलौजिस्ट : शुगर के लिए ढेर सारे टैस्ट्स करा देगा ।

नेफ्रोलौजिस्ट : डायबिटीज है तो किडनी डिसीज तो होगी ही । एक और लिस्ट , टैस्ट्स की ।

यूरोलौजिस्ट : यूरिनरी सिस्टम में कहीं रूकावट है तो यूरोलौजिस्ट ही बताएगा ना । अब थोड़े टैस्ट और अल्ट्रा साउंड , सी टी स्केन आदि करेंगे तभी तो पता चलेगा , कहाँ रोग की जड़ है ।

न्यूरोलौजिस्ट : शुगर हो और नर्वस सिस्टम ठीक हो , ऐसा तो हो नहीं सकता । इसलिए एक बार पूरा नर्वस सिस्टम जांच करना पड़ेगा ।

गैस्ट्रोएंट्रोलौजिस्ट : पेट में खराबी है , बार बार दस्त आ रहे हैं , कोई बात नहीं ये डॉक्टर आकर अपनी एक्सपर्ट राय दे जायेगा । बस ५ -७ जाँच वो भी लिख जायेगा ।

हालाँकि इसके बाद और भी लौजिस्ट्स बचे हैं , जो आपकी किस्मत पर निर्भर करता है या आपके हालातों पर ।

इन सब ऐशो आराम के बीच बस एक ही चीज़ सताती है । और वो है --हर दो दिन बाद एक भारी राशी का एस्टीमेट जमा कराने के लिए ।

पैसे जमा करते करते एक दिन ऐसा आता है जब आप अपनी बीमारी के बारे में भूलकर बस यही सोचने लगते हैं कि ये डॉक्टर कब छोड़ेगा ।

ज़रा सोचिये --यदि आप करोडपति हैं जो लाखों हर महीने कमा रहे हैं या फिर ऐसी नौकरी करते हैं जहाँ आपका सारा खर्च दफ्तर उठाने को तैयार है , तब तो ठीक है । वर्ना एक आम आदमी के लिए ऐसा इलाज कराना क्या संभव है ?

इससे बचने के लिए तो एक ही रास्ता है कि आप बीमार ही न पड़ें ।
लेकिन क्या यह संभव है ?

शायद नहीं , लेकिन ऊपर वाले से कम से कम प्रार्थना तो कर ही सकते हैं ।

Tuesday, July 6, 2010

क्या हो यदि शरीर के जोड़ जाम हो जाएँ----


एक दिन के लिए दिल्ली बंद हुई । मानो जिंदगी ही ठप्प हो गई ।
कुछ इसी तरह हमारे शरीर के साथ भी होता है । यदि शरीर के जोड़ जाम हो जाएँ , यानि उनमे कोई रोग हो जाये तो हमारी सारी गतिविधियाँ ही प्रभावित हो जाती हैं । यूँ तो जोड़ों के रोग को गठिया रोग कहते हैं । लेकिन ये रोग कई प्रकार के होते हैं । जैसे --ओस्टियो आर्थराईटिस , रिउमेटिक आर्थराईटिस और गाउटी आर्थराईटिस ।

आइये आज बात करते हैं , गाउटी आर्थराईटिस की ।
इसके कई नाम होते हैं जैसे --गाउट , गाउट सिंड्रोम , गाउटी आर्थराईटिस, किंग्स फुट आदि ।

गाउट क्या होता है ?
यह एक ऐसी दशा है जिसमे शरीर में यूरिक एसिड की अधिकता हो जाती है। रक्त में यूरिक एसिड अधिक होने से यह शरीर के विभिन्न अंगों में जमा हो जाता है , क्रिस्टल के रूप में । जैसे गुर्दों में , पैरों और हाथों की उँगलियों में , कोहनी के पीछे , कान के लोब्युल में ।

सबसे ज्यादा असर पैर के अंगूठे में होता है, जिसमे सूजन और दर्द होने से चलना मुश्किल हो जाता है ।
गाउट के लक्षण :


गाउट का अटैक होने पर पैर के अंगूठे में अचानक सूजन , लाली , गर्म होना और तेज दर्द होने लगता है । हालाँकि पहला अटैक बिना इलाज़ के भी १-२ हफ्ते में ठीक हो जाता है । लेकिन फिर होने वाले अटैक बिना दवा के ठीक नहीं होते । आगामी अटैक लम्बे भी ज्यादा चलते हैं । रोग बढ़ने पर गुर्दों में भी पथरी बनने की सम्भावना रहती है ।

क्यों होता है ?
यह रक्त में यूरिक एसिड के बढ़ने से होता है । यूरिक एसिड दो तरह से बढ़ सकता है --या तो ज्यादा बनने से , या मूत्र में वित्सर्जित न होने से । इसके प्रमुख कारण हैं :
जेनेटिक : २० % लोगों को जेनेटिक कारण से होता है ।
खाने में रेड मीट , यीस्ट , और फिश ऑयल ज्यादा होने से ।
अत्यधिक अल्कोहल , विशेष तौर पर बियर ।
मोटापा होने से ।
कुछ दवाओं से भी यूरिक एसिड बढ़ सकता है ।

निदान : मुख्य तौर पर पैर के अंगूठे के बेस पर अचानक सूजन , दर्द और लाल होना --गाउट की ओर इशारा करता है । यूरिक एसिड के बढे होने से इसकी पुष्टि होती है । लेकिन सही निदान के लिए सूजन से पानी निकाल कर इसकी जाँच करने पर यूरिक एसिड के क्रिस्टल दिखाई देते हैं ।

उपचार : अक्युट अटैक होने पर आराम करें । चलने के लिए छड़ी लेने से जोड़ पर बोझ कम पड़ता है । पैर को उठाकर रखें , जैसे तकिया लगाकर । आइस पैक (बर्फ )का इस्तेमाल करें । पानी की कमी न होने दें । यानि ज्यादा पानी पियें ।

डॉक्टर से सलाह अवश्य लें । डॉक्टर आपको देगा :
दर्द निवारक दवा , यूरिक एसिड को कम करने की दवा और कभी कभी steroids
यदि अटैक दोबारा न हो , इसके लिए ज़रूरी है कि आप डॉक्टर को दिखाते रहें ताकि यूरिक एसिड को कम रखने के लिए दवा मिलती रहे ।

बचाव के साधन :
खाने में परहेज़ । यही एक रोग है जिसमे परहेज़ बहुत काम आता है । लो फैट और लो कोलेस्ट्रोल डाईट लें ।
रेड मीट , यीस्ट , फिश , कोर्न सिरप और डाईट सोडा से परहेज़ रखें ।
अल्कोहल या बियर से बचें । यदि लेनी भी हो तो कम से कम मात्रा में ।
वज़न धीरे धीरे कम करें ।
पानी खूब पियें ।
दूध , दही खूब खाएं पियें । इस हिसाब से हरयाणवी लोगों को गाउट कम होना चाहिए ।

यदि आप कोई दवा ले रहे हों तो अपने डॉक्टर को ज़रूर बताएं ।

अंत में : चिंता न करें । यह रोग शर्तिया ठीक होने वाले रोगों में से एक है। बस एक अच्छा डॉक्टर होना चाहिए।

और आपको एक अच्छा मरीज़ होना चाहिए ।