Saturday, May 12, 2012

ज़रा संभल के --- स्वास्थ्य के मामले में चमत्कार नहीं होते .


शायद हमारा देश ही एक ऐसा देश होगा जहाँ रोगों का इलाज करने के लिए दादी नानी से लेकर साधु बाबा तक सभी चिकित्सक का काम धड़ल्ले से करते हैं . न सिर्फ मान्यता प्राप्त चिकित्सा पद्धतियाँ ही अनेक हैं , बल्कि यहाँ बिना किसी डिग्री धारण किये और बिना सरकार से मान्यता प्राप्त किये अनेकों सिद्ध पुरुष , स्व घोषित चिकित्सक और घराने/ सफ़ाखाने मोटी रकम वसूल कर धर्मभीरु और मूढमति जनता को लूटते हुए मिल जायेंगे .

आजकल टी वी पर भी ऐसे अनेकों कार्यक्रम दिखाई देने लगे हैं जहाँ कोई ज्योतिषी, पंडित जी , टेरो कार्ड रीडर , वास्तु एक्सपर्ट , साधु , बाबा या कोई भी पहचान रहित बंदा पेट के कीड़ों से लेकर कैंसर तक का शर्तिया इलाज करने का दावा करते हैं .

हमें तो सबसे ज्यादा हास्यस्पद तब लगता है जब एक ज्योतिषी अपना कंप्यूटर लेकर बैठ जाता है और फोन पर किसी की स्वास्थ्य समस्या सुनकर तुरंत computerized इलाज बता देता है .

एक हरियाणवी लाला तो हर बीमारी का इलाज घर में मिलने वाले मसालों से ही बता देता है . माना हल्दी बड़ी गुणकारी है लेकिन हर तरह के रोग इसके सेवन से ठीक हो जाते तो सैकड़ों दवा निर्माण कम्पनियाँ ( pharmaceutical firms ) बंद न हो जाएँ . ऊपर से ज़नाब हर फोन करने वाले को यह भी बताते हैं , हमारा पैकेज खरीद लो , शर्तिया फायदा होगा . पैकेज भी सौ दो सौ का नहीं बल्कि तीन से चार हज़ार रूपये का . हम तो इस कार्यक्रम को बस दो चार मिनट के लिए एक हास्य कार्यक्रम के रूप में देखते हैं .

एक और कार्यक्रम जो टी वी पर बहुत लोकप्रिय रहा है वह है किसी बाबा द्वारा आयोजित किये गए सत्संग का सीधा प्रसारण या रिकोर्ड किया हुआ प्रसारण . ऐसा कोई एक बाबा नहीं है . पिछले दस पंद्रह सालों में अनेक बाबाओं ने देश की जनता को अपनी प्रतिभा से भ्रमित कर न सिर्फ अपना दास भक्त बना लिया है बल्कि आज उनका करोड़ों का व्यापार चल रहा है . यह सोच कर भी हैरानी होती है , कैसे कोई गोल गप्पे खाकर / खिलाकर अपनी मुश्किलों का हल निकाल सकता है . लेकिन बाबा ने कहा और भक्त ने आँख बंद कर विश्वास कर लिया. आखिर एक सुखी जीवन के लिए १०००-१५००/- भला क्या मायने रखते हैं .

हमारे देशवासियों की सबसे बड़ी कमजोरी है , चमत्कारों में विश्वास रखना . हालाँकि सभी ओर से निराश होकर मनुष्य अपना विवेक खो जाता है . लेकिन आशा के विरुद्ध आस रखना कहीं न कहीं चमत्कारिक आस्थाओं को ही जन्म देता है . इन्हीं आस्थाओं और अंध विश्वास का फायदा उठाते हैं ये ढोंगी बाबा और धर्म गुरु जिनके पास निश्चित रूप से विलक्षण बुद्धि तो होती है . इस कलियुग में जो दूसरों को बेवक़ूफ़ बना सकता है , वही सिद्ध है ,वही भगवान है , उसी की पूजा होती है -- तन , मन और धन से .

आइये देखते हैं कुछ रोगों से सम्बंधित कुछ विशेष उदाहरण :

एपिलेप्सी :

कई वर्ष पहले ऋषिकेश में एक क्लिनिक का बड़ा बोलबाला था जहाँ एपिलेप्सी का इलाज किया जाता था . इसके संस्थापक और मुख्य चिकित्सक न तो डिग्रीधारी चिकित्सक थे , न मान्यता प्राप्त . फिर भी अख़बारों के मुख्य प्रष्ठ पर बड़े बड़े विज्ञापन आते थे जिनमे उन्हें राष्ट्रपति के ऑनरेरी फिजिसियन होने का दावा किया जाता था . सबसे आश्चर्यजनक बात थी तथाकथित डॉक्टर द्वारा पहली खुराक अपने हाथों से खिलाया जाने का आगृह . फिर तीन महीने की दवा एक साथ --मात्र ५०००-६००० रूपये में .
अंत में इस धोखाधड़ी का भंडा भोड़ हुआ और डॉक्टर साहब को जेल .

सत्य : एपिलेप्सी का इलाज चमत्कारिक नहीं है . एलोपेथी में कई तरह की दवाएं हैं , जिनके सेवन से तीन साल में एपिलेप्सी हमेशा के लिए ठीक हो जाती है . लेकिन ये दवाएं डॉक्टर की देख रेख में ही लेनी चाहिए क्योंकि इनके साइड इफेक्ट्स भी होते हैं जो हानि कर सकते हैं .

एस्थमा :
हैदराबादी मछली :
इसके बारे में तो सभी ने सुना होगा . एक परिवार जिन्दा मछली में कोई दवा मिलाकर रोगियों को खिलाता है . देश में अलग अलग जगह कैम्प लगाये जाते हैं जहाँ दूर दूर से निराश रोगी इलाज कराने आते हैं . जो शाकाहारी हैं या जिन्दा मछली नहीं निगल सकते , उन्हें दवा केले में मिलाकर खिलाई जाती है . इलाज भले ही मुफ्त में किया जाता हो , लेकिन लोग किराया लगाकर कैम्प तक पहुँचते हैं .
अब सोचने की बात यह है , यदि केले में लेने से उतना ही फायदा होता है जितना मछली में, तो जिन्दा मछली क्यों खिलाई जाती है . क्या है यह दवा ? कितने लोगों को फायदा हुआ है ? यह कोई नहीं जानता .

सत्य :
एस्थमा एक अनुवांशिक रोग है जो परिवारों में चलता है . इसका कोई इलाज नहीं है लेकिन सही दवाओं से नियंत्रित किया जा सकता है . यदि सही तरीके से इलाज न किया जाए तो जान भी जा सकती है , विशेष कर अक्युट अटैक में . इन्हेलर्स के इस्तेमाल से बहुत फायदा होता है . लेकिन इसका इलाज भी एक्सपर्ट की देख रेख में ही कराना चाहिए .

पीलिया ( जौंडिस ) :

यह एक वाइरल संक्रमण है जिससे लीवर ( यकृत ) की कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं . लेकिन यह सेल्फ लिमिटिंग होता है . यानि एक से डेढ़ महीने में अपने आप लीवर सेल्स पुनर्जीवित हो जाती हैं . इलाज में सिर्फ बेड रेस्ट और खाने का ध्यान रखना होता है .

लेकिन रोग को ठीक करने के लिए अनेक नीम हकीम जड़ी बूटियों से शर्तिया इलाज का दावा करते हैं . जाने माने ब्लॉगर भाई अविनाश वाचस्पति जी ने स्वयं अपनी दास्ताँ सुनाते हुए लिखा , किस तरह एक ठग ने उनसे हजारों रूपये झाड़ लिए और शरीर में जो रिएक्शन हुई उसके इलाज में उन्हें अलग से पैसा खरचना पड़ा और दर्द सहन करना पड़ा . अंत में हमारी सलाह पर उन्होंने सही जगह इलाज कराया और आज वो लगभग पूर्णतया सही हो चुके हैं .

सत्य : पीलिया का कोई इलाज नहीं होता . यह स्वत : सही हो जाता है . हालाँकि क्रॉनिक हिपेटाईटिस में इलाज ज़रूरी है जो महंगा भी है . लेकिन किसी भी झाड़ फूंस , तंत्र मंत्र या चमत्कारिक दवा के चक्कर में न पड़ें .

ऐसा नहीं है , एलोपेथी ही एक पद्धति है उपचार की . आयर्वेद और होमिओपेथी में भी कई रोगों का अच्छा उपचार होता है . हालाँकि यह क्रॉनिक रोगों में ज्यादा फायदेमंद होता है . लेकिन जो विकास एलोपेथी में हुआ है और जो क्रांतिकारी अनुसन्धान यहाँ हुआ है , उसका कोई मुकाबला नहीं है .
अक्सर रोगी यहाँ वहां से सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर गलत हाथों में अपनी जिंदगी थमा देते हैं . यह अत्यंत हानिकारक होता है . उपचार हमेशा सुशिक्षित , मान्यता प्राप्त और क्वालिफाइड डॉक्टर से ही कराना चाहिए . आखिर , यह जिंदगी एक ही बार मिलती है .

नोट : यह पोस्ट जन साधारण के हित में लिखी गई है . किसी व्यक्ति विशेष, समूह या पद्धति के विरुद्ध नहीं है . कृपया अपना विवेक इस्तेमाल करें .




66 comments:

  1. हम तो ये जानते हैं जी के जिस बीमारी का कोई इलाज नहीं उसकी हजार दवाईयाँ और नुस्खे हैं और जिसका इलाज है वह आधी गोली से ही ठीक हो जाता है। स्वास्थ्य के प्रति जागरुक करती एक अच्छी पोस्ट के लिए शुभकामनाएं।

    पीलिया पर मै भी अपने व्यक्तिगत अनुभव लिखुंगा कभी।

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  2. गरीबी तंगहाली बदहाली दुःख तकलीफ,

    सबसे बड़ी बिमारी तो ये ही है,
    और बाबा लोग इसे १०००-२००० में ठीक करने का दावा करते हैं...
    क्यों न जाए इंसान इनकी शरण में.

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    1. सही कहा दीपक जी । जब यह विश्वास मन में बैठ जाए कि रसगुल्ले खाने या खिलाने से कृपा आने लगेगी , तो इन्सान भी भगवान दिखने लगता है ।

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  3. डॉ दराल जी आपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूपता भरी जानकारी देने के लिए शुभकामनाएं।

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  4. डॉ.साहब , सही समय पर ,सही पोस्ट ,बहुत जरूरी है ये जानकारी ...हम सब के लिए |
    कहीं न कहीं ,चाहते न चाहते हम सब इसमें शामिल हैं .....
    आभार!

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  5. डा साहब आप लोगो को हजार बार समझाओ, लेकिन समझने के बाद यह फ़िर से वही जायेगे, लोग नही समझते, जैसे हम सवा रुप्ये का प्रसाद चढा कर भगवान को चुना लगते हे वैसे ही हम इन नीम हकीम की दवा ले कर सोचते हे बिमारी को भी चुना लगा दिया,

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    1. सही कहा भाटिया जी । यहाँ सुशिक्षित लोग भी एविडेंस बेस्ड मेडिसिन की जगह चमत्कारों में विश्वास रखते हैं । इन्हें कौन समझा सकता है ।
      बस एक प्रयास है ।

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  6. ऐसे अंधविश्‍वासों के लिए जरूरी है ऐसी चेतावनी।

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  7. चेतावनी देती सार्थक पोस्ट ....

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  8. इलाज के नाम पर गर्म होता हवसख़ोरी का बाज़ार
    चमत्कार न होते तो डाक्टर को मौत न आती।

    ऐसा देखा जा सकता है कि बहुत बार हायजीनिक कंडीशन में रहने वाले डाक्टर बूढ़े हुए बिना मर जाते हैं जबकि कूड़े के ढेर पर 80 साल के बूढ़े देखे जा सकते हैं।
    मिटटी पानी और हवा में ज़हर है लेकिन लोग फिर भी ज़िंदा हैं।
    क्या यह चमत्कार नहीं है ?

    लोग दवा से भी ठीक होते हैं और प्लेसिबो से भी।

    भारत चमत्कारों का देश है और यहां सेहत के मामले में भी चमत्कार होते हैं।
    हिप्नॉटिज़्म को कभी चमत्कार समझा जाता था लेकिन आज इसे भी इलाज का एक ज़रिया माना जाता है।
    जो कभी चमत्कार की श्रेणी में आते थे, उन तरीक़ों को अब मान्यता दी जा रही है।
    एक्यूपंक्चर का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है लेकिन उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अगर मान्यता दी जा रही है तो सिर्फ़ उसके चमत्कारिक प्रभाव के कारण।
    होम्योपैथी भी एक ऐसी ही पैथी है।
    वैज्ञानिक आधार पर खरी ऐलोपैथी से इलाज कराने वालों से ज़्यादा लोग वे हैं जो कि उसके अलावा तरीक़ों से इलाज कराते हैं।
    पूंजीपति वैज्ञानिकों से रिसर्च कराते हैं और फिर उनकी खोज का पेमेंट करके महंगे दाम पर दवाएं बेचते हैं।
    वैज्ञानिक सोच के साथ जीने का मतलब है मोटा माल कमाने और ख़र्च करने की क्षमता रखना।
    भारत के अधिकांश लोग 20-50 रूपये प्रतिदिन कमाते हैं। सो वैज्ञानिक सोच और वैज्ञानिक संस्थान व आधुनिक अस्पताल उनके लिए नहीं हैं। इनकी दादी और उसके नुस्ख़े ही इनके काम आते हैं।
    यही लोग वैकल्पिक पद्धतियां आज़माते हैं, जिनके पास कोई विकल्प नहीं होता।
    बीमारियां केवल दैहिक ही नहीं होतीं बल्कि मनोदैहिक होती हैं।

    ...और मन एक जटिल चीज़ है।
    मरीज़ को विश्वास हो जाए कि वह ठीक हो जाएगा तो बहुत बार वह ठीक हो जाता है।
    मरीज़ को किस आदमी या किस जगह या किस बात से अपने ठीक होने का विश्वास जाग सकता है, यह कहना मुश्किल है।
    यही वजह है कि केवल अनपढ़ व ग़रीब आदमी ही नहीं बल्कि शिक्षित व धनपति लोग भी सेहत के लिए दुआ, तावीज़, तंत्र-मंत्र करते हुए देखे जा सकते हैं।
    आधुनिक नर्सिंग होम्स के गेट पर ही देवी देवताओं के मंदिर देखे जा सकते हैं। मरीज़ देखने से पहले डाक्टर साहब पहले वहां हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं कि उनके मरीज़ों को आरोग्य मिले।

    आपकी पोस्ट अच्छी है लेकिन चिकित्सा के पेशे को जिस तरह सेवा से पहले व्यवसाय और अब ठगी तक में बदल दिया गया है, उसी ने जनता को नीम हकीमों के द्वार पर धकेला है।
    Please see

    http://commentsgarden.blogspot.in/2012/05/blog-post.html

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    1. अनवर जी , समय निकालने के लिए शुक्रिया ।
      जीवन के बारे में कोई नहीं बता सकता । किसे पता था कि शास्त्री जी वार जीतने के बाद विदेश में बिना कारण स्वर्ग सिधार जायेंगे ।
      प्लेसिबो से कोई ठीक नहीं होता । यह बस एक भ्रम है । असल में कुछ रोग होते ही ऐसे हैं जो बिना इलाज भी ठीक हो जाते हैं जैसे वाइरल फीवर । १- ७ दिन में बुखार उतरना लगभग निश्चित है । लेकिन कोई डॉक्टर यह नहीं बता सकता कि एक दिन में उतरेगा या ७ दिन में । आप ६ दिन तक एक डॉक्टर की दवा लेकर , हारकर सातवें दिन दूसरे डॉक्टर के पास जाते हैं और बुखार उतर जाता है । नया डॉक्टर तो हो गया आपके लिए भगवान ।
      बेशक आजकल इलाज बहुत महंगा हो गया है । लेकिन सरकारी अस्पतालों में अभी भी मुफ्त होता है और अच्छा इलाज होता है ।
      हमारी अधिकांश आबादी अभी भी उचित स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है । इसीलिए आर्थिक विकास में हम इथिओपिया से भी नीचे हैं ।
      सुशिक्षित लोग भी तंत्र मन्त्र के चक्कर में पड़ते हैं , यह देखकर सिवाय दुःख प्रकट करने के और कुछ नहीं कर सकते ।
      देवी देवताओं के दर्शन मन को सकूं पहुंचाते हैं क्योंकि आखिर डॉक्टर भी भगवान नहीं होता ।
      अभी वह दिन दूर है जब हम मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेंगे ।
      आपने दिए गए उदाहरणों पर प्रकाश नहीं डाला !

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    2. भारतीय संस्कृति में दादी मां की आवश्यकता क्यों ?

      दराल जी,
      टिप्पणी पर ध्यान देने के लिए शुक्रिया !
      1. आपने लालबहादुर शास्त्री जी के स्वर्ग सिधारने की बात कही है। आप स्वर्ग नर्क को मानते हैं लेकिन बहुत लोग स्वर्ग नर्क की मान्यता को अंधविश्वास और कल्पना मात्र मानते हैं और अपनी नास्तिक सोच को वैज्ञानिक बताते हैं।
      जब दो विचार टकराएं तो किस विचार को वैज्ञानिक माना जाए ?, इसके लिए हमारे पास कोई पैमाना होना चाहिए।
      ...और यह भी कि सिधारने वाला स्वर्ग ही सिधारा है या कहीं और ?
      वर्ना केवल दिवंगत आदि कहना चाहिए।

      2. सरकारी अस्पताल देश की सवा अरब की आबादी के कितने प्रतिशत लोगों को सेवा दे पाते हैं ?

      3. अपने रूतबे से हटकर आप किसी गांव-क़स्बे के सरकारी अस्पताल में किसी रोगी को इलाज के लिए लेकर तो जाएं, आपका तजर्बा आपको बताएगा कि सरकारी अस्पतालों के इलाज कितने अच्छे हैं ?

      4. विज्ञान ने तरक्क़ी की तो उपचार ने भी तरक्क़ी की। उपचार महंगा हुआ तो चिकित्सक बनने के लिए केवल योग्यता ही काफ़ी न रही, मोटा इन्वेस्टमेंट भी एक आवश्यक शर्त बन गया। मोटे इन्वेस्टमेंट के बाद मोटा मुनाफ़ा भी लाज़िमी हुआ। अब डाक्टर सेवक कम और व्यापारी ज़्यादा हो गया।

      5. कमीशन के लिए ग़ैर ज़रूरी टेस्ट और दवाएं लिखने वाला डाक्टर तो ठग ही हुआ। अब डाक्टर के रूप में व्यापारी और ठग ज़्यादा हैं और सेवक कम। वैज्ञानिक तरीक़े से इलाज कराने वालों की एफ़.डी. टूटते और ज़मीन बिकते हुए देखी जा सकती है। डाक्टर अमीर और अमीर होते चले जा रहे हैं और मरीज़ कंगाल। इधर का माल उधर जा रहा है और यह सब इलाज के नाम पर हो रहा है।

      6. कन्या भ्रूण हत्या करने वाले सुपारी किलर डाक्टर भी वैज्ञानिक सोच वाले होते हैं। इनमें से किसी के भी विरूद्ध कोई प्रभावी कार्यवाही कभी हुई हो, ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है।

      7. तनख्वाह और सुविधाओं में बढ़ोतरी के लिए डाक्टर सामूहिक हड़ताल पर चले जाते हैं और इस दरम्यान सैकड़ों लोग मर जाते हैं। तब चंबल के हत्यारे डाकुओं और इन हत्यारे डाक्टरों में कोई अंतर शेष नहीं रहता।

      8. गांव और ग़रीबों के बीच ये डाक्टर जाते नहीं हैं। गांव के लाचार बीमारों के पास उनकी ‘दादी मां‘ ही शेष रहती है। उनका इलाज ‘दादी मां‘ की मजबूरी है, उसका शौक़ नहीं है।

      9. इलाज हरेक नागरिक का बुनियादी हक़ है। इसके लिए उसके पास काफ़ी रूपया हो, यह हरगिज़ ज़रूरी नहीं होना चाहिए।

      10. गर्भधारण, प्रसव और शिशु पालन के विषय में गांव की बहुओं की जितनी मदद इन ‘दादी मांओं‘ ने की है। उसकी कोई तुलना किसी सरकारी ‘आशा‘ या किसी एनजीओ से नहीं की जा सकती।
      मां का स्पर्श ही शिशु के लिए दर्द निवारक है। यह एक चमत्कार भी है और एक वैज्ञानिक तथ्य भी। मां के रूप में एक चिकित्सक सदा ही शिशु के साथ रहता है। यह ईश्वर का एक वरदान है। उसका दूध शिशु के लिए अमृत है। यह भी एक वैज्ञानिक तथ्य है। टीवी आदि के ज़रिये ज़रूरी विषयों की जानकारी घर घर आम की जाए तो मां की कार्यकुशला को बढ़ाया जा सकता है।

      11. आपने कहा है कि
      ‘हमारी अधिकांश आबादी अभी भी उचित स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है। इसीलिए आर्थिक विकास में हम इथिओपिया से नीचे हैं।‘
      यह बात ठीक उल्टे रूप में कही जानी चाहिए कि
      ‘हमारे यहां टैक्स चोरी और रिश्वतख़ोरी का स्तर इथिओपिया से अधिक है। इसीलिए हमारी अधिकांश आबादी उचित स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है।‘
      टैक्स चोरी में वैज्ञानिक सोच वाले डाक्टर किसी से पीछे नहीं हैं।

      12. आप देवी देवताओं के दर्शन को शान्तिदायक मानते हैं लेकिन तंत्र-मंत्र का सफ़ाया चाहते हैं। जबकि तंत्र-मंत्र देवी देवताओं से ही जुड़े हुए हैं। जब तक देवी देवताओं में आस्था रहेगी तब तक लोगों की आस्था तंत्र-मंत्र में भी बनी रहेगी। देवी देवताओं में आस्था रखते हुए भी लोग तंत्र-मंत्र से दूर कैसे रहें ?, इसका कोई उपाय हो तो उदाहरण सहित अवश्य प्रकाश डालें।

      नोट- यह टिप्पणी केवल तथ्य केंद्रित है। कोई विशेष पद्धति अथवा कोई व्यक्ति विशेष इसका विषय नहीं है।

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    3. डॉ अनवर ज़माल जी , आपने जो तथ्य प्रस्तुत कियें हैं , वे सत्य हैं । इन्हें झुठलाया नहीं जा सकता । बेशक , भ्रष्टाचार का प्रभाव चिकित्सा क्षेत्र में भी पड़ा है । हालाँकि सबको एक डंडे से नहीं हांका जा सकता ।
      लेकिन यहाँ चिकित्सा को गाँव गाँव तक पहुँचाने की ज़रुरत है । इसके लिए सरकार को प्रयत्न करना पड़ेगा । अपने आप कोई नहीं जाना चाहता , आराम की जिंदगी छोड़कर । वैसे भी डॉक्टर्स भी इन्सान होते हैं जिनकी अपनी ज़रूरतें होती हैं । मरीजों का नीम हकीम के पास जाना एक मज़बूरी हो सकती है लेकिन इसे सही नहीं ठहराया जा सकता ।
      देवी देवताओं का तंत्र मन्त्र से कोई सम्बन्ध नहीं है । धार्मिक विश्वास और अंध विश्वास में फर्क होता है ।

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  9. ऐसे अंधविश्‍वासों से बचना चाहिए ,......
    स्वास्थ्य के प्रति जागरुक करती बहुत अच्छी प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएं।

    MY RECENT POST ,...काव्यान्जलि ...: आज मुझे गाने दो,...

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  10. इस सार्थक पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार डाक्टर साहब !

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  11. आपसे ऐसी पोस्टों की उम्मीद इसलिए भी रहती है कि आपका यह विशेषज्ञता का क्षेत्र है ...
    पूरी तरह सहमति ....

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    1. अरविन्द जी , कोशिश तो रहती है । लेकिन जानता हूँ , सदियों से बने अंध विश्वासों को एक झटके में नहीं तोडा जा सकता ।

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    2. डाक्टर साहब ,
      आपकी पोस्ट बहुत पसंद आई , भले ही इससे मेरे रिटायरमेंट के बाद वाली बाबागिरी ( से चिकित्सा ) की योजना को धक्का लगता है :)

      @ पोस्ट ,
      मैंने खुद नब्बे के दशक में अंधविश्वास के विरुद्ध सार्वजानिक अभियानों में हिस्सा लिया , कैम्प लगाए हैं ! लगता है कि हम अनपढ़ और कम पढ़े लोगों को फोकस करके गलती कर रहे थे ! खुराफात की जड़ें सबसे गहरे , तो पढ़े लिखे लोगों में मौजूद हैं ! अच्छे से अच्छे एलोपैथ / वैज्ञानिक / प्रोफेसर्स को नारियल फोड़ते , दस दस अंगूठियों से इलाज खोजते , तंत्र मंत्र से निदान के यत्न करते , ज्योतिषियों के पांव पखारते देखा है मैंने ! आम आदमियों की तो बात ही अलग है !

      स्वास्थ्य को लेकर पैथियों का मसला भी कमोबेश ऐसा ही है ! बहरहाल एक अच्छी पोस्ट के लिए पुनः बधाई !

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    3. अली साब,आपका एक मरीज़ तो मैं हूँ ही,निराश मत होइए !

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    4. @रिटायरमेंट के बाद वाली बाबागिरी से चिकित्सा की योजना को धक्का लगता है
      :)

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    5. अली सा , हम तो रिटायर्मेंट के बाद गौमुख के पास एक कुटिया बना कर रहने की सोच रहे हैं । :)
      सही कहा आपने , अंध विश्वास में शिक्षित लोग भी कम नहीं । बड़े बड़े नेता , ब्यूरोक्रेट्स और अन्य सरकारी अफसर भी इन चक्करों में पड़े रहते हैं । शायद इसका सीधा सम्बन्ध आचरण से है ।

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  12. दराल साहेब,
    सचमुच बहुत काम की पोस्ट है आपकी...आप जैसे गुणीजनों का ब्लॉग जगत में होने का यही तो फायदा है...
    आपका हृदय से धन्यवाद...

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    1. शुक्रिया अदा जी । ब्लॉग्स पर आपकी वापसी प्रसंशनीय है ।

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  13. आश्चर्य तो यही है कि शैक्षिक रूप से विकसित होकर भी कई लोग अभी भी चमत्कारों के फेर में पड़ जाते हैं !

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  14. -- अच्छी व जागरूक करने वाली पोस्ट... कुछ तथ्य...

    १---जिनके सेवन से तीन साल में एपिलेप्सी हमेशा के लिए ठीक हो जाती है...यह सर्वदा सत्य नहीं है.. बच्चों को होने वाली एपीलेप्सी तो प्राय: ठीक होजाती है....परंतु अधिक उम्र की एपीलेप्सी के साथ सदा एसा नहीं होता...

    २---पीलिया एक वाइरल संक्रमण है जिससे लीवर ( यकृत ) की कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं . लेकिन यह सेल्फ लिमिटिंग होता है . यानि एक से डेढ़ महीने में अपने आप लीवर सेल्स पुनर्जीवित हो जाती हैं। यह बात सिर्फ़ इन्फ़ेक्टिव-पीलिया( हेपेटाइटिस)के साथ सही है ...कुछ अन्य खतरनाक कारण भी होते हैं जिनका उचित इलाज आवश्यक होता है...
    ३-- डा अनवर जमाल साहब का कहना है कि---
    एक्यूपंक्चर का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है लेकिन उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अगर मान्यता दी जा रही है तो सिर्फ़ उसके चमत्कारिक प्रभाव के कारण।
    होम्योपैथी भी एक ऐसी ही पैथी है।----यह सत्य नहीं है...एक्यूपन्क्चर व होम्योपेथी भी वैग्यानिक आधार पर ही हैं।

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    1. डॉ गुप्ता -- १) आपकी बात सही है । बड़ों में एपिलेप्सी अन्य कारणों से भी हो सकती है जैसे ट्यूमर , सर की चोट आदि । लेकिन दवाओं से नियंत्रित तो रहती है ।
      २) यहाँ बात हिपेटाईटिस की ही कर रहे हैं । obstrutive jaundice में सिवाय सर्जरी और कोई विकल्प हो ही नहीं सकता । ऐसे में झाड फूंस कितना घातक हो सकता है ।
      ३) अक्यूपंक्चर एक सहायक इलाज के रूप में प्रयोग किया जाता है जैसे एस्थमा में इन्हेलर्स के साथ । बेशक वैज्ञानिक आधार तो है ही ।

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    2. @ डा. श्याम कुमार गुप्ता जी ! एक्यूपंक्चर में शरीर में ऊर्जा के प्रवाह के लिए जो मेरीडियंस मानी जाती हैं। वे किसी भी चीरफाड़ में नहीं देखी जा सकी हैं।
      इसी तरह होम्योपैथी में 12 शक्ति से ज़्यादा शक्ति वाली दवा को लैब में टेस्ट किया जाता है तो उसमें किसी दवा का अंश नहीं मिलता।
      एक्यूपंक्चर की ऊर्जा ‘ची‘ और होम्योपैथी की दवा का उच्चीकृत अंश, दोनों ही सूक्ष्म हैं। इसीलिए ये दोनों ही असरकारी नतीजे देने के बावजूद विज्ञान की पकड़ से बाहर हैं।

      हर चीज़ को विज्ञान पकड़ ले, यह संभव नहीं है और न ही विज्ञान इसका दावा करता है।
      विज्ञान का दायरा सीमित है और सत्य इसके दायरे से बड़ा है।
      अतः सत्य विज्ञान के दायरे में भी है और इसके बाहर भी।

      जो कुछ विज्ञान के दायरे के बाहर है, वह असत्य और मिथ्या है, यह सोचना ठीक नहीं है।

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  15. हार्दिक आभार डॉ. साहब! भारतीय समाज में अशिक्षा और अन्धविश्वास की बहुतायत तो है ही, स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था का अभाव भी जीवन की अनिश्चितता को बढा रहा है। ऐसे में चमत्कार को नमस्कार करना स्वाभाविक ही है। आम आदमी की बात क्या कहें कई लोग तो अपने को डॉ बताते हुए भी किस्म-किस्म के अन्धविश्वासों की दुकान सजाये बैठे हैं। ऐसे में मुन्दी आंखें खोलने का आपका प्रयास सराहनीय है। ऐसे और लेखों की प्रतीक्षा है। मेरी सलाह तो यह है कि आप अन्य समाजसेवी डॉक्टर्स के साथ मिलकर स्वास्थ्य चेतना का एक सामूहिक और प्रामाणिक ब्लॉग अलग से आरम्भ कीजिये। शुभकामनायें!

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    1. अनुराग जी , इस विषय पर दिल्ली में दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन द्वारा एंटी क्वेकरी कमेटी का गठन कई साल पहले ही कर दिया गया था । लेकिन यहाँ की राजनीति और लोकतंत्र के चलते सब कुंठित हो जाता है । आखिर दिल्ली में मान्यता प्राप्त डॉक्टर्स से ज्यादा क्वेक्स प्रेक्टिस करते हैं ।

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  16. बेहद आवश्यक एवं लाभदायक पोस्ट है ! नीम हकीमों के इस देश में, डाक्टर बनना सबसे आसान लगता है !
    ४ लोगों की महफ़िल में बीमारी का नाम लेते ही कम से कम ३ लोग दवा बता देंगे ! शायद ही कोई ऐसा घर हो जहाँ यह नुस्खे कभी न आजमाए गए हों !
    शुभकामनायें हमारी बुद्धि के लिए !
    आभार आपका !

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  17. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  18. जोड़ों के दर्द के एक तेल का टीवी पर प्रायोजित कार्यक्रम आता है...सारे रिटायर्ड कलाकार और जैकी श्राफ, गोविंदा जैसे होस्ट...इसमें तेल के गुणगान करते एक बाबाजी को दिखाया जाता है...ये बाबा मेरठ का मेरा एक दोस्त है जो कि बहुत अच्छा स्टेज एक्टर है...क्या इतना ही बताना ​काफ़ी नहीं है इस प्रोडक्ट की असलियत को लेकर...​
    ​​
    ​जय हिंद...

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    1. खुशदीप भाई , टी वी पर अधिकतर स्वास्थ्य कार्यक्रम प्रायोजित होते है जो अपने प्रोडक्ट्स बेचने के लिए जनता को गुमराह करते हैं । लेकिन पैसा चीज़ ही ऐसी है की सब आँख बंद किये रहते हैं । वर्ना ये बाबा लोग क्यों करोड़पति बनते ।

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  19. जानकर खुशी हुई कि हरिद्वार और बाबा दर्शन के बाद भी आप वही हमारे पुराने वाले डाक्टर साहब हैं जो समय-समय पर हमे अंध विश्वास के प्रति जागरूक करते रहते हैं।
    बढ़िया पोस्ट के लिए आभार।

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  20. नोट : यह पोस्ट जान साधारण के हित में लिखी गई है . किसी व्यक्ति विशेष, समूह या पद्धति के विरुद्ध नहीं है . कृपया अपना "विवेक" इस्तेमाल करें .
    "विवेक"???????????
    ये कौन हैं????

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    1. पाण्डे जी , भाई हम तो हनीमून पर गए थे । :)

      अनु जी , इस पोस्ट से कई लोगों का मूड ख़राब हो सकता है ।

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  21. स्वास्थ्य एक गंभीर मसला है। तब और भी अधिक,जब इसके प्रति अज्ञानता अथवा लापरवाही का आलम खतरे की सीमा को पार कर गया हो।
    यह एक तथ्य है कि हमारे पुरखे घरेलू उपायों से अनेक रोगों का इलाज़ करते थे। दुर्भाग्य,कि वे विधाएं जितनी तेज़ी से क्षरित हुईं,उनके नाम पर धंधा करने वाले उतनी ही तेज़ी से उभरते चले गए। गरीब आज भी उसी उम्मीद से नीम-हक़ीम के चक्कर में पड़ अपनी जान ख़तरे में डालता है। अब यह बात और है कि हकीमों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता,क्योंकि एक जाएगा,दूसरा आएगा।
    अपने ज्ञान और अपनी मौलिकता को बौद्धिक सम्पदा अधिकार मनवाने के प्रति हमारा रवैया आज भी ढुलमुल है। चूंकि प्राचीन चिकित्सा विधाएं संरक्षित और हस्तांतरित नहीं हुईं,लिहाजा कई शर्तिया इलाज़ भी अब शक के दायरे में हैं और उन्हें अपनी वैज्ञानिकता प्रमाणित करने के लिए जूझना पड़ रहा है। बेशक,एलोपैथ ने इस मामले में बाज़ी मारी है। मगर महंगेपन और साइड इफेक्ट के मामले में वह इतना तकलीफदेह है कि लोगबाग न चाहकर भी अन्य विधाओं की ओर उन्मुख होने को विवश होते हैं। अखबारों में रोज़-रोज़ छपते बेहूदे सर्वेक्षणों के कारण,स्वयं एलोपैथी भी अपनी हंसी उड़ाने पर आमादा है।
    जब दिल्ली के कई सरकारी अस्पतालों की हालत दयनीय है,तो दूर-दराज़ के अस्पतालों में उपलब्ध सुविधा का क्या हवाला देना। एक अस्पताल से दूसरे में रेफर करते-करते रोगी 70 प्रतिशत खराब हो चुका होता है।
    जनसंख्या के हिसाब से डाक्टरों का अनुपात जब तक नहीं बढ़ता,झोलाछापों की कृपा बरसती रहेगी। ज़रूरत इस बात की है कि स्वास्थ्य से जुड़े कुछ ज़रूरी तथ्यों को पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा बनाए जाए ताकि पढ़े-लिखे मूर्खों की संख्या घटे।
    जब जीवन में चमत्कार घटित हो सकता है,तो फिर स्वास्थ्य के मामले में क्यों नहीं हो सकता? हो सकता है। होता है। किंतु,ये चमत्कार उन लोगों के पास घटित नहीं हो सकते,जो इस रूप में ही अपना प्रचार कर रहे हैं। आपको सिद्ध पुरुषों की शरण में ऐसे कई लोग मिलेंगे जो असाध्य रोगों से ग्रस्त थे,मगर गुरूकृपा से आज पूर्ण स्वस्थ जीवन बिता रहे हैं। विज्ञान की सारी खोज बाहर की है,अध्यात्म की सारी खोज भीतर की। इसलिए,ऐसी बातों को वैज्ञानिक अपने मानदंडों पर तौलने की व्यर्थ कोशिश करते हैं। विज्ञान तो अभी यही पता नहीं लगा पाया है कि शरीर के भीतर ऊर्जा के जो तल बताए गए हैं,स्वास्थ्य अथवा जीवन-यात्रा में उनकी भूमिका क्या है!

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    1. राधारमण जी , सही कहा चमत्कार तो होते है लेकिन इसके लिए भी सही ज्ञान का होना ज़रूरी है । कभी कभी कोमा में पड़ा रोगी महीनों या सालों बाद भी होश में आ जाता है । लेकिन तभी जब उसे पूरा मेडिकल सपोर्ट मिला हो ।

      गुरुकृपा वाली बात हज्म नहीं हो रही । ये कृपा ही तो लोगों को ले डूब रही है ।

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  22. इंसान जब हर तरफ से हार जाता है तो आखिरी उम्मीद के रूप में वैकल्पिक तरीके अपनाता है जो कई बार उसे पाखंडियों तक ले जाता है !
    अच्छी जागरूक करती पोस्ट !

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  23. आधुनिक विज्ञानं कुछ सदियों पूर्व भौतिक संसार को मूल मान, जो बाहरी टूल आदि का उपयोग कर, अथवा मानव आँखों से वैसे ही सीधे दिखता है, उस के आधार पर कुछेक सदियों से ही 'शून्य' से आरम्भ कर और श्रंखलाबद्ध रूप से रिकोर्ड कर एक स्तर तक पहुंचा है - जो काबिले तारीफ़ है, डॉक्टर तारीफ सिंह जी...
    किन्तु अफ़सोस की बात यही तो है कि जो दिखता है वो कालान्तर में कभी कभी सत्य नहीं निकलता है - और जो सत्य है वो दिखता नहीं... लोहे का एक टुकडा दूसरे आम लोहे के टुकडे को कैसे खींच लेता है???... नहीं पता न कि कैसे उसे उसी आम लोहे के टुकडे से कुछ देर रगड़ दो उस में भी वही गुण कुछ हद तक आ जाते हैं जैसे खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदल लेता है!!!... और 'चाक़ू खरबूजे पर गिरे, अथवा खरबूजा चाक़ू पर// कटेगा खरबूजा ही'' (लोहा धातु को 'शैतान' शनि से सम्बंधित जाना गया है)!!!...

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  24. पुनश्च - और शनि को पश्चिम दिशा का राजा माना गया, और भूतनाथ शिव के पञ्च भूतों में से एक भूत नीले आकाश समान रंग से सम्बंधित...
    आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार, हाल ही में, जिस काल में 'भारत' में पीतल/ कांसे आदि की तलवारें उपयोग में लायी जातीं थी तो वे पश्चिम दिशा से थोड़े से 'विदेशियों' द्वारा लायी गयी लोहे की तलवारों आदि हथियारों के सामने गाजर-मूली समान कट गयीं और 'हम' ऐसे गुलाम बने कि तब से अब तक 'स्वतन्त्रता प्राप्ति' के बाद भी दुखी हैं, बीमार हैं, भूखे हैं, आदि, आदि, और प्राचीन ज्ञानी पूर्वजों के अनुसार 'मायाजाल' को तोड़ पाना तो दूर दलदल में फंसते पशु समान संसार के ही डूबने के ही भय से मरे जा रहे हैं...:(

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  25. मन का निवारण तो समझा बुझा कर किया जा सकता है, शरीर जिद्दी है..

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    1. कठिनाई यही तो है कि प्राणी शरीर अस्थायी है, मिटटी का खिलोना, पंचतत्व / पंचभूतों से बना, और अंततोगत्वा मिटटी, अर्थात अरबों वर्षीय धरा/ वसुधा/ वसुंधरा से मिलने और अपना अस्तित्व खोने के लिए (१००+/- वर्ष के नाटक में हरेक के अपूर्ण ज्ञान के कारण शोरमचाते हुए भाग लेने के बाद के मौन हो जाने के लिए???)...

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  26. बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  27. चमत्कार से दूर रहने की सलाह देती जागरूक करने वाली जानकारी.

    बहुत धन्यबाद.

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  28. ऐसा नहीं है , एलोपेथी ही एक पद्धति है उपचार की . आयर्वेद और होमिओपेथी में भी कई रोगों का अच्छा उपचार होता है . हालाँकि यह क्रॉनिक रोगों में ज्यादा फायदेमंद होता है . लेकिन जो विकास एलोपेथी में हुआ है और जो क्रांतिकारी अनुसन्धान यहाँ हुआ है , उसका कोई मुकाबला नहीं है .
    अक्सर रोगी यहाँ वहां से सुनी सुनाई बातों पर यकीन कर गलत हाथों में अपनी जिंदगी थमा देते हैं . यह अत्यंत हानिकारक होता है . उपचार हमेशा सुशिक्षित , मान्यता प्राप्त और क्वालिफाइड डॉक्टर से ही कराना चाहिए . आखिर , यह जिंदगी एक ही बार मिलती है .
    रोग ला इलाज़ हो जाने पर या फिर ला -इलाज़ रोगों के मामले में अकसर लोग हताश होकर कहीं भी जाने को तैयार हो जाते हैं आस्था नहीं छोड़ते ,प्लेसिबो इफेक्ट खींचे रहता है .एलोपैथी चिकित्सा तंत्र खैराती अस्पतालों के रूप में खुद भी बीमार है और एस्कोर्ट्स ,अपोलो ,फोर्टिस तक सब पहुँच नहीं पाते .स्वास्थ्य और शिक्षा को सरकार विकास के हाशिये से ही बाहर रखे हुए है .चिकित्सा बजट देखें कुल सकल घरेलू आय का kittaa छोटा टुकडा भर होता है .
    जहां तक maanyataa का सवाल है charak और su -shrut kahaan padhe likhe थे ,kabeer और daadu kahaan padhe थे .gair maanyataa praapt logon में sabhi chor नहीं हैं .कृपया यहाँ भी पधारें
    -
    शनिवार, 12 मई 2012
    क्यों और कैसे हो जाता है कोई ट्रांस -जेंडर ?
    क्यों और कैसे हो जाता है कोई ट्रांस -जेंडर ?
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

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    1. शर्मा जी , चरक और शुश्रुत पुराने ज़माने की बातें हैं । विश्व में पहला सिजेरियन गाय / भैंस के सींगों से पेट फाड़ कर किया गया था । चिकित्सा के क्षेत्र में निरंतर हो रहे विकास का ही असर है कि अब हम डिजाइनर बेबीज पैदा कर सकते हैं ।
      माना कि दवाएं बेचकर लाखों लोग रोजगार प्राप्त कर रहे हैं । लेकिन गलत तो गलत ही कहा जायेगा ।

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    2. क्षमा प्रार्थी हूँ, सौ (१००) प्रतिशत सही तो एलोपैथी भी नहीं है, न ही डॉक्टर सारे आप जैसे परोपकारी...
      अभी अधिकतर बीमारी का कारण ही नहीं पता है...
      आदमी ही नहीं, सूक्ष्माणु भी 'भले' और 'बुरे' होते हैं... मेरे स्व. डॉक्टर साडू भाई भी कहते थे कि एंटीबाईओटिक के व्यक्ति विशेष के लिए सही डोज़ का पता नहीं होने से यदि (विदेशियों पर टेस्ट किये) दवाई की डोज़ भारतीय के लिए अधिक हो तो वो कुछ भले और शायद सारे बुरे, दोनों सूक्ष्माणु, को मार देगी - जिसके कारण जो भालों से लाभ मिल रहा था वो मिलना कम हो जाएगा, जिसके कारण साइड इफेक्ट होंगे, आदि... और यदि डोज़ कम हो तो, जो मरे नहीं वो सूक्ष्माणु और तगड़े हो जायेंगे... आदि आदि... और एक डॉक्टर ने बताया कि कैसे भारतीयों में ही पहाड़ियों के लिए अधिक डोज़ कि आवश्यकता होती है... इत्यादि इत्यादि, अर्थात ज्ञान कि कमी मुख्य कारण है...

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    3. जे सी जी आपने सही सवाल उठाया है . दरअसल इस पोस्ट का मुख्य उद्देश्य जनसाधारण को इसी तरह की जानकारी देना था .
      एंटीबायोटिक्स चिकित्सा जगत का सबसे महत्त्वपूर्ण अन्वेषण है . लेकिन इनके इस्तेमाल में कुछ बातें ज़रूरी हैं जिनका ध्यान रखना पड़ता है :
      एंटीबायोटिक्स की एक मिनिमम डोज होती है और मैक्सिमम . इन दोनों के बीच अक्सर एक बड़ी रेंज होती है . जैसे एम्पिसिलिन की डोज ५०-१०० mg /kg बॉडी वेट होती है . यानि न्यूनतम और अधिकतम डोज में दुगने का अंतर है . मिनिमम से कम देने पर असर नहीं आएगा और रेजिस्टेंस पैदा हो जायेगा . मैक्सिमम से ज्यादा देने पर साइड इफेक्ट्स आ जायेंगे . लेकिन सही मात्रा में देने पर कोई हानि नहीं होती . जहाँ तक अच्छे मिक्रोब्स की बात है , यह एक सप्ताह तक लेने के बाद होता है . ऐसे में साथ में लेक्टो बेसिलिस की खुराक दी जाती है .

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  29. डाक्टर साहब मै आपके लेखन का बहुत बड़ा प्रसंशक हूँ लेकिन अब आपके साफगोई से जलन सी होने लगी है .बड़ाई नहीं आपसे मिलने की बलवती इच्छा है देखे इश्वर की कब कृपा होती है .जनहित में लिखे आलेख के लिए अभिवादन और प्रणाम ..

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  30. अंधविश्वासों में फंस कर स्वास्थ के साथ खिलवाड नहीं करना चाहिए, विशेषकर गंभीर रोगों में.

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  31. इंसान जब इलाज से लाइलाज महसूस करता है तो इस तरह के टोटके भी अपनाता है और यहीं इन पाखंडियों और बाबाओं की चांदी हो जाती है.सार्थक पोस्ट डॉ साहब.

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  32. आपकी रचना बेहतरीन है। अच्छी रचनाओं को ज़्यादा से ज़्यादा नेट यूज़र्स तक पहुंचाने के लिए उन का ज़िक्र यहां भी किया जाता है-
    http://blogkikhabren.blogspot.com/2012/05/dr-t-s-daral.html

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  33. बहुत कीमती पोस्‍ट.

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  34. यह तो सब जानते हैं की बुखार में क्रोसिन लेने से बुखार उतर जाता है . सर दर्द हो तो कोई भी दर्द निवारक दवा ले सकते हैं . आदि आदि . लेकिन चिकित्सा एक बहुत विस्तृत क्षेत्र है . इसीलिए चिकित्सा शिक्षा का पाठ्यक्रम सबसे लम्बा होता है . दवा के मामले में यह जानना ज़रूरी है की दवा देते समय एक डॉक्टर को निम्न बातों का ध्यान रखना पड़ता है :
    किस रोग में कौन सी दवा सबसे उपयुक्त रहेगी . दवा की सही डोज , कितने बार लेनी है , खाने से पहले या बाद में , दूध के साथ या पानी से , साइड इफेक्ट्स क्या हो सकते हैं , कितने दिन तक लेनी है , किसी और दवा के साथ इंटरएक्शन तो नहीं है , कोई विशेष सावधानी आदि . इन सब बातों को ध्यान में रखकर दवा प्रेस्क्राइब की जाती है . एक रोगी को भी इन सब बातों के बारे में जानने का हक़ है . हालाँकि हमारे देश में इन सब बातों का ध्यान नहीं रखा जाता .

    अक्सर पूरी जानकारी डॉक्टर्स को भी नहीं होती . ऐसे में नीम हकीम से क्या उम्मीद की जा सकती है .लेकिन यहाँ सब चलता है .

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  35. हाताषा इंसान को ऐसे नीम हकीमों के पास जाने कों मजबूर करती है ... दूसरा जल्दी में सब कुछ पा लेने की ललक इंसान कों बाबाओं के चक्कर में डालती है ... पर देश में इतने लोग है की बाबों की दुकानों का चलना मुश्किल नहीं है ...

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  36. This post is useful in more than one ways .The author is very humble even in exposing the self proclaimed professional .As far miracle watchers indians are fond of it .Thanks for this post.

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  37. भई वाह क्या बात है डॉ साहब कमाल की जानकारी पूर्ण पोस्ट है। रही बात बाबाओं और झाड फूँक मंत्र तंत्र वाली बात तो आज के जमाने मे यदि कोई पढ़ा लिखा समझदार इंसान इन सब का सहारा लेता है तो उसका सिर्फ एक ही कारण है मरता क्या न करता टाइप बात जब बात अपनों पर आती है तो इंसान उन्हें बचाने के लिए वह सब करने के लिए भी बड़ी आसानी से तैयार हो जाता है जो उसे नहीं करना चाहिए। अर्थात यह जानते हुए भी की मंत्र तंत्र में कुछ नहीं रखा जो होना है हो कर रहता है फिर भी आम तौर पर लोग रोज़ मंदिर जाते है पूजा पाठ हवन पूजन यज्ञ सभी करवाते हैं। क्यूँ ? क्यूंकि उम्मीद पर दुनिया क़याम है। बहुत बढ़िया चेतावनी देती सार्थक पोस्ट वैसे मैं तो सतीश सक्सेना जी बात से भी सहमत हूँ।

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  38. यहाँ शायद कहना आवश्यक होगा कहना कि हम 'हिन्दू' (शिव के माथे में इंदु अनादि काल से दर्शाने वाले) संसार की सबसे प्राचीनतम और स्वर्णिम इतिहास वाली सभ्यता होने के नाते गर्व तो महसूस करते हैं कि 'भारत' ने विश्व को शून्य दिया... और यूं अमृत योगेश्वर शिव/ विष्णु, परमात्मा को उन्होंने अजन्मा और अनंत, महाकाल, कह उन्हें शून्य समय और काल से समबन्धित शक्ति रुपी दर्शाया... और विविधता पूर्ण विशाल सृष्टि में, धरा में असंख्य अन्य प्राणीयों के बीच में मानव को साकार सौर-मंडल के नौ सदस्यों (सूर्य से शनि ग्रह तक) के 'नवग्रह' के सार से बना अनंत ब्रह्माण्ड का प्रतिरूप जान, प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य परमात्मा के निराकार और साकार रूपों को पाना ही दर्शाया... और इस के लिए 'योग' द्वारा शरीर में आठ चक्रों में उपलब्ध शक्ति को मस्तक में एक बिंदु में पहुंचाना आवश्यक जाना...

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  39. शुक्रिया इस इस जानकारी के लिए .....

    सभी ने बहुत कुछ कह दिया अब हमारे लिए यही बचा था ......

    @ आजकल टी पर भी ऐसे अनेकों ? कौन सी 'टी' (चाय .).. ?:)

    @ यह पोस्ट जान.....;) कौन सी 'जान '....?

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    1. ओह ! कल तक तो सब ठीक था . आज ये कैसे बदल गई ? :)

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  40. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  41. सुन्दर प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट पर आपका पुन: स्वागत है । धन्यवाद ।

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  42. सार्थक आलेख और सार्थक पहल भी ,अन्धविश्वास से जूझने की ...!!
    शुभकामनायें डॉ.साब ...प्रयास जारी रखें ...!!

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