Monday, May 23, 2016

एक ग़ज़ल ---

१)

भरी जवानी में धर्म कर्म करने लगे हैं ,
मियाँ जाने किस जुर्म से डरने लगे हैं !

जो कहते थे दुनिया में नहीं है ईश्वर कहीं ,
मुसीबत पड़ी तो रामा रामा करने लगे हैं। 


वो ना डरते थे करने से दुष्कर्म कभी , 
अब जिन्दा ही पल पल मरने लगे हैं।  

सब लेकर जायेंगे जैसे , जो धन कमाया ,
बक्सों में सारा ऐसे , सामां भरने लगे हैं।

रहते आये थे सदा कूलर ऐ सी की छाया में ,
जब गर्म लू लगी तो झरने से झरने लगे हैं।

आया वो हूनर जब हाथों में 'तारीफ़' के ,
दुःख दर्द हम रोगियों के हरने लगे हैं । 

२) 

जब मोह भंग हुआ तो हमने ये जाना ,
कितना कम सामां चाहिए जीने के लिए।

तन पर लंगोटी हो और खाने को दो रोटी ,
बस एक पिंट बीयर चाहिए पीने के लिए ।

लत्ते, कपड़े, घड़ी, गॉगल्स, गिफ्ट में देते हैं लोग , 
रिटायर्ड बन्दे को क्या चाहिए तन ढकने के लिए ।  

सुबह से बैठे थे खाली , कुछ नहीं था करने को ,
मैडम एक गठरी कपडे दे गई प्रैस करने के लिए।

अब नहीं कोई जिम्मेदारी और वक्त बहुत है ज्यादा ,
एक फेसबुक ही काफी हैं वक्त गुजर करने के लिए ।  

बड़े काम के थे , नाकाम नहीं आज भी 'तारीफ़', 
बस जौहरी की नज़र चाहिए, परखने के लिए।   

2 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " भारत का पहला स्वदेशी स्पेस शटल RLV-TD सफलतापूर्वक लॉन्च " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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