भाई तिलक राज कपूर जी का लेख पढ़कर ग़ज़ल लिखना सीखने का प्रयास किया है । इस में मत्ला और मक्ता सहित सिर्फ पांच शेर (अश`आर ) कहे हैं । इसमें काफिया --आत है जैसे गात , रात , बात आदि । रदीफ़ है --नहीं आती । पहले शेर यानि मत्ला में काफिया और रदीफ़ दोनों मिसरों (पंक्तियाँ ) में हैं । बाकि में सिर्फ दूसरे मिसरा में । सभी शेर स्वतंत्र हैं । इसलिए इसे ग़ज़ल ही कहेंगे ।
पसीने की गंध गात नहीं आती
नींद उनको सारी रात नहीं आती ।
वो काम करते नहीं जब तलक
काम के बदले सौगात नहीं आती ।
क्या बताऊँ उनको मैं जात अपनी
सिवा इंसानियत कोई जात नहीं आती ।
नेता हम भी बन जाते लेकिन
सच को छोड़ बात नहीं आती ।
ज़ज्बा लड़ने का बहुत है `तारीफ`
शैतान को देनी मात नहीं आती ।
अब यह प्रयास कैसा रहा , यह तो ग़ज़ल के जानकार ही बता सकते हैं । आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा ।
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Thursday, June 10, 2010
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