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Friday, March 9, 2012

अंजानी (ब्लॉग) राहों पर चलना संभल के ---


होली के अवसर पर हर वर्ष डॉक्टर्स की विभिन्न संस्थाएं अपने अपने क्षेत्र में होली मनाती हैं । रात को होने वाले कार्यक्रम में कॉकटेल डिनर होता है । बात उस समय की है जब हमारी नई नई नौकरी लगी थी । हमने अपने साथ काम करने वाले एक बुजुर्ग डॉक्टर को भी आमंत्रित कर लिया । उनके लिए यह एक नया अनुभव था । जब ड्रिंक्स शुरू होने का समय आया तो मुफ्त की शराब देखकर वह बावला हो गया और गटागट कई पैग पी गया । उसके बाद वह एक ऐसे समूह के साथ वार्तालाप में लीन हो गया जिसमे वह किसी को नहीं जानता था । उनसे बस यही गलती हो गई । उन लोगों ने जब देखा कि यह बंदा उल्लू बन रहा है तो उन्होंने उसे पैग पर पैग देने शुरू कर दिए । थोड़ी ही देर में हमारे डॉक्टर साहब नशे में धुत्त होकर टॉयलेट में पड़े थे । अंतत: हमें ही उन्हें ऑटो में डालकर घर छोड़कर आना पड़ा ।

उस दिन हमने भी एक सबक लिया कि कभी भी अंजान लोगों के साथ मिलकर दारू नहीं पीनी चाहिए ।

बचपन से लेकर अब तक और भी कई बातें सीखीं हैं जैसे :

* किसी अंजान व्यक्ति से लेकर कुछ खाना नहीं चाहिए विशेषकर सफ़र में ।
* किसी अंजान व्यक्ति पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए ।
* चापलूसों से सावधान रहना चाहिए विशेषकर जो ज़रुरत से ज्यादा मीठी मीठी बातें कर रहे हों ।
* गाड़ी में किसी को लिफ्ट नहीं देनी चाहिए विशेषकर अकेली महिला को ।

जब से मंच पर आने लगे हैं तब से पब्लिक स्पीकिंग के बारे में कई बातें सीखीं हैं । इसमें सबसे विशेष है कि कभी भी किसी व्यक्ति का मज़ाक इस तरह नहीं उड़ाना चाहिए कि उसे बुरा लगे ।

आखिर मज़ाक और उपहास में अंतर होता है ।
विशुद्ध हास्य में सौम्यता होती है न कि छिछोरापन ।

होली एक त्यौहार है मौज मस्ती का , रंगों उमंगों का , खाने खिलाने का , पीने पिलाने का , हंसने हंसाने का , मिलने मिलाने का और सबको प्यार से गले लगाने का ।

होली मनाने के तरीके भी अलग अलग होते हैं । कहीं रंग गुलाल से मनाई जाती है , कहीं पानी से । कहीं लठमार होली होती है तो कहीं कोलड़ा मार । कहीं कहीं गोबर और कीचड़ में सनकर भी होली खेली जाती है । हालाँकि ऐसी होली हमने कभी नहीं खेली ।

लेकिन इस होली पर कुछ ऐसा ही अनुभव हुआ जब हमने एक अंजान ब्लोगर के आमंत्रित करने पर उनके ब्लॉग पर हास्य की चंद पंक्तियाँ भेज दीं । अब भले ही वो एक जाने माने ग़ज़लकार , हास्य कलाकार या व्यंगकार हों , लेकिन हमारे लिये वो और उनके लिए हम अंजान ही तो थे ।

फिर हमारे साथ कुछ ऐसा हादसा हुआ जो हम सोच भी नहीं सकते थे कि कोई ऐसा करने की सोच भी सकता है ।

अफ़सोस तो तब हुआ जब कुछ अपने मित्र भी वहां चुस्कियां लेते नज़र आए ।

आखिर एक बार फिर यही समझ आया कि ब्लोग्स पर भी किसी अंजान व्यक्ति पर भरोसा नहीं किया जा सकता ।
वैसे भी इस आभासी दुनिया में अक्सर लोगों की फितरत छुपी ही रहती है ।

नोट : हम जानते हैं कि अक्सर गलती करने वाले को गलती करने का अहसास नहीं होता । न ही अक्सर उसकी ऐसी मंशा होती है । लेकिन गलती से की गई गलती भी गलती ही कहलाएगी ।