Sunday, March 27, 2011

आज बस यूँ ही ---होली के आफ्टर इफेक्ट्स --

लगता है , ब्लॉग जगत में होली का खुमार अभी उतरा नहीं है । इसी कड़ी में छोटा सा योगदान अपना भी ।
आज बस यूँ ही , कुछ शे'र लिखने की कोशिश की है ।


इक शोर सा उठा है मयख़ाने में
फिर कोई दीवाना होश खो बैठा ।

या खुदा ये कैसा आलम है
या हम नशे में हैं या उन्हें चढ़ी है ।

करें क्या उनसे हम शिकवा
ख़ता कोई हमीं से हुई होगी ।

दोस्ती का दम यहाँ भरते हैं सभी
आखिरी कदम कोई साथ नहीं चलता


ग़र मिला कभी तो पूछूंगा ऱब से, क्या बिगड़ जाता
ग़र बनाया होता दिल के मकाँ में इक मेहमानखाना ।


बस आज इतना ही , अगली पोस्ट में एक और प्रयोग ।

37 comments:

  1. लगता है हकीकत को काव्य में बदल दिया है;एकदम सही कथन है.

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  2. आज इतनी भी मय नहीं मयख़ाने में,
    जितनी छोड़ दिया करते थे हम पैमाने में...

    जय हिंद...

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  3. दोस्ती का दम यहाँ भरते हैं सभी
    आखिरी कदम कोई साथ नहीं चलता
    बहुत खूब कहा है.

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (28-3-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  5. ग़र मिला कभी तो पूछूंगा ऱब से, क्या बिगड़ जाता
    ग़र बनाया होता दिल के मकाँ में इक मेहमानखाना ।


    क्याब्बात है डॉक्टसाब!!!

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  6. या खुदा ये कैसा आलम है
    या हम नशे में हैं या उन्हें चढ़ी है ।
    अजी उन्हे चढी होगी....
    बहुत मस्त मस्ती जी आज की पोस्ट मे
    हमे तो बिना पिये चढ गई.
    धन्यवाद

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  7. ठीक ठाक ही लिख लेते हो आप....कब आ रही है आपकी पहली काव्य बुक....!बहुत खूब !!!

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  8. शेर मत कहो ना!

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  9. antim sher wah kya baat hai..........aur pahile sher se muttalik............
    deewane to vo hee kahlate hai jee jo hosh kho baithe hai..........:)

    vaise aap ka prayog kamyab raha.....
    aap to harfanmoula ban gaye......
    badhaee

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  10. ग़र मिला कभी तो पूछूंगा ऱब से, क्या बिगड़ जाता
    ग़र बनाया होता दिल के मकाँ में इक मेहमानखाना ।

    मत पूछना....अच्छा किया वर्ना घर में जंग छिड़ जाती :)

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  11. अपनी खिड़की से हम झांके अपनी खिड़की से वे झांके
    लगा दो आग खिड़की में न हम झांकें न तुम झांको !

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  12. वाह जी बल्ले बल्ले

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  13. ग़र बनाया होता दिल के मकाँ में इक मेहमानखाना ।

    बहुत खूब ...होली के आफ्टर इफेक्ट्स बढ़िया हैं ..

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  14. सच पूछिए तो दराल सर, कभी कभी आपसे ऐसी पोस्टों की उम्मीद करता हूँ, और आप दिल की बात सुनते भी हैं, तभी तो अपने पाठकों को आप कभी निराश नहीं होने देते.

    लेकिन आज आपके शेर में आपका दर्द भी दिख रहा है. चलिए अब मुस्कराए आप :)

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  15. हा हा हा ! माथुर जी , सुलभ --ऐसा भी नहीं है । आज पहली बार कवि की कल्पना का सहारा लिया है ।
    रजनीश जी , बस पता चलते ही कि बुक लिखी कैसे जाती है ।
    अजित जी --सॉरी !

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  16. bahut sundar
    sare sher achche hai

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  17. ये अनुभव के आफ्टर-इफेक्ट्स हैं।

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  18. दोस्ती का दम यहाँ भरते हैं सभी
    आखिरी कदम कोई साथ नहीं चलता ।

    सच्चाई को अभिव्यक्त किया है आपने ..इस दुनिया में यही होता है

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  19. ग़र मिला कभी तो पूछूंगा ऱब से, क्या बिगड़ जाता
    ग़र बनाया होता दिल के मकाँ में इक मेहमानखाना ।

    खुमार उतरना भी नहीं चाहिए. सारा साल ही ये माहौल रहे तो क्या बात हो. शेर भी उम्दा माहौल के अनुकूल.

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  20. बढ़िया हैं ये साईड इफेक्ट !

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  21. हद है इतना बड़ा मेहमानखाना होते हुए भी खुदा से रोना ०अभी भी भांग चढी हुयी है !

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  22. .

    @-ग़र मिला कभी तो पूछूंगा ऱब से, क्या बिगड़ जाता
    ग़र बनाया होता दिल के मकाँ में इक मेहमानखाना ..

    शायर साहब ,
    मेहमानखाना हो न हो , हमने तो डेरा डाल रखा है वहाँ ..

    .

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  23. इक शोर सा उठा है मयख़ाने में
    फिर कोई दीवाना होश खो बैठा ।

    या खुदा ये कैसा आलम है
    या हम नशे में हैं या उन्हें चढ़ी है ।

    जबरदस्त सर जबरदस्त ! मजा आ गया !

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  24. "...फिर कोई दीवाना होश खो बैठा..."

    होश खोने की बात चली तो वो बोले
    भाई पीया तो शिव जी ने था
    मानव जीवन के हित में कालकूट, हलाहल
    और झेल उसे लीन हो गए घोर साधना में
    अर्धांगिनी पार्वती पर छोड़ दुनिया का झमेला...
    तबसे आदमी गटक रहा है और भटक रहा है
    पूछे तो किससे कि कोई पीता ही क्यूँ है ?

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  25. मेरी तो और भी देर से उतरी है इसीलिये आपके इन साईड इफेक्ट्स का अवलोकन बहुत बाद में हो पा रहा है । शायरी की भाषा में होली के आफ्टर इफेक्ट्स अच्छा असर कर रहे हैं ।

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  26. इक शोर सा उठा है मयख़ाने में
    फिर कोई दीवाना होश खो बैठा ।

    हूँ...हूँ.....कौन थी वो ....?

    या खुदा ये कैसा आलम है
    या हम नशे में हैं या उन्हें चढ़ी है ।

    बधाई ...इस आलम की ......

    करें क्या उनसे हम शिकवा
    ख़ता कोई हमीं से हुई होगी ।

    अब मयखाने में यूँ दीवाने बनेंगे तो मैडम जी नाराज़ तो होंगी ही न ......):

    दोस्ती का दम यहाँ भरते हैं सभी
    आखिरी कदम कोई साथ नहीं चलता ।

    अभी देखा पिछली यात्रा में तो साथ ही थीं अपनी पसंद का फूल दिखातीं ....

    लाजवाब ...होली के आफ्टर इफेक्ट्स....!!

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  27. दोस्ती का दम यहाँ भरते हैं सभी
    आखिरी कदम कोई साथ नहीं चलता ।
    सारे शेर अच्छे हैं मगर इस शेर ने दिल को छू लिया !
    आभार!

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  28. हा हा हा ! नहीं राधारमण जी , ऐसा अनुभव नहीं हुआ है ।

    रचना जी , क्या करें रोज होली दिवाली होती नहीं ।

    बहुत खूब दिव्या जी ।

    शुक्रिया गोदियाल जी , कोई तो मयखाने का कद्रदान निकला ।

    हरकीरत जी , क्या बात है ! आपने तो अलग अलग शेर को पिरोकर बढ़िया कहानी बना डाली ।

    धन्यवाद ज्ञानचंद जी ।

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  29. बहुत सुन्दर है सारे शे'र डॉ. साहेब ! एक मेरी तरफ से :-

    हम अपने दर्द की तोहिंन कर गए होते !
    अगर शराब न होती तो मर गए होते !

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  30. या खुदा ये कैसा आलम है
    या हम नशे में हैं या उन्हें चढ़ी है ।

    सुबह का भूला शाम तक घर आ गया होता
    क्या करे पर रास्ते में एक ठेका है.

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  31. उम्दा साइड एफ्फेक्ट्स.
    दायें से भी बढ़िया,बायें से भी बढ़िया.

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  32. ग़र मिला कभी तो पूछूंगा ऱब से, क्या बिगड़ जाता
    ग़र बनाया होता दिल के मकाँ में इक मेहमानखाना ।

    जबरदस्त साइड इफेक्ट्स

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  33. डा ० साहेब आपकी कविता और आपके प्रयोग लाजवाब होते हैं ! ताल कटोरा के चित्र बहुत ही अच्छे लगे !

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  34. आदरणीय डॉक्टर साहब
    प्रणाम है …

    इतने ग़ज़्ज़्ज़ब शे'र !
    हुज़ूर , इनकी दहाड़ हमारी हालत ख़राब कर रही है … :)

    विलंब से आया हूं … लेकिन, विश्वस्त सूत्रों से सूचना मिली थी कि ---होली के आफ्टर इफेक्ट्स -- के बहाने हम जैसे कवि-शायर कहलाने वालों की छुट्टी की तैयारी है … पता नहीं था कि हम आपके निशाने पर हैं … :)

    या खुदा ये कैसा आलम है
    या हम नशे में हैं या उन्हें चढ़ी है

    क्या बात है जनाब ! हमारे मन की बात आपकी ज़ुबानी ! व्व्वाऽऽह !

    करें क्या उनसे हम शिकवा
    ख़ता कोई हमीं से हुई होगी

    आहऽऽहाऽऽहाऽह ! महबूब की बेवफ़ाई पर भी शिकायत की जगह बिना कसूर इल्ज़ाम अपने सर लेने को यूं तैयार रहना …
    पत्थर को भी पिघलना पड़ जाएगा… :)

    बहुत बहुत मुबारकबाद !

    अरे ! ये क्या ? इन्हीं शे'रों को हीरजी भी कोट करके गईं हैं … ! उनके कोट किए तीसरे शे'र को अपने साथ ले'कर जा रहा हूं फिर …


    नव संवत्सर की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !


    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  35. हा हा हा ! राजेन्द्र जी , देर आयद दूरस्त आयद !
    लेकिन आखिरी शे'र पर तो आप ने भी टिपण्णी नहीं की ज़नाब । :)

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