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Sunday, May 12, 2013

घर बैठे ही महसूस करें गर्मियों में भी सर्दी का अहसास -- बीट द हीट।


मौसम के मामले में दिल्ली की दो बातें मशहूर हैं -- दिल्ली की सर्दी और दिल्ली की गर्मी। इस समय दिल्ली में गर्मी चरम सीमा की ओर अग्रसर है। ऐसे में दिल्ली वाले निकल पड़ते हैं , ठन्डे देशों/ प्रदेशों की ओर एक दो सप्ताह की छुट्टी पर। लेकिन आप कहाँ जाते हैं , यह आपकी हैसियत पर निर्भर करता है। आइये देखते हैं , दिल्ली वालों की हैसियत का लेखा जोखा :

१ ) आम आदमी :  सर्दी हो या गर्मी , करीब  ९० % लोग घर से बाहर निकल ही नहीं पाते। यदि जाते भी हैं तो बच्चों के नाना नानी या दादा दादी के पास। ये वे लोग होते हैं , जिनके लिए रोजी रोटी कमाना ही एक उपलब्धि होती है।       

२ ) आम से ज़रा सा ऊपर :  ये वे मिडल क्लास लोग होते हैं जो जिंदगी को सीमित दायरे में रहकर लेकिन भरपूर जीना चाहते हैं। इन्हें हर वर्ष गर्मियों में किसी ने किसी हिल स्टेशन पर जाना होता है, तरो ताज़ा होने के लिए। इनमे ज्यादातर हम जैसे सरकारी कर्मचारी आते हैं।

३ ) छोटे मोटे बिजनेसमेन :  ये लोग निकलते हैं साउथ ईस्ट एसियन देशों की ओर जैसे थाईलेंड ,  होंगकोंग और मलेसिया आदि।

४ ) निओ रिच और बड़े बाप के बेटे :  जाते हैं स्विट्जर्लेंड , पेरिस , लन्दन या इटली के युरोपियन टूर पर। ज़ाहिर है , इनमे वे लोग ज्यादा होते हैं जिनके पास दो नंबर का पैसा ज्यादा होता है।

५ ) रियल रिच या खानदानी रईश :  ये वे लोग होते हैं जो हर साल एक नयी रोमांचक जगह की तलाश में निकल पड़ते हैं जैसे केन्या , अलास्का , साउथ अफ्रीका , रोमानिया आदि।

गर्मी जब हद से ज्यादा बढ़ जाती है तब हम तो पहाड़ों के सपने देखने लग जाते हैं। ऐसे में जाने से पहले ही ठंडक का अहसास होने लगता है। यकीन न हो तो आप भी देखिये, कुछ हिल स्टेशंस के नज़ारे और महसूस कीजिये पहाड़ों की ठंडी हवाओं को।    

उत्तर भारत के हिल स्टेशन : 
       
१ ) मसूरी -- पर्वतों की रानी -- दिल्ली से करीब २७५ किलोमीटर।



समुद्र ताल से ऊंचाई -- ६ ० ० ०  फीट।




स्टर्लिंग रिजॉर्ट मसूरी।



मसूरी से करीब ३० किलोमीटर -- धनोल्टी जहाँ सुरखंडा देवी का मंदिर है जहाँ तक एक किलोमीटर की चढ़ाई है। लेकिन जून में भी बादलों से ढका रहता है।



धनोल्टी से आगे आप जा सकते हैं चम्बा -- जहाँ नया टिहरी शहर और टिहरी डैम बना है।

२ ) मनाली : 

दिल्ली से ६५० किलोमीटर दूर। यहाँ आप जा सकते हैं -- रोहतांग पास जिसकी ऊंचाई है १ ४ ० ० ० फीट। यह लेह को जाने वाला रास्ता भी है ।     


सोलंग वैल्ली -- जहाँ पैरा ग्लाइडिंग का आनंद लिया जा सकता है।

इसके अलावा उत्तर में शिमला और नैनीताल अन्य अत्यंत मशहूर हिल स्टेशन हैं।

दक्षिण भारत : 

१ )ऊटी :
२ ) कोडाई



ऊटी -- यहाँ आपको खड़े पहाड़ नज़र नहीं आयेंगे। लेकिन नज़ारा बेहद खूबसूरत मिलेगा।    





 बोटेनिकल गार्डन ऊटी।




ऊटी से बाहर मैसूर के रास्ते में बहुत सुन्दर पहाड़ और घाटियाँ , झीलें और वन हैं।   


ऊंचाइयों पर : 

कश्मीर को जन्नत कहते हैं। लेकिन लेह लद्दाख भी कम सुन्दर नहीं।  



लेह--  टॉप ऑफ़ द वर्ल्ड डेज़र्ट का जन्नत।





साथ ही बर्फ से ढके पहाड़। कोई कैसे इसे चीनियों के हाथों में सोंप सकता है।


उत्तर पूर्वी भारत : 

दार्जिलिंग : 



मिरिक लेक -- हमें यह झील अभी तक देखी सबसे सुन्दर झील लगी।





गंगटोक :  छंगु लेक। यह प्राकृतिक झील गंगटोक से करीब ५ ० किलोमीटर दूर  पहाड़ों पर बनी है। यहाँ से नाथुला पास थोड़ी दूर पर है। नाथुला पास से चीन शुरू हो जाता है। यहाँ सीमा पर तैनात आप चीनी सैनिकों से हाथ मिला सकते हैं।

यहाँ काफी ठण्ड पड़ती है। अब तक निश्चित ही आपको भी ठण्ड लगनी शुरू हो चुकी होगी। इसलिए इस सफ़र को यहीं समाप्त करते हैं। और आगे की तैयारी करते हैं।    



Wednesday, May 8, 2013

ताउगिरी का इस्तेमाल करते हुए जिंदगी के तनाव हटायें --


कॉलेज के दिनों में खूब हँसते थे , गाते थे और मस्ती करते थे। दोस्तों में केंद्र बिंदु हम ही होते थे। डॉक्टर बनने के बाद भी यह क्रम जारी रहा। सब मित्र हमारे ही इर्द गिर्द रहकर सामंजस्य बनाये रखते थे। फिर कुछ वर्षों की दुनियादारी निभाने के बाद अस्पताल में नए लोगों से पाला पड़ा। यहाँ भी हमारे साथ हंसने हंसाने का दौर चलता रहा। कुछ लोग तो हमारे पास आते ही हंसने के लिए थे। जो कभी भी कहीं भी नहीं हँसते थे , वे हमारे साथ बैठकर हंसने का कोटा पूरा करते थे।

अक्सर देखने में आता है कि अधिकांश लोग हंसने में बड़ी कंजूसी करते हैं। हमारे एक मित्र , बाल रोग चिकित्सक , हमेशा परेशांन रहते। लेकिन हमारे पास आकर थोड़ी देर के लिए अपनी सारी परेशानियाँ भूल जाते। फिर एक दिन दूसरे अस्पताल में विभाग अध्यक्ष बन गए। लेकिन अभी भी हाल वही , माथे पर सलवटें , चेहरे पर चिंता के भाव , कंधे झुके हुए, मानो जिंदगी का सारा बोझ वही ढो रहे हैं।

यहाँ ब्लॉगिंग में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं। हालाँकि ब्लॉगिंग करने का ध्येय सबका भिन्न हो सकता है , पसंद नापसंद भी भिन्न हो सकती है, लेकिन हास परिहास और आमोद प्रमोद के बिना ब्लॉग जिंदगी बड़ी सूनी सूनी सी लग सकती है। गत वर्ष हिंदी ब्लॉगर्स में काफी उथल पुथल हुई , कई लोग ब्लॉगिंग छोड़ फेसबुक की ओर हो लिए, कुछ ने नाता ही तोड़ लिया। कई धुरंधर माने जाने वाले ब्लॉगर्स की अनुपस्थिति से नए ब्लॉगर्स के विकास में बाधा उत्पन्न हुई।

ऐसे में एक ब्लॉगर बंधु ने फिर से माहौल को खुशनुमा बनाने की दिशा में प्रयास करना आरम्भ किया है जिसका प्रभाव भी दिखाई दे रहा है। ताऊ के नाम से प्रसिद्द श्री पी सी रामपुरिया का हास्य विनोद, ब्लॉगिंग को फिर से दिलचस्प बना रहा है। ताऊ कविता नहीं करते लेकिन उनकी कल्पना शक्ति किसी बड़े कवि से कम नहीं है। अक्सर लोग हैरानी में पड़ जाते हैं कि ताऊ के पास ऐसे खुरापाती आइडियाज आखिर आते कहाँ से हैं।


ताऊ पी सी रामपुरिया ( मुदगल ) : 


हिंदी ब्लॉगजगत में जब भी ताऊ का नाम आता है , मन में मौज मस्ती की जैसे धारा प्रवाहित होने लगती है। ताऊ की ब्लॉग पहेलियाँ सभी ब्लॉगर्स का ऐसा मानसिक व्यायाम कराती थी जैसे कोई ८१ खानों वाला क्रॉसवर्ड पज़ल करता है। एक चिकित्सक की दृष्टि से देखें तो यह एक्षरसाइज़ करने वालों को एल्ज़िमर्स डिसीज होने का खतरा कम से कम रहता है।

हालाँकि पिछले एक आध साल से ताऊ की ब्लॉगिंग सक्रियता पर ताई का अंकुश लगा रहा और ताऊ ''चैरिटी बिगिन्स एट होम '' के सिद्धांत का पालन करते हुए पूर्णतया ताई सेवा में लीन रहे जिससे पूरे ब्लॉग जगत में मायूसी सी छाई रही। लेकिन ख़ुशी की बात यह है कि ताई ने अब धर्म कर्म में व्यस्त होकर ताऊ पर से ब्लॉगिंग प्रतिबन्ध हटा दिया है और अब ताऊ पूर्ण रूप से स्पेनिश बुल की तरह बलमस्त होकर मैदान में कूद पड़ा है , बुल फाइटर्स को दिन में रंगीन तारे दिखाने के लिए।

ताऊ को देखा कहीं ! : 

ताऊ की एक ख़ास बात यह है कि आज तक उन्हें कोई पहचान नहीं पाया। हमें भी ताऊ से बस एक मुलाकात का अवसर मिला था लेकिन यह देखकर हैरान रह गए कि --

न टोपी , न पगड़ी 
न मूंछ , न दाढ़ी।  
न लट्ठ , न डंडा 
न ताबीज़, न गंडा।   
न बन्दर सी शक्ल , 
न छछूंदर सी अक्ल। 
न चेहरा काला ,
न गले में माला। 
न तन पर धोती, न चुनर,
न ताऊ, न ताऊ की उम्र। 
न देखा बुड्ढा खूंसट हठीला , 
दिखा एक बांका ज़वान सजीला।  


अक्सर हम ब्लॉगर्स स्वयं को सबसे बड़ा ज्ञानी समझने का भ्रम पाले रहते हैं। लेकिन ताऊ का प्रोफाइल पढ़कर हमारे तो ज्ञान चक्षु खुल गए और अब हम खुद को ज्ञानी समझने की भूल नहीं करते।

'' हमारे यहाँ एक पान की दूकान पर तख्ती टंगी है , जिसे हम रोज देखते हैं ! उस पर लिखा है : कृपया यहाँ ज्ञान ना बांटे , यहाँ सभी ज्ञानी हैं ! बस इसे पढ़ कर हमें अपनी औकात याद आ जाती है ! और हम अपने पायजामे में ही रहते हैं ! एवं किसी को भी हमारा अमूल्य ज्ञान प्रदान नही करते हैं !'' 

ताऊ अपना अमूल्य ज्ञान प्रदान करें या न करें , लेकिन एक बात निश्चित है कि बिना ज्ञान बघेरे भी ताऊ ब्लॉग जगत को अपने जिंदादिल लेखन से जीने की सही राह दिखा रहे हैं।

दो दिन की है जिंदगी, 
यूँ ही कट जायेगी ,  
कुछ रोने में, कुछ सोने में। 
जीने का मज़ा है ,  
जिंदादिल होने में।   

आइये ताउगिरी का इस्तेमाल करते हुए जिंदगी के तनाव हटायें -- हम भी। 
सबके जीवन में समस्याएं होती हैं , कठिनाइयाँ होती हैं , लेकिन जो इनका सामना करते हुए भी माहौल को खुशनुमा बनाये रखे , उसे ताऊ कहते हैं।  


         

Saturday, May 4, 2013

जब पहली बार हमें एक अपराधी जैसा होना महसूस हुआ -- ऐ विजिट टू दिल्ली एयरपोर्ट।


एक समय था जब दिल्ली एयरपोर्ट तभी जाना होता था जब कनाडा में रहने वाले हमारे मित्र साल दो साल में एक बार दिल्ली आते थे। उन्हें लेने जाते तो आधी रात तक बेसब्री से इंतजार करते। ट्रॉली पर सामान लादे दोनों हाथों से ट्रॉली धकाते हुए जब वे सामने आते तो पहचान कर चेहरे पर जैसे एक विजयी मुस्कान फ़ैल जाती। इसी तरह विदेश जाते समय सभी दोस्त और रिश्तेदार मिलकर उन्हें विदा करने जाते। इस अवसर पर सब प्रस्थान क्षेत्र में बने रेस्तराँ में बैठकर चाय कॉफ़ी का आनंद लेते और बाहर चलते हवाई ज़हाज़ों को देखकर रोमांचित होते।

उन दिनों प्रस्थान टर्मिनल का नज़ारा भी बड़ा दिलचस्प होता था। अक्सर पंजाब से लोग दल बल सहित आते और विदेश जाने वाले प्यारे मुंडे को फूल मालाओं से लाद कर गले मिलकर खूब रोते। एक एक बन्दे को छोड़ने ४०-५० लोग तक बस या ट्रक भर कर आते। पता नहीं कि तब विदेश जाना ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता था या हवाई ज़हाज़ में बैठना , या शायद दोनों। हमने भी जब पहली बार हवाई यात्रा की तब अपना वी आई पी होने का भ्रम ज़ेहन में अन्दर तक उतर गया था। ट्रॉली में एक छोटा सा बैग रखकर हम ऐसे चल रहे थे जैसे बरसों बाद विदेश से लौटे हों। स्वागत में तख्ती लिए खड़े एक एक शख्स को देखते हुए ऐसे आगे बढ़ रहे थे जैसे हमारे ही स्वागत में खड़े हों।   

लेकिन अब जब देश में लो कॉस्ट एयरलाइन्स के चलते हवाई यात्रा पहले के मुकाबले सस्ती हो गई है और साथ ही मिडल क्लास की खर्च करने की क्षमता अपेक्षाकृत बढ़ गई है , तब हवाई यात्रा और एयरपोर्ट जाना उतना दुर्लभ नहीं रहा। महीने दो महीने में दोनों बच्चों में से किसी एक को लाने या छोड़ने का क्रम चलता ही रहता है। हालाँकि अब एयरपोर्ट तक मेट्रो उपलब्ध है लेकिन दिल्ली वालों को अपनी गाड़ी में चलने की बड़ी बुरी आदत है। इसी के चलते एयरपोर्ट पर गाड़ियों की भीड़ इतनी बढ़ गई कि अब वहां रुकने की इज़ाज़त ही बंद कर दी गई है।

अब डोमेस्टिक एयरपोर्ट पर पिकअप करने के लिए बस ५ मिनट का ही समय मिलेगा। उसके बाद १०० रूपये का टिकेट कट जायेगा। और यदि आपको एक घंटा रुकना पड़ गया तो समझो ६०० का चूना लग गया। हालाँकि पार्किंग में गाड़ी पार्क करने के आधे घंटे के ५० रूपये देने पड़ते हैं।

ऐसे में अक्सर देखने में आता है कि पिकअप करने के लिए जाने वाले गाड़ीवाले एयरपोर्ट से पहले ही सड़क पर  
साइड में गाड़ी लगाकर खड़े हो जाते हैं। लेकिन जल्दी ही ट्रैफिक पुलिस वाले लाउड स्पीकर पर गाड़ी का नंबर पुकारते हुए वहां से हटने को मजबूर कर देते हैं। यह नज़ारा अब आम हो गया है।

कुछ दिन पहले हम भी एक्सप्रेस हाइवे आरम्भ होने से पहले वाले स्थान पर रात १० बजे बेटी का प्लेन लैंड होने का इंतजार कर रहे थे। तभी देखा कि आगे पीछे जो और गाड़ियाँ थीं , सब अचानक चल दिए। कुछ सेकंड्स बाद ही एक पुलिस की गाड़ी हमारे साइड में आकर रुकी और उसमे बैठा पुलिसमेंन हमें घूर कर देखने लगा। हमें भी लगा जैसे हम कोई अपराधी हैं। अब तक हम यह भी समझ गए थे कि यहाँ से खिसक लेना ही बेहतर है। हालाँकि हमें एक महिला (पत्नि) के साथ देर रात यूँ सड़क पर रुके होने का अर्थ उन्होंने क्या लगाया होगा , यह सोचकर ही हंसी आ गई।    

हाइवे पर चढ़ते ही नज़ारा और भी दिलचस्प हो गया। जहाँ दायीं लेन में चलती हुई गाड़ियों में तेज चलने की रेस लगी थी , वहीँ बायीं लेंन में वे सब चल रहे थे जिन्हें एयरपोर्ट जाना था। बायीं लेन में चलने वालों में एक तरह से धीरे चलने की होड़ सी लगी थी। ज़ाहिर था , किसी को भी जाने की जल्दी नहीं थी। आखिर एक जगह जहाँ फ़्लाइओवर में मोड़ सा था , वहां पर जाकर सारी गाड़ियाँ रुकने लग गई। वहां न सिर्फ मोड़ था , बल्कि अँधेरा भी था। फिर भी लोग इत्मिनान से गाड़ी रोककर इंतजार कर रहे थे , घड़ी की सूइयों के आगे बढ़ने का। कुल मिलाकर सारा दृश्य एक संस्पेस्फुल फिल्म के  सैट जैसा लग रहा था।

इंतजार करते हुए यही विचार मन में आ रहा था कि ५ से १५ लाख की गाड़ियों में बैठे हम शहरी खाते पीते लोग वहां सिर्फ इसलिए खड़े थे क्योंकि पार्किंग के ५० रूपये बचाने थे। यह अलग बात है कि यदि पिकअप करने में ५ मिनट से ज्यादा की देरी हो जाये तो ५० बचाने के चक्कर में १०० रूपये भी देने पड़ सकते हैं। उधर फ़्लाइओवर के ऊपर से होती हुई एयरपोर्ट मेट्रो जा रही थी , बिल्कुल खाली। एयरपोर्ट आने वाली मेट्रो में भी मुश्किल से १० सवारियां थीं। ज़ाहिर था कि हम दिल्ली वालों को अपनी गाड़ी से ही चलने की भयंकर आदत है। इसीलिए सब जगह पार्किंग की समस्या बढती जा रही है।           

अब सवाल यह उठता है कि इन परिस्थितियों में दोष किसे दिया जाये।

क्या उन्हें जो अपने प्रिय परिजनों को लेने एयरपोर्ट अपनी गाड़ी में जाते हैं ?
या एयरपोर्ट मेट्रो लोगों को लुभा नहीं पा रही है ?  
या फिर एयरपोर्ट अधिकारीगण इस समस्या का कोई बेहतर समाधान नहीं निकाल पा रहे हैं ? 

जब तक कोई बेहतर विकल्प नहीं मिलता , तब तक लगता है कि दिल्ली के सांभ्रांत लोग यूँ ही मन में एक अपराधबोध लिए सडकों पर पुलिस से बचते फिरते रहेंगे।   



Sunday, April 28, 2013

सबके बिगड़े काम बनाये ,एक कप चाय ---


सुबह उठते ही दो चीज़ें याद आती हैं , अखबार और चाय। दोनों एक दूसरे की पूरक भी हैं। एक न हो तो दूसरे में भी मन नहीं लगता। चाय का तो कोई विकल्प नहीं लेकिन यदि अख़बार न हो तो अब हम भी अन्य ब्लॉगर्स / फेसबुकियों की तरह कंप्यूटर खोल कर बैठ जाते हैं। आखिर सबसे ताज़ा ख़बरें तो यहीं मिल जाती हैं।

अक्सर फेसबुक खोलते ही अनूप शुक्ल जी की चाय पर 'कट्टा कानपुरी' कविता पढने को मिलती है। वहीँ से पता चलता है कि अनूप जी या तो चाय की चुस्कियां ले रहे होते हैं या इंतज़ार में कविता लिख रहे होते हैं। यह भी पता चलता है कि वह खुद कभी चाय नहीं बनाते बल्कि चाय बनाने वाले / वाली पर निर्भर रहकर चाय का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं।

लेकिन हम तो सुबह सबसे पहला काम ही यही करते हैं। श्रीमती जी का भी कहना है कि हम चाय बहुत अच्छी बनाते हैं। हालाँकि उनका तारीफ़ करने का मकसद हम भली भांति समझते हैं, लेकिन इस विषय में असहमति भी नहीं रखते। आखिर दुनिया में कोई और काम आये न आये , लेकिन कम से कम चाय बनाना तो आना ही चाहिए।

वैसे तो देशवासियों को चाय पीना अंग्रेजों ने सिखाया था लेकिन हम जो चाय पीते हैं उससे अंग्रेजों का कोई लेना देना नहीं है। देखा जाये तो हम चाय नहीं , चाय की खीर पीते हैं। वैसे तो चाय की अनेकों किस्में भारत में पैदा होती हैं और चाय बनाने के तरीके भी अनेक हैं। लेकिन पानी , दूध , चीनी और चाय की पत्ती से बनने वाली चाय का स्वाद हर घर में अलग होता है। इसका कारण है चाय बनाने का तरीका। आइये देखते हैं, चाय का स्वाद कैसे भिन्न भिन्न होता है :

पंजाबी लोगों की चाय में चीनी कम और दूध न के बराबर होता है जबकि पत्ती ज्यादा डालकर कड़क चाय बनाई जाती है। लेकिन हरियाणा के लोग शुद्ध दूध की चाय पीते हैं जिसमे चीनी भी दिल खोल कर डाली जाती है। अक्सर शहरी लोग या तो बिना चीनी की चाय पीते हैं या बहुत कम चीनी की। उधर ढाबों पर मिलने वाली चाय में आधा कप तो चीनी से ही भरा होता है। मजदूर लोग भी ऐसी ही चाय को पसंद करते हैं।

चाय में अलग अलग खुशबू तो चाय की किस्म पर निर्भर करती है लेकिन स्वाद बनाने पर। यदि चाय को सही तरीके से बनाया जाये तो यह न सिर्फ स्वादिष्ट होती है बल्कि फायदेमंद भी होती है। दूसरी ओर गलत तरीके से बनी चाय का स्वाद भी खराब होता है और नुकसानदायक भी हो सकती है। आइये देखते हैं क्या है चाय बनाने का सही तरीका :

तरीका बहुत आसान है इसलिए चाय बनाना सबके लिए संभव है। दो कप चाय बनाने के लिए सवा कप पानी और पौना कप ट्रिपल टोंड दूध ( डबल टोंड दूध जिसमे से मलाई निकाल ली गई हो ) चाहिए। यदि टोंड दूध हो तो आधा कप और फुल क्रीम दूध का चौथाई कप ही काफी रहेगा। पानी में चाय पत्ती डालकर उबलने तक गर्म कीजिये। उबाल आने पर १० -१५ सेकण्ड तक उबालिए। यदि तेज चाय चाहिए तो १५ सेकण्ड वर्ना १०- १२ सेकण्ड ही काफी है।  अब इसमें चौथाई चम्मच चीनी और दूध डालकर गर्म कीजिये। जब उबाल आने लगे तो चाय के बर्तन को उठाकर आंच पर हिलाते हुए उबालिए। धीरे धीरे चाय का रंग निखरता आएगा। लीजिये तैयार हो गई गर्मागर्म चाय।   

चाय के गुण और उपयोग :  

* चाय में मौजूद केफीन नर्वस सिस्टम पर प्रभाव डालकर उत्तेजित करती है। इसलिए ताजगी और स्फूर्ति प्रदान करती है।
* एंटीऑक्सिडेंट कई तरह के केंसर से बचाव करते हैं।
* सुबह की चाय उठते ही सुस्ती को दूर कर स्फूर्ति लाती है। हालाँकि बेड टी का प्रचलन अंग्रेजों ने शुरू किया होगा, लेकिन बिना कुल्ला किये चाय पीना अच्छी आदत नहीं।
* दिन भर में ५ -६ चाय पीना सामान्य है और काम में ध्यान लगाने के लिए सहायक सिद्ध होती है।
* चाय पीने से तनाव से मुक्ति मिलती है। इसलिए काम में उत्पादकता बढती है।
* चाय सभी पारिवारिक , सामाजिक, धार्मिक  और औपचारिक कार्यक्रमों में आवभगत का बढ़िया माध्यम है।
* अविवाहित लोगों के लिए चाय का बुलावा एक वरदान साबित होता है।
* विवाह प्रस्ताव में वर पक्ष को लड़की दिखाने के लिए जब घर पर बुलाया जाता है तो लड़की चाय लेकर ही सामने आती है।  
* दुनिया में पानी के बाद चाय ही ऐसा पेय है जो सबसे ज्यादा पिया जाता है। शायद लोगों को चाय पानी की आदत सी पड़ गई है। इसीलिए आजकल कहीं भी जाइये , बिना चाय पानी के कोई काम ही नहीं होता।  

अंत में : चाय पीजिये , खूब पीजिये , पिलाइये , खूब पिलाइये --  लेकिन खुद भी बनाइये। 

       

Tuesday, April 23, 2013

इंसानी भेड़िये कहीं बाहर से नहीं आते ---


दिल्ली में एक पांच वर्षीय बच्ची के साथ हुए अमानवीय कुकृत्य से सारा देश शोकाकुल है और शर्मशार भी। क्रोधित भी है क्योंकि व्यवस्था से जैसे विश्वास सा उठ गया है। ऐसे में आम आदमी का गुस्सा उबल पड़ा है। प्रस्तुत हैं इसी विषय पर कुछ मन के उद्गार , एक कवि की दृष्टि से :  
  
१)

दिल खुश हुआ कि, दिल्ली दमदार हुई ,
फिर एक बार पर, दिल्ली शर्मसार हुई।
कुछ जंगली भेड़ियों की कारिस्तानी से, 
फिर दिल्ली में इंसानियत की हार हुई।  

२)


निर्मल कोमल से, कच्ची धूप होते हैं,
बच्चे भगवान् का ही स्वरुप होते हैं।
जो मासूमों को कुचलते हैं बेरहमी से ,
उनके उजले चेहरे कितने कुरूप होते हैं।

३)


सीने में जलन है, पर रो नहीं सकती,
आँखों में नींद है, पर सो नहीं सकती।
इतने ज़ख्म दिए हैं बेदर्द ज़ालिमों ने,
इस दर्द की कोई दवा, हो नहीं सकती।     

४)


खुदा का हर बंदा भगवान नहीं होता
देवता बनना भी आसान नहीं होता।
दूषित है मानवता बस एक हैवान से, 
दुनिया में हर पुरुष शैतान नहीं होता।




नोट : व्यवस्था को सुधारने के साथ साथ हमें आत्मनिरीक्षण भी करना होगा। साथ ही सतर्क रहना भी आवश्यक है क्योंकि इंसानी भेड़िये कहीं बाहर  से नहीं आते बल्कि इंसानों की भीड़ में ही घुले मिले रहते हैं।  



Sunday, April 14, 2013

शेर जो देखन मैं चल्या, शेर मिल्या ना कोय ---

बचपन में शेर की कहानी सुनने में बड़ा मज़ा आता था। आज भी डिस्कवरी चैनल पर अफ्रीका के जंगलों की सैर करते हुए जंगली जानवरों के बारे में फिल्म देख कर बड़ा रोमांच महसूस होता है। शायद इसी वज़ह से हर साल १३ अप्रैल को जो हमारी वैवाहिक वर्षगांठ होती है, हमें जंगलों की याद प्रबल हो आती है। यूँ तो भारत में भी अनेक शेर और बाघ संरक्षित क्षेत्र हैं लेकिन इनमे जंगली जानवरों से सामना उतना ही असंभव लगता है जितना जितना मनुष्यों में इन्सान का ढूंढना। फिर भी यही चाह हमें खींच ले जाती है जंगलों की ओर। 
इस वर्ष हमारा जाना हुआ - जिम कॉर्बेट पार्क। 

दिल्ली से २५० किलोमीटर रामनगर से करीब १० किलोमीटर पर बसा है ढिकुली गाँव जहाँ अनेकों आरामदायक रिजॉर्ट्स बने हैं। दिल्ली से मुरादाबाद तक का १५० किलोमीटर का सफ़र राष्ट्रीय राजमार्ग २४ द्वारा बहुत सुहाना लगता है जहाँ आप फर्राटे से गाड़ी चलाते हुए हाइवे ड्राइविंग का आनंद उठा सकते हैं। लेकिन उसके बाद काशीपुर से होता हुआ रामनगर तक का करीब १०० किलोमीटर का रास्ता आपको रुला सकता है। कहीं बढ़िया , कहीं टूटी फूटी सड़क को देखकर पता चल जाता है कि कहाँ कैसे ठेकेदार ने काम किया होगा। 

लेकिन रामनगर पहुँचने के बाद पहाड़ शुरू होने पर राहत सी मिलती है। फिर एक के बाद एक रिजॉर्ट्स आपका स्वागत करने को तैयार मिलते हैं।              

 

एक ओर पहाड़ और दूसरी ओर कोसी नदी के बीच २०० मीटर का क्षेत्र। रिजॉर्ट में घुसते ही ड्राइव वे के दोनों ओर घने पेड़ जिनमे बांस के पेड़ बेहद खूबसूरत लग रहे थे।    



घनी हरियाली के बीच बनी कॉटेज अपने आप में एक स्वर्गिक अहसास की अनुभूति कराती हैं।    



कॉटेज के बाद नदी किनारे रेस्तराँ, स्विमिंग पूल और हरे भरे लॉन -- कुल मिलाकर एक परफेक्ट सेटिंग।   




ढिकुली से आगे राजमार्ग संख्या १२१ सीधे रानीखेत को जाता है। करीब ४ किलोमीटर आगे यह गर्जिया देवी का मंदिर नदी के बीचों बीच बना है।    




कोसी नदी का एक दृश्य -- मंदिर से थोड़ा पहले एक पुराना ब्रिज बना है जहाँ कई तरह के एडवेंचर स्पोर्ट्स का मज़ा लिया जा सकता है। बेशक इसके लिए मन में साहस और उत्साह की आवश्यकता है।   


  

रिवर क्रॉसिंग करते हुए। यहाँ एक बार धम्म की आवाज़ आने पर हमने पूछा कि क्या हुआ तो पता चला कि ब्रिज फाल हो रहा है। समझने में समय लगा कि यह पुल से पानी में कूदने का खेल था।  



जिम कॉर्बेट पार्क में मुख्य रूप से जीप सफारी द्वारा जंगल की सैर की जाती है। पार्क के ४ अलग अलग जोन्स हैं जहाँ एक बार में एक जोन में जाया जा सकता है। लेकिन वीकेंड पर अक्सर बुकिंग पहले ही फुल हो जाती है। हमें भी जो बुकिंग मिली वो ऐसे क्षेत्र की थी जहाँ बस पहाड़ ही पहाड़ थे। लेकिन बहुत घना जंगल था। पेड़ पौधों की अनेकों किस्म थी जिनमे सबसे प्रमुख साल के पेड़ थे।

कुछ नहीं थे तो शेर और बाघ। हालाँकि यहाँ बाघों की काफी संख्या बताई जाती है लेकिन दिखने की सम्भावना न के बराबर ही होती है। फिर भी ऐसा नहीं सोचा था कि इतने घने जंगल में भी एक भी जंगली जानवर दिखाई नहीं देगा।



लेकिन पेड़ तरह तरह के दिखे। यह तना दो पेड़ों का है। बाहर वाला अन्दर वाले पर पेरासाईट है जो जल्दी ही इसकी जान निकाल देगा। शायद कलयुगी मनुष्यों की लालची प्रवृति का प्रभाव पेड़ों पर भी आ गया है।    



पूरे जंगल में आखिर यह एक लंगूर ही नज़र आया जो हमें देखते ही उछलकर पेड़ पर चढ़ गया।



घने जंगल से होकर अंत में हम पहुँच गए ऐसे स्थान पर जहाँ इस क्षेत्र की दूसरी नदी -- रामगंगा नज़र आ रही थी। यह यहाँ की मुख्य नदी है जिस पर रामगंगा रिजर्वायर बना है।

जंगल सफ़ारी तो निराशाजनक रहा, हालाँकि घने जंगल में ५० - ६० किलोमीटर की सैर कमाल की थी। रिजॉर्ट में आकर  यहाँ की खूबसूरती का अवलोकन अपने आप में एक अनुपम अनुभव था।



यहाँ लॉन में शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ भोजन का आयोजन किया जाता है।
 


पहाड़ों में लाल रंग बहुत ही सुन्दर लगता है। इसलिए सभी कॉटेज की छत इसी रंग में रंगी थी। लेकिन फूलों का भला क्या मुकाबला !  



कोसी नदी में महाशीर नाम की मछलियाँ पाई जाती हैं जिनका शिकार एंगलर्स को बहुत भाता है।





अगले दिन सुबह आसमान में बदल छा गए थे। बादलों की खूबसूरती नदी और पहाड़ के साथ मिलकर दोगुनी हो जाती है। लेकिन अब वापस चलने का समय हो गया था। इसलिए हमने भी अपना बोरिया बिस्तर समेटा और लौट आए फिर से उसी जंगल में जहाँ एक ढूंढो तो हज़ार मिलते हैं, इंसानी जानवर।

वापसी में एक सवाल बार बार तंग करता रहा -- क्या वास्तव में हमारे जंगलों में जंगली जानवर बचे हैं ? या इन्सान ने उन्हें अपने लालच का शिकार बना कर ख़त्म कर डाला है। और हम स्वयं को धोखा दिए जा रहे हैं वन विभाग की बातों में आकर।

लेकिन भले ही वनों में वन्य जीवन का अस्तित्त्व मिटता जा रहा हो , अभी भी समय है वन्य जीवन की रक्षा करने का ताकि हमारी आने वाली पीढियां उन्हें सिर्फ किताबों में ही न देखें। शहरी जिंदगी की भाग दौड़ से अलग ये क्षेत्र हमेशा इन्सान को सकूं पहुंचाते रहे हैं।  पर्यावरण की रक्षा करना हमारा धर्म है।  यह बात सबको सीखनी चाहिए .      



Friday, April 5, 2013

कहना मुश्किल था कि बोतल में शराब थी या ---


होली के कुछ दिन बाद शाम का समय था। अस्पताल से घर जाते हुए सड़क पर ट्रैफिक बहुत मिला। ऊपर से सड़क पर पुलिस के बैरिकेड, मानो स्पीड कम करने के लिए बस इन्ही की ज़रूरत थी। ऐसे ही एक बैरिकेड के आगे एक मनुष्य सा दिखने वाला जीव बैठा हिल डुल रहा था। मैला कुचैला , होली के रंगों में रंगा लेकिन बेहद गन्दा। सामने एक अद्धे जैसी बोतल रखी थी जिसमे गोल्डन रंग का कोई द्रव्य भरा था। बोतल आधी खाली थी। कहना मुश्किल था कि बोतल में शराब थी या पेशाब। दूसरी सम्भावना ज्यादा लग रही थी क्योंकि वह मानव जीव हवा में हाथ घुमाते हुए खुद से बातें किये जा रहा था। ज़ाहिर था, वह कोई मानसिक रूप से विक्षिप्त पुराना रोगी था।

ऐसे में एक विचार मन में आकर कुलबुलाने लगा कि इस बन्दे का क्या किया जाना चाहिए। यदि विभिन्न पहलुओं पर गौर करें तो कुछ बातें सामने आती हैं :

१) कानून की दृष्टि से : 

कानूनन उसे उठाकर किसी अस्पताल में भर्ती किया जाना चाहिये जहाँ उसका उचित उपचार किया जा सके। तद्पश्चात उसे किसी अनाथालय या सेवा आश्रम में सहारा मिलना चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि ऐसा करेगा कौन। आजकल सब को भागमभाग रहती है। अपने काम ही नहीं संभाले जाते , फिर कोई किसी आवारा की ओर क्यों देखेगा। पुलिस को भी कहाँ फुर्सत है अपराधियों से जो दिल्ली की सड़कों पर एक ढूंढो तो सौ मिलते हैं।    

२) चिकित्सा की दृष्टि से :   

मरीज़ कितना भी गन्दा हो , किसी भी हालत में हो, भले ही शरीर में कीड़े पड़े हों , एक चिकित्सक के लिए वह एक रोगी ही है। उसकी पूरी चिकित्सीय देखभाल करना एक डॉक्टर का फ़र्ज़ है।
लेकिन ऐसे रोगी को डॉक्टर्स भी नहीं देखना चाहते। भर्ती कर भी लिया तो एक दो दिन में बेड खाली कराने का प्रयास रहता है। डॉक्टर्स भी क्या करें , सरकारी अस्पतालों में पहले ही एक बेड पर दो दो तीन तीन मरीज़ पड़े होते हैं। वे गंभीर रोगियों का इलाज़ करें या ऐसे रोगी पर ध्यान दें।      

३) मानवता की दृष्टि से : 

हर मनुष्य को जीने का अधिकार है। असहाय, बीमार और कष्ट भोगते हुए इन्सान के प्रति उदारता सभी मनुष्यों का फ़र्ज़ है और इंसानियत का तकाज़ा है।
लेकिन हमारे जैसे देश में जहाँ इन्सान थोक के भाव पैदा होते हैं , वहां भला एक ऐसे व्यक्ति की क्या कीमत होगी जो खुद किसी काम का नहीं।   

कुछ इसी तरह के विचार मन में विचरने लगे। यानि यदि आप इंसानियत और कानून का पालन करते हुए उसे किसी अस्पताल में भर्ती करा भी दें तो क्या होगा। कुछ दिन और यथासंभव उपचार के बाद उसे भगा दिया  
जायेगा या वह खुद ही भाग जायेगा। पुराने मानसिक रोगी को मानसिक रोगों के अस्पताल के अलावा और कहीं रखा भी नहीं जा सकता। शारीरिक रोगों का उपचार तो संभव है लेकिन मानसिक रूप से विक्षिप्त ऐसे रोगी को स्वस्थ करना अक्सर संभव नहीं होता।  

इन हालातों में ऐसे मनुष्य का जिन्दा रहना किस के लिए उपयोगी है ? देश के लिए, या समाज के लिए ? परिवार के लिए, या स्वयं के लिए ? वैसे तो ऐसे रोगी का न कोई परिवार होता है , न समाज।  ऐसे रोगी हकीकत की दुनिया से दूर एक अलग ही दुनिया में विचरते रहते हैं जिसका हकीकत की दुनिया से कोई वास्ता नहीं होता। फिर उसका जिन्दा रहने का क्या उद्देश्य है ?
वह न सिर्फ समाज पर बल्कि स्वयं पर भी एक बोझ है। ऐसी निरुद्देश्य जिंदगी का क्या फायदा ?

क्या ऐसे में कुछ अलग हटकर सोचा जा सकता है ? यही अहम सवाल है !