top hindi blogs
Showing posts with label चाय. Show all posts
Showing posts with label चाय. Show all posts

Sunday, February 11, 2018

पकौड़ों की महिमा ---


पकौड़ों में कितना है दम , अब तो ये जान लो ,
हिला कर रख देंगे सबको , अब तो ये मान लो।

चाय की चर्चा पर चाय ने कहा गर्म पकौड़ों से ,
अच्छे दिन ज़रूर आएंगे , अब तो ये मान लो।

जो कहते थे जायेंगे कभी उस बदनाम गली ,
वहीँ छुपे हैं नज़रें चुराकर, अब तो पहचान लो।

बारिश में याद आएंगे पकौड़े आज की शाम को ,
चाय संग ग़ज़ब जुगलबंदी है, अब तो ये मान लो।

होली दीवाली हो या जब कभी खुश घरवाली हो ,
उदर से दिल में उतर जायें , अब तो ये मान लो।

चायवाले हो तुम या फुटपाथ पर पकौड़े बेचने वाले ,
एक दिन राजा बन सकते हो, यदि मन में ठान लो।

ईमानदारी का धंधा कोई गन्दा नहीं होता कभी,
ये भी बस एक रोजगार है , अब तो ये मान लो।

पकौड़ों में इतना है दम , अब तो ये जान लो ,

पकौड़े नहीं किसी से कम , अब तो ये मान लो।  


Wednesday, June 19, 2013

बिन पकौडे बिन चाय, जीवन नहीं है, क्या करें आज बीबी जो घर पर नहीं है।


कई दिनों से लग रहा था कि कई महीनों से श्रीमती जी मायके क्यों नहीं जा रही। आखिर साल में दो चार दिन तो पतिदेव के भी होने ही चाहिए आज़ादी के। लेकिन अब समझ में आ रहा है कि महिलाओं की मायके जाने की टाइमिंग बड़ी ज़बर्ज़स्त होती है। उनका मायके जाने का अपना ही हिसाब होता है जो हम मर्दों को समझ नहीं आ सकता।

इस सप्ताहं जब पत्नि का प्रोग्राम बन ही गया तो अपनी तो बांछें खिल गई। सोचा एक अरसे बाद होम अलोन का आनंद आएगा। आया भी लेकिन दो दिन तक। उसके बाद घर में ही होम सिकनेस सी होने लगी। लेकिन हमने बड़ी बहादुरी के साथ पत्नि को विश्वास दिलाया था कि हम घर और खुद को भली भांति संभाल लेंगे। फिर भी श्रीमती जी ने ऑफर दिया था कि फ्रिज तो खाने के सामान से भरा पड़ा है , बस रोटियों की ज़रुरत पड़ेगी जो वो भिजवा सकती हैं। लेकिन यह तो हमारे पौरुष को चुनौती थी इसलिए हमने भी बड़ी शान से कहा कि अज़ी हमने अपनी तीन पीढ़ियों को खाना बनाकर खिलाया है। आखिर पूर्णतय: गृह कार्य में दक्ष होने का दम यूँ ही नहीं भरते हैं। फिर रोटियां बनाना कौन मुश्किल काम है।

फिर भी श्रीमती जी ने हिदायत देते हुए समझाया कि आटा गूंधने के लिए मिक्सी में कितना आटा डालना है और कितना पानी। अच्छी तरह से समझकर हमने उन्हें विश्वास दिलाया कि हमें कोई परेशानी नहीं होने वाली , वो बेफिक्र रहें। शाम को उनके बताये मार्ग पर चलते हुए जब हमने कार्यवाही आरंभ की तो कुछ देर चलने के बाद मिक्सी बेकाबू सी होने लगी। कभी तेज होती , कभी सुस्त। हमने सोचा , यह तो श्रीमती जी के सामने भी ऐसे ही व्यवहार करती थी , इसलिए थोड़ी देर में चुप हो जाएगी। लेकिन वो ऐसे चुप हुई कि फिर चलने का नाम ही नहीं लिया। खोलकर देखा तो आटा भी ऐसी हालत में था कि अच्छे से अच्छा कुक या शैफ़ भी उसे काबू में न कर पाए। अब तो हम भी समझ चुके थे कि आज तकनीक के आगे हमारी हार हुई है। क्योंकि हमने आटा गूंधने के लिए मिक्सी में गलत अटेचमेंट लगा दिया था जिससे न सिर्फ काम नहीं हुआ बल्कि मिक्सी की मोटर भी जल गई। 

अंतत: हमें अपने पुराने तरीके से ही काम चलाना पड़ा, आटा गूंधने के लिए। हालाँकि रोटियां बनाने में तो हमारा कोई ज़वाब नहीं लेकिन आधुनिकता के सामने पारम्परिकता की तो हार ही हुई। अब इंतजार है श्रीमती जी के आने का और यह बुरी खबर सुनाने का।

लेकिन रविवार को जब मौसम ने अंगडाई ली और जमकर बारिश होने लगी तब होम अलोन ने नया मोड़ लिया। घर की बालकनी में बैठ , गोद में लैप टॉप रख जो जम कर अकेले पिकनिक मनाई तो आनंद आ गया।आइये इस अवसर पर एक पैरोड़ी जो बनी , उसका मज़ा लेते हैं :


लगी आज बारिश की फिर वो झड़ी है ,
वही चाह पीने की फिर जल पड़ी है। 

बिन पकौडों के चाय स्वादिष्ट नहीं है,
क्या करें आज बीबी भी घर पे नहीं है।----


कभी ऐसे दिन थे के हाथों से अपने 
बना के पिलाई थी गर्म चाय तुमने। 
वहीं तो है डब्बा मगर नहीं पत्ती ,
कटोरी भी चीनी की खाली पड़ी है ! 


पता आज चला जब ढूँढा जो हमने 
कोई चीज़ घर में कहाँ पर पड़ी है।  

बिन पकौडों के चाय स्वादिष्ट नहीं है,
क्या करें आज बीबी भी घर पे नहीं है।-----



कोई काश आकर बना दे पकोड़े 
खा ले भले ही खुद भी वो थोड़े। 
मगर ये हैं  मुश्किल बड़ी हालातें,  
हम तड़पे यहाँ ये किसको पड़ी है। 


बिन घरवाली  मालिक  बना कामवाला 
आज बाई भी बारिश में फंस के खड़ी है।  


बिन पकौडे बिन चाय, जीवन नहीं है,
क्या करें आज बीबी जो घर पर नहीं है।


लगी आज बारिश की फिर वो झड़ी है ,
वही चाह पीने की फिर जल पड़ी है। -------


नोट : जैसे बिन बारिश के सावन नहीं , वैसे ही बिन बीबी के घर घर नहीं होता।             


Sunday, April 28, 2013

सबके बिगड़े काम बनाये ,एक कप चाय ---


सुबह उठते ही दो चीज़ें याद आती हैं , अखबार और चाय। दोनों एक दूसरे की पूरक भी हैं। एक न हो तो दूसरे में भी मन नहीं लगता। चाय का तो कोई विकल्प नहीं लेकिन यदि अख़बार न हो तो अब हम भी अन्य ब्लॉगर्स / फेसबुकियों की तरह कंप्यूटर खोल कर बैठ जाते हैं। आखिर सबसे ताज़ा ख़बरें तो यहीं मिल जाती हैं।

अक्सर फेसबुक खोलते ही अनूप शुक्ल जी की चाय पर 'कट्टा कानपुरी' कविता पढने को मिलती है। वहीँ से पता चलता है कि अनूप जी या तो चाय की चुस्कियां ले रहे होते हैं या इंतज़ार में कविता लिख रहे होते हैं। यह भी पता चलता है कि वह खुद कभी चाय नहीं बनाते बल्कि चाय बनाने वाले / वाली पर निर्भर रहकर चाय का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं।

लेकिन हम तो सुबह सबसे पहला काम ही यही करते हैं। श्रीमती जी का भी कहना है कि हम चाय बहुत अच्छी बनाते हैं। हालाँकि उनका तारीफ़ करने का मकसद हम भली भांति समझते हैं, लेकिन इस विषय में असहमति भी नहीं रखते। आखिर दुनिया में कोई और काम आये न आये , लेकिन कम से कम चाय बनाना तो आना ही चाहिए।

वैसे तो देशवासियों को चाय पीना अंग्रेजों ने सिखाया था लेकिन हम जो चाय पीते हैं उससे अंग्रेजों का कोई लेना देना नहीं है। देखा जाये तो हम चाय नहीं , चाय की खीर पीते हैं। वैसे तो चाय की अनेकों किस्में भारत में पैदा होती हैं और चाय बनाने के तरीके भी अनेक हैं। लेकिन पानी , दूध , चीनी और चाय की पत्ती से बनने वाली चाय का स्वाद हर घर में अलग होता है। इसका कारण है चाय बनाने का तरीका। आइये देखते हैं, चाय का स्वाद कैसे भिन्न भिन्न होता है :

पंजाबी लोगों की चाय में चीनी कम और दूध न के बराबर होता है जबकि पत्ती ज्यादा डालकर कड़क चाय बनाई जाती है। लेकिन हरियाणा के लोग शुद्ध दूध की चाय पीते हैं जिसमे चीनी भी दिल खोल कर डाली जाती है। अक्सर शहरी लोग या तो बिना चीनी की चाय पीते हैं या बहुत कम चीनी की। उधर ढाबों पर मिलने वाली चाय में आधा कप तो चीनी से ही भरा होता है। मजदूर लोग भी ऐसी ही चाय को पसंद करते हैं।

चाय में अलग अलग खुशबू तो चाय की किस्म पर निर्भर करती है लेकिन स्वाद बनाने पर। यदि चाय को सही तरीके से बनाया जाये तो यह न सिर्फ स्वादिष्ट होती है बल्कि फायदेमंद भी होती है। दूसरी ओर गलत तरीके से बनी चाय का स्वाद भी खराब होता है और नुकसानदायक भी हो सकती है। आइये देखते हैं क्या है चाय बनाने का सही तरीका :

तरीका बहुत आसान है इसलिए चाय बनाना सबके लिए संभव है। दो कप चाय बनाने के लिए सवा कप पानी और पौना कप ट्रिपल टोंड दूध ( डबल टोंड दूध जिसमे से मलाई निकाल ली गई हो ) चाहिए। यदि टोंड दूध हो तो आधा कप और फुल क्रीम दूध का चौथाई कप ही काफी रहेगा। पानी में चाय पत्ती डालकर उबलने तक गर्म कीजिये। उबाल आने पर १० -१५ सेकण्ड तक उबालिए। यदि तेज चाय चाहिए तो १५ सेकण्ड वर्ना १०- १२ सेकण्ड ही काफी है।  अब इसमें चौथाई चम्मच चीनी और दूध डालकर गर्म कीजिये। जब उबाल आने लगे तो चाय के बर्तन को उठाकर आंच पर हिलाते हुए उबालिए। धीरे धीरे चाय का रंग निखरता आएगा। लीजिये तैयार हो गई गर्मागर्म चाय।   

चाय के गुण और उपयोग :  

* चाय में मौजूद केफीन नर्वस सिस्टम पर प्रभाव डालकर उत्तेजित करती है। इसलिए ताजगी और स्फूर्ति प्रदान करती है।
* एंटीऑक्सिडेंट कई तरह के केंसर से बचाव करते हैं।
* सुबह की चाय उठते ही सुस्ती को दूर कर स्फूर्ति लाती है। हालाँकि बेड टी का प्रचलन अंग्रेजों ने शुरू किया होगा, लेकिन बिना कुल्ला किये चाय पीना अच्छी आदत नहीं।
* दिन भर में ५ -६ चाय पीना सामान्य है और काम में ध्यान लगाने के लिए सहायक सिद्ध होती है।
* चाय पीने से तनाव से मुक्ति मिलती है। इसलिए काम में उत्पादकता बढती है।
* चाय सभी पारिवारिक , सामाजिक, धार्मिक  और औपचारिक कार्यक्रमों में आवभगत का बढ़िया माध्यम है।
* अविवाहित लोगों के लिए चाय का बुलावा एक वरदान साबित होता है।
* विवाह प्रस्ताव में वर पक्ष को लड़की दिखाने के लिए जब घर पर बुलाया जाता है तो लड़की चाय लेकर ही सामने आती है।  
* दुनिया में पानी के बाद चाय ही ऐसा पेय है जो सबसे ज्यादा पिया जाता है। शायद लोगों को चाय पानी की आदत सी पड़ गई है। इसीलिए आजकल कहीं भी जाइये , बिना चाय पानी के कोई काम ही नहीं होता।  

अंत में : चाय पीजिये , खूब पीजिये , पिलाइये , खूब पिलाइये --  लेकिन खुद भी बनाइये। 

       

Thursday, June 17, 2010

चाय बिन मांगे , पानी मांगे से हम पिलाने लगे ---एक ग़ज़ल

कहते हैं -- अतिथि देवो भव: । हमारे देश में अतिथि का आदर सत्कार करना परम कर्तव्य माना जाता हैलेकिन ऐसा लगता है कि बदलते ज़माने के साथ यह सोच भी बदल रही हैं

बोर्ड रूम में मीटिंग चल रही थीअस्पताल की गर्म समस्याओं पर गर्मागर्म बहस चल ही थी बाहर भी गर्मी , अन्दर भी गर्मी झलक रही थी सी भी प्रभावी नहीं हो रहा थाऐसे में किसी ने पानी माँगाहमने अटेंडेंट को पानी लाने के लिए कहाथोड़ी देर बाद वह आदत से मजबूर , यंत्रवत सा चाय की ट्रे लिए गयाहमने उसे फिर पानी के लिए कहा और महमान को ये पंक्तियाँ लिखकर थमा दी , ताकि उनकी पिपाषा कुछ देर शांत रह सके :

किल्लत ये पानी की है या सोच की ,
मेहमान को चाय बिन मांगे
और पानी मांगने पर ही हम पिलाने लगे

बस इसी से जन्मी यह ग़ज़ल सी रचना
तकनीकि बारीकियों में जाकर , भावार्थ पर ध्यान देकर पढेंगे तो अवश्य आनन्द आएगा


चित्र साभार हिंदुस्तान टाइम्स के सौजन्य से


महमाँ जो घर में मंडराने लगे
घर जाने से हम घबराने लगे

पानी की यूँ किल्लत होने लगी
मांगे पर ही पानी लाने लगे ।

खाने को जब कुछ और नहीं मिला
माटी के लड्डू वो खाने लगे ।

खुद की आईने में जो छवि दिखी
अपने साये से कतराने लगे ।

ज़ालिम पर जब कोई जोर चला
दे गाली दिल को बहलाने लगे

मुर्दों की बस्ती में 'तारीफ' क्यों
गूंगे बहरों को समझाने लगे


नोट : खाना पानी एक सीमित साधन हैयदि अभी से सचेत नहीं हुए तो एक दिन इन्ही की वज़ह से चित होना पड़ेगा


Wednesday, February 24, 2010

क्या आप चाय के रूप में ज़हर पी रहे हैं ?

क्या आप चाय पीते हैं ? --ज़रूर पीते होंगे ।
क्या आप ट्रेन में सफ़र करते हैं ? --कभी कभी तो करते ही होंगे ।
क्या आप ट्रेन में सफ़र करते हुए , प्लेटफार्म की चाय पीते हैं ? --सम्भावना हैं ज़रूर पीते होंगे ।

बेहतर है --मत पीजिये । क्योंकि पता नहीं चाय के रूप में आप ज़हर पी रहे हों।
यह मैं नहीं , टी वी वाले कह रहे हैं।

कल टी वी पर न्यूज देखते हुए एक न्यूज आइटम देखने को मिला जिसमे एक लड़के को नकली दूध से चाय बनाते हुए दिखाया गया था ।
सच मानिये , ये नज़ारा देखकर आपके पैरों तले से ज़मीन खिसक जाएगी।

मूंह पर कपडा बांधकर मूंह छुपाकर चाय वाला दिखा रहा था नकली चाय बनाना।

मात्र ८ रूपये में मिलने वाली एक सफ़ेद पेंट की डिबिया --- इस पेंट को २० लीटर पानी में घोला --इसे पतीले में डाल स्टोव पर चढ़ा दिया ---उबाल आने पर चीनी और ढेर सारी इलाइची डाली --और बन गई खुशबूदार चाय।

अब --चाय --बढ़िया चाय --चाय लेलो --सुनकर आपको लगेगा की एक रुपया सस्ती इतने दूध वाली खुशबूदार चाय पीकर मज़ा आ जायेगा।

लेकिन सोचिये इस चाय को पीकर आपको क्या हानि हो सकती है।

तो भई , अब अगली बार आप ट्रेन में सफ़र करें तो सावधान ! प्लेटफार्म की खुली चाय न ही पीयें तो अच्छा है।

डिस्क्लेमर : यह रिपोर्ट टी वी न्यूज देख कर लिखी गई है । इसकी सत्यता और सार्थकता के बारे में हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है।
वैसे यह समझ में नहीं आया की चाय वाला टी वी कैमरे के सामने नकली चाय बनाने के लिए तैयार कैसे हो गया !
अब यह सच्चाई तो टी वी चैनल्स में काम करने वाले ही बता सकते हैं।