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Wednesday, July 9, 2014

मनुष्य अपने मित्रों से जाना पहचाना जाता है ---


जो ख़ुशी में इतराये ना ,
ग़म से कभी घबराये ना !
ऐसे शख्स का संग भी ,
सत्संग जैसा होता है !

जो ख़ुशी में बुलाये ना ,
ग़म में साथ निभाए ना !
ऐसे शख्स का याराना ,
नादानों जैसा होता है !


जो दिल की बात बताये ना,
दिल की लगी को भुलाये ना !
ऐसे शख्स से दिल लगाना ,
आत्मघात जैसा होता है !




Wednesday, September 19, 2012

And they lived happily ever after -- यह कथन सुखांत कहानियों में ही देखने को मिलता है --


मनुष्य का बचपन जिंदगी से अन्जान होता है . युवावस्था नादान होती है . दोनों ही अवस्थाओं में मनुष्य दुखों की अनुभूति नहीं कर पाता . लेकिन एक उम्र के बाद जिंदगी के असली रूप सामने आने लगते हैं . वास्तव में , शादी के एक दो साल बाद ही चिंता और तनाव का दौर शुरू हो जाता है . किसी को जल्दी बच्चा होने का टेंशन , किसी को न होने का . यदि हो जाये तो दो साल बाद ही स्कूल में एडमिशन का टेंशन . पहले एक का , फिर दूसरे का . और इसी तरह बच्चों को पालते पालते, स्कूल से कॉलेज आने तक का सफ़र कब कट जाता है , पता ही नहीं चलता . आजकल कॉलेज में एडमिशन भी अक्सर शहर से बाहर ही होता है और नौकरी तो निश्चित ही किसी दूसरे शहर में ही मिलती है . यानि बच्चों के बड़े होते ही आप रह गए अकेले .

कुल मिलाकर यही लगता है -- आधुनिक मानव तभी तक सुख का आनंद ले पाता है जब तक बच्चे छोटे होते हैं . फिर एक ऐसा दौर भी आता है जब परिवार और निकट सम्बन्धियों में आने का कम और जाने का सिलसिला ज्यादा होने लगता है . हमारे देश में जहाँ अभी भी पारिवारिक सम्बन्ध बने हुए हैं , लोग एक दूसरे से जुड़े हैं -- वहां किसी भी परिवार में कोई संकट आने पर सभी का प्रभावित होना स्वाभाविक है . विशेषकर किसी की मृत्यु होने पर १३ दिन का शोक आपकी सारी सामान्य दैनिक प्रक्रिया को अस्त व्यस्त कर देता है . यदि आप ५० को पार कर गए हैं तो निश्चित ही यह अवसर अनचाहे ही यदा कदा आता ही रहता है और आप कुछ नहीं कर सकते .

अक्सर लोगों को यह कहते सुना है - अमुक काम हो जाए तो गंगा नहा आऊँ . यानि हम सोचते हैं , एक विशेष अवस्था के बाद सुख चैन की जिंदगी बिता पाएंगे . लेकिन यह एक भ्रम ही होता हैं . सच तो यह है -- इन्सान की जिंदगी में ऐसा कोई मोड़ या पड़ाव हो ही नहीं सकता जिसके बाद आपका हमेशा सुखी रहना अवश्यम्भावी हो . इसलिए यह कथन --- and they lived happily ever after --- मात्र कहानियों में ही फिट बैठ सकता है .

इसीलिए इस सन्दर्भ में यह कहना कदाचित अनुचित नहीं होगा -- जो आज है , वही सर्वोपरि है . वर्तमान के हर पल का जी भर कर आनंद लेना चाहिए . क्योंकि कल कभी नहीं आता . और कोई नहीं जानता , कल क्या होने वाला है . यदि खुशियों को कल पर छोड़ा तो शायद यह अवसर कभी हाथ न आए .

Saturday, June 4, 2011

आदमी को कुत्ता कमीना कहना यानि कुत्ते को गाली देना --क्या सही है ?

अपने पसंदीदा फ़िल्मी हीरो धर्मेन्द्र की फिल्मों में अक्सर एक डायलोग सुनने को मिलता है --कुत्ते कमीने मैं तेरा खून पी जाऊँगा ।


टोरंटो कनाडा के एक बड़े मॉल में घूमते हुए अचानक एक स्टाल पर नज़र पड़ी । लिखा था --डॉग्स मीट । हम हैरान हो गए यह सोचकर कि यहाँ भी लोग कुत्तों का मीट खाते हैं । यह आदत तो पूर्वी एसिया के लोगों में पाई जाती है । फिर पता चला कि वह कुत्ते का मीट नहीं बल्कि कुत्तों के खाने के लिए मीट था जो बेचने के लिए रखा था ।

कहते हैं कुत्ता मनुष्य का सबसे सच्चा दोस्त होता है वह वफ़ादार भी होता है कुत्ता शायद सबसे पहला जानवर है जो मनुष्य के साथ घरेलु बना आज कुत्तों के बिना बहुत से घरों में सूनापन सा हो जायेगा बहुत से लोग कुत्तों से प्यार भी बहुत करते हैं

दरअसल कुत्तों में गुण ही ऐसे हैं कि मनुष्य भी उनके सामने काफ़िर सा नज़र आने लगता है । लेकिन हम मनुष्य हैं कि कुत्तों से कुछ भी नहीं सीखते ।

आइये देखते हैं कुत्ते और मनुष्य में समानता और विभिन्नताएं :

जनसँख्या में आदमी और कुत्तों में बस एक समानता है

दोनों में मादाएं कम , और नरों की संख्या ज्यादा है



लेकिन आदमी और कुत्ते में एक अंतर है बहुत भारी

और वो है कुत्ते की मालिक के प्रति वफ़ादारी ।


कुत्ता अपने मालिक के लिए जान भी दे देता है

आदमी जिस थाली में खाता है , उसी में छेद कर देता है ।


कुत्ता गली में कभी दुसरे कुत्ते को नहीं काटता

आदमी है कि रोड रेज़ में सीधा गोली मारता ।


कुत्ता नींद में भी जागता है , भरोसेमंद है

आदमी नशे में ही भागता है , भरोसा बंद है ।


रोटी के इक टुकड़े से कुत्ते को मिलता संतोष

पैसे के पीछे आदमी अक्सर खो देता है होश ।


एक बार एक आदमी और कुत्ते में बहस हो गई कहीं

कुत्ता बोला कभी मैं भी इंसान था , मगर तेरी तरह कुत्ता नहीं ।


मैं भी सोचता हूँ कि काश कितना अच्छा होता

यदि आदमी आदमी न होकर एक कुत्ता होता ।


तब न होती काम , क्रोध , मद , लोभ की बीमारी

और आदमी भी होता कुत्ते की तरह सदाचारी ।


नोट : अब ज़रा आप ही बताएं कि आदमी को कुत्ता कमीना कहकर गाली देना क्या सही है।

साथ ही कोशिश करें और चित्र में दिखाए कुत्ते की नस्ल बताने का प्रयास करें ।




Saturday, May 21, 2011

सबसे उन्नत सामाजिक प्राणी का समाज बिखर सा गया है--




बचपन
में शेर की कहानियां सुनने का बड़ा शौक था जब भी ताउजी फ़ौज से छुट्टी आते, मेरी एक ही जिद होती , शेर की कहानी सुनने की

आज बरसों बाद जब अपने पसंदीदा टी वी चैनल डिस्कवरी पर जंगलों में विचरते शेर , बाघ , चीते आदि देखता हूँ , तो बहुत रोमांचित हो उठता हूँ

मन ही मन धन्यवाद भी करता हूँ उस वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर का जो महीनों या साल भर जंगल में रहकर जंगली जानवरों के व्यवहार का अध्ययन करता है और उनकी जीवनी पर फिल्म बनाता है, जिसे हम अपने ड्राइंग रूम के आराम में बैठकर एक घंटे में देख कर प्रफुल्लित होते हैं

इन फिल्मों को देखकर मुझे अक्सर वह कहावत याद जाती है--मैन इज सोशल एनीमल ( मनुष्य एक सामाजिक जानवर है )

सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि क्या मनुष्य को जानवर कहना उचित है

आइये देखते हैं जंगली जानवरों और मनुष्य के व्यवहार में समानताएं और भिन्नताएं

) हाथी : जंगल का सबसे बड़ा जानवर :

हाथी प्राय: झुण्ड में रहते हैं एक झुण्ड में बीसियों हाथी --नर और मादाएं तथा बच्चे --सब मिलकर रहते हैं सभी हाथी मिलकर झुण्ड के बच्चों की रखवाली करते हैं


फोटो नेट से

लेकिन सबसे भारी और शक्तिशाली होने के बावजूद हाथी कभी कभी शेरों के शिकार बन जाते हैं

कभी कोई हाथी उदंडता से व्यवहार करने लगे तो उसे झुण्ड से निकाल दिया जाता है झुण्ड से निकला अकेला हाथी पागल जैसा हो जाता है जो बड़ा उत्पाद मचाता है और मनुष्यों को हानि पहुंचा सकता है


) जंगली भैंसे --दूसरे भारी जानवर :

भैंसे सैंकड़ों और हजारों की संख्या में झुण्ड बना कर रहते हैं बड़े और शक्तिशाली नर भैंसे झुण्ड के रक्षक होते हैं और मिलकर दुश्मन का मुकाबला करते हैं बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा मादा पर होता है लेकिन समय पर सब एक होकर खड़े हो जाते हैं

ये भी कभी कभी मांसाहारियों के शिकार बन जाते हैं , विशेषकर बीमार , बूढ़े या झुण्ड से अलग हुए बच्चे

) शेर --जंगल का राजा :

ये भी समूह बनाकर रहते हैं लेकिन शेरों के झुण्ड में सभी मादाएं होती हैं , साथ में बच्चे नर एक ही होता है जो झुण्ड का सरदार होता है यह बबर शेर शानदार , शक्तिशाली और सर्व शक्तिमान होता है इसका काम केवल मादाओं को गर्भवती करना होता है इसका समूह की सभी शेरनियों पर आधिपत्य होता है कोई दूसरा शेर समूह पर तभी कब्ज़ा कर सकता है जब सरदार बूढा हो जाए और उसमे लड़ कर जीतने की क्षमता रहे

शेरों के समूह में शिकार का काम अक्सर मादाएं ही करती हैं जो मिलकर शिकार करती हैं लेकिन शिकार मिलने के बाद खाने का हक़ पहले सरदार को ही होता है उसके बाद ही बाकि खा सकते हैं

शेरों का नया सरदार आते ही पहले समूह के बच्चों को मार देता है जिससे कि वह शेरनियों से अपनी स्वयं की संतान पैदा कर सके

) बिग कैट्स --बाघ , चीता , तेंदुआ :

इनके व्यवहार में अंतर होता है इनमे नर मादा के पास अक्सर प्रजनन के समय ही आता है और गर्भवती होने के बाद छोड़कर चला जाता है इसके बाद बच्चे पैदा होने से लेकर उनका पालन पोषण और सुरक्षा की जिम्मेदारी मादा की ही रह जाती है

इनके बच्चों को सिर्फ दूसरे परभक्षियों बल्कि अपनी प्रजाति के दूसरे नरों से भी खतरा होता है

मादा बच्चों को खाना खिलाती है , उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखती है और तब तक उनकी देखभाल करती है जब तक वे खुद शिकार करना नहीं सीख जाते यह काम भी मादा ही करती है

बड़े होने पर एक दिन ये बच्चे मां को छोड़ स्वतंत्र रूप से अपनी जिंदगी बसर करने निकल पड़ते हैं


) भेड़िये , जंगली कुत्ते और अन्य मांसाहारी तथा हिरन , जेबरा और अन्य शाकाहारी जानवर --ये सब भी प्राय बड़े समूहों में रहते हैं , मिलकर साथ चलते हैं और अपने झुण्ड से अलग नहीं होते

इन सब जानवरों में एक समानता है --सदियों से इनका व्यवहार एक जैसा ही है जो जैसा है , वो वैसा ही है समय के साथ इनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है

अब देखते हैं मानविक व्यवहार :

पृथ्वी पर मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है जो सर्वाधिक विकसित और उन्नत है अपने दिमाग का प्रयोग करते हुए उसने अपने लिए सुख के सभी संसाधन जुटा लिए हैं

बेशक मनुष्य विकास की कड़ी में जानवरों से ही विकसित हुआ है लेकिन अब वह एक पूर्ण रूप से सामाजिक प्राणी बन चुका है

मनुष्य का परिवार होता है , खानदान होता है , जाति , धर्म और देश भी होता है
मनुष्य भी अपने बच्चों का लालन पालन करने में व्यस्त रहता है स्त्री पुरुष दोनों मिलकर घर चलाते हैं

सदियों से मनुष्य भी हाथी , भैंसे और अन्य शाकाहारी जानवरों की तरह रहता आया है संयुक्त परिवार में रहते हुए समाज के नियमों का पालन करता आया है बच्चों को संरक्षण और बड़ों को सम्मान मिलता आया है

लेकिन इक्कीसवीं सदी का मनुष्य बदल रहा है अब वह बिग किट्स की तरह व्यवहार करने लगा है

लिव इन रिलेशनशिप रखने लगा है

छोटी छोटी बात पर तलाक लेने लगा है

बिन ब्याही किशोरी मां और बच्चे को पालती एकल मां को देखकर कैसा लगता है ?

अब बड़े होते ही बच्चे भी अपने रास्ते पर निकल जाते हैं

वृद्ध मात पिता की हालत उस शेर जैसी होती है जिसकी शक्ति क्षीण होने से उसका दबदबा ख़त्म हो जाता है

परिवार टूट जाते हैं संयुक्त परिवार देखने को नहीं मिलते

शहर में लाखों लोग रहते हुए भी लोग अकेले होते हैं

इन्सान अब बदल गया है

सबसे उन्नत सामाजिक प्राणी का समाज बिखर सा गया है

क्या यही है विकास का इनाम ?

क्या हम शाकाहारी जानवरों से ही कुछ सीख पाएंगे ?