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Thursday, September 12, 2013

काश किसी गुरु की कृपा हम पर भी होती ---


टी वी पर बाबाओं की धूम देख कर समझ नहीं आता कि हालात पर हसें या रोयें ! फिर सोचा चलो कविता ही रची जाये :


ज़वानों की  जुबानी सुनी, लाख तरकीबें अपनाई,
पर ज़वानी जो गई एक बार, फिर लौट कर ना आई !

दिल में थी आरजू कि लहराएँ अपनी भी जुल्फें,
हेयर कटिंग भी हमने तो हबीब के सैलून से कराई !

बालों को रंगाया कभी रोगन कभी मेहंदी से,
पर अब तो सर पर बाल ही कितने बचे हैं भाई !

गालों पर कराया फेसियल शहनाज़ का ,
लेकिन झुर्रियों में ज़रा सी कमी तक ना आई !

चेहरे पर लगाया वैदिक एंटी सन लोशन ,
काम बाबा रामदेव की ज़वानी क्रीम भी ना आई !

हसीनों संग करते थे कनअंखियों से आँख मिचोली ,
अब मोतिया बिंद से ही बंद है इन आँखों की बिनाई !

आसां नहीं है दुनिया में आसाराम बन जाना ,
हाथ मलते रह जाओगे ग़र गुरु कृपा ही ना आई !

खामख्वाह दम भरते हैं ज़वानी का ' तारीफ ' ,
साँस रुक जाती है जब लट्ठ लेकर सामने आती है ताई !

नोट : कृपया इसे शुद्ध हास्य के रूप में ही पढ़ें। अर्थ का अनर्थ निकालकर आत्मविश्वास न खोएं।  


Sunday, September 8, 2013

सच्चा मन का मीत --- एक वृद्धावस्था प्रेम वार्तालाप ....


कई साल पहले की बात है। बैठे बैठे यूँ ही विचार आया कि जब पति पत्नी ७० साल पार कर जाते हैं , तब उनका प्रेम वार्तालाप कैसा होता होगा ! कल्पना शक्ति का सहारा लेकर कुछ यूँ ख्याल आए :
  
  १ ) पति :

प्रिये याद करो वो दिन,
जब तुम्हारी एक हंसी पर, हम हुए थे फ़िदा ।
अब बदल गया वो मंज़र ,
अब ना मूंह में दांत रहे, ना वो हसीं अदा 

जिन आँखों में झलकते थे मोती,
अब मोतिया देता है दिखाई 

सुन लेती थी तुम दिल की धड़कन भी दूर से
अब कानों में मशीन लगी पर, आवाज़ भी  दे सुनाई 

काली लहराती सावन की घटा सी थी तुम्हारी जुल्फें
अब खोला करों  इनको , रामसे फिल्म्स की नायिका देती हो दिखाई 


२ ) पत्नी :  ( एक के बदले तीन ) :


कभी रात रात भर करते थे मीठी बातें,
अब बात बात पर करते हो लड़ाई 

दिखाते थे नाईट शो में जेम्स बांड की फ़िल्में 
अब चुपके से अकेले में देखते हो जलेबी बाई  

रोज सुबह शाम लगाते थे जिसके चक्कर
अब उस गली का नाम तक याद नहीं 

उड़ाते थे गुलाब जामुन , ज़लेबी कभी हलवा
अब करेले के सिवाय कुछ सवाद नहीं 

कभी शेरों के शिकार की सुनाते थे दास्ताँ
अब सत्यम के शेयरों में सब गँवा कर बैठे हो 

दावा करते थे खाने का सीने पे गोलियां
मियां अब गोलियां खाकर ही जीते हो 

जिन सांसों में समाई थी यौवन की खुशबु
अब गार्लिक पर्ल्स की गंध आती है 

और ये साँस भी मुई अब तो 
बिना इन्हेलर के कहाँ आती है ।

कभी दिल की नस नस में बसे थे हम
सुना है अब वहां स्टेंट निवास करते हैं.

फिर भी सनम हर हाल में हम तो
बस तुम्ही पर विश्वास रखते हैं.  

३ ) 

जीवन के सब उपवन , जब मुरझा जाते हैं
तब पति पत्नी ही बस , इक दूजे संग रह जाते है 

यौवन की तपन हो या , वृधावस्था की शीत 
हर पल साथ निभाए जा , सच्चा मन का मीत 

   

Wednesday, September 4, 2013

विवाहित पुरुष को पत्निव्रत होना और सन्यासी को पूर्ण रूप से स्त्री से दूर रहने को ब्रह्मचर्य कहा जाता है ----


मनुष्य समेत सभी जीवों के जीवन में दो ही ऐसी मूल आवश्यकताएं हैं जिन पर जीवन पूर्णतया आश्रित रहता है. एक भोजन और दूसरा यौन क्रिया ( सेक्स । जहाँ भोजन मनुष्य को जीवित रखता है और उसे जीवित रहने के लिए समर्थ बनाता है , वहीँ यौन क्रिया जीवन का स्रोत है और पृथ्वी पर विभिन्न प्रजातियों की नस्ल को बनाये रखता है. लेकिन यौन क्रिया एक ऐसा विषय है जिस पर हमारे समाज में खुल कर बात करने में अभी भी संकोच होता है. इसका एक कारण तो यह है कि यह विषय एक पूर्ण रूप से व्यक्तिगत मामला समझा जाता है. हालाँकि जब इसका दुरूपयोग होता है तब यह व्यक्तिगत मामला एक सार्वजानिक विषय बन जाता है जिसके परिणाम भी भयंकर होते हैं. इसलिए आज इस बात की अत्यंत आवश्यकता है कि आज की युवा पीढ़ी को यौन शिक्षा प्रदान की जाये।

बच्चों के शारीरिक विकास में यौन विकास सबसे महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील दौर होता है. इस आयु अवस्था में न सिर्फ बच्चे के शरीर में परिवर्तन दिखाई देते हैं बल्कि उसकी सोच और आचरण में भी बदलाव नज़र आता है. इसका कारण है शरीर में सेक्स हॉर्मोन्स का बढ़ना। लड़कों में टेस्टोस्टिरोंन और लड़कियों में इस्ट्रोजन हॉर्मोन्स को सेक्स हॉर्मोन कहा जाता है.

टेस्टोस्टिरोंन : यह मेल सेक्स हॉर्मोन है जिससे शरीर में यौन अंगों का विकास होता है जिन्हें सेकंडरी सेक्स केरेक्टर्स कहते हैं. यही ज़वानी के लक्षण भी कहे जा सकते हैं. यही वह हॉर्मोन है जिससे यौन इच्छा ( लिबिडो ) बनी रहती है और यौन क्षमता ( पोटेंसी ) भी. हालाँकि रक्त में इसका स्तर एक आयु के बाद कम होने लगता है , लेकिन अक्सर लम्बी आयु के बाद भी शरीर में टेस्टोस्टिरोंन पर्याप्त मात्रा में रहता है जिससे वृधावस्था में भी पोटेंसी बनी रहती है.

स्वप्नदोष : युवावस्था में इस हॉर्मोन की मात्रा अधिक होने से लिबिडो और पोटेंसी दोनों चरम सीमा पर होते हैं. यह सत्य युवाओं के लिए समस्या भी बन जाता है. युवावस्था आने पर वीर्य का निर्माण भी होने लगता है जो एक निरंतर प्रक्रिया है. शरीर के यौन अंगों में वीर्य को संग्रह करने की क्षमता सीमित होती है. इसलिए समय समय पर वीर्य स्खलन आवश्यक होता है. विवाह पूर्व ऐसा संभव नहीं हो पाता। इसलिए एक अवधि के बाद वीर्य स्खलन स्वत: ही सोते समय हो जाता है , जिसे स्वप्नदोष कहते हैं. अक्सर यह युवाओं के लिए बड़ा चिंता और शर्म का विषय बन सकता है. इसलिए यह जानना आवश्यक है कि स्वप्नदोष कोई रोग नहीं होता बल्कि एक स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है जिससे कोई हानि नहीं होती और जो विवाहोपरांत स्वयं समाप्त हो जाती हैं।

हस्त मैथुन : यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे इच्छानुसार वीर्य स्खलन कर कामोत्तेजना से क्षणिक राहत पाई जा सकती है. यह विशेषकर विवाह पूर्व या किसी भी कारणवश अकेले रहने पर विवश व्यस्क व्यक्ति के लिए एक आसान और हानिरहित तरीका है. युवावस्था में लगभग सभी लोग हस्त मैथुन करते हैं , यह एक सत्य है. लेकिन युवावस्था में अक्सर आत्मग्लानि होती है जिससे कई मानसिक विकार पैदा हो सकते हैं जिनका नाज़ायज़ फायदा तथाकथित सेक्सोलॉजिस्ट उठाते हैं और जो युवाओं को गुमराह कर पैसा बनाते हैं. सच तो यह है कि यह भी एक स्वाभाविक और हानिरहित प्रक्रिया है. हालाँकि कभी कभी यह एक लत का रूप धारण कर सकती है जिससे पढाई या काम में ध्यान भंग हो सकता है. आखिर , अति हर बात की ख़राब होती है.

लिबिडो ( यौन इच्छा ) और यौन क्षमता ( पोटेंसी ) :  

जब तक हॉर्मोन की कमी नहीं होती , जो कि बहुत कम ही होती है , तब तक ये दोनों गुण विद्धमान रहते हैं. हालाँकि , लिबिडो और / या पोटेंसी कम होने के कारण विभिन्न और भिन्न हो सकते हैं. ऐसा भी हो सकता है कि इच्छा है पर क्षमता नहीं और यह भी संभव है कि क्षमता तो है पर इच्छा नहीं। यह बहुत सी स्थितियों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है. कुल मिलाकर यही कह सकते हैं कि सेक्स एक पूर्ण रूप से व्यक्तिगत विषय है और प्रत्येक मनुष्य की यौन इच्छा और यौन क्षमता भिन्न होती है. इसका सामान्यीकरण करना सही नहीं कहा जा सकता।

ब्रह्मचर्य : पहले कहा जाता था कि २५ वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। यहाँ यह समझा जाता था कि ब्रह्मचर्य का अर्थ है , वीर्य स्खलन न होने देना। वीर्य को एक दुर्लभ स्वास्थ्य खज़ाना माना जाता था. लेकिन यह न सच है , न संभव। इस भ्रांति को दूर करते हुए यह मानना चाहिए कि प्रत्येक काम का एक समय होता है और उचित समय पर ही किया गया काम लाभदायक होता है. ब्रह्मचर्य की वास्तविक परिभाषा गीता में दी गई है जिसके अनुसार -- विवाहित पुरुष को पत्निव्रत होना और सन्यासी को पूर्ण रूप से स्त्री से दूर रहने को ब्रह्मचर्य कहा गया है. हालाँकि पहली स्थिति में तो यह संभव है लेकिन दूसरी स्थिति में ब्रह्मचर्य का पालन करना इस मृत्यु लोक में संभव नहीं लगता। यह वर्तमान में हो रही साधु बाबाओं द्वारा बलात्कार की घटनाओं को देखकर साफ ज़ाहिर होता है.

यौन इच्छा एक ऐसी प्रक्रिया है जिस पर  काबू पाना न सिर्फ आसान नहीं होता बल्कि इसे अनुचित रूप से दबाने से मानसिक विकार पैदा होते हैं. इसीलिए ओशो रजनीश द्वारा सुनाये गए प्रवचन तर्क संगत लगते हैं. यौन इच्छा की आपूर्ति स्वाभाविक रूप से होती रहनी चाहिए। लेकिन विपरीत परिस्थितियों में इच्छाओं पर काबु पाना भी आवश्यक है वर्ना इन्सान और हैवान में कोई अंतर नहीं रह जायेगा।   
   

Saturday, August 31, 2013

आने वाले स्वस्थ कल के लिए आज को सुधारना आवश्यक है --


पिछली पोस्ट में हमने देखा कि बुजुर्गों का हमारे जीवन में कितना महत्त्व है. इस आयु वर्ग के लोगों की निरंतर बढती संख्या को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि हम उनकी समस्याओं पर ध्यान देते हुए उनका निवारण करने का प्रयास करें। कई प्रवासी भारतीय मित्रों की टिप्पणी से ज्ञात होता है कि विकसित देशों में बुजुर्गों की देखभाल के लिए अधिकारिक तौर पर प्रबंध किये जाते हैं जिनमे न सिर्फ आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाती है बल्कि रहने , खाने पीने और मनोरंजन का भी ख्याल रखा जाता है.

लेकिन हमारे देश में इस तरह की सुविधाएँ या तो न के बराबर हैं , या उनका सही उपयोग नहीं हो पाता। ऐसे में परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. शहरीकरण के साथ और आधुनिक जीवन शैली से बिखरते परिवारों में यह और भी मुश्किल हो जाता है. इसलिए बुजुर्गों का आत्मनिर्भर होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है. आत्मनिर्भरता में सबसे ज्यादा आवश्यक है , स्वस्थ रहना क्योंकि कहते हैं कि जान है तो जहान है.

स्वास्थ्य : सिर्फ रोगमुक्त होना ही स्वास्थ्य की निशानी नहीं है. आधुनिक परिभाषा अनुसार स्वास्थ्य -- शारीरिक , मानसिक , सामाजिक , आध्यात्मिक और आर्थिक सम्पन्नता का होना है. बुजुर्गों में विशेषकर ये सभी कारक बहुत महत्त्व रखते हैं क्योंकि इस उम्र में प्राकृतिक रूप से इन सभी शक्तियों का ह्रास होने लगता है. बढती उम्र के साथ स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं मुख्य रूप से इस प्रकार हैं :

* शारीरिक :  ब्लड प्रेशर , डायबिटिज , हृदय रोग , घुटनों में दर्द ,नेत्र ज्योति का कम होना , मोतिया बिन्द , श्रवण शक्ति कम होना , प्रोस्टेट का बढ़ना और आम कमज़ोरी।

* मानसिक : इस उम्र में अकेलापन बहुत तंग करता है. अवसाद , स्मरण शक्ति कम होना और चिडचिडापन आम होता है. एलजाइमर्स डिसिज एक लाइलाज बीमारी है.

* सामाजिक : अकेलापन विशेषकर यदि पति या पत्नी में से एक न रहे. घरों में भी बच्चों और बड़ों को बुजुर्ग लोग एक बोझ सा लग सकते हैं. संयुक्त परिवार में संतुलन बनाये रखना दुर्लभ सा हो जाता है .

* आध्यात्मिक : इस रूप में कुछ इज़ाफा होता है. अक्सर लोग इस उम्र में आकर अत्यधिक धर्म कर्म में विश्वास रखने लगते हैं. हालाँकि इसमें कोई बुराई नहीं बल्कि यह उम्र अनुसार यथोचित ही लगता है.

* आर्थिक : अक्सर सेवा निवृत लोगों को आर्थिक रूप से बच्चों पर निर्भर होना पड़ सकता है यदि उन्होंने स्वयं अपने लिए उचित धन राशी का प्रबंध न कर रखा हो. यहाँ अभी भी प्रशासनिक आर्थिक सहायता का आभाव है.

बुजुर्गी की ओर बढ़ना एक स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है. लेकिन इससे जुड़ी शारीरिक समस्याएँ बहुत पहले ही शुरू हो जाती हैं. इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि हम अपने स्वास्थ्य का ध्यान आरम्भ से ही रखें। यदि ज़वानी में सही रहे तो बुढ़ापे में भी सही रहने की सम्भावना बढ़ जाती है. आरामदायक जिंदगी की ही देन है -- मेटाबोलिक सिंड्रोम एक्स।

मेटाबोलिक सिंड्रोम एक्स :

यह शहरीकरण और सम्पन्नता का स्वास्थ्य प्रसाद है , इन्सान के लिए. अति निष्क्रियता से हमारे शरीर में विकार कुछ इस तरह पैदा होते हैं --

* मोटापा
* हाई बी पी
* डायबिटिज
* हाई कॉलेस्ट्रोल
* हाई यूरिक एसिड

उपरोक्त पांचों विकार पारस्परिक सम्बंधित होते हैं यानि एक से दूसरा रोग पनपता है और अंतत : पांचों विकारों से ग्रस्त होकर आप बन जाते हैं मिस्टर एक्स। आप मिस्टर एक्स न बन जाएँ , इसके लिए इन बातों का ध्यान रखा जाये :

१ ) वज़न -- ८ ० किलो से कम रखें।
२ ) बी पी -- नीचे वाला बी पी ८ ० से कम.
३ ) नब्ज़ की गति -- ८ ० से कम .
४ ) ब्लड शुगर फास्टिंग -- ८ ० से कम .
५)  कमर का नाप -- ८ ० सेंटीमीटर से कम .

यह तभी संभव है जब आप खान पान पर नियंत्रण रखें और नियमित सैर करें। ऐसा करने से वज़न , बी पी ,   शुगर , और कॉलेस्ट्रोल सामान्य बने रहते हैं और आप बढती उम्र में भी ज़वान दिखाई देते हैं। खाने में घी और मीठा कम से कम खाना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही अत्यंत ऊर्जावान खाद्य पदार्थ हैं. साथ ही नियमित रूप से  ४५ मिनट की वॉक करने से आपका शरीर आपके नियंत्रण मे रहता है.

हमारा आने वाला कल स्वस्थ हो , इसके लिए अपने आज को संवारना सुधारना आवश्यक है. स्वस्थ शुभकामनायें .

        

Sunday, August 25, 2013

जहाँ परिवार में परस्पर प्यार है , वह केवल अपना हिंदुस्तान है---


विकास और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता के कारण अब हमारे देश में भी मनुष्यों की औसत आयु ७० वर्ष से ज्यादा हो गई है. हमारे मित्रों और निकट सम्बन्धियों में ही चार पांच ऐसे बुजुर्ग दंपत्ति हैं जिनकी उम्र ८० से ज्यादा है.  ज़ाहिर है , देश में ६० वर्ष से ज्यादा आयु के लोगों की संख्या निरंतर बढती जा रही है. ऐसे में परिवारों , समाज और देश की नैतिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है, ताकि देश के बुजुर्गों का यथोचित ख्याल रखा जा  सके.

हमारे जीवन में बड़े बूढों का बहुत महत्त्व होता है. ये  वर्तमान के बुजुर्ग ही हैं जिन्होंने हमारे वर्तमान को सुनहरा बनाने के लिए भूतकाल में अपना वर्तमान न्यौछावर किया था. आज जब हम समर्थ हैं और  वे असमर्थ होने लगे हैं , तब उनका सहारा बनकर यह क़र्ज़ चुकाना हमारा फ़र्ज़ है.

कहते हैं , जितनी आवश्यक विधालय और कॉलेज में ग्रहण की गई  शिक्षा है , उतनी ही आवश्यक घर में बड़े बूढों से ली गई अनौपचारिक शिक्षा है. जहाँ औपचारिक शिक्षा हमें  भौतिक विकास और प्रगति की राह पर ले जाती है , वहीँ अनौपचारिक शिक्षा नई पीढ़ी में संस्कारों का संचार करती है, जिससे हमारा नैतिक विकास होता है. हम भाग्यशाली हैं कि हमारे देश में  अभी भी हमारे संस्कार जीवित हैं. इसीलिए यहाँ अभी भी पारिवारों में पारस्परिक प्रेम और सौहार्द नज़र आता है.

माना कि विश्व का तकनीकि अधिकारी जापान है ,
और अमेरिका की बीमारी , डॉलर का अभिमान है.
लेकिन जहाँ परिवार में परस्पर प्यार है ,
वह केवल अपना हिंदुस्तान है.               

लेकिन देखने में आता है कि बढ़ते शहरीकरण के साथ अब संयुक्त परिवार समाप्त होते जा रहे हैं. शहरों में एकल ( न्यूक्लियर फैमिली ) परिवार भी तभी तक रहते हैं , जब तक बच्चे विधालय में पढ़ते हैं. एक बार कॉलेज में आने के बाद अक्सर दाखिला किसी दूर दराज़ शहर के कॉलेज में हो गया तो बच्चा सदा के लिए दूर हो जाता है. और घर में रह जाते हैं बस पति पत्नि। ये भी तभी तक साथ होते हैं जब तक दोनों जिन्दा हैं. लेकिन बुढ़ापे के साथ कई तरह की शारीरिक, मानसिक , सामाजिक और आर्थिक समस्याएं भी आने लगती हैं. ऐसे में उनका बच्चों पर आश्रित होना स्वाभाविक सा है.

बुढ़ापे में सबसे बड़ी समस्या है , एकाकीपन। संयुक्त परिवारों में भी देखने में आता है कि बुजुर्गों से बात करने वाला कोई नहीं होता। जहाँ कामकाजी पति पत्नि अपने अपने काम में व्यस्त रहते हैं , वहीँ बच्चों को बुजुर्गों की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। ऐसे में बुजुर्गों में सबसे ज्यादा सम्भावना अवसाद पैदा होने की रहती है. अवसाद से अनेकों शारीरिक और मानसिक विकार पैदा होने लगते हैं. वैसे भी इस उम्र में आकर ब्लड प्रेशर , मधुमेह , हृदय रोग , जोड़ों का दर्द , शारीरिक और मानसिक कमजोरी आदि ऐसे रोग हैं जो स्वत ; ही मनुष्य को घेर लेते हैं.

ज़ाहिर है , बुजुर्गों को अपनी संतान के सहारे की बहुत आवश्यकता होती है. जिन्होंने अपनी उंगली पकड़ाकर आपको चलना सिखाया , बुढ़ापे में उन्ही को आपके सहारे की आवश्यकता होती है. विकसित देशों में लोग वर्ष में एक बार मदर्स डे / फादर्स डे आदि मनाकर अपना कर्तव्य पूर्ण समझ लेते हैं. लेकिन इस मानसिकता का प्रभाव हमारे समाज पर न पड़े , इसके लिए हमें अपनी संस्कृति को याद रखते हुए सचेत रहना पड़ेगा . याद रहे कि आज के युवा कल के  बुजुर्ग हैं और आज के बच्चे कल के युवा। यह जीवन चक्र यूँ ही चलता रहता है.

नोट : एक अरसे से भाषण देने का अवसर नहीं मिला था. सोचा काव्य अभिव्यक्ति की तरह क्यों न ब्लॉग पर ही भाषण दे दिया जाये !  
         


Thursday, August 22, 2013

एक अद्भुत अनुभव -- मुंबई से खंडाला !


पिछली पोस्ट से आगे ---

जीवन में पहली बार राजधानी ट्रेन की यात्रा कर हम ईद के दिन मुंबई पहुंचे और दिन भर मुंबई की सैर करते हुए ईद का दिन वस्तुत: मुंबई की आम जनता के बीच बिताया। अगले दिन आई आई टी में दीक्षांत समारोह में सम्मिलित होना था. हमारे लिए तो यह भी प्रथम अवसर ही था जब हम किसी दीक्षांत समारोह में शामिल होने जा रहे थे. हमें तो अपनी डिग्री अपने कॉलेज के छोटे बाबु ( क्लर्क ) से ही मिली थी.         



सभा कक्ष में छात्रों के लिए आयोजन किया गया था और सभी अभिभावकों को चार लेक्चर थियेटर्स में बैठाया गया था. लेक्चर हॉल भी बहुत आधुनिक साज सज्जा से लैस और आरामदायक थे. तीन बड़े स्क्रीन्स पर सारी कार्यवाही दिखाई जा रही थी. एक बजे सभी के लिए लंच का आयोजन था. लंच के समय हजारों लोगों का एक साथ लंच करना भी एक आश्चर्यजनक दृश्य था. आरम्भ में थोड़ा असमंजस्य की स्थिति लगी लेकिन जल्दी ही स्थिति को संभाल लिया गया और सभी ने आराम से लंच किया।    





लंच के बाद कैम्पस घूमने का समय मिल गया. कैम्पस इतना हरा भरा है कि पेड़ों के झुरमुट में भवन भी दिखाई नहीं देते। एक तरफ पवाई लेक और उसके पार हीरनन्दानी आवासीय  कॉम्प्लेक्स और दूसरी ओर पहाड़ , बहुत मनोरम दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे.

घर पहुँचते पहुंचते शाम हो गई थी. लेकिन बेटी की सहेलियां जो अलग अलग शहरों से आई हुई थी, सबने मिलकर मॉल जाने का प्रोग्राम बना लिया। हमें भी उनके पीछे पीछे जाना ही पड़ा. आखिर डिनर पार्टी भी हमारी तरफ से हुई. बदले में बस उन्हें हमारी दो चार कवितायेँ सुननी पड़ी. लेकिन रात के खाने के बाद पता चला बिटिया ने केक का ऑर्डर दिया हुआ था. एक बार फिर पहली बार हमने रात के बारह बजे जन्मदिन का केक काटा।   

अगले दिन हमारा कार्यक्रम था लोनावला और खंडाला की सैर. सुबह ८ बजे टैक्सी वाला पहुँच गया और हम चल दिए खंडाला की ओर -- एक बार फिर जीवन में पहली बार.   




मुंबई में तीनों दिन रह रह कर बारिश हो रही थी. मुंबई पूना हाइवे पर रास्ते भर बारिश होती रही. पहाड़ शुरू होने के बाद सड़क पानी में धुलकर शीशे की तरह चमक रही थी. 




थोड़ी और चढ़ाई आने पर सड़क पर इतना गहरा कोहरा छा गया था कि दस फुट आगे भी मुश्किल से ही दिख रहा था. हमारा पहला पड़ाव था -- टाइगर हिल.  



यह लोनावला का शायद सबसे ऊंचा स्थान रहा होगा। वैसे यहाँ की ऊंचाई ज्यादा नहीं है , करीब ६०० मीटर। लेकिन बरसात के दिनों में यहाँ धुंध ऐसे छाई रहती है जैसी कभी मसूरी में देखने को मिलती थी. इस स्पॉट पर मेला सा लगा था. गहरी धुंध में लोग पिकनिक मना रहे थे. चाय , भुट्टे , और अन्य स्नैक्स के अलावा  युवाओं के झुण्ड मौज मस्ती का सारा सामान साथ लेकर आए थे. इस स्थान से नीचे घाटी दिखाई देती होगी जो एकदम ढलान वाली जगह है. लेकिन उस वक्त तो बस सफ़ेद चादर ही दिख रही थी.     



समतल स्थान के आगे तारों की बाड़ लगाई गई थी ताकि लोग इससे आगे न जाएँ। फिर भी कुछ युवा युगल एडवेंचर लव मेकिंग से बाज नहीं आ रहे थे. हालाँकि इस बोर्ड को पढ़कर कोई भी घबरा जाये। यहाँ लिखा था -- अब तक छप्पन ---




उधर सड़क पर कुछ युवाओं का दल ढोल मंजीरे बजाते हुए मस्ती कर रहा था. कुल मिलाकर बरसात के मौसम में धुंध का आनंद अपने आप में एक अद्भुत अनुभव था.

यहाँ से वापसी में रास्ते में एक जगह आती है जहाँ घाटी में बहते दर्ज़नों झरनों से बहते पानी को इक्कट्ठा कर बांध बनाकर एक झील के रूप में परिवर्तित किया गया है. यह स्थल एक खूबसूरत पिकनिक स्थान बन गया है. बहते पानी से होकर बांध तक पहुंचना पड़ता है जहाँ लोग पानी में ढलान पर लुत्फ़ उठाते हैं.    



इस स्थान पर सैंकड़ों लोग पानी में भीगते हुए जिंदगी के मज़े ले रहे थे.




लेक को पार कर आप पहुँच जाते हैं घाटी में जहाँ जगह जगह अनेक खूबसूरत झरने दिखाई देते हैं. ये झरने सिर्फ मॉनसून में ही बहते हैं. इसलिए यहाँ आने का सर्वोत्तम समय बरसात के दिनों में ही है. दूर तक फैली घाटी में हरियाली और पानी के झरने देखकर स्वत: ही तन और मन में साहस और रोमांच का अहसास प्रवाहित होने लगता है.  



लोनावला से करीब १२ किलोमीटर आगे पूना हाइवे पर एक और दर्शनीय स्थल है जहाँ एक पहाड़ी पर एक मंदिर है और पहाड़ को काटकर बनाई गई गुफाएं हैं. रास्ते से यहाँ की हरियाली बड़ी मनभावन लग रही थी. 




पहाड़ की चोटी पर बनी ये गुफाएं और उनके ऊपर से बहते झरने बड़े रहस्यमय लग रहे थे.




अंतत: लोनावला से वापस मुंबई को जाते हुए रास्ते में खंडाला आता है जहाँ इस मौसम में बादल पर्वतों के साथ आँख मिचौली खेलते रहते हैं. थोड़ी थोड़ी देर में दृश्य बदलता रहता है. साथ ही बीच बीच में होती बारिश वातावरण को खुशगवार बनाये रखती है.

लोनावला / खंडाला में भुने हुए भुट्टे और उबली हुई साबुत मूंगफली बड़ी स्वादिष्ट मिलती हैं. लेकिन यहाँ की एक विशेष मिठाई भी है -- चिक्की -- जिसे यहाँ हम मूंगफली की पट्टी कहते हैं. लेकिन विभिन्न स्वादों और मेवों से बनी चिक्की का स्वाद वास्तव में अनूठा होता है.

लोनावला / खंडाला मुंबई वालों के लिए ठीक वैसा है जैसे दिल्ली वालों के लिए मसूरी या शिमला। इसकी ऊँचाई ज्यादा नहीं है , इसलिए बरसात के मौसम को छोड़कर बाकि समय यहाँ कुछ विशेष आकर्षण नहीं है. इसलिए मुंबई वाले इन ३ - ४ महीनों में यहाँ पिकनिक मनाकर पूरे साल का लुत्फ़ एक साथ उठा लेते हैं. 

लेकिन पर्यावरण के प्रति यहाँ भी लोगों का रवैया वैसा ही है जैसा बाकि भारत में. यदि समय रहते सचेत नहीं हुए तो मुंबई वालों को भी तरसना पड़ जायेगा, बरसात के मौसम में बारिश और हरियाली के लिए.       


Sunday, August 18, 2013

ई है मुंबई नगरिया , तू देख बबुआ --- १२ साल बाद !


इत्तेफ़ाक से ईद के दिन हम पहुंचे मुंबई, जहाँ हमारा जाना पूरे १२ वर्ष बाद हुआ. इन बारह वर्षों में हमने  पहली बार रेल यात्रा भी की. किसी भी राजधानी ट्रेन में यह हमारी पहली यात्रा थी. अवसर था हमारी बेटी का मुंबई आई आई टी में एम् बी ऐ का दीक्षांत समारोह जो १० अगस्त को होना था। बस या ट्रेन का सफ़र हमें हमेशा ही लुभाता रहा है. खिड़की के पास बैठकर बाहर का नज़ारा देखते हुए हम घंटों बिता सकते हैं. इस सफ़र में भी दिल्ली से निकलते ही बहुत खूबसूरत नज़ारे देखने को मिले क्योंकि बरसात के मौसम में सारी पृथ्वी हरी भरी नज़र आ रही थी. जब तक अँधेरा नहीं हो गया , हम हरियाली का आनंद लेते रहे. 

ईद के दिन १० बजे तक हम घर पहुँच गए थे. छुट्टी का दिन था , इसलिए मुंबई घूमने के लिए सबसे उपयुक्त दिन था. घुमाने की जिम्मेदारी भी बिटिया की ही थी , इसलिए उसके कहे अनुसार हम ऑटो / टैक्सी पकड़ते रहे और एक ही दिन में लगभग सारी मुंबई  घूम ली.

सबसे पहले पहुंचे आर्थर रोड जहाँ समुद्र किनारे घूमने का अच्छा इंतज़ाम था लेकिन सफ़ाई कुछ ख़ास नहीं थी. एक पार्क था -- जोगर्स पार्क -- जो दोपहर को बंद था. इसलिए ऑटो पकड़ हम वहां से बांद्रा पहुँच गए, जहाँ सड़क पर एक जगह ऐसे भीड़ लगी थी जैसे कोई तमाशा हो रहा हो.  सैंकड़ों लोग और दसियों ओ बी वैन खड़ी थी किसी सीधे प्रसारण के लिए.       



ऑटो से उतरने के बाद हमने जानना चाहा कि क्या माज़रा है !




लेकिन सभी देखने में ही इतने व्यस्त थे कि खुद ही  मशक्कत करनी पड़ी यह पता लगाने के लिए कि चक्कर क्या है !




अंत में हमारे कैमरे ने ही पकड़ लिया कि अरे यह तो मन्नत है -- शाहरुख़ खान का बंगला। हालाँकि  बाहर से देखकर हमें तो निराशा ही हुई. सारे बंगले को सफ़ेद और हरी चद्दरों से ढक दिया गया था. आगे के हिस्से पर टिन शेड लगे थे. बाहर से सिर्फ गेट ही दिख रहा था. लेकिन एक बार टी वी पर देखा था , अन्दर से बेहद खूबसूरत है किंग खान का बंगला। यहाँ लोग ईद के अवसर पर शाहरुख़ और अन्य मेहमानों के दीदार की उम्मीद में खड़े थे.    




भीड़ से बचकर हम तो शाहरुख़ की गली के आगे समुद्र में उतर गए , पेंट ऊपर चढ़ाकर और भुट्टे खाकर। वैसे इतने स्वादिष्ट भुट्टे हमने पहले कभी नहीं खाए थे.




यहाँ से सी लिंक रोड से होते हुए हमें जाना था चौपाटी।




रास्ते में दिखा एंटिला -- बहुत भीड़ भाड़ वाला क्षेत्र लेकिन महंगा -- सड़क से हटकर बना है. इसके आगे अन्य भवन होने से सड़क से छुपा रहता है. जाने क्या ख़ास बात है !




बहुत पहले जब चौपाटी आए थे तब यह जोहड़ का किनारा सा लगा था. लेकिन अब पहले से काफ़ी बेहतर है. ईद होने के कारण खूब भीड़ थी. ज्यादातर मुस्लिम लोग ही पिकनिक मना रहे थे. सही मायने में आम आदमी , जिनकी बहुतायत थी. लेकिन उम्र और ओहदे के तहत अब ऐसी भीड़ में हम स्वयं को अज़नबी सा ही महसूस करते हैं. जाने क्यों , थोड़ा दुःख सा भी होता है. हालाँकि छोटी छोटी बातों से लोगों को खुश होते देखकर मन को सुकून सा भी मिलता है.      




यहाँ मेरीन ड्राइव पर सड़क और समुद्र के बीच बने चौड़े फुटपाथ पर सैर करते लोग और चबूतरे पर बैठकर समुद्र से आती ठंडी हवा का आनंद लेते हुए घंटों बिताना यहाँ के लोगों का खास शौक लगता है. यहाँ की एक विशेषता यह है कि यहाँ हर वर्ग के लोग वॉकिंग या जॉगिंग के लिए आते है. मुंबई में आर्थिक भेद भाव कम ही नज़र आता है. लेकिन रेत में पड़ी गन्दगी को देखकर स्वदेश में होने का अहसास सदा याद दिलाता रहता है, कि हम अभी भी विकासशील ही हैं.
  



टैक्सी पकड़ी और आ गया -- गेटवे ऑफ़ इंडिया ! सारे दिन सफ़ेद लिबास का बोलबाला रहा. ईद के दिन बच्चे और युवाओं समेत बड़े बूढ़े, सभी सफ़ेद कपड़ों में नज़र आ रहे थे। लगभग सभी के पास मोबाईल कैमरे जिनसे तरह तरह के पोज मारकर फोटो खिंचवाते लोगों को देखकर हंसी भी आती और आनंद भी. एक ज़माना था जब हम रील ख़त्म होने के डर से फोटो लेने में बड़ी अहतियात बरतते थे. लेकिन अब ज़ाहिर है , न रील ख़त्म होने का डर , न रील धुलवाने का इंतज़ार। इसलिए अब लोग फ़ोटो खींचते हैं और सबसे पहला काम करते हैं देखने का. सचमुच ज़माना बदल गया है.     




यहाँ सर घुमाते ही नज़र आता है -- होटल ताज़महल। वही ताज़महल जहाँ क़रीब ५ साल पहले २६/११ को धांय धांय की आवाज़ के बीच इतिहास में आतंकवाद का सबसे भयंकर रूप देखने को मिला था. हमारे पीछे होटल का जो कोना दिखाई दे रहा है , वह तब धू धू कर जल रहा था. पास से देखने पर मरम्मत के निशान साफ दिखाई देते हैं जो शायद सदा याद दिलाते रहेंगे कि इस ईमारत ने इन्सान के हाथों कितनी मार खाई है.

मुंबई में मौसम दिल्ली की अपेक्षा ज्यादा सुहाना लगा. थोड़ी थोड़ी देर में बारिश आकर उमस को ख़त्म कर देती है. सारे समय छाये बादलों ने सूरज की गर्मी से हमें बचाए रखा. हालाँकि , हर समय गीलेपन का अहसास भी होता रहा जो हमें बुरा नहीं लगा.

मुंबई में आवागमन के लिए ऑटो और टैक्सी की सुविधा भी बहुत सुविधाजनक है. बिना हील हुज्ज़त किये मीटर डाउन कर चल देते हैं , मंजिल की ओर. साथ ही , लोकल ट्रेन्स तो जैसे मुंबई की जान हैं. खचाखच भरी लोकल में यात्रा करने की आदत सी पड़ जाती है. हालाँकि हमारे जैसे तो बेचारे फस्ट क्लास में ही ट्रेवेल कर सकते हैं. सेकण्ड क्लास में ट्रेवेल करने पर और लोग ही हमारी ओर ऐसे देख रहे थे जैसे उन्हें हम पर दया आ रही हो कि बेचारे कहाँ फंस गए. लेकिन हमने भी यह अनुभव करने की ठान रखी थी.

यहाँ की सबसे अच्छी बात यह लगी कि यहाँ रात भी रात नहीं लगती। लगता है , मुम्बईकर कम ही सोते हैं.

          
नोट : मुंबई में तीन रहे लेकिन किसी से भी संपर्क करना संभव नहीं था. ऐसे में कुछ मित्रों को शिकायत भी हो सकती है. या शायद न भी हो !