मनुष्य समेत सभी जीवों के जीवन में दो ही ऐसी मूल आवश्यकताएं हैं जिन पर जीवन पूर्णतया आश्रित रहता है. एक भोजन और दूसरा यौन क्रिया ( सेक्स ) । जहाँ भोजन मनुष्य को जीवित रखता है और उसे जीवित रहने के लिए समर्थ बनाता है , वहीँ यौन क्रिया जीवन का स्रोत है और पृथ्वी पर विभिन्न प्रजातियों की नस्ल को बनाये रखता है. लेकिन यौन क्रिया एक ऐसा विषय है जिस पर हमारे समाज में खुल कर बात करने में अभी भी संकोच होता है. इसका एक कारण तो यह है कि यह विषय एक पूर्ण रूप से व्यक्तिगत मामला समझा जाता है. हालाँकि जब इसका दुरूपयोग होता है तब यह व्यक्तिगत मामला एक सार्वजानिक विषय बन जाता है जिसके परिणाम भी भयंकर होते हैं. इसलिए आज इस बात की अत्यंत आवश्यकता है कि आज की युवा पीढ़ी को यौन शिक्षा प्रदान की जाये।
बच्चों के शारीरिक विकास में यौन विकास सबसे महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील दौर होता है. इस आयु अवस्था में न सिर्फ बच्चे के शरीर में परिवर्तन दिखाई देते हैं बल्कि उसकी सोच और आचरण में भी बदलाव नज़र आता है. इसका कारण है शरीर में सेक्स हॉर्मोन्स का बढ़ना। लड़कों में टेस्टोस्टिरोंन और लड़कियों में इस्ट्रोजन हॉर्मोन्स को सेक्स हॉर्मोन कहा जाता है.
टेस्टोस्टिरोंन : यह मेल सेक्स हॉर्मोन है जिससे शरीर में यौन अंगों का विकास होता है जिन्हें सेकंडरी सेक्स केरेक्टर्स कहते हैं. यही ज़वानी के लक्षण भी कहे जा सकते हैं. यही वह हॉर्मोन है जिससे यौन इच्छा ( लिबिडो ) बनी रहती है और यौन क्षमता ( पोटेंसी ) भी. हालाँकि रक्त में इसका स्तर एक आयु के बाद कम होने लगता है , लेकिन अक्सर लम्बी आयु के बाद भी शरीर में टेस्टोस्टिरोंन पर्याप्त मात्रा में रहता है जिससे वृधावस्था में भी पोटेंसी बनी रहती है.
स्वप्नदोष : युवावस्था में इस हॉर्मोन की मात्रा अधिक होने से लिबिडो और पोटेंसी दोनों चरम सीमा पर होते हैं. यह सत्य युवाओं के लिए समस्या भी बन जाता है. युवावस्था आने पर वीर्य का निर्माण भी होने लगता है जो एक निरंतर प्रक्रिया है. शरीर के यौन अंगों में वीर्य को संग्रह करने की क्षमता सीमित होती है. इसलिए समय समय पर वीर्य स्खलन आवश्यक होता है. विवाह पूर्व ऐसा संभव नहीं हो पाता। इसलिए एक अवधि के बाद वीर्य स्खलन स्वत: ही सोते समय हो जाता है , जिसे स्वप्नदोष कहते हैं. अक्सर यह युवाओं के लिए बड़ा चिंता और शर्म का विषय बन सकता है. इसलिए यह जानना आवश्यक है कि स्वप्नदोष कोई रोग नहीं होता बल्कि एक स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है जिससे कोई हानि नहीं होती और जो विवाहोपरांत स्वयं समाप्त हो जाती हैं।
हस्त मैथुन : यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे इच्छानुसार वीर्य स्खलन कर कामोत्तेजना से क्षणिक राहत पाई जा सकती है. यह विशेषकर विवाह पूर्व या किसी भी कारणवश अकेले रहने पर विवश व्यस्क व्यक्ति के लिए एक आसान और हानिरहित तरीका है. युवावस्था में लगभग सभी लोग हस्त मैथुन करते हैं , यह एक सत्य है. लेकिन युवावस्था में अक्सर आत्मग्लानि होती है जिससे कई मानसिक विकार पैदा हो सकते हैं जिनका नाज़ायज़ फायदा तथाकथित सेक्सोलॉजिस्ट उठाते हैं और जो युवाओं को गुमराह कर पैसा बनाते हैं. सच तो यह है कि यह भी एक स्वाभाविक और हानिरहित प्रक्रिया है. हालाँकि कभी कभी यह एक लत का रूप धारण कर सकती है जिससे पढाई या काम में ध्यान भंग हो सकता है. आखिर , अति हर बात की ख़राब होती है.
लिबिडो ( यौन इच्छा ) और यौन क्षमता ( पोटेंसी ) :
जब तक हॉर्मोन की कमी नहीं होती , जो कि बहुत कम ही होती है , तब तक ये दोनों गुण विद्धमान रहते हैं. हालाँकि , लिबिडो और / या पोटेंसी कम होने के कारण विभिन्न और भिन्न हो सकते हैं. ऐसा भी हो सकता है कि इच्छा है पर क्षमता नहीं और यह भी संभव है कि क्षमता तो है पर इच्छा नहीं। यह बहुत सी स्थितियों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है. कुल मिलाकर यही कह सकते हैं कि सेक्स एक पूर्ण रूप से व्यक्तिगत विषय है और प्रत्येक मनुष्य की यौन इच्छा और यौन क्षमता भिन्न होती है. इसका सामान्यीकरण करना सही नहीं कहा जा सकता।
ब्रह्मचर्य : पहले कहा जाता था कि २५ वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। यहाँ यह समझा जाता था कि ब्रह्मचर्य का अर्थ है , वीर्य स्खलन न होने देना। वीर्य को एक दुर्लभ स्वास्थ्य खज़ाना माना जाता था. लेकिन यह न सच है , न संभव। इस भ्रांति को दूर करते हुए यह मानना चाहिए कि प्रत्येक काम का एक समय होता है और उचित समय पर ही किया गया काम लाभदायक होता है. ब्रह्मचर्य की वास्तविक परिभाषा गीता में दी गई है जिसके अनुसार -- विवाहित पुरुष को पत्निव्रत होना और सन्यासी को पूर्ण रूप से स्त्री से दूर रहने को ब्रह्मचर्य कहा गया है. हालाँकि पहली स्थिति में तो यह संभव है लेकिन दूसरी स्थिति में ब्रह्मचर्य का पालन करना इस मृत्यु लोक में संभव नहीं लगता। यह वर्तमान में हो रही साधु बाबाओं द्वारा बलात्कार की घटनाओं को देखकर साफ ज़ाहिर होता है.
यौन इच्छा एक ऐसी प्रक्रिया है जिस पर काबू पाना न सिर्फ आसान नहीं होता बल्कि इसे अनुचित रूप से दबाने से मानसिक विकार पैदा होते हैं. इसीलिए ओशो रजनीश द्वारा सुनाये गए प्रवचन तर्क संगत लगते हैं. यौन इच्छा की आपूर्ति स्वाभाविक रूप से होती रहनी चाहिए। लेकिन विपरीत परिस्थितियों में इच्छाओं पर काबु पाना भी आवश्यक है वर्ना इन्सान और हैवान में कोई अंतर नहीं रह जायेगा।

