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Monday, September 2, 2024

सेवानिवृत बुजुर्ग ...

 बुजुर्ग ना खाते हैं ना पीते है,

फिर भी चैन से मस्त जीते हैं।

ना कपड़ों का खर्च रहा ना कहीं आना जाना,

अब तो मुफ्त में गुजरता है सारा दिन सुहाना। 


ना किराए की चिंता ना बच्चों की फीस,

ना कोई कर्ज़ ना लोन चुकाने की टीस

ना सब्जीवाले, रिक्शावाले, रेहडीवाले से चकचक,

जिसने जो मांगा दे दिया ना मोल भाव की बकबक। 


खाली हाथ लटकाए बाजार जाते हैं,

बिन पैसे थैला भर सामान ले आते हैं। 

नोटों को अब तो हाथ तक नहीं लगाते हैं,

मोबाइल पर एक उंगली से काम चलाते हैं। 


सरकार भी इनकम टैक्स में देती है भारी छूट,

पेंशन कम नहीं, ये तो है ईमानदारी की सरकारी लूट। 



Wednesday, July 11, 2018

टाइम बैंक -- बुजुर्गों का साथी :



देश में बुजुर्गों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। विशेषकर शिक्षित परिवारों में बुजुर्गों के एकाकीपन की समस्या और भी गंभीर होती जा रही है क्योंकि अक्सर बच्चे पढ़ लिख कर घर, शहर या देश ही छोड़ देते हैं और मात पिता अकेले रह जाते हैं। अक्सर ऐसे में बुजुर्गों को सँभालने वाला कोई नहीं रहता जो उनकी रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा करने में सहायता कर सके।

पता चला है कि स्विट्ज़रलैंड में सरकार द्वारा ऐसे टाइम बैंक स्थापित किये गए हैं जिनमे आपका समाज सेवा का लेखा जोखा रखा जाता है। वहां युवा वर्ग और शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ लोग अपने फालतू समय में समाज के बुजुर्गों के लिए काम करते हैं और जितने घंटे काम किया , उतने घंटे उनके खाते में जमा हो जाते हैं। यह कार्य स्वैच्छिक और सुविधानुसार होता है जिसे वे तब तक करते हैं जब तक स्वयं समर्थ होते हैं। जब वे स्वयं असमर्थ हो जाते हैं, तब अपने टाइम बैंक के खाते से घंटे निकाल लेते हैं।  यानि बैंक उनकी सहायता के लिए किसी और को घर भेज देता है जो सहायता करता है।  इस तरह यह क्रम चलता रहता है। आपके खाते में जितने घंटे जमा हुए , उतने घंटों की सेवा आप प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए किसी बुजुर्ग को न तो अकेलापन महसूस होता है और न ही उन्हें वृद्ध आश्रम में जाकर रहना पड़ता है।

यदि इस तरह की कोई योजना यहाँ भी बनाई जाये तो शायद बुढ़ापे में बहुत से लोगों को राहत मिल सकती है। लेकिन हमारे देश और स्विट्ज़रलैंड में बहुत अंतर है।  वहां आबादी कम है और संसाधन ज्यादा।  लोग भी मेहनती , निष्ठावान और कर्मयोगी होते हैं।  वे अपने देश से प्रेम करते हैं और नियमों का पालन करते हैं।  लेकिन हमारे यहाँ अत्यधिक आबादी , भ्रष्टाचार , कामचोरी , हेरा फेरी और धोखाधड़ी का बोलबाला है।  ऐसे में यह योजना सफल होना तो दूर, कोई इसके बारे में सोच भी नहीं सकता। ज़ाहिर है , पहले हमें अपनी बुनियादी समस्याओं से सुलझना होगा।  तभी हम विकसित देशों के रास्ते पर चल पाएंगे। 

  

Saturday, August 31, 2013

आने वाले स्वस्थ कल के लिए आज को सुधारना आवश्यक है --


पिछली पोस्ट में हमने देखा कि बुजुर्गों का हमारे जीवन में कितना महत्त्व है. इस आयु वर्ग के लोगों की निरंतर बढती संख्या को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक हो जाता है कि हम उनकी समस्याओं पर ध्यान देते हुए उनका निवारण करने का प्रयास करें। कई प्रवासी भारतीय मित्रों की टिप्पणी से ज्ञात होता है कि विकसित देशों में बुजुर्गों की देखभाल के लिए अधिकारिक तौर पर प्रबंध किये जाते हैं जिनमे न सिर्फ आर्थिक सुरक्षा प्रदान की जाती है बल्कि रहने , खाने पीने और मनोरंजन का भी ख्याल रखा जाता है.

लेकिन हमारे देश में इस तरह की सुविधाएँ या तो न के बराबर हैं , या उनका सही उपयोग नहीं हो पाता। ऐसे में परिवार के सदस्यों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. शहरीकरण के साथ और आधुनिक जीवन शैली से बिखरते परिवारों में यह और भी मुश्किल हो जाता है. इसलिए बुजुर्गों का आत्मनिर्भर होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है. आत्मनिर्भरता में सबसे ज्यादा आवश्यक है , स्वस्थ रहना क्योंकि कहते हैं कि जान है तो जहान है.

स्वास्थ्य : सिर्फ रोगमुक्त होना ही स्वास्थ्य की निशानी नहीं है. आधुनिक परिभाषा अनुसार स्वास्थ्य -- शारीरिक , मानसिक , सामाजिक , आध्यात्मिक और आर्थिक सम्पन्नता का होना है. बुजुर्गों में विशेषकर ये सभी कारक बहुत महत्त्व रखते हैं क्योंकि इस उम्र में प्राकृतिक रूप से इन सभी शक्तियों का ह्रास होने लगता है. बढती उम्र के साथ स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं मुख्य रूप से इस प्रकार हैं :

* शारीरिक :  ब्लड प्रेशर , डायबिटिज , हृदय रोग , घुटनों में दर्द ,नेत्र ज्योति का कम होना , मोतिया बिन्द , श्रवण शक्ति कम होना , प्रोस्टेट का बढ़ना और आम कमज़ोरी।

* मानसिक : इस उम्र में अकेलापन बहुत तंग करता है. अवसाद , स्मरण शक्ति कम होना और चिडचिडापन आम होता है. एलजाइमर्स डिसिज एक लाइलाज बीमारी है.

* सामाजिक : अकेलापन विशेषकर यदि पति या पत्नी में से एक न रहे. घरों में भी बच्चों और बड़ों को बुजुर्ग लोग एक बोझ सा लग सकते हैं. संयुक्त परिवार में संतुलन बनाये रखना दुर्लभ सा हो जाता है .

* आध्यात्मिक : इस रूप में कुछ इज़ाफा होता है. अक्सर लोग इस उम्र में आकर अत्यधिक धर्म कर्म में विश्वास रखने लगते हैं. हालाँकि इसमें कोई बुराई नहीं बल्कि यह उम्र अनुसार यथोचित ही लगता है.

* आर्थिक : अक्सर सेवा निवृत लोगों को आर्थिक रूप से बच्चों पर निर्भर होना पड़ सकता है यदि उन्होंने स्वयं अपने लिए उचित धन राशी का प्रबंध न कर रखा हो. यहाँ अभी भी प्रशासनिक आर्थिक सहायता का आभाव है.

बुजुर्गी की ओर बढ़ना एक स्वाभाविक और प्राकृतिक प्रक्रिया है. लेकिन इससे जुड़ी शारीरिक समस्याएँ बहुत पहले ही शुरू हो जाती हैं. इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि हम अपने स्वास्थ्य का ध्यान आरम्भ से ही रखें। यदि ज़वानी में सही रहे तो बुढ़ापे में भी सही रहने की सम्भावना बढ़ जाती है. आरामदायक जिंदगी की ही देन है -- मेटाबोलिक सिंड्रोम एक्स।

मेटाबोलिक सिंड्रोम एक्स :

यह शहरीकरण और सम्पन्नता का स्वास्थ्य प्रसाद है , इन्सान के लिए. अति निष्क्रियता से हमारे शरीर में विकार कुछ इस तरह पैदा होते हैं --

* मोटापा
* हाई बी पी
* डायबिटिज
* हाई कॉलेस्ट्रोल
* हाई यूरिक एसिड

उपरोक्त पांचों विकार पारस्परिक सम्बंधित होते हैं यानि एक से दूसरा रोग पनपता है और अंतत : पांचों विकारों से ग्रस्त होकर आप बन जाते हैं मिस्टर एक्स। आप मिस्टर एक्स न बन जाएँ , इसके लिए इन बातों का ध्यान रखा जाये :

१ ) वज़न -- ८ ० किलो से कम रखें।
२ ) बी पी -- नीचे वाला बी पी ८ ० से कम.
३ ) नब्ज़ की गति -- ८ ० से कम .
४ ) ब्लड शुगर फास्टिंग -- ८ ० से कम .
५)  कमर का नाप -- ८ ० सेंटीमीटर से कम .

यह तभी संभव है जब आप खान पान पर नियंत्रण रखें और नियमित सैर करें। ऐसा करने से वज़न , बी पी ,   शुगर , और कॉलेस्ट्रोल सामान्य बने रहते हैं और आप बढती उम्र में भी ज़वान दिखाई देते हैं। खाने में घी और मीठा कम से कम खाना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही अत्यंत ऊर्जावान खाद्य पदार्थ हैं. साथ ही नियमित रूप से  ४५ मिनट की वॉक करने से आपका शरीर आपके नियंत्रण मे रहता है.

हमारा आने वाला कल स्वस्थ हो , इसके लिए अपने आज को संवारना सुधारना आवश्यक है. स्वस्थ शुभकामनायें .

        

Sunday, August 25, 2013

जहाँ परिवार में परस्पर प्यार है , वह केवल अपना हिंदुस्तान है---


विकास और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता के कारण अब हमारे देश में भी मनुष्यों की औसत आयु ७० वर्ष से ज्यादा हो गई है. हमारे मित्रों और निकट सम्बन्धियों में ही चार पांच ऐसे बुजुर्ग दंपत्ति हैं जिनकी उम्र ८० से ज्यादा है.  ज़ाहिर है , देश में ६० वर्ष से ज्यादा आयु के लोगों की संख्या निरंतर बढती जा रही है. ऐसे में परिवारों , समाज और देश की नैतिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है, ताकि देश के बुजुर्गों का यथोचित ख्याल रखा जा  सके.

हमारे जीवन में बड़े बूढों का बहुत महत्त्व होता है. ये  वर्तमान के बुजुर्ग ही हैं जिन्होंने हमारे वर्तमान को सुनहरा बनाने के लिए भूतकाल में अपना वर्तमान न्यौछावर किया था. आज जब हम समर्थ हैं और  वे असमर्थ होने लगे हैं , तब उनका सहारा बनकर यह क़र्ज़ चुकाना हमारा फ़र्ज़ है.

कहते हैं , जितनी आवश्यक विधालय और कॉलेज में ग्रहण की गई  शिक्षा है , उतनी ही आवश्यक घर में बड़े बूढों से ली गई अनौपचारिक शिक्षा है. जहाँ औपचारिक शिक्षा हमें  भौतिक विकास और प्रगति की राह पर ले जाती है , वहीँ अनौपचारिक शिक्षा नई पीढ़ी में संस्कारों का संचार करती है, जिससे हमारा नैतिक विकास होता है. हम भाग्यशाली हैं कि हमारे देश में  अभी भी हमारे संस्कार जीवित हैं. इसीलिए यहाँ अभी भी पारिवारों में पारस्परिक प्रेम और सौहार्द नज़र आता है.

माना कि विश्व का तकनीकि अधिकारी जापान है ,
और अमेरिका की बीमारी , डॉलर का अभिमान है.
लेकिन जहाँ परिवार में परस्पर प्यार है ,
वह केवल अपना हिंदुस्तान है.               

लेकिन देखने में आता है कि बढ़ते शहरीकरण के साथ अब संयुक्त परिवार समाप्त होते जा रहे हैं. शहरों में एकल ( न्यूक्लियर फैमिली ) परिवार भी तभी तक रहते हैं , जब तक बच्चे विधालय में पढ़ते हैं. एक बार कॉलेज में आने के बाद अक्सर दाखिला किसी दूर दराज़ शहर के कॉलेज में हो गया तो बच्चा सदा के लिए दूर हो जाता है. और घर में रह जाते हैं बस पति पत्नि। ये भी तभी तक साथ होते हैं जब तक दोनों जिन्दा हैं. लेकिन बुढ़ापे के साथ कई तरह की शारीरिक, मानसिक , सामाजिक और आर्थिक समस्याएं भी आने लगती हैं. ऐसे में उनका बच्चों पर आश्रित होना स्वाभाविक सा है.

बुढ़ापे में सबसे बड़ी समस्या है , एकाकीपन। संयुक्त परिवारों में भी देखने में आता है कि बुजुर्गों से बात करने वाला कोई नहीं होता। जहाँ कामकाजी पति पत्नि अपने अपने काम में व्यस्त रहते हैं , वहीँ बच्चों को बुजुर्गों की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। ऐसे में बुजुर्गों में सबसे ज्यादा सम्भावना अवसाद पैदा होने की रहती है. अवसाद से अनेकों शारीरिक और मानसिक विकार पैदा होने लगते हैं. वैसे भी इस उम्र में आकर ब्लड प्रेशर , मधुमेह , हृदय रोग , जोड़ों का दर्द , शारीरिक और मानसिक कमजोरी आदि ऐसे रोग हैं जो स्वत ; ही मनुष्य को घेर लेते हैं.

ज़ाहिर है , बुजुर्गों को अपनी संतान के सहारे की बहुत आवश्यकता होती है. जिन्होंने अपनी उंगली पकड़ाकर आपको चलना सिखाया , बुढ़ापे में उन्ही को आपके सहारे की आवश्यकता होती है. विकसित देशों में लोग वर्ष में एक बार मदर्स डे / फादर्स डे आदि मनाकर अपना कर्तव्य पूर्ण समझ लेते हैं. लेकिन इस मानसिकता का प्रभाव हमारे समाज पर न पड़े , इसके लिए हमें अपनी संस्कृति को याद रखते हुए सचेत रहना पड़ेगा . याद रहे कि आज के युवा कल के  बुजुर्ग हैं और आज के बच्चे कल के युवा। यह जीवन चक्र यूँ ही चलता रहता है.

नोट : एक अरसे से भाषण देने का अवसर नहीं मिला था. सोचा काव्य अभिव्यक्ति की तरह क्यों न ब्लॉग पर ही भाषण दे दिया जाये !  
         


Thursday, December 1, 2011

बुजुर्गों का आशीर्वाद और हमारी थर्ड आई का महत्त्व ---

अपने बड़ों का सम्मान करना हमारी सांस्कृतिक परंपरा रही है। सम्मान करने के तरीके भी अनेक हैं ।
सबसे आसान और लोकप्रिय तरीका है , हाथ जोड़कर संबोधन करना जैसे --नमस्ते , नमस्कार , गुड मोर्निंग , राम राम या जय राम जी की साथ में यदि सम्बन्ध का विशेषण भी लगा दें जैसे --दादाजी , पिताजी , चाचा जी , या फिर आंटी जी --तो सोने पे सुहागा हो जाता है ।

लेकिन एक और भी तरीका है --पैर छूना । बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करना न सिर्फ एक अच्छा आचरण माना जाता है बल्कि पारस्परिक पारिवारिक प्यार बनाये रखने में भी सहायक सिद्ध होता है ।

पैर छूने के भी अनेक तरीके हैं ।

आम तौर पर झुककर पैरों या जूतों को हाथ लगाकर सम्मान दिया जाता है । लेकिन बस थोडा सा झुककर हाथ नीचे ले जाकर भी यह रस्म पूरी हो जाती है । विशेष रूप से पंजाबी परिवारों में यह नज़ारा अक्सर देखा जाता है कि मुंडा ज़रा सा झुककर बोलता है --पैयाँ पैना । और हो गया काम । लेकिन यह भी न किया जाए तो बुजुर्ग अवश्य बुरा मान जाते हैं ।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह रिवाज़ हरियाणा में नहीं है । यानि वहां कोई किसी के पैर नहीं छूता । हालाँकि नमस्ते या राम राम कह कर सम्मान ज़रूर दिया जाता है। इस पर बुजुर्ग भी कहता है --राम राम भाई

लेकिन पुराने ज़माने में जब हम बच्चे थे , तब की बात याद आती है । उन दिनों में जब कोई नई नवेली दुल्हन आती तो घर की सभी बड़ी औरतों जैसे दादी , ताई , चाची आदि के पैर दबाकर आशीर्वाद प्राप्त करती ।

यहाँ गौर करने की बात यह है कि बहु पैर नहीं छूती थी बल्कि कई मिनट तक पैर दबाती थी जैसे मेसाज करते हैं । साथ ही बुजुर्ग महिला एक लम्बा सा आशीर्वाद देती यह कहकर --सदा सुहागन रहो , दूधों नहाओ , पूतों फलो, और न जाने क्या क्या । यह आशीर्वाद हमें तो एक कविता सी लगती थी जिसे मैं बड़े शौक और तन्मयता से सुनता था । अक्सर महिलाएं हमारी हरकत पर हंसती भी , लेकिन हम कोई मौका नहीं छोड़ते ।

अब शायद ये रिवाजें वहां भी ख़त्म हो चुकी हैं । लेकिन अभी भी गाँव में बुजुर्ग महिलाएं सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद ज़रूर देती हैं । और सच मानिये , यह अनुभव मन को बहुत शांति प्रदान करता है । ठीक उसी तरह जैसे किसी धार्मिक समारोह में पंडित जी जब हमारे माथे पर टीका लगाते हैं तो एक परम आनंद की अनुभूति होती है ।

इसका कारण है माथे पर जहाँ टीका लगाया जाता है , वह हमारी चेतना का केंद्र बिंदु होता है । इसी बिंदु के पीछे मष्तिष्क में पीनियल बॉडी नाम का एक छोटा सा अंग होता है । यह एक एंडोकराइन ग्लैंड होती है जिससे मेलाटोनिन नाम का हॉर्मोन उत्पन्न होता है । मेलाटोनिन का रोल मनुष्य में ज्यादा नहीं है लेकिन पशुओं में यह सिर्कार्दियन रिदम को कंट्रोल करता है जो प्रजनन से सम्बंधित होता है ।

पीनियल ग्लैंड हमारे मष्तिष्क के ठीक मध्य में ब्रेन के दोनों हिस्सों के बीच मौजूद होती है । यह ब्रेन का अकेला ही ऐसा हिस्सा है जो एक ही होता है जबकि बाकि सारे हिस्से डबल होते हैं ।

पीनियल बॉडी को थर्ड आई ( तीसरी आँख ) भी कहा जाता हैधार्मिक रूप से यह विश्वास माना जाता है कि हमारे शरीर में हमारी आत्मा का निवास पीनियल बॉडी में ही होता है

इसीलिए केरल के आयुर्वेदिक मेसाज में तेल की धार माथे के मध्य छोड़ी जाती है

मेडिटेशन करने के लिए भी हमें अपना ध्यान इसी बिंदु पर केन्द्रित करना होता है

पंडित लोग भी इसी बिंदु पर टीका लगाते हैं

महिलाएं भी बिंदी इसीलिए इसी बिंदु पर लगाती हैं !