top hindi blogs

Wednesday, September 9, 2026

कोरोना काल की यादें...

  

क्वारेन्टीन और डिस्टेंसिंग जैसे शब्द अब यक्ष हो गए हैं ,

आइसोलेशन में पति पत्नी के जुदा शयन कक्ष हो गए हैं ।

कोरोना ने लोगों की जिंदगी में कर दिया ऐसा करेक्शन ,

कि युवा ही नहीं बूढ़े भी अब गृह कार्यों में दक्ष हो गए हैं ।


लॉक डाउन के दिन रात तो नाकाम बीते हैं,

पर कोरोना ने सिखा दिया कि कैसे जीते है

जो लोग गर्मियों में भी नहाने से कतराते थे

अब ऐसे सुधरे कि दूध को भी धोकर पीते हैं।


कोविड जैसे कष्ट भरे दिन सदी में एक बार आते हैं,

लेकिन इंसा की आदतों को सुधार जाते हैं

सुधर तो हम भी इस कदर गए यारो,

कि जब भी जाते हैं किचन में, दो चार बर्तन धोकर हो आते हैं। 

Monday, July 6, 2026

केवल हास्य के लिए...

 कुदरत का पुरुषों पर ये कैसा कुदरती अत्याचार है,

पत्नी को पति से लड़ने का मिला विशेषाधिकार है।

आधुनिक सुशिक्षित पत्नियां पति के बराबर कमाती हैं,

लेकिन सारी शॉपिंग की पेमेंट्स पति से ही कराती हैं।


फिर भी पत्नी पति को समझती है दाल बराबर,

ऊपर से पति को समझाती हैं ये बात बताकर।

कि शाकाहारी लोगों में दाल भी ज़रूरी है,

क्योंकि प्रोटीन की मात्रा तो इसी में पूरी है।


पति गर रिएक्ट करे तो पत्नी नाराज हो जाती हैं,

बिना लड़े तो उनकी तबियत ही खराब हो जाती है।

इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल वे बखूबी करती हैं,

दो दिन भी पति से ना लड़ें तो भूख ही नही लगती हैं।


पत्नियां लड़ कर ही ज़िंदगी का भरपूर मज़ा लेती हैं,

कोई बहाना ना मिले तो बिना बहाने भी लड़ लेती हैं।

पुरुष बेचारे तो बस मन मसोस कर ही रह जाते हैं,

इस नियमित पत्नी पीड़ा को चुपचाप सह जाते हैं।


पत्नियों को यह विशेषाधिकार पतियों ने ही दिया है,

शिक्षा ने पतियों को सहनशील होना जो सिखा दिया है।

किंतु इक्कीसवीं सदी में पति भी जागरूक हो गए हैं,

शहरों में पत्नी पीड़ित संघ बनाकर संगठित हो गए हैं।

आखिर पतियों को भी चैन से जीने का अधिकार चाहिए,

फॉर्म भरे जा रहे हैं, आइए ,  आप भी मेंबर बन जाइए। 

Monday, June 29, 2026

कितने दुखद ये हालात हैं...

 फुटपाथ पर बच्चों का सोना,

मंदिर में चढ़ावे का चांदी सोना,

और मंगेतर का प्रेमी के संग होना,

आजकल बहुत रिस्की हो गए हैं।  


प्रेम में पागल लड़की से शादी,

हनीमून के लिए पर्वतों की वादी,

और नीले ड्रम की बढ़ती आबादी,

आजकल बहुत रिस्की हो गए हैं। 


बुढ़ापे में घर में अकेला होना,

रिटायर्ड शख्स के पास पैसा होना,

और फ्रॉड कॉल पर भरोसा होना,

आजकल बहुत रिस्की हो गए हैं। 


सड़कों पर दौड़ती काली थार,

गुड़गांव के रईसजादों का व्यवहार,

और रोड़ रेज में तू तू मैं मैं के आसार,

आजकल बहुत रिस्की हो गए हैं। 


*आजकल के दुखद समाचारों पर आधारित।

Monday, June 15, 2026

ग़ज़ल के कद्रदान अभी बाकी हैं...

 बड़े से मॉल की आंखों में चुभ रही है जो,

गली के मोड़ पे इक छोटी दुकान अभी बाकी है।


हर शख़्स इस शहर में नज़र आता है ग़मगीन,

शुक्र है कुछ चेहरों पर मुस्कान अभी बाकी है।


पोथी पढ़ पढ़ कर इल्म तो बहुत कर लिया हासिल,

पर असल जिंदगी का इम्तिहान अभी बाकी है।


जिसे भी देखो वही दिखाई देता है यहां नेता,

तसल्ली है कुछ लोगों में ईमान अभी बाकी है।


रिश्वतखोरी के दलदल में भी रहते पाक साफ,

वो खुद्दार जिनमें आत्मसम्मान अभी बाकी है।


हैरान ना हो देखकर मुर्दों की मुर्दानगी,

शहर के कुछ मर्दों में जान अभी बाकी है।


वक्त ने कुछ तो भर दिए जो दिए थे जालिमों ने,

उन बेदर्द जख्मों के कुछ निशान अभी बाकी हैं।


रुकसत हुआ वो शख्स जो महीनों से पड़ा था बीमार,

फुटपाथ पर उसका बस कुछ सामान अभी बाकी है।


मत सोचो गुजर गया जल जमी से वो जलजला,

हार्मोज के सागर में उफनता तूफान अभी बाकी है।


बिसराने वाले तो बहुत मिल जाएंगे डॉ दराल,

तू लिखता चल तेरी लेखनी के कद्रदान अभी बाकी हैं। 

Wednesday, June 3, 2026

अभिलाषा...

 अभिलाषा:

ए ज़िंदगी,

ज़रा आहिस्ता चल।

क्यों बेतहाशा भागती है,

बदहवास दौड़े जाती है।

ज़रा रुक, दम भर तो ठहर,

ऐसी भी क्या जल्दी है।

कुछ आराम कर लूं,

एक आध पड़ाव पार कर लूं,

एक रत्न अवार्ड जेब में धर लूं।

ए आई भी तो अभी आई है,

ज़रा रूबरू तो होने दे।

रईसों की भीड़ में शुमार तो होने दे।

क्यों बेवज़ह दौड़े जाती है,

अरमानों को पीछे छोड़े जाती है।

चल, ज़रूर चल,

पर ज़रा आहिस्ता चल,

ए ज़िंदगी। 

Monday, April 20, 2026

एक ग़ज़ल...

 मेहरबानियों पर ताउम्र जीते रहे,

मुफ्त मिलती रही हम पीते रहे।

मुफलिसी का दौर इस तरहां गुजरा,

पैरहन फटते रहे हम सीते रहे।

उम्र गुजार दी यूं फ़ाक़ामस्ती में,

लोग उधार देते रहे हम लेते रहे।


काम कभी कोई अपना रुका नहीं,

हाथ मगर दोनों देखो सदा रीते रहे।

इश्क का रिस्क उठाते भी तो कैसे,

जिंदगी में क्या कम फजीहते रहे।


इस कान से सुना दूसरे से निकाला,

बाखबर फिर भी देते नसीहतें रहे।

इक दिन तो ख़ाक में मिलना है लाजिमी,

चलो दोस्त अभी तो हंसते मुस्कराते रहें। 

Wednesday, April 15, 2026

Such is life dearies...

 They say, you live only once,

And that once is like an ounce.

That ounce goes for a bounce.


You don't even realize,

That you can get a surprise,

When your life is cut to size.


So many things you desire,

To attain the hights you aspire,

And touch the sky before you expire.


One moment, you are the boss,

Don't even know the impending loss,

Very next moment your life goes for a toss.


Life's struggle is intense,

What matters is the tense,

Only living in present, makes the sense. 

Tuesday, April 7, 2026

हंसने की फरियाद...

 एक महफिल में

कविता सुनाने की जब फरमाइश आई,

हमने अपनी बेस्ट हास्य कविता सुनाई।

पर उस दिन तो मैं ऐसा फंसा,

श्रोता एक भी ना हंसा।

फिर ख्याल आया कि आजकल

हास्य कविता सुनाते ही कौन हैं।

शायद इसीलिए सब श्रोता मौन हैं। 

यही सोचकर हमने दर्जनों चुटकले भी सुनाए,

पर श्रोता ज़रा भी ना मुस्कराए।


भई हंसते भी कैसे, सब घबराए थे,

अपनी अपनी पत्नी संग जो आए थे।

और पत्नियां सब चुप बैठी थीं,

जाने किस टेंशन में ऐंठी थीं।

शायद पति ने झुमके दिला दिए सस्ते,

फिर बिना पत्नी की परमिशन के

भला कैसे हंसते।

हमने निर्णय लिया कि पहले महिलाओं को समझाएंगे,

फिर हम ही समझ गए कि भैया जो पत्नी के सामने हंस सके

ऐसे पति कहां से आयेंगे।


हमारी भी प्रॉब्लम ये कि हम हास्य कवि,

ठहाकों की फरियाद नहीं करते।

बाकी कवियों की तरह

तालियों के लिए हुंकार नहीं भरते।

कि जो सच्चा देशभक्त है

वो अगली पंक्ति पर तालियां जरूर बजाएगा।

हमने सोचा, अब मजा आएगा,

चलो बोलते हैं,

भाइयों बहनों चाचा काका,

अगले जोक पर ठोको ठहाका।

पर हाय रे किस्मत, जोक किसी को ना जँचा,

क्योंकि श्रोता फिर एक ना हंसा।


अब हमने महिलाओं की ओर रुख किया

और प्रश्न किया,

कृपया हाथ उठाएं जिस जिस के पति ने 

लॉकडाउन में झाड़ू पोंछा लगाया,

पत्नियां भी सभी पतिव्रता निकली

एक ने भी हाथ नहीं उठाया।

खाली गया ये भी जो तंज था कसा,

क्योंकि श्रोता अब भी एक ना हंसा।


भई हंसते भी कैसे,

कोई अपनी या अपनों की बीमारी से त्रस्त हैं,

कोई बेरोजगार है तो कोई जॉब के तनाव से ग्रस्त है।

इस मृत्युलोक में सुखी लोग नज़र ही कहां आते हैं,

इसीलिए हम तो सबको यही समझाते हैं।

कि उम्र एक नम्बर है, नम्बर ज़िंदगी नहीं,

जिंदगी में खुश रहने पर कोई पाबंदी नहीं। 

हंसने हंसाने का ही दोस्तो नाम है जिंदगी,

खुल कर हंसो, हंसने में कोई शर्मिंदगी नहीं। 


क्योंकि जब आप हंसते हैं तब अपना तनाव हटाते हैं,

जो लोग हंसाते हैं वे दूसरों के तनाव मिटाते हैं,

हंसना हंसना भी एक लाभकारी काम है दुनिया में,

इसलिए हम तो सदा हंसी की ही दवा पिलाते हैं। 

Monday, February 16, 2026

डाइटिंग के इफेक्ट्स...

 डाइटिंग का कमाल:

क्या सुनाऊँ तुमको मैं अपनी दर्दीली दास्तान,

जब से हमने शुरू किया सात्विक भोजन प्लान'।


जलेबी समोसे सब हुए बीते कल की बात,

अब भोजन में मिलती है बस उबली घास पात।


रोज सुबह चाय में 'ग्रीन-टी' का सेवन करता हूँ,

यूँ समझो कि बिना मिठास बस कड़वी घूँट भरता हूँ।


कभी मन करता है खा लूं , मक्खन मार के पराठा",

पर मेन्यू में मिलता है सलाद बेस्वाद और पाठा।


जिम जाने के ख्याल से ही मेरा जिस्म दुखने लगता था,

ट्रेडमिल पर दौड़ते ही मेरा दिल दौड़ने लगता था।


पड़ोसी के घर से जब आती थी हलवे की खुशबू,

दिल कहता था चल पड़ोसी को राम राम कर तू।


अब तो सपने में भी मुझे रसगुल्ले नज़र आते हैं,

किंतु सपने भी भला कहीं हकीकत बन पाते हैं।


पर वेट घटा, पेट घटा, सिक्स एब्स पेट पर आ गए,

सिगरेट शराब सब छूटी, जब वेगन डाइट पर आ गए।


हमारे इस डाइट प्लान ने यारो कर दिया ऐसा कमाल,

बी पी, शुगर, कॉलेस्ट्रोल से मुक्त हो गए डॉ  दराल। 

Monday, October 27, 2025

देसी विदेशी।

 जेब में रूमाल, हाथ में घड़ी, और

पैंट की बैक पॉकेट में पर्स नजर आए,

तो समझ जाओ कि बंदा हिंदुस्तानी है।


ऊंची बिल्डिंग को ऊंट की तरह सर उठाकर देखे,

और उंगली हिलाकर मंजिलें गिनता नजर आए,

तो समझ जाओ कि.... भाई


पार्किंग या सड़क पर खड़ी गाड़ी,

और काले शीशे देखते ही कंघी करने लग जाए,

तो समझ जाओ कि बंदा...


मौसम सुहाना हो खिली खिली सी धूप हो ,

और नई शर्ट पैंट बैल्ट पहनकर पार्क में घूमने जाए,

तो समझ जाओ कि.... बाऊ


मॉल में घूमते हुए हर चीज को ताके झांके,

और हर शख्स को घूरता नज़र आए

तो समझो कि....


जेब्रा क्रॉसिंग पर सड़क पार कर रहा हो,

और बस या गाड़ी को आते हुए देखते ही रुक जाए,

तो समझ जाओ कि... पट्ठा


बस स्टेंड पर किसी के साथ खड़ा हो और

बस के आते ही चलो चलो बोलने लग जाए,

तो समझ जाओ...ये इंसान


किसी काउंटर पर लाइन लगी हो,

और बेझिझक सबसे आगे पहुंच जाए,

तो समझो कि....


हाथ में सेल्फी स्टिक लेकर वीडियो बनाए

और ओटवा को ओटावा बोलता नजर आए,

तो समझ जाओ ....


बंदा हिंदुस्तानी हो,

और सामने से बिना मुस्कराए अकड़ कर निकल जाए,

तो समझ जाओ कि बंदा पक्का हिंदुस्तानी है। 

Friday, October 10, 2025

उस दिन इतवार था ...

 उस वर्ष इतवार था। 


पति बोला, आज हमारा भी व्रत रखने का विचार है।

पत्नी बोली, साथ निभाओगे हमें इसका पूरा एतबार है। 

पर सोचती हूं, दफ्तर में गुपचुप समोसे कैसे खाओगे,

भूल गए क्या, इस वर्ष तो करवा चौथ के दिन इतवार है। 🌷🌷

Wednesday, September 17, 2025

 पेशे से जो पुश्तैनी हलवाई है,

उसको भी शुगर का पंगा निकला।

गए थे कराने गंजेपन का इलाज़,

डॉक्टर बेचारा खुद ही गंजा निकला।


जो नेता देने आया था भाषण,

अरे देखो वो तो हकला निकला।

सफेद लिबास में जो दिखा दानवीर,

काले धन का वो पुतला निकला।


बहुत करता है वो बाहर दिखावा,

घर के अंदर तो कड़का निकला।

दूर से दिखी काली जुल्फों की घटा,

पास से देखा तो वो लड़का निकला।


मशक्कत से उगाया गमले में धनिया,

सब्जियों के साथ मुफ्त का निकला।

क्या लेकर आया था क्या लेकर जाएगा,

बाबा का ये प्रवचन तो 1500 का निकला।


जिसे कमज़ोर समझ दिखाई अकड़,

उसका हाथ तो बड़ा तगड़ा निकला।

ये जो बहस करते दिखते हैं नेता टीवी पर,

अंत में वो बिना बात का झगड़ा निकला।

Friday, September 5, 2025

शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं।

 यूं तो औपचारिक शिक्षा ज्ञान हमें स्कूल और कॉलेज से प्राप्त होता है, जो आज के वैज्ञानिक युग में अत्यंत महत्वपूर्ण भी है। फिर भी अनौपचारिक ज्ञान हमें अपने मात पिता और घर के बुजुर्गों से प्राप्त होता है, जिसका महत्व भी कदाचित कम नहीं होता। क्योंकि यही वो ज्ञान है जो हमें दुनियादारी सिखाता है। दुनिया में रहने के लिए दुनियादारी का ज्ञान भी आवश्यक है, वरना लोग आपको भोला समझते है। 

अक्सर कामकाजी मात पिता के पास समय नहीं होता बच्चों को यह ज्ञान देने के लिए। दादा दादी के पास समय भी होता है और अनुभव का ज्ञान भी । लेकिन आज के ज़माने में बच्चों के साथ न तो दादा दादी होते हैं, न ही दादा दादी के पास बच्चे जिन्हें वे कुछ सिखा सकें। 

दुनिया में ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें न तो स्कूल कॉलेज की शिक्षा मिली, न ही बुजुर्गों का साथ। फिर भी कुछ लोग अपने बल बूते पर मेहनत कर ज्ञान हासिल करते हैं और जिंदगी में सफल भी होते हैं। उनकी ज़िंदगी ही उनका सबसे बड़ा शिक्षक साबित होती है। हालांकि ऐसे लोग विरले ही होते हैं। 

डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी को नमन और सभी शिक्षकों, अभिभावकों और बुजुर्गों को शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं। 🌷🌷

Sunday, August 31, 2025

रिटायर्ड होकर टायर्ड ना हों।

 एक बात हमको हरदम सताती है,

कि आजकल 60 तो क्या,

70 की उम्र भी इतनी जल्दी आ जाती है।

कहते हैं 60 में लोग सठियाने लगते हैं,

पर हमें तो लगता है ,

70 में भी ज्यादा सयाने लगते हैं।

मगर सरकार उम्र भर की सेवाओं का ये कैसा सिला देती है,

जो भरी जवानी में कर परमानेंट तबादला देती हैं।


खाली घर में रहकर हाथ पैर भी टेढ़े हो जाते हैं,

सेवानिवृत होकर तो जवान भी बूढ़े हो जाते हैं।

इसीलिए कहते हैं भैया रिटायर्ड हुए तो क्या, टायर्ड मत हो,

मिलो मिलाओ, कविता लिखो, सुनो सुनाओ, फिर ना कोई ज़हमत हो। 

Tuesday, August 12, 2025

ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है ...

 जन्मदिन पर दोस्तों की दुआएं हों,

और अपनों का साथ हो,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


बच्चे केक मंगवाएं,

और केक काटने में पत्नी हाथ बंटाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


बेटी विदेश से फूल भिजवाए,

और एक प्यार सा संदेश पहुंचाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


पुत्र केक खिलाए, पुत्रवधू फोटो खींचे,

और पत्नी केक खिलाकर गाल पर केक लगाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है।


वर्षों के साथी डॉक्टर, ब्लॉगर, और कवि मित्र साथ हंसें मुस्कुराएं,

और जिंदगी सत्तरवें साल में प्रवेश कर जाए,

तो ज़िंदगी एक ग़ज़ल होती है। 

Wednesday, August 6, 2025

दोहे...

 लेडी चालक देख के, फौरन संभला जाय,

ना जाने किस मोड़ पे,बिना बात मुड़ जाय।


पर्वत तो यूं बिखर रहे, ज्यों ताश के पत्ते,

पेड़ काटकर बन रहे ,रिजॉर्ट्स बहुमंजिले।


जब पाप बढ़े जगत में, कुदरत करती न्याय,

आजकल तो सावन में, शेर भी घास ख़ाय।


उन्नत शहर की नालियां, बारिश में भर जाय,

क्या करें हर सावन में, बारिश आ ही जाय। 

Wednesday, July 30, 2025

एक शहर की सड़कें ...

एक साल में तीन चुनाव,

हर चुनाव में जागती एक उम्मीद।

कि तीन सालों से टूटी सड़कें,

अब तो सज संवर ही जाएंगी।


चंबल के बीहड़ों सी ऊबड़ खाबड़,

बारिशों में बरसाती नाला बनी सड़कें,

सावन आने से दस दिन पहले,

आखिर संवर ही गईं,

बिटुमन की काली चादर ओढ़कर।


ठेकेदार अब रोज मंदिर जाता है,

प्रसाद चढ़ाकर दुआ मांगता है,

पेमेंट होने तक सड़क की सलामती की।

आखिर अगले ही दिन,

सड़क की सतह पर उभर आईं थीं रोड़ियां।


दुनिया में परमानेंट कुछ भी नहीं,

फिर ये तो बेचारी इमरजेंसी सड़क है,

भ्रष्ट अफसरों द्वारा बनाई गई,

भ्रष्ट नेताओं की लाज रखने के लिए। 

Monday, July 21, 2025

नया नया बूढ़ा ...

 2025 का नया नया मैं बूढ़ा हूं,

पर दवाओं पर ही अब जीता हूं।


रम वोदका बीयर विस्की सब छूट गई,

मदर डेयरी की बस छाछ लस्सी पीता हूं।


पेंट शर्ट सब टंगी टंगी पुरानी हो गईं,

फट जाए तो रफुगर बन खुद सीता हूं।


रोज थैला उठाए मार्केट में दिखता हूं,

हर दुकानदार से करता फजीहता हूं।


घर में है लाइब्रेरी भरी सैकड़ों किताबों से,

पर पढ़ने लिखने में बस करता कविता हूं।


बचे खुचे हैं जो सर पर तजुर्बे के बाल हैं,

कोई सुनता नहीं वरना ज्ञान की गीता हूं।


सीढ़ियां चढ़ने में भले ही फूल जाता है दम,

पर दिल से अभी युवाशक्ति का चीता हूं।

Wednesday, June 18, 2025

मुक्तक...

एक बाइक वाला उधर से आ रहा था,

एक रिक्शावाला उधर को जा रहा था।

एक गाड़ी वाला दोनों से जा टकराया,

वो ग्रीन लाइट जंप करके जा रहा था।


आजकल मैं ना कोई काम करता हूं,

बस दिन भर केवल आराम करता हूं।

जब आराम करते करते थक जाता हूं,

तो सुस्ताने को फिर से आराम करता हूं।


आजकल साइबर फ्रॉड के केस बहुत नज़र आते हैं,

फ्रॉड करने वाले भी रोज नए नए तरीके अपनाते हैं।

हम तो सावधानी में इस कदर सावधान हो गए हैं कि,

बीवी की बेवक्त कॉल को भी डर के मारे नही उठाते हैं।


हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है ये सब जानते हैं,

किसान दिन भर मेहनत कर के भी खाक छानते हैं।

किन्तु कुछ पढ़े लिखे खाए अघाये लोग ऐसे भी हैं,

जो प्लेट भर खाना जूठा छोड़ने को फैशन मानते हैं। 

Saturday, May 17, 2025

दोस्ती की परिभाषा ।

 बचपन की गलियों में गिल्ली डंडा

और बैट बाल साथ खेलने वाले जो बच्चे

बुढ़ापे में भी संग बैठे गपियाते हैं,

वही असली दोस्त कहलाते हैं।

कॉलेज में संग उठना बैठना, खाना पीना

पिक्चर जाना और दोस्त के भाई बहन

और मात पिता से जो घुल मिल जाते हैं,

वही असली दोस्त कहलाते हैं।

दोस्त और दोस्त के बच्चों की शादी में नाचना

फिर दोस्त की गोल्डन जुबली में

जोहरा जबीं गाने पर जो थिरकते नज़र आते हैं,

वही असली दोस्त कहलाते हैं।

जिंदगी के सफ़र में सहपाठी और सहकर्मी

तो बहुत होते हैं, आते हैं, चले जाते हैं,

किंतु जीवन पर्यंत जो सुख दुख में साथ निभाते हैं,

वही असली दोस्त कहलाते हैं।