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Tuesday, January 21, 2014

पत्थरों के शहर मे सामाजिक परिवर्तन का प्रयास -- नॉयडा का राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल --


दिल्ली से नॉयडा जाने वाले  मार्ग पर सेक्टर १५-१६ के सामने सड़क और यमुना पुश्ते के बीच लगभग एक किलोमीटर से ज्यादा लम्बे ८२ एकड़ क्षेत्र में  बना है -- राष्ट्रीय दलित  प्रेरणा स्थल --जिसका उद्घाटन १४ अक्टूबर २०११ में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी ने  किया था । एक अरसे  तक विवादों में घिरा यह स्थल आखिर अब जनता के लिए खुल गया है।  मात्र १० रूपये का प्रवेश शुल्क देकर प्रवेश करते ही नज़र आता है यह राष्ट्रीय दलित स्मारक। पूरे क्षेत्र को तीन भागों में बांटा गया है जिसके ३६ एकड़ वाले में पहले खंड में बना है यह स्मारक जिसका डोम ४० मीटर ऊंचा है।  



गुलाबी रंग के पत्थरों से बना यह भवन दो चबूतरों पर बनाया गया है।



मुख्य गुम्बद के अंदर स्थापित हैं तीन मूर्तियां -- डॉक्टर भीम राव आंबेडकर , श्री कांशी राम और मायावती जी की कांस्य मूर्तियां।  



मुख्य गुम्बद के बाहर वाले कमरों में सामाजिक परिवर्तन हेतु संघर्षरत महापुरुषों की भव्य प्रतिमायें स्थापित की गई हैं।  चित्र में मायावती अपने मात पिता के साथ।   



पिछले  कक्ष से ।


साइड कक्ष से नज़ारा।



स्मारक के दोनों ओर दस दस हाथियों की प्रतिमाएं कतार में बनाई गई हैं जो स्वागत की मुद्रा में दिखाई गई हैं।




उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं में कांस्य से बने ५२ फुट ऊंचे सुन्दर फव्वारे बने हैं।



यहाँ भी हाथियों की मूर्तियां बहुतायत में देखने को मिलती हैं।



फव्वारे से भवन की ओर।




प्रवेश द्वार के पास छोटी सी केन्टीन भी है जहाँ ५ से लेकर १५ रूपये में खाने पीने का  सामान उपलब्ध है।  ज़ाहिर है , यहाँ आम आदमी का पूरा ख्याल रखा गया है।   



पहले खंड से दूसरे और तीसरे खंड में जाने के लिए यह लगभग एक किलोमीटर लम्बी पगडंडी बनी है।  दूसरे खंड में हरियाली युक्त उपवन बनाया गया है।  



३३ एकड़ में बने तीसरे खंड में एक और प्रतीक स्थल बना है जिसके मध्य में १०० फुट ऊंचा ग्रेनाइट से बना स्तम्भ है।  इसके चारों ओर  ११ संतों की कांस्य की १८ फुट ऊंची प्रतिमाएं बनी हैं।



स्तंभ का  आधार।



इस स्थल के सामने बहुत सुन्दर और हरा भरा पार्क है।  दूर क्षितिज में नॉयडा की भव्य व्यवसायिक इमारतें नज़र आ रही हैं।



वापस प्रवेश द्वार पर लौटकर।  स्मारक के सामने बहुत बड़ा ग्रेनाइट में बना अहाता है जो शाम के समय शीशे की तरह चमक रहा था।

इस स्थल के निर्माण में अनुमानत: ७०० करोड़ रुपया खर्च हुआ बताते हैं।  बेशक इसके पक्ष और विपक्ष में बहुत से भिन्न विचार सुनने को मिलेंगे।  लेकिन एक बात तय है कि मायावती जी ने अपने कार्यकाल में दलितों के संघर्ष और उनके प्रति सामाजिक रवैये में परिवर्तन की दिशा में सराहनीय कार्य किया है जिसे अंतत : सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्वीकृति प्रदान कर दी। हमारे लिए तो यह स्थान एक बढ़िया पर्यटक स्थल साबित हुआ।  लेकिन गर्मियों में निश्चित ही यहाँ आने के लिए बहुत साहस बटोरना पड़ेगा।  


Wednesday, January 15, 2014

सादा और अनुशासित जीवन , खुश मिज़ाज़ रहना और समय पर टाँका लगाना ही लम्बे स्वस्थ जीवन की कुंजी है ---



आप २५ वर्ष के युवा हों या ५० वर्ष के अधेड़ , मामला जब दिल का आता है तो सभी आयु वर्ग के लोग दिल के टूटने से घायल होते हैं।  जहाँ पहले अलग अलग आयु में दिल टूटने के कारण भी अलग अलग होते थे , वहीँ आजकल ये दूरियां मिट सी गई हैं और हर आयु में दिल की स्थिति नाज़ुक सी ही बनी रहती है।  
यानि आजकल  युवाओं को भी प्रौढ़ आयु वर्ग के रोग लगने लगे हैं।  यह आधुनिक जीवन शैली का ही परिणाम है कि आजकल युवाओं को भी ह्रदयाघात ( हार्ट अटैक ) होने लगे हैं।   

क्यों होता है हृदयाघात : 

कहते हैं पेड़ अपने फल नहीं खाते , नदियां अपना पानी नहीं पीती।  लेकिन यह भी सच है कि रसोइये को भी खाना खाना पड़ता है , डॉक्टर भी बीमार पड़ते हैं। दिल का मामला भी कुछ इसी तरह का होता है।  सारे शरीर को रक्त पहुंचाने वाले दिल को स्वयं के लिए भी रक्त की आवश्यकता होती है।  



यह काम जो नसें करती हैं उन्हें कोरोनरी आर्टरीज कहते हैं।  हृदय से एओर्टा द्वारा रक्त सारे शरीर में जाता है।  इसी से निकलती हैं दो धमनियां जिन्हे दायीं और बायीं कोरोनरी आर्टरी कहते हैं।  ये अलग अलग शाखाओं में बंटकर सारे हृदय की मांसपेशियों को रक्त पहुंचाती हैं। यदि इनमे कहीं भी रुकावट पैदा हो जाये तो रक्त प्रवाह में बाधा आ सकती है जिससे पर्याप्त मात्रा में रक्त हृदय के उत्तकों तक नहीं पहुँच पाता । ऐसे में  ऑक्सीजन और ऊर्ज़ा के भूखे उत्तक चिल्लाने लगते हैं जिसे एंजाइना कहते हैं।

मूलत: एंजाइना हृदय की एक  पुकार है आपको याद दिलाने के लिए कि उसे भी खुराक चाहिए जो पूरी नहीं हो पा रही है।  यदि अब भी आपने नहीं सुना तो यह पुकार सदा के लिए शांत हो जाती है , हार्ट अटैक के रूप में।

एंजाइना के लक्षण : 

अक्सर छाती में बायीं ओर होने वाले दर्द को एंजाइना समझा जाता है।  लेकिन सिर्फ दर्द ही नहीं बल्कि किसी भी तरह की चुभन , जलन या भारीपन भी एंजाइना हो सकता है।  इसके अलावा बायीं ओर दांत में दर्द , कंधे में दर्द या बाजु में होने वाला दर्द भी एंजाइना हो सकता है।  पसलियों के बीच पेट के ऊपरी हिस्से ( एपीगेस्ट्रियम) में होने वाले दर्द या जलन को अक्सर एसिडिटी मान लिया जाता है जबकि यह भी एंजाइना हो सकता है।  दर्द के साथ यदि पसीना भी आ गया है या घबराहट होने लगी है या दिल में धड़कन महसूस हो रही है तो यह एंजाइना होने के स्पष्ट संकेत हैं।

कारण : 

हमारे शरीर की धमनियों में कॉलेस्ट्रॉल का जमाव निरंतर होता रहता है।  यह बचपन से ही आरम्भ हो जाता है। यूँ तो कॉलेस्ट्रॉल शरीर के लिए अत्यंत आवश्यक पदार्थ है लेकिन इसकी अत्यधिकता भी उतनी ही हानिकारक है।  धमनियों में कॉलेस्ट्रॉल जमने से इनमे अवरुद्ध पैदा होता है जो रक्त प्रवाह को प्रभावित करता है।  रक्त प्रवाह कम होने से शरीर के विभिन्न अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।  लेकिन इसका सबसे ज्यादा कुप्रभाव  हृदय पर ही पड़ता है।  हृदय में यह एंजाइना के रूप में सामने आता है।  लेकिन यदि इस तरह की अवरुद्ध धमनी में अचानक कोई रुकावट आ जाये तो हार्ट अटैक हो जाता है। अक्सर ऐसा क्लॉट बनने से होता है।

कारक : 

हृदयाघात में फैमिली हिस्ट्री बहुत महत्त्वपूर्ण है।  यानि यदि आपके परिवार में किसी की मृत्यु हृदयाघात से हुई है या निकट सम्बन्धियों में हृदय रोग है तो आप भी रिस्क पर हैं।  इसके अलावा निष्क्रिय जीवन शैली , मोटापा , हाई बल्ड प्रेशर , डायबिटीज , हाई कॉलेस्ट्रॉल , धूम्रपान ,  मानसिक तनाव आदि ऐसे कारक हैं जो हृदयरोग को बढ़ावा देते हैं।

रोकथाम : 

नियमित व्यायाम , आहार नियंत्रण , नियंत्रित वज़न , बल्ड प्रेशर और शुगर कंट्रोल और तनाव रहित जीवन जीने से हृदयाघात की सम्भावना निश्चित रूप से कम हो जाती है। नियमित रूप से ४५ मिनट की पैदल  यात्रा सबसे बढ़िया व्यायाम है।  खाना उतना ही खाया जाये जितना आवश्यक है।  यानि सिर्फ जीने के लिए खाएं न कि खाने के लिए जीयें ।  मोटा होना सेहतमंद नहीं सेहतबंद होने की निशानी है।  धूम्रपान से हीरो नहीं ज़ीरो होने का रास्ता खुलता है। अंतत : घर का बना खाना ही सर्वोत्तम है, पिज़्ज़ा, बर्गर , मोमोज , नूडल्स आदि तत्काल आहार सेवा जीवन का अंतकाल है।   

उपचार : 

फिर भी यदि एंजाइना हो ही जाये तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।  सबसे पहले ई सी जी किया जायेगा , लेकिन एंजाइना होने पर एंजिओग्राफी लगभग आवश्यक हो जाती है।  इस टेस्ट से धमनी में रुकावट की स्थिति और गम्भीरता का पता चलता है।  यदि रुकावट चिकित्सा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण पायी जाती है तो स्टेंट डालना आवश्यक होता है।

हार्ट अटैक : 

हार्ट अटैक होने पर तुरंत पास के हॉस्पिटल में जाना चाहिए। ऐसे में एक एक मिनट कीमती होता है।  अक्सर हार्ट अटैक धमनी में क्लॉट बनने से अचानक हुई रुकावट के कारण होता है।  ऐसे में इंजेक्शन द्वारा क्लॉट को विघटित करने का प्रयास किया जाता है।  इसे थ्रोम्बोलाइजेशन कहते हैं।  क्लॉट के घुलने से बंद हुई धमनी खुल जाती है और रक्त प्रवाह होने लगता है।  इस तरह हृदय की मांसपेशियाँ मृत होने से बच जाती हैं।  यह कम एक घंटे में हो जाये तो सर्वोत्तम है , हालाँकि ३ घंटे तक भी फायदा होने की सम्भावना रहती है। लेकिन जितना जल्दी किया जायेगा ,  फायदा भी उतना ज्यादा होगा।

आधुनिक अस्पतालों में जहाँ एंजिओग्राफी की सुविधा होती है वहाँ तुरंत स्टेंट डालकर धमनियों को खोल दिया जाता है।  यह एक बढ़िया ईलाज़ है और आजकल बहुत उपयोग में लाया जा रहा है।  लेकिन दो से ज्यादा धमनियों में ब्लॉक होने पर बाईपास सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है। हालाँकि , उम्र भर दवाईयों का दास तो फिर भी होना ही पड़ता है।

इसलिए रोकथाम में ही भलाई है।  सादा और अनुशासित जीवन ,  खुश मिज़ाज़ रहना और समय पर टाँका लगाना ही लम्बे स्वस्थ जीवन की कुंजी है।   


Sunday, January 5, 2014

सड़क पर लगे बेरीकेड -- आपका इम्तिहान !


आज एच टी में करन थापर का पुलिस बेरिकेडिंग पर लिखा दिलचस्प लेख पढ़कर हमें अपनी सालों पहले लिखी एक हास्य व्यंग कविता याद आ गई। लीजिये आप भी पढ़िए और देखिये कितनी समानताएं हैं दोनों में।  


सड़क पर पुलिस के बैरिकेड गड़े थे ,
ट्रैफिक जाम में फंसे हम बेचैन खड़े थे ।

मैंने एक पुलिसवाले से पूछा, भई कितने आतंकवादी पकड़े ?
वो बोला -एक भी नहीं , सुबह से ख़ाली खड़े हैं ठण्ड में अकड़े ।

मैंने कहा तो फिर इसे हटाओ, क्यों बेकार समय की बर्बादी करते हो ।
वो बोला -चलो थाने, मुझे तो तुम्ही कोई आतंकवादी लगते हो ।

मैंने कहा --थाने क्यों चलूँ  ,मैंने क्या जुर्म किया है ?
वो बोला -नहीं किया तो करो, मैंने कब मना किया है ।

पर ज़नाब जुर्माना तो देना पड़ेगा ,
तुमने इक पुलिसवाले का वक्त घणा लिया है ।

अरे यदि तुमने मुझे बातों में ना जकड लिया होता ,
तो अब तक मैंने एक आध आतंकवादी तो ज़रूर पकड़ लिया होता ।

अब कैसे करूँगा मैं भरे पूरे परिवार का भरण पोषण ,
जब आतंकवादी ही न मिला, तो कैसे मिलेगा आउट ऑफ़ टर्न प्रोमोशन ।

अच्छा मोबाईल पर बात करने का निकालो एक हज़ार रूपये जुर्माना ।
मैंने कहा -मेरे पास तो मोबाईल है ही नहीं,मैं तो ऍफ़ एम् पर गुनगुना रहा था गाना ।

तो फिर ये बताओ आपने गाड़ी पचास के ऊपर क्यों चलाई ?
मैंने कहा -ये खटारा ८६ मोडल चालीस के ऊपर चलती ही कहाँ है भाई ।

रेडलाईट के १०० मीटर के अन्दर हॉर्न तो ज़रूर बजाया होगा ।
मैंने कहा -हॉर्न तो तब बजाता जब हॉर्न कभी लगवाया होता ।

फिर तो चलान कटेगा गाड़ी में हॉर्न ही नहीं है ,
मैंने कहा --सामने से हट जाओ, इसमें ब्रेक भी नहीं है ।

इस पर वो बोला - आपकी गाड़ी के शीशे ज़रुरत से ज्यादा काले हैं ।
मैंने उस कॉन्स्टेबल से कहा ज़नाब, आप भी इन्स्पेक्टर बड़े निराले हैं ।

ज़रा आँखों से काला चश्मा हटाओ, और आसमान की ओर नज़र घुमाओ।
अरे यह तो कुदरत की माया है, काले शीशे नहीं , शीशे में काले बादलों की छाया है ।

थक हार कर वो बोला, अच्छा कम्प्रोमाइज कर लेते हैं ।
चलो सौ रूपये निकालो, जुर्माना डाउनसाइज कर देते हैं ।

पर सौ रूपये किस बात के, यह बात समझ नहीं आई ?
वो बोला दिवाली का दिन है, अब कुछ तो शर्म करो भाई ।

अरे घर से बार बार फोन करती है घरवाली।
दो दिन से यहाँ पड़े हैं, हमें भी तो मनानी है दिवाली ।

मैंने कहा -यह बात थी तो हमारे अस्पताल चले आते ।
और हम से दो चार दिन का नकली मेडिकल ले जाते ।

यह कह कर तो मैंने उसका गुस्सा और जगा दिया ।
वो बोला मैं गया था, लेकिन आपके सी एम् ओ ने भगा दिया ।

और अब जो खाई है कसम , वो कसम नहीं तोडूंगा।
और मां कसम उस अस्पताल के डॉक्टर को नहीं छोडूंगा ।

और जब मुक्ति की कोई युक्ति समझ न आई ।
तो अगले साल का प्रोमिस देकर ही जान छुड़ाई ।


अगले दिन मैं घर से बिना सीट बेल्ट बांधे ही निकल पड़ा था ।
वो पुलिसवाला उसी जगह उसी चौराहे पर मुस्तैद खड़ा था ।

पर उस दिन वो निश्चिंत था , अपनी धुन में मस्त था ।
उसने मुझे न टोका , न गाड़ी के सामने आकर रोका ।

क्योंकि भले ही कोई आतंकवादी न मिला हो
इस वर्ष दिवाली पर कोई बम नहीं फूटा ।

हमारे पुलिस वाले कितनी विषम परिस्थितियों में काम करते हैं । 
इसके लिए हम इनको कोटि कोटि सलाम करते हैं ।


Monday, December 30, 2013

नांगलोई में काव्य गोष्ठी और एडवेंचर मेट्रो ट्रेल -- एक सफ़र की दास्ताँ !


तीन  साल से घटनाक्रम कुछ यूँ चलते रहे कि सभी साहित्यिक गतिविधियां लगभग बन्द सी हो गई थीं। इसलिए  जब राजीव तनेजा का काव्य गोष्ठी के लिये निमंत्रण आया तो हमने जाने का निर्णय ले लिया। लेकिन समस्या थी कि जाया कैसे जाये। दिल्ली के पूर्वी छोर से पश्चिमी छोर का रास्ता बहुत लम्बा था। लेकिन हमने जन्म लिया था दिल्ली के पश्चिमी बॉर्डर पर स्थित एक गाँव मे और अब काम करते हैं पूर्वी बॉर्डर पर। पश्चिम से पूर्व का यह सफ़र बहुत लम्बा और कठिन था। लेकिन अब पूर्व से पश्चिम का यह सफ़र भी कम कठिन नहीं लग रहा था क्योंकि इतनी दूर ड्राईव करना कोई समझदारी का काम नहीं था। हालांकि मेट्रो ठीक गोष्ठी स्थल तक जाती है लेकिन हम तो मेट्रो मे बस एक ही रूट मे बैठे थे। और यहाँ तो एक या दो बार मेट्रो बदलना आवश्यक था। मेट्रो से सफ़र का ख्याल आते ही हमे चचा ग़ालिब का एक शे'र याद आ गया जिसे हमने कुछ यूं लिखा : 

अफ़सरी ने 'तारीफ' निकम्मा कर दिया , 
वरना आदमी तो हम भी थे 'आम' से !  

खैर , हम तैयार हुए लेकिन तभी ख्याल आया कि ऐसे मे बच्चे अक्सर हमे कहते हैं कि ये क्या बुड्ढों वाले कपड़े पहन लिये हैं। इसलिये कोट और टाई निकाल कर लाल स्वेटर पहना , पावं मे स्पोर्ट शूज़ पहन लिये और सोचा अब देखते हैं कौन हमे बुड्ढा कहता है। फिर हमने श्रीमती जी से हमे मेट्रो स्टेशन तक छोड़ने का आग्रह किया लेकिन जल्दबाज़ी मे मोबाइल गाड़ी मे ही भूल गए। मोबाइल आने के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि हम बिना मोबाइल के दूर के सफ़र पर निकल पड़े। हमने भी इसे एक एडवेंचर के रूप मे स्वीकार किया और निकल पड़े नांगलोई की ओर।   

हालाँकि इतवार का दिन था लेकिन मेट्रो खचाखच भरी हुई थी।  हमने किसी तरह से गेट के पास जगह बनाई और एक हेंडल पकड़ कर खड़े हो गए।  फिर सोचा गेट के पास तो सीट मिलने से रही। इसलिए थोडा बीच में खड़े हो गए।  तभी सामने वाली सीट पर बैठा एक युवक खड़ा हो गया और हम लपक कर बैठ गए।  फिर सोचा कि वह युवक खड़ा क्यों हो गया क्योंकि अभी तो स्टेशन भी नहीं आया था।  तभी हमारा ध्यान ऊपर की ओर गया तो पता चला वहाँ लिखा था -- केवल बुजुर्गों के लिए। इस आत्मबोध से हम हतप्रद रह गए।  

नांगलोई पहुंचकर स्टेशन के सामने ही था खम्बा नंबर ४२० जिसके ठीक सामने तनेजा जी का ऑफिस था जिसके प्रथम तल पर आयोजन था इस संगोष्ठी का।       



खुली छत को ओपन एयर रेस्ट्रां बनाया गया था।




अंदर कार्यक्रम का आरम्भ किया राजीव तनेजा जी ने।




सभापति और विशिष्ठ अतिथि आ चुके थे लेकिन मुख्य अतिथि यानि हमारी कुर्सी अभी खाली थी। कार्यक्रम का सञ्चालन वंदना गुप्ता जी कर रही थी।    



इस संगोष्ठी की एक विशेष बात यह रही कि इसमें पचास से ज्यादा लोगों ने भाग लिया।  ये सभी दिल्ली के चारों कोनो से आए थे और कुछ तो दिल्ली से बाहर से भी आए थे।  




दूसरी विशेषता यह थी कि लगभग आधे से ज्यादा उपस्थिति महिलाओं की थी जो वास्तव में प्रसंशनीय था।




मुन्ना भाई अविनाश वाचस्पति ने अपनी व्यंग प्रस्तुति से लोगों को गुदगुदाया।



युवा कवि और ब्लॉगर सुलभ जयसवाल। लेकिन यह मत समझिये कि ये माइक हाथ में लेकर कोई डांस कर रहे हैं ! फिर क्या कर रहे हैं ?




वंदना जी ने भी अपने चिर परिचित अंदाज़ में अपनी एक रचना पढ़कर सुनाई जिसे सभी ने बड़ी गम्भीरता से सुना ।





अंत में हमें भी कहा गया कि कुछ हम भी सुनाएँ।  हमने क्या सुनाया , यह तो सुनने वालों ने सुन ही लिया , अब क्या बताएं।  लेकिन सुना है कि सबको आनंद आया।

अंत में चायपान और पकोड़ा पार्टी के बाद हमने प्रस्थान किया फिर एक बार मेट्रो में खड़े होकर।  इस बार भीड़ पहले से भी ज्यादा थी , हालाँकि थोड़ी देर बाद बिना बुजुर्गी का अहसास दिलाये सीट भी मिल गई। अब हम बैठे बैठे देखते रहे कि कैसे मेट्रो में सफ़र करने वाले लगभग ९० % लोगों की आयु ४० वर्ष से कम थी और ५० के ऊपर तो शायद ५ % लोग भी नहीं थे।  ज़ाहिर था , युवाओं का ज़माना है और युवा इसका भरपूर इस्तेमाल भी कर रहे थे।  सामने वाली सीट पर एक सुन्दर सी मासूम सी १८ -२० साल की लड़की बैठी थी और उसका बॉय फ्रेंड उसके सामने खड़ा था।  दोनों इसी दशा में भी जिस तरह खुसर पुसर और भौतिकीय घटनाओं का प्रदर्शन कर रहे थे , उसे देखकर साथ बैठे एक महाशय ने अपनी आँखें बंद कर ली थी।  लेकिन और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।  खुल्लम खुल्ला ऐसा पी डी ऐ देखकर हमें अपने जल्दी जवान होने पर गुस्सा सा आने लगा था।

उधर एक दूसरी सीट पर एक और १८ -२० वर्षीया मुस्लिम युवति , गोरी चिट्टी , सुन्दर सी लेकिन चेहरे पर मासूमियत लिए अपने एक साल के बच्चे के साथ बतियाती जा रही थी और अपनी स्नेहमयी ममता लुटाती जा रही थी।  आजकल बच्चे भी पैदा होते ही चंट हो जाते हैं।  ज़ाहिर है , विकास का अहसास उन्हें भी हो ही जाता है।  भले ही मेट्रो में हमें सभी आम आदमी ही नज़र आए लेकिन विकास का प्रभाव सभी पर साफ नज़र आ रहा था।  हालाँकि यह विकास सिर्फ शहरों में ही दिखाई देता है।  अभी भी देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा बाकि बचा है जहाँ पीने का पानी लाने के लिए भी महिलाओं को मीलों सफ़र तय करना पड़ता है।


नोट : इस संगोष्ठी में सभी कवियों और कवयत्रियों ने बहुत सुन्दर रचनाएं सुनाई।  एक सफल आयोजन के लिए राजीव तनेजा जी को बहुत बहुत बधाई। अंजू चौधरी , सुनीता शानू जी , रतन सिंह शेखावत , पी के शर्मा जी समेत अनेक ब्लॉगर्स और फेसबुक मित्रों से मिलना सुखद रहा।   





Thursday, December 19, 2013

आधुनिक मनुष्य को जंगली जानवरों से ही कुछ सीख लेना चाहिए --


पिछली पोस्ट से आगे --

पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ मात्र एक कोशिका से होकर आधुनिक मानव के विकास तक की कहानी करोड़ों वर्ष लम्बी है। मानव को स्वयं बन्दरों से विकसित होने में लाखों वर्ष लग गए। आरम्भ में आदि मानव जंगलों में अकेला रहता था , कंद मूल खाता था। जंगली जानवरों की तरह उसका सारा समय भोजन की तलाश में ही गुजरता था। फिर उसने समूह में रहना सीखा और मिलकर शिकार करने लगा। धीरे धीरे उसने रहने के लिए झोंपड़ी बनाना और खेती करना सीखा।  इस तरह उसने समाज में रहना शुरू किया।  समाज बना तो समाज के कायदे कानून भी बने जिनका पालन करना भी उसने सीख लिया। यही समाज विकसित होता हुआ एक दिन आधुनिक मानव के रूप में बदल गया।  

आधुनिकता में हम सदा पश्चिम से पीछे रहे हैं। विशेषकर वैज्ञानिक आविष्कार वहाँ हुए और हम तक पहुंचने में समय लगा। वैज्ञानिक युग में रहन सहन , खान पान और पहनावा बदलता रहा और हम पश्चिम के पीछे पीछे चलते रहे।  हालाँकि इस बीच हमारी अपनी सभ्यता का भी विकास हुआ जिसे विश्व में श्रेष्ठंतम भी माना गया। लेकिन हम अपना प्रभाव दूसरों पर इतना नहीं छोड़ सके जितना दूसरे हम पर।  हम पश्चिम को कुर्ता पाजामा या धोती और महिलाओं को साड़ी पहनना नहीं सिखा पाये लेकिन उनसे पैंट शर्ट और स्कर्ट एवम बिकिनी पहनना अवश्य सीख गए। 

इसी सीखने के क्रम में आता है समलैंगिकता।  भले ही यह मनुष्य जाति में सदियों से विद्धमान है लेकिन इसका पहले खुल्लम खुल्ला आह्वान पश्चिम में ही हुआ। अब यह लहर हमारे देश में भी फैलने लगी है जिसका समर्थन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर बुद्धिजीवी भी कर रहे हैं।  देखा जाये तो प्रकृति की एक भूल का सहारा लेकर आज मनुष्य प्रकृति को ही दूषित करने में लगा हुआ है।  कुछ गिने चुने बदकिस्मत लोगों की आड़ में खाये पीये अघाये लोगों ने एक सुव्यवस्थित समाज के सभी कानूनों को ताक पर रख कर सम्पूर्ण मानव जाति को विनाश के रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज मानव अधिकारों के नाम पर हम वो मांग रहे हैं जो न सिर्फ प्रकृति के विरुद्ध है बल्कि स्वयं मानव जाति के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।  एक व्यवस्थाहीन समाज का भविष्य वैसा ही हो सकता है जैसे  शरीर में कैंसर  की कोशिकाएं फैलने से होता है।  

समलैंगिक समूह में विशेषतया चार किस्म के लोग शामिल होते हैं जिन्हे एल जी बी टी कहा जाता है यानि लेस्बियन , गे , बाई सेक्सुअल और ट्रांसजेंडर। इनमे से केवल ट्रांसजेंडर लोग ही ऐसे होते हैं जिनके साथ प्रकृति ने अन्याय किया होता है।  क्योंकि इन लोगों में बायोलॉजिकल सेक्स और जेनेटिक सेक्स अलग अलग होते हैं।  अर्थात ये बाहर से देखने में लड़का या लड़की होते हैं लेकिन जेनेटिकली इसका उल्टा होता है।  यदि बायोलॉजिकल सेक्स मेल है और जेनेटिक सेक्स फीमेल तो पैदा होने वाला बच्चा लड़का दिखेगा लेकिन बड़ा होते होते उसकी आदतें और हरकतें लड़कियों जैसी होंगी।  इसे कहते हैं लड़के के शरीर में लड़की।  ज़ाहिर है , व्यस्क होने पर यह लड़का दूसरे लड़कों की ओर ही आकृषित होगा न कि लड़कियों की ओर। यह सही मायने में समलैंगिकता है। हालाँकि कुछ परिस्थितियों में पूर्ण मेडिकल चेकअप के बाद सर्जरी द्वारा लिंग परिवर्तन भी किया जा सकता है।   

ट्रांसजेंडर के अलावा बाकि तीनों में तथाकथित सेक्सुअल ओरियंटेशन की प्रॉब्लम होती है। हालाँकि इसके विभिन्न कारण माने जाते हैं लेकिन कोई निश्चित कारण अभी पता नहीं चला है। सम्भवत : समलैंगिता अक्सर परिस्थितिवश ज्यादा विकसित होती है।  अक्सर इसका आरम्भ किशोर अवस्था में होता है जिस समय सेक्सुअल एनेर्जी अनियंत्रित होती है। यौन ऊर्जा का कोई उचित निकास न होने से समलैंगिकता परिस्थतिवश एक सुविधाजनक माध्यम बन जाता है।  इसीलिए इसके उदाहरण अक्सर हॉस्टल्स , कैम्पों , जेलों और आर्मी कैम्प्स आदि में बहुतायत से देखे जा सकते हैं।  लेकिन यह क्षणिक और परिस्थितिवश होता है जो परिस्थिति बदलने के साथ ही समाप्त भी हो जाता है।  

लेकिन कुछ ऐसे व्यवसाय भी हैं जहाँ समलैंगिकता एक फैशन सा बन गया है जैसे फैशन समाज , मॉडलिंग , फ़िल्म वर्ल्ड आदि।  बेशक इतिहास में इसके प्रमाण मिलना इसी बात को दर्शाता है कि यह मानव जीवन में सदा व्याप्त रहा है।  लेकिन मानव जाति में समय के साथ साथ बुराइयां कम और अच्छाइयां बढ़ने को ही विकास कहते हैं।  अब यदि पूर्ण विकसित होकर भी हम आदि मानव की तरह व्यवहार करने लगेंगे तो यह विनाश की ओर पहला कदम होगा।  

एल जी बी समलैंगिकता प्रकृति के विरुद्ध कदम है। इसे अपराध की श्रेणी में लाये जाने पर मतभेद हो सकता है।  लेकिन समलैंगिकता मनुष्य की कुटिल बुद्धि का एक बहुत छोटा सा ही रूप है। मनुष्य यौन सम्बन्धों के मामले में इससे कहीं ज्यादा कुटिल और निर्दयी हो सकता है। इसी को विकृति कहते हैं।  यौन विकृति के कुछ उदाहरण हैं -- पीडोफिलिया यानि बच्चों के साथ यौनाचार , बेस्टिअलिटी यानि पशुओं के साथ यौनाचार , ऍक्सहिबिसनिस्म यानि सरे आम नंगा होकर घूमना , ट्रांसवेस्टिस्म यानि महिलाओं के कपडे पहनकर आनंदित होना , सैडिज्म यानि महिला को दर्द देकर यौनाचार करना आदि ऐसे मानसिक विकार हैं जो मूलत : मनोरोग की श्रेणी में आते हैं। ये विकार निश्चित ही अपराध हैं।  हालाँकि ऐसे लोगों को उपचार की भी आवश्यकता होती है।                 
अंत में यही कहा जा सकता है कि समाज के कायदे कानून समाज की भलाई के लिए बनाये जाते हैं।  इनका पालन करने से ही समाज में व्यवस्था बनी रहती है।  जंगली जानवरों में भी समूह के नियम देखे जाते हैं जिन्हे तोड़ने पर सजा भी मिलती है।  क्या हम जंगली जानवरों से भी बदतर होते जा रहे हैं ! 

       

Thursday, December 12, 2013

यदि पश्चिमी सभ्यता को अपनाना है तो उनकी अच्छाइयों को भी अपनाना होगा --


समलैंगिक सम्बन्धों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टी वी चैनलों , अख़बारों और सोशल साइट्स पर इस विषय पर लोगों की  रूचि और विचारों को पढ़कर यह महसूस हो रहा है कि समलैंगिकता समाज में व्यापक तौर पर मौजूद है। लेकिन हैरानी इस बात पर हो रही है कि इसके समर्थन में लोगों का विशेषकर युवा वर्ग का बहुत बड़ा भाग उठ खड़ा हुआ है।  इसके समर्थन में न सिर्फ पत्रकार , फैशन जगत और फ़िल्म जगत के लोग दिखाई दे रहे हैं , बल्कि आम आदमियों में भी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।  जबकि धार्मिक संस्थाओं सहित परिपक्व और रूढ़िवादी लोगों के अनुसार कोर्ट का यह निर्णय सही है।   

इस विषय के पक्ष या विपक्ष में कुछ भी न कहते हुए ( क्योंकि यह अपने आप में एक बेहद विस्तृत चर्चा का विषय है ) , यह कहना कदाचित अनुचित नहीं होगा कि समलैंगिक सम्बन्धों को मान्यता प्रदान करने की मांग मूलत: पश्चिम की अंधाधुंध नक़ल है।  कहीं न कहीं हम अपनी संस्कृति को भूलकर एक मृग मरीचिका के शिकार हो रहे हैं।  इस प्रक्रिया में हम धोबी के कुत्ते जैसे -- घर के न घाट के -- बनते जा रहे हैं। न हम पुरबिया रहे , न पश्चिमी बन सके।  क्योंकि हम पश्चिम की बुराइयों की नक़ल तो कर रहे हैं , लेकिन अच्छाइयों की नहीं। यदि पश्चिमी सभ्यता को ही अपनाना है तो उनकी अच्छाइयों को भी अपनाना होगा।

यदि पश्चिमी देशों की नक़ल करनी है तो नक़ल करिये :

* उनके अनुशासन , कर्मनिष्ठा और  कर्तव्यपरायणता की।
* यातायात के नियमों को पालन करने की ।
* शहर को स्वच्छ रखने की आदत की ।
* ईमानदारी से टैक्स भरकर विकास में योगदान देने की ।
* आबादी , प्रदुषण और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखने की।

लेकिन यह सब करने के लिए जो इच्छाशक्ति चाहिए वह तो हम में है ही नहीं।  यह काम तो हम दूसरों पर छोड़ देते हैं।  कानून और सरकार से हम डरते नहीं क्योंकि सब जगह हमारा कोई न कोई चाचा या मामा बैठा रहता है।  हम तो मनमौजी हैं और अब हमारी मौज में दखल पड़ गया है।  इसलिए विरोध कर रहे हैं।

ज़रा सोचिये हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए क्या तैयार कर रहे हैं !

Tuesday, December 3, 2013

लोग क्या कहेंगे -- आजकल कोई कुछ नहीं कहता !


अक्सर सुनने में आता है -- लोग क्या कहेंगे।  इसी कहने के डर से लोग कुछ करने में डरते हैं।  लेकिन लगता है कि यह कहने की बात पुऱाने ज़माने में होती थी।  अब कुछ कहने वाले बचे ही कहाँ हैं। आधुनिकता की दौड़ में  लोगों को सोचने की ही फुर्सत नहीं है , फिर कुछ कहने के लिए समय कहाँ से आएगा।

हमारे पड़ोस में एक सरदारजी रहते हैं।  सरदार सरदारनी दोनों बड़े सोहणे और हंसमुख हैं।  सरदारनी तो लोगों के बीच ही हंसती मुस्कराती है लेकिन अक्सर सुबह या शाम को सैर करते समय हमने पाया कि सरदारजी सैर करते करते मुस्कराते रहते हैं और होठों ही होठों में कुछ बुदबुदाते रहते हैं।  हम सोचते थे कि शायद ओशो के भक्त होंगे , इसलिए वॉक के साथ साथ मेडिटेशन करते होंगे ! या फिर मन ही मन गुरबाणी का पाठ करते होंगे।  फिर एक दिन पाया कि पास से गुजरते हुए अब वो इतने जोर से गाने लगे थे कि सुनायी पड़ने लगा था कि वो क्या गा रहे हैं।  दरअसल वो गुरबाणी नहीं बल्कि ग़ज़ल गुनगुना रहे थे।  उन्हें यूँ ग़ज़ल गाते गाते घूमते हुए देखकर उनके मनमौजी होने का अहसास होता था।

लेकिन अभी कुछ दिनों से उन्हें अपने पप्पी के साथ सुबह सुबह सोसायटी के पार्क में बेंच पर बैठकर जोर जोर से गाते हुए सुनकर बड़ा अचम्भा हुआ।  पार्क से आती आवाज़ दो ब्लॉक्स के बीच गूंजती है।  इसलिए और भी जोर से सुनाई देती है।  उन्हें यूँ गाते देखकर एक बार तो लगा कि लोग क्या सोचेंगे , क्या कहेंगे।  लेकिन सच में न तो कोई कुछ सोचता है , न कोई कुछ कहता है।

हालाँकि ऐसे व्यक्ति को लोग या तो सनकी कहते हैं , या थोड़ा खिसका हुआ। लेकिन देखा जाये तो आज किस के पास समय है कि वो किसी दूसरे के बारे में सोचे जबकि स्वयं अपने ही बारे में सोचने से फुर्सत नहीं मिलती।
शायद यह अपने मन का भ्रम ही है कि हम सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे ! आजकल लोग न कुछ कहते हैं , न सोचते हैं।