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Tuesday, December 3, 2013

लोग क्या कहेंगे -- आजकल कोई कुछ नहीं कहता !


अक्सर सुनने में आता है -- लोग क्या कहेंगे।  इसी कहने के डर से लोग कुछ करने में डरते हैं।  लेकिन लगता है कि यह कहने की बात पुऱाने ज़माने में होती थी।  अब कुछ कहने वाले बचे ही कहाँ हैं। आधुनिकता की दौड़ में  लोगों को सोचने की ही फुर्सत नहीं है , फिर कुछ कहने के लिए समय कहाँ से आएगा।

हमारे पड़ोस में एक सरदारजी रहते हैं।  सरदार सरदारनी दोनों बड़े सोहणे और हंसमुख हैं।  सरदारनी तो लोगों के बीच ही हंसती मुस्कराती है लेकिन अक्सर सुबह या शाम को सैर करते समय हमने पाया कि सरदारजी सैर करते करते मुस्कराते रहते हैं और होठों ही होठों में कुछ बुदबुदाते रहते हैं।  हम सोचते थे कि शायद ओशो के भक्त होंगे , इसलिए वॉक के साथ साथ मेडिटेशन करते होंगे ! या फिर मन ही मन गुरबाणी का पाठ करते होंगे।  फिर एक दिन पाया कि पास से गुजरते हुए अब वो इतने जोर से गाने लगे थे कि सुनायी पड़ने लगा था कि वो क्या गा रहे हैं।  दरअसल वो गुरबाणी नहीं बल्कि ग़ज़ल गुनगुना रहे थे।  उन्हें यूँ ग़ज़ल गाते गाते घूमते हुए देखकर उनके मनमौजी होने का अहसास होता था।

लेकिन अभी कुछ दिनों से उन्हें अपने पप्पी के साथ सुबह सुबह सोसायटी के पार्क में बेंच पर बैठकर जोर जोर से गाते हुए सुनकर बड़ा अचम्भा हुआ।  पार्क से आती आवाज़ दो ब्लॉक्स के बीच गूंजती है।  इसलिए और भी जोर से सुनाई देती है।  उन्हें यूँ गाते देखकर एक बार तो लगा कि लोग क्या सोचेंगे , क्या कहेंगे।  लेकिन सच में न तो कोई कुछ सोचता है , न कोई कुछ कहता है।

हालाँकि ऐसे व्यक्ति को लोग या तो सनकी कहते हैं , या थोड़ा खिसका हुआ। लेकिन देखा जाये तो आज किस के पास समय है कि वो किसी दूसरे के बारे में सोचे जबकि स्वयं अपने ही बारे में सोचने से फुर्सत नहीं मिलती।
शायद यह अपने मन का भ्रम ही है कि हम सोचते हैं कि लोग क्या कहेंगे ! आजकल लोग न कुछ कहते हैं , न सोचते हैं।  


Monday, October 8, 2012

पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों की हेरा फेरी -- बार बार, लगातार !


कॉलिज के दिनों में एक जोक बहुत सुना जाता था -- दो सहेलियां आपस में बातें कर रही थी . एक ने कहा -- ये लड़के आपस में कैसी बातें करते  हैं ?  दूसरी बोली -- जैसी हम करते हैं . पहली सहेली बोली -- हा ! इतने बदमाश होते हैं !
आज तीस साल बाद वे सब लड़के लड़कियां पुरुष और महिलाएं बन चुके होंगे . लेकिन अब ऐसा महसूस होता है कि शायद पुरुष महिलाओं से कहीं ज्यादा बदमाशी करते हैं . फिर जाने महिलाएं क्यों बराबरी का दम भरती हैं .

इत्तेफाक से पुरुष सबसे ज्यादा बदमाशी महिलाओं के मामले में ही करते हैं . यही कारण है कि वेश्यावर्ती जैसा घिनौना व्यवसाय आदि काल से चला आ रहा है . राजा महाराजाओं का रनिवास हो , या अरब शेखों के हरम , मुग़लों के अत्याचार या फिर अंग्रेजों के ज़ुल्म . सदियों से औरत पुरुषों की हवस की शिकार रही हैं . आज भी सभी शहरों में मौजूद रेड लाईट एरिया , कोठे आदि मनुष्य के इसी शौक के अड्डे हैं .

कुछ ऐसे ही पुरुषों के मनोरंजन के अड्डे होते हैं -- डांस बार्स . कुछ वर्ष पहले मुंबई में सभी डांस बार्स को बंद कर दिया गया था . तब बड़ी संख्या में डांस गर्ल्स बेरोजगार हो गई थी . यहाँ दिल्ली में यह कल्चर या तो रहा नहीं या बस छुप छुप कर होता होगा . आज भी दिल्ली में शायद ही कहीं कोई डांस बार हो . हालाँकि यह भी हो सकता है कि हम ही अनभिज्ञ हों .

अपनी विदेश यात्रा के दौरान एक रात 10 बजे डिनर के बाद सभी महिलाएं शौपिंग मोड में आ गईं। वैसे भी  मॉल्स 11 बजे तक खुले होने के कारण महिलाओं के लिए इस प्रलोभन से बचना मुश्किल था। जैसा कि आम तौर पर होता है, मानव प्रजाति हो या कोई अन्य , बच्चे भी अक्सर मां के पीछे पीछे हो लेते हैं . अब रह गए अकेले हम तीन दोस्त। और लगे सोचने कि हम क्या करें, कहाँ जाएँ .

आखिर प्रोग्राम बना कि चलो बार में बैठा जाये . वैसे भी डिनर कर ही चुके थे , एक आध बियर ही पी जा सकती थी। किसी ने बताया -- यहाँ डांस बार्स भी होते हैं जहाँ ड्रिंक्स के साथ डांस देखने का लुत्फ़ उठाया जा सकता है . हमारे लिए तो यह बिल्कुल नया अनुभव था . इसलिए टैक्सी वाले को कहा, चलो ले चलो किसी ऐसे ही बार में .

ज़ाहिर था, वहां ऐसी जगहों की कोई कमी नहीं थी , इसलिए पांच मिनट में ही पहुँच गए एक डांस बार में . प्रवेश करते ही लगा जैसे किसी अंधेर नगरी में आ गए। पहले तो डिम लाईट में देखना ही मुश्किल हो रहा था . किसी तरह वेटर ने ही टेबल दिखाई और हम बैठ गए जम कर . सामने एक स्टेज बनी थी जिस पर तेज रौशनी में एक लड़की डांस कर रही थी। पीछे बैठने की जगह बनाई गई थी जहाँ 7-8 लड़कियां और बैठी थीं। देखने में सभी 20-25 वर्ष की लग रही थी , हालाँकि चेहरे की भव्य साज सजावट के पीछे असली उम्र का पता लगाना मुश्किल था। देखने में सभी भारतीय लग रही थी और हिंदी फिल्मों के गानों पर थिरक रही थी .

बैठते ही एक के बाद एक मेनेजर और वेटर्स की लाइन लग गई . सबने  आकर सबसे हाथ मिलाकर हमारा अभिवादन किया. सच पूछिए तो यह अप्रत्यासित स्वागत हमें अस्वाभाविक और असहज सा लगा . वैसे भी एक वेटर से हाथ मिलाने का कोई औचित्य समझ नहीं आ रहा था। उधर स्टेज पर एक लड़की डांस कर बैठ जाती और दूसरी शुरू हो जाती। यह क्रम लगातार चल रहा था।

इसी असमंजस के बीच हमने बियर का ऑर्डर दिया और मेज पर रखे ड्राई फ्रूट्स चबाने लगे जिनमे काजू या बादाम कम और सख्त खोल वाले पिस्ता ज्यादा थे जिन्हें तोड़ने में बड़ी दिक्कत हो रही थी . थोड़ी देर तक कई वेटर्स हमारे इर्द गिर्द सावधान की मुद्रा में खड़े रहे। फिर हमें खाने और पीने में आत्मीयता से व्यस्त देखकर चुपचाप खिसक लिए . अब तक हमें भी कुछ कुछ समझ आने लगा था उनका व्यवहार और डांस बार का कारोबार।

वहां का माहौल देखकर हमें मुंबई के सुप्रसिद्ध कवि आसकरण अटल जी की एक कविता के कुछ अंश याद आ  गए :

लोग आ रहे हैं , जा रहे हैं
और वापस जा रहे हैं .
( हम तो बस पी खा रहे हैं )

हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
वैसे तो हर जगह लड़ाई ,
पर हाइवे पर ( बार में ) भाई भाई .

वहां शायद खाने पीने वाले तो बस हम ही थे . बाकि सब तो देखने वाले थे . इस बीच दो स्थानीय निवासी सेठ लोग स्टेज के बिल्कुल सामने आकर बैठ गए . उनमे से एक विधिवत रूप से स्थानीय वेष भूषा में था जबकि दूसरा आम कपड़ों में . सुसज्जित सेठ ने हुक्का मंगवाया और कश लेने लगा . लेकिन दूसरा खुदा का बंदा अपनी नज़रें स्टेज पर ही गडाए था . स्टेज पर बैठी एक लड़की का सारा ध्यान अब इस सेठ पर ही था . मूक बधिरों की भाषा में खुलेआम बातचीत चल रही थी . उधर थोड़े थोड़े अन्तराल पर एक दो लड़कियां गायब हो   जाती और फिर कुछ समय बाद लौट आती .

वहां क्या गोरखधंधा चल रहा था , हमारे लिए तो यह अटकलबाज़ी का ही विषय था .

आखिर, दो बियर लेने के बाद दिल में कई सवाल लिए हमने प्रस्थान करना ही उचित समझा और टैक्सी पकड़ वापस लौट आए अपने आशियाने की ओर . होटल पहुंचकर पहला झटका तब लगा जब देखा कि जिस नाम के बार में हम होकर आए थे उसी नाम का बार तो हमारे ही होटल में था . यानि खामख्वाह टैक्सी का भाड़ा दिया . उत्सुकतावश अन्दर जाकर देखा तो यहाँ भी ठीक वही दृश्य पाया .

लेकिन दूसरा झटका तब लगा जब बच्चों ने आकर बताया कि उन्होंने हमें बहुत ढूँढा , यहाँ तक कि बार में भी देखा लेकिन हम नहीं मिले . अब हम उन्हें कैसे समझाते कि हम थे तो उसी बार में लेकिन वह बार ही वहां नहीं था , कहीं और था।

अंत में , आखिरी झटके के लिए हम चल दिए अपने अपने कमरे की ओर . अन्य दोस्तों का क्या हस्र हुआ , यह तो हम नहीं जानते लेकिन जब हमने श्रीमती जी को सारी बात बताई तो हमने मिलकर जमकर ठहाका लगाया .

यह अलग बात है कि जो सवाल मन में उठे , उनका ज़वाब शायद कभी न मिल पाए।    

नोट :यह पोस्ट कुछ लोगों की संवेदनाओं को आहत कर सकती है . कृपया इसे इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म ही समझें . 

Saturday, May 21, 2011

सबसे उन्नत सामाजिक प्राणी का समाज बिखर सा गया है--




बचपन
में शेर की कहानियां सुनने का बड़ा शौक था जब भी ताउजी फ़ौज से छुट्टी आते, मेरी एक ही जिद होती , शेर की कहानी सुनने की

आज बरसों बाद जब अपने पसंदीदा टी वी चैनल डिस्कवरी पर जंगलों में विचरते शेर , बाघ , चीते आदि देखता हूँ , तो बहुत रोमांचित हो उठता हूँ

मन ही मन धन्यवाद भी करता हूँ उस वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर का जो महीनों या साल भर जंगल में रहकर जंगली जानवरों के व्यवहार का अध्ययन करता है और उनकी जीवनी पर फिल्म बनाता है, जिसे हम अपने ड्राइंग रूम के आराम में बैठकर एक घंटे में देख कर प्रफुल्लित होते हैं

इन फिल्मों को देखकर मुझे अक्सर वह कहावत याद जाती है--मैन इज सोशल एनीमल ( मनुष्य एक सामाजिक जानवर है )

सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि क्या मनुष्य को जानवर कहना उचित है

आइये देखते हैं जंगली जानवरों और मनुष्य के व्यवहार में समानताएं और भिन्नताएं

) हाथी : जंगल का सबसे बड़ा जानवर :

हाथी प्राय: झुण्ड में रहते हैं एक झुण्ड में बीसियों हाथी --नर और मादाएं तथा बच्चे --सब मिलकर रहते हैं सभी हाथी मिलकर झुण्ड के बच्चों की रखवाली करते हैं


फोटो नेट से

लेकिन सबसे भारी और शक्तिशाली होने के बावजूद हाथी कभी कभी शेरों के शिकार बन जाते हैं

कभी कोई हाथी उदंडता से व्यवहार करने लगे तो उसे झुण्ड से निकाल दिया जाता है झुण्ड से निकला अकेला हाथी पागल जैसा हो जाता है जो बड़ा उत्पाद मचाता है और मनुष्यों को हानि पहुंचा सकता है


) जंगली भैंसे --दूसरे भारी जानवर :

भैंसे सैंकड़ों और हजारों की संख्या में झुण्ड बना कर रहते हैं बड़े और शक्तिशाली नर भैंसे झुण्ड के रक्षक होते हैं और मिलकर दुश्मन का मुकाबला करते हैं बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा मादा पर होता है लेकिन समय पर सब एक होकर खड़े हो जाते हैं

ये भी कभी कभी मांसाहारियों के शिकार बन जाते हैं , विशेषकर बीमार , बूढ़े या झुण्ड से अलग हुए बच्चे

) शेर --जंगल का राजा :

ये भी समूह बनाकर रहते हैं लेकिन शेरों के झुण्ड में सभी मादाएं होती हैं , साथ में बच्चे नर एक ही होता है जो झुण्ड का सरदार होता है यह बबर शेर शानदार , शक्तिशाली और सर्व शक्तिमान होता है इसका काम केवल मादाओं को गर्भवती करना होता है इसका समूह की सभी शेरनियों पर आधिपत्य होता है कोई दूसरा शेर समूह पर तभी कब्ज़ा कर सकता है जब सरदार बूढा हो जाए और उसमे लड़ कर जीतने की क्षमता रहे

शेरों के समूह में शिकार का काम अक्सर मादाएं ही करती हैं जो मिलकर शिकार करती हैं लेकिन शिकार मिलने के बाद खाने का हक़ पहले सरदार को ही होता है उसके बाद ही बाकि खा सकते हैं

शेरों का नया सरदार आते ही पहले समूह के बच्चों को मार देता है जिससे कि वह शेरनियों से अपनी स्वयं की संतान पैदा कर सके

) बिग कैट्स --बाघ , चीता , तेंदुआ :

इनके व्यवहार में अंतर होता है इनमे नर मादा के पास अक्सर प्रजनन के समय ही आता है और गर्भवती होने के बाद छोड़कर चला जाता है इसके बाद बच्चे पैदा होने से लेकर उनका पालन पोषण और सुरक्षा की जिम्मेदारी मादा की ही रह जाती है

इनके बच्चों को सिर्फ दूसरे परभक्षियों बल्कि अपनी प्रजाति के दूसरे नरों से भी खतरा होता है

मादा बच्चों को खाना खिलाती है , उन्हें सुरक्षित स्थान पर रखती है और तब तक उनकी देखभाल करती है जब तक वे खुद शिकार करना नहीं सीख जाते यह काम भी मादा ही करती है

बड़े होने पर एक दिन ये बच्चे मां को छोड़ स्वतंत्र रूप से अपनी जिंदगी बसर करने निकल पड़ते हैं


) भेड़िये , जंगली कुत्ते और अन्य मांसाहारी तथा हिरन , जेबरा और अन्य शाकाहारी जानवर --ये सब भी प्राय बड़े समूहों में रहते हैं , मिलकर साथ चलते हैं और अपने झुण्ड से अलग नहीं होते

इन सब जानवरों में एक समानता है --सदियों से इनका व्यवहार एक जैसा ही है जो जैसा है , वो वैसा ही है समय के साथ इनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है

अब देखते हैं मानविक व्यवहार :

पृथ्वी पर मनुष्य ही एकमात्र प्राणी है जो सर्वाधिक विकसित और उन्नत है अपने दिमाग का प्रयोग करते हुए उसने अपने लिए सुख के सभी संसाधन जुटा लिए हैं

बेशक मनुष्य विकास की कड़ी में जानवरों से ही विकसित हुआ है लेकिन अब वह एक पूर्ण रूप से सामाजिक प्राणी बन चुका है

मनुष्य का परिवार होता है , खानदान होता है , जाति , धर्म और देश भी होता है
मनुष्य भी अपने बच्चों का लालन पालन करने में व्यस्त रहता है स्त्री पुरुष दोनों मिलकर घर चलाते हैं

सदियों से मनुष्य भी हाथी , भैंसे और अन्य शाकाहारी जानवरों की तरह रहता आया है संयुक्त परिवार में रहते हुए समाज के नियमों का पालन करता आया है बच्चों को संरक्षण और बड़ों को सम्मान मिलता आया है

लेकिन इक्कीसवीं सदी का मनुष्य बदल रहा है अब वह बिग किट्स की तरह व्यवहार करने लगा है

लिव इन रिलेशनशिप रखने लगा है

छोटी छोटी बात पर तलाक लेने लगा है

बिन ब्याही किशोरी मां और बच्चे को पालती एकल मां को देखकर कैसा लगता है ?

अब बड़े होते ही बच्चे भी अपने रास्ते पर निकल जाते हैं

वृद्ध मात पिता की हालत उस शेर जैसी होती है जिसकी शक्ति क्षीण होने से उसका दबदबा ख़त्म हो जाता है

परिवार टूट जाते हैं संयुक्त परिवार देखने को नहीं मिलते

शहर में लाखों लोग रहते हुए भी लोग अकेले होते हैं

इन्सान अब बदल गया है

सबसे उन्नत सामाजिक प्राणी का समाज बिखर सा गया है

क्या यही है विकास का इनाम ?

क्या हम शाकाहारी जानवरों से ही कुछ सीख पाएंगे ?