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पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ मात्र एक कोशिका से होकर आधुनिक मानव के विकास तक की कहानी करोड़ों वर्ष लम्बी है। मानव को स्वयं बन्दरों से विकसित होने में लाखों वर्ष लग गए। आरम्भ में आदि मानव जंगलों में अकेला रहता था , कंद मूल खाता था। जंगली जानवरों की तरह उसका सारा समय भोजन की तलाश में ही गुजरता था। फिर उसने समूह में रहना सीखा और मिलकर शिकार करने लगा। धीरे धीरे उसने रहने के लिए झोंपड़ी बनाना और खेती करना सीखा। इस तरह उसने समाज में रहना शुरू किया। समाज बना तो समाज के कायदे कानून भी बने जिनका पालन करना भी उसने सीख लिया। यही समाज विकसित होता हुआ एक दिन आधुनिक मानव के रूप में बदल गया।
आधुनिकता में हम सदा पश्चिम से पीछे रहे हैं। विशेषकर वैज्ञानिक आविष्कार वहाँ हुए और हम तक पहुंचने में समय लगा। वैज्ञानिक युग में रहन सहन , खान पान और पहनावा बदलता रहा और हम पश्चिम के पीछे पीछे चलते रहे। हालाँकि इस बीच हमारी अपनी सभ्यता का भी विकास हुआ जिसे विश्व में श्रेष्ठंतम भी माना गया। लेकिन हम अपना प्रभाव दूसरों पर इतना नहीं छोड़ सके जितना दूसरे हम पर। हम पश्चिम को कुर्ता पाजामा या धोती और महिलाओं को साड़ी पहनना नहीं सिखा पाये लेकिन उनसे पैंट शर्ट और स्कर्ट एवम बिकिनी पहनना अवश्य सीख गए।
इसी सीखने के क्रम में आता है समलैंगिकता। भले ही यह मनुष्य जाति में सदियों से विद्धमान है लेकिन इसका पहले खुल्लम खुल्ला आह्वान पश्चिम में ही हुआ। अब यह लहर हमारे देश में भी फैलने लगी है जिसका समर्थन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर बुद्धिजीवी भी कर रहे हैं। देखा जाये तो प्रकृति की एक भूल का सहारा लेकर आज मनुष्य प्रकृति को ही दूषित करने में लगा हुआ है। कुछ गिने चुने बदकिस्मत लोगों की आड़ में खाये पीये अघाये लोगों ने एक सुव्यवस्थित समाज के सभी कानूनों को ताक पर रख कर सम्पूर्ण मानव जाति को विनाश के रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज मानव अधिकारों के नाम पर हम वो मांग रहे हैं जो न सिर्फ प्रकृति के विरुद्ध है बल्कि स्वयं मानव जाति के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। एक व्यवस्थाहीन समाज का भविष्य वैसा ही हो सकता है जैसे शरीर में कैंसर की कोशिकाएं फैलने से होता है।
समलैंगिक समूह में विशेषतया चार किस्म के लोग शामिल होते हैं जिन्हे एल जी बी टी कहा जाता है यानि लेस्बियन , गे , बाई सेक्सुअल और ट्रांसजेंडर। इनमे से केवल ट्रांसजेंडर लोग ही ऐसे होते हैं जिनके साथ प्रकृति ने अन्याय किया होता है। क्योंकि इन लोगों में बायोलॉजिकल सेक्स और जेनेटिक सेक्स अलग अलग होते हैं। अर्थात ये बाहर से देखने में लड़का या लड़की होते हैं लेकिन जेनेटिकली इसका उल्टा होता है। यदि बायोलॉजिकल सेक्स मेल है और जेनेटिक सेक्स फीमेल तो पैदा होने वाला बच्चा लड़का दिखेगा लेकिन बड़ा होते होते उसकी आदतें और हरकतें लड़कियों जैसी होंगी। इसे कहते हैं लड़के के शरीर में लड़की। ज़ाहिर है , व्यस्क होने पर यह लड़का दूसरे लड़कों की ओर ही आकृषित होगा न कि लड़कियों की ओर। यह सही मायने में समलैंगिकता है। हालाँकि कुछ परिस्थितियों में पूर्ण मेडिकल चेकअप के बाद सर्जरी द्वारा लिंग परिवर्तन भी किया जा सकता है।
ट्रांसजेंडर के अलावा बाकि तीनों में तथाकथित सेक्सुअल ओरियंटेशन की प्रॉब्लम होती है। हालाँकि इसके विभिन्न कारण माने जाते हैं लेकिन कोई निश्चित कारण अभी पता नहीं चला है। सम्भवत : समलैंगिता अक्सर परिस्थितिवश ज्यादा विकसित होती है। अक्सर इसका आरम्भ किशोर अवस्था में होता है जिस समय सेक्सुअल एनेर्जी अनियंत्रित होती है। यौन ऊर्जा का कोई उचित निकास न होने से समलैंगिकता परिस्थतिवश एक सुविधाजनक माध्यम बन जाता है। इसीलिए इसके उदाहरण अक्सर हॉस्टल्स , कैम्पों , जेलों और आर्मी कैम्प्स आदि में बहुतायत से देखे जा सकते हैं। लेकिन यह क्षणिक और परिस्थितिवश होता है जो परिस्थिति बदलने के साथ ही समाप्त भी हो जाता है।
लेकिन कुछ ऐसे व्यवसाय भी हैं जहाँ समलैंगिकता एक फैशन सा बन गया है जैसे फैशन समाज , मॉडलिंग , फ़िल्म वर्ल्ड आदि। बेशक इतिहास में इसके प्रमाण मिलना इसी बात को दर्शाता है कि यह मानव जीवन में सदा व्याप्त रहा है। लेकिन मानव जाति में समय के साथ साथ बुराइयां कम और अच्छाइयां बढ़ने को ही विकास कहते हैं। अब यदि पूर्ण विकसित होकर भी हम आदि मानव की तरह व्यवहार करने लगेंगे तो यह विनाश की ओर पहला कदम होगा।
एल जी बी समलैंगिकता प्रकृति के विरुद्ध कदम है। इसे अपराध की श्रेणी में लाये जाने पर मतभेद हो सकता है। लेकिन समलैंगिकता मनुष्य की कुटिल बुद्धि का एक बहुत छोटा सा ही रूप है। मनुष्य यौन सम्बन्धों के मामले में इससे कहीं ज्यादा कुटिल और निर्दयी हो सकता है। इसी को विकृति कहते हैं। यौन विकृति के कुछ उदाहरण हैं -- पीडोफिलिया यानि बच्चों के साथ यौनाचार , बेस्टिअलिटी यानि पशुओं के साथ यौनाचार , ऍक्सहिबिसनिस्म यानि सरे आम नंगा होकर घूमना , ट्रांसवेस्टिस्म यानि महिलाओं के कपडे पहनकर आनंदित होना , सैडिज्म यानि महिला को दर्द देकर यौनाचार करना आदि ऐसे मानसिक विकार हैं जो मूलत : मनोरोग की श्रेणी में आते हैं। ये विकार निश्चित ही अपराध हैं। हालाँकि ऐसे लोगों को उपचार की भी आवश्यकता होती है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि समाज के कायदे कानून समाज की भलाई के लिए बनाये जाते हैं। इनका पालन करने से ही समाज में व्यवस्था बनी रहती है। जंगली जानवरों में भी समूह के नियम देखे जाते हैं जिन्हे तोड़ने पर सजा भी मिलती है। क्या हम जंगली जानवरों से भी बदतर होते जा रहे हैं !