Tuesday, January 21, 2014

पत्थरों के शहर मे सामाजिक परिवर्तन का प्रयास -- नॉयडा का राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल --


दिल्ली से नॉयडा जाने वाले  मार्ग पर सेक्टर १५-१६ के सामने सड़क और यमुना पुश्ते के बीच लगभग एक किलोमीटर से ज्यादा लम्बे ८२ एकड़ क्षेत्र में  बना है -- राष्ट्रीय दलित  प्रेरणा स्थल --जिसका उद्घाटन १४ अक्टूबर २०११ में तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती जी ने  किया था । एक अरसे  तक विवादों में घिरा यह स्थल आखिर अब जनता के लिए खुल गया है।  मात्र १० रूपये का प्रवेश शुल्क देकर प्रवेश करते ही नज़र आता है यह राष्ट्रीय दलित स्मारक। पूरे क्षेत्र को तीन भागों में बांटा गया है जिसके ३६ एकड़ वाले में पहले खंड में बना है यह स्मारक जिसका डोम ४० मीटर ऊंचा है।  



गुलाबी रंग के पत्थरों से बना यह भवन दो चबूतरों पर बनाया गया है।



मुख्य गुम्बद के अंदर स्थापित हैं तीन मूर्तियां -- डॉक्टर भीम राव आंबेडकर , श्री कांशी राम और मायावती जी की कांस्य मूर्तियां।  



मुख्य गुम्बद के बाहर वाले कमरों में सामाजिक परिवर्तन हेतु संघर्षरत महापुरुषों की भव्य प्रतिमायें स्थापित की गई हैं।  चित्र में मायावती अपने मात पिता के साथ।   



पिछले  कक्ष से ।


साइड कक्ष से नज़ारा।



स्मारक के दोनों ओर दस दस हाथियों की प्रतिमाएं कतार में बनाई गई हैं जो स्वागत की मुद्रा में दिखाई गई हैं।




उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं में कांस्य से बने ५२ फुट ऊंचे सुन्दर फव्वारे बने हैं।



यहाँ भी हाथियों की मूर्तियां बहुतायत में देखने को मिलती हैं।



फव्वारे से भवन की ओर।




प्रवेश द्वार के पास छोटी सी केन्टीन भी है जहाँ ५ से लेकर १५ रूपये में खाने पीने का  सामान उपलब्ध है।  ज़ाहिर है , यहाँ आम आदमी का पूरा ख्याल रखा गया है।   



पहले खंड से दूसरे और तीसरे खंड में जाने के लिए यह लगभग एक किलोमीटर लम्बी पगडंडी बनी है।  दूसरे खंड में हरियाली युक्त उपवन बनाया गया है।  



३३ एकड़ में बने तीसरे खंड में एक और प्रतीक स्थल बना है जिसके मध्य में १०० फुट ऊंचा ग्रेनाइट से बना स्तम्भ है।  इसके चारों ओर  ११ संतों की कांस्य की १८ फुट ऊंची प्रतिमाएं बनी हैं।



स्तंभ का  आधार।



इस स्थल के सामने बहुत सुन्दर और हरा भरा पार्क है।  दूर क्षितिज में नॉयडा की भव्य व्यवसायिक इमारतें नज़र आ रही हैं।



वापस प्रवेश द्वार पर लौटकर।  स्मारक के सामने बहुत बड़ा ग्रेनाइट में बना अहाता है जो शाम के समय शीशे की तरह चमक रहा था।

इस स्थल के निर्माण में अनुमानत: ७०० करोड़ रुपया खर्च हुआ बताते हैं।  बेशक इसके पक्ष और विपक्ष में बहुत से भिन्न विचार सुनने को मिलेंगे।  लेकिन एक बात तय है कि मायावती जी ने अपने कार्यकाल में दलितों के संघर्ष और उनके प्रति सामाजिक रवैये में परिवर्तन की दिशा में सराहनीय कार्य किया है जिसे अंतत : सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्वीकृति प्रदान कर दी। हमारे लिए तो यह स्थान एक बढ़िया पर्यटक स्थल साबित हुआ।  लेकिन गर्मियों में निश्चित ही यहाँ आने के लिए बहुत साहस बटोरना पड़ेगा।  


24 comments:

  1. अभी फरवरी में नोयडा जाना तो है, यदि समय मिल जाएगा तो अवश्‍य देखेंगे इसे भी।

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  2. कोई नेगेटिव कमेंट करना सही नहीं है...मगर इसमें सकारात्मक क्या है ये सोच रही हूँ....
    हाँ पर्यटन के लिए अच्छी जगह मानी जा सकती है...

    आभार इस पोस्ट के लिए.....हमारे देश में क्या क्या हो रहा है पता तो लगा...
    सादर
    अनु

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    1. अनु जी , हर सिक्के के दो पहलू होते हैं . इन्ही पत्थरों ने लखनऊ की शक्ल बदल दी . बेशक विकास कार्यों मे पैसा तो लगता ही है !

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  3. isme bhut kuchh skaratmk h. yadi soch ka njriya shi ho,...

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  4. Apne samaj ke liye hr vykti koi karya krta h. aur whi Mayawti ji ne kiya. i support this work.. Youth Poet Manjeet Singh Avtar 09259292641

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  5. ७०० करोड़ रुपया खर्च हुआ बताते हैं
    we could have had educational institution there or so hospital may be just exclusively for dalits
    no more comment because appreciation is only that people want

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    1. रचना जी , यहाँ बस हाथियों की बहुतायत राजनीति को दर्शाती है . वरना इस कार्य मे कोई बुराई नहीं . सब कार्यों की अपनी अहमियत होती है .

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  6. Not even a single tree is visible . wastage of that much of money ..on granite floor ..that could be replaced with nice green natural lawn .... surrounded with gulmohar trees .

    lekin paisa khaya kaise jaye ... isleye ...granite floor.

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    1. नहीं ऐसा नहीं है . ज़ोन दो और तीन मे हरियाली ही हरियाली है . पेड़ अभी बड़े होने बाकी हैं . पत्थर तो बस १० % जगह मे ही लगे हैं .

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  7. Management planted small plants in rows at Akshardham temple .. couldn't grew up till today .

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  8. खुबसूरत उपवन .खुबसूरत दीदार
    बाकी सब बातें बेकार आपका आभार .....,:-)

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  9. बढती जनसँख्या और भीडभाड के बीच इन बाग़ /पार्कों आदि की अपनी अहमियत है.चित्रों में तो बहुत ही सुन्दर दिखाई दे रहा है.
    मायावती जी अपनी खुद की मूर्तियों पर अगर पैसा न खर्च कर के उन पैसों को उत्तर प्रदेश के गाँवों देहातों के विकास में लगातीं तो उनकी वाह वाही होती.
    लोग उनकी मूर्तियाँ लगवाते ! फिर भी सराहनीय है .['नाच-गाने /सैर सपाटे आदि पर जनता के पैसे लुटाने के मामले में कम से कम अन्य मुख्यमंत्रियों की तुलना में इन्होने यह बेहतर काम किया हैं .]

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    1. जी सही कहा . बस हाथियों की मूर्तियाँ बहुतायत मे लगाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश गलत लगती है . स्वयंभू प्रदर्शन भी अवांछनीय है .

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  10. आपकी इस प्रस्तुति को आज की सीमान्त गांधी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  11. जो किया, अच्छा किया ........ और चित्र बयान कर रहा की बेहतरीन बना है पार्क :)

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  12. दराल साहब मायावती ने जो किया उससे लखनऊ शहर की काया पलट गई भले अपनी मूर्तियाँ लगवा कर सामंती प्रथा को आगे बढ़ाया या अपनी कुंठा को उजागर किया हा ये बात अलग है की 600 700 सौ करोड़ मे सड़के चमचमा सकती थीं बिजली निर्वाद मिल सकती थी राजगार के अवसर पैदा हो सकते थे नए प्रोजेक्ट डाल कर

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    1. जी , कुछ पैसा तो निश्चित ही बचाया जा सकता था .

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  13. ७०० करोर की लागत और मायावती का स्मारक ... फोटो से इसकी भव्यता नज़र आ रही है ... आपके केमरे का कमाल साफ़ नज़र आ रहा है ... अब स्मारक मायावती ने बनवाया अहि तो राजनीति भी होगी ... पर अगर इसे ऐसे ही मेंटेन भी क्या जाए तो भविष्य के लिए अच्छा पर्यटक स्थल भी बन सकता है ...

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    1. मेन्टेन तो करना ही चाहिये वरना जो खर्चा हुआ है , वह भी बेकार हो जायेगा .

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  14. अब राजनीति के चलते जो होना था वो हो ही चुका है अब तो बस यदि इसे ऐसे ही मेंटेन किया जाता रहे तो शायद भविषय के लिए यह अच्छा पर्यटक स्थल साबित हो।

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  15. मुझे इस पार्क में सिर्फ मूर्तियों से एतराज़ है ..बाकी विकास कार्यों में सौन्दरीयकरण भी अहम होता ही है.
    हाथी तो बहुत सुन्दर लगते हैं ..बशर्ते राजनीति से उन्हें न जोड़ा जाए.

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    1. सही कहा . अति हर बात की खराब होती है .

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  16. हर बात के दो पाह्लू होते हैं, कुछ अच्छा कुछ बुरा, सार्थक जानकारी मिली, आभार.

    रामराम.

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