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Thursday, December 12, 2013

यदि पश्चिमी सभ्यता को अपनाना है तो उनकी अच्छाइयों को भी अपनाना होगा --


समलैंगिक सम्बन्धों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टी वी चैनलों , अख़बारों और सोशल साइट्स पर इस विषय पर लोगों की  रूचि और विचारों को पढ़कर यह महसूस हो रहा है कि समलैंगिकता समाज में व्यापक तौर पर मौजूद है। लेकिन हैरानी इस बात पर हो रही है कि इसके समर्थन में लोगों का विशेषकर युवा वर्ग का बहुत बड़ा भाग उठ खड़ा हुआ है।  इसके समर्थन में न सिर्फ पत्रकार , फैशन जगत और फ़िल्म जगत के लोग दिखाई दे रहे हैं , बल्कि आम आदमियों में भी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।  जबकि धार्मिक संस्थाओं सहित परिपक्व और रूढ़िवादी लोगों के अनुसार कोर्ट का यह निर्णय सही है।   

इस विषय के पक्ष या विपक्ष में कुछ भी न कहते हुए ( क्योंकि यह अपने आप में एक बेहद विस्तृत चर्चा का विषय है ) , यह कहना कदाचित अनुचित नहीं होगा कि समलैंगिक सम्बन्धों को मान्यता प्रदान करने की मांग मूलत: पश्चिम की अंधाधुंध नक़ल है।  कहीं न कहीं हम अपनी संस्कृति को भूलकर एक मृग मरीचिका के शिकार हो रहे हैं।  इस प्रक्रिया में हम धोबी के कुत्ते जैसे -- घर के न घाट के -- बनते जा रहे हैं। न हम पुरबिया रहे , न पश्चिमी बन सके।  क्योंकि हम पश्चिम की बुराइयों की नक़ल तो कर रहे हैं , लेकिन अच्छाइयों की नहीं। यदि पश्चिमी सभ्यता को ही अपनाना है तो उनकी अच्छाइयों को भी अपनाना होगा।

यदि पश्चिमी देशों की नक़ल करनी है तो नक़ल करिये :

* उनके अनुशासन , कर्मनिष्ठा और  कर्तव्यपरायणता की।
* यातायात के नियमों को पालन करने की ।
* शहर को स्वच्छ रखने की आदत की ।
* ईमानदारी से टैक्स भरकर विकास में योगदान देने की ।
* आबादी , प्रदुषण और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण रखने की।

लेकिन यह सब करने के लिए जो इच्छाशक्ति चाहिए वह तो हम में है ही नहीं।  यह काम तो हम दूसरों पर छोड़ देते हैं।  कानून और सरकार से हम डरते नहीं क्योंकि सब जगह हमारा कोई न कोई चाचा या मामा बैठा रहता है।  हम तो मनमौजी हैं और अब हमारी मौज में दखल पड़ गया है।  इसलिए विरोध कर रहे हैं।

ज़रा सोचिये हम अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए क्या तैयार कर रहे हैं !