एक सुबह अस्पताल जाते हुए रास्ते में यह नज़ारा देखा तो फोटो ले लिया। यही ज़ेहन में आकर एक ग़ज़ल बन गई :
हर सू हरियाली छाई है ,
अपनी जाँ पे बन आई है।
औरों की सजती, महफ़िल है,
एक हम पर ही तनहाई है।
धोखा मत खा जाना यारो,
तन उजला, मन पर काई है।
छोड़ें या अपनायें किसको,
दूल्हा दुल्हन ना बाराती,
शूगर का रोगी है खुद वो
क्यों बाजा ना शहनाई है।
शूगर का रोगी है खुद वो
जो पेशे से हलवाई है।
ना समझे ना माने दिल की,
क्यों ऐसा वो हरजाई है।
रक्त का रंग है एक, मानो तो
सब ही आपस में भाई हैं।
दिल जीते जो 'तारीफ़ों' से,
तो खुशियों की भरपाई है।
नोट : ग़ज़ल में मात्रिक क्रम है - 22 22 22 22








