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Friday, January 11, 2013

डाक्टर अच्छा मिले , तो और बात है --


कहते हैं , हँसना और गाल फुलाना एक साथ नहीं होता। लेकिन लगता है कवियों के जीवन में ये प्रक्रियाएं साथ साथ ही चलती हैं। तभी तो ख़ुशी हो या ग़म, एक कवि का धर्म तो कविता सुनाना ही है। विशेषकर हास्य कवियों के लिए यह दुविधा और भी महत्त्वपूर्ण होती है। भले ही दिल रो रहा हो, लेकिन हास्य कवि को तो श्रोताओं को हँसाना होता है। यही उसका कर्म है , यही कवि धर्म है।

कुछ ऐसा ही हुआ गत सप्ताह। सांपला सांस्कृतिक मंच, हरियाणा में एक हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसमे हमें मुख्य अतिथि बनाया गया था। लेकिन उसी दिन सुबह ही पता चला कि बहादुरी के साथ जीवन संघर्ष कर रही दामिनी की सिंगापुर में मृत्यु हो गई थी। अचानक यह खबर सुनकर एक पल को ऑंखें नम हो गईं। ऐसा लगा जैसे अचानक कुछ ढह सा गया। उस दिन शाम को ही तो कवि सम्मेलन में जाना था। भला ऐसे में हँसना हँसाना क्या उचित होता। आयोजक को फोन किया तो पता चला कि सारी तैयारियां हो चुकी थी , इसलिए स्थगित करना संभव नहीं था। हमने भी सम्मिलित होने का वचन दिया था, इसलिए अब पीछे नहीं हटा जा सकता था। आखिर भारी मन से हमने प्रस्थान किया।        







कवि सम्मेलन में एक से बढ़कर एक धुरंधर कवि अलग अलग राज्यों से आए हुए थे। साथ ही सांपला के क्षेत्रिय निवासियों में भी कई लोग थे जिन्हें कविता का शौक था। इनमे से कई तो डॉक्टर ही थे। रात 8 बजे शुरू हुआ कार्यक्रम आधी रात के बाद ढाई बजे तक चला। हैरानी की बात थी कि कड़ाके की ठण्ड के बावजूद , रात 2 बजे तक एक भी श्रोता पंडाल छोड़कर नहीं गया और सब तन्मयता से कवितायेँ सुनते रहे। हालाँकि हमें तो इतनी देर तक बैठे रहने की आदत नहीं थी लेकिन 6 घंटे कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। 

कवियों की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि उन्हें देखकर यह पता नहीं लगाया जा सकता कि यह कवि हास्य रस का है या वीर रस का , या फिर श्रृंगार या प्रेम रस का। एक दम शांत सा दिखने वाला कवि मंच पर माईक के सामने आते ही जब दहाड़ने लगता है तब उसके ओजस्वी होने का अहसास होता है। इसी तरह साधारण सा इन्सान दिखने वाला बंदा जब हर वाक्य पर हास्य की फुलझड़ियाँ छोड़ता है तब उसकी असाधारण प्रतिभा का बोध होता है। किसी को हँसाना बड़ा मुश्किल काम है। वास्तव में यह एक गंभीर काम है। हम तो पहले से ही मानते आए है कि जब लोग हँसते हैं तब वे अपना तनाव हटाते हैं। और जो लोग हंसाते हैं, वे दूसरों के तनाव मिटाते हैं। इस तरह हँसाना वास्तव में एक परोपकार का कार्य है। और एक कला भी है जो सब के पास नहीं होती ।

ज्यादातर कवि सम्मेलन अक्सर रात में ही आयोजित किये जाते हैं। समाप्त होते होते आधी रात से भी ज्यादा गुजर जाती है। फिर खाना और अक्सर 3-4 बजे प्रस्थान। ज़ाहिर है, कवियों की जिंदगी खतरों और मुश्किलों से भरी होती है। रात में सडकों पर ड्राईव करना खतरे से खाली नहीं होता, विशेषकर दूर दराज़ के क्षेत्रों में। 2009 में हुए एक सड़क हादसे में श्री ओम प्रकाश आदित्य समेत कई जाने माने प्रसिद्द कवियों को जान से हाथ धोना पड़ा था। जिन कवियों की डिमांड ज्यादा रहती है , वे विशेष अवसरों पर लगभग रोज़ाना कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेते हैं। ऐसे में नींद भी पूरी नहीं हो पाती होगी। बेशक, इनसे होने वाली कमाई ज्यादातर कवियों के लिए बहुत अहमियत रखती है। कई कवियों की तो रोजी रोटी ही कवि सम्मेलनों से चलती है। लेकिन निसंदेह , समाज में कवियों का योगदान न सिर्फ मनोरंजन के लिहाज़ से बल्कि सामाजिक चेतना जागरूक करने में भी महत्त्वपूर्ण होता है।   





आजकल सभी कवि सम्मेलन हास्य कवि सम्मेलन ही कहलाते हैं। हालाँकि सभी कार्यक्रमों में कविगण मिश्रित रस के ही होते हैं। लेकिन सभी कवि अपनी विधा की कविता के साथ हंसाने में भी सफल रहते हैं। इसी से पता चलता है कि लगभग सभी कवि विनोदी स्वाभाव के होते हैं। दूसरे शब्दों में यदि आप विनोदी स्वाभाव के हैं तो आप भी कवि हो सकते हैं। एक तरह से कवि हमें जिंदगी को सही मायने में जीना सिखाते हैं। अक्सर कवियों की हाज़िरज़वाबी तो कमाल की होती है। मंच पर भी एक दूसरे पर फब्तियां कसते रहते हैं। लेकिन सब इसे हास परिहास के रूप में ही लेते हैं। हालाँकि कभी कभार मामला हद से गुजर जाता है।




सांपला हास्य कवि सम्मेलन में सभी कवियों से मिलकर बहुत अच्छा लगा। हमारे लिए तो यह एक नया अनुभव था। मंजे हुए कवियों के बीच बैठकर बिना हूट हुए कविता आदि सुनाकर हमने भी अपना निशुल्क योगदान दिया। वापसी में कई अन्य कवियों को दिल्ली बस अड्डा छोड़कर हम सुबह साढ़े पांच बजे जब घर पहुंचे तो घर में एंट्री मुश्किल से ही मिली। आखिर यह भी कोई वक्त होता है घर आने का !   

अंत में एक सवाल : यदि कवि सम्मेलनों का आयोजन दिन में किया जाये तो क्या बुराई है। इससे सभी को सुविधा रहेगी, विशेषकर कवियों की मुश्किलें कम हो सकती हैं। या शायद बढ़ भी सकती हैं। 

नोट :  हमें सुनने के लिए कृपया यहाँ चटका लगायें।   
कवि सम्मेलन के मुख्य आयोजक भाई अंतर सोहिल का आभार प्रकट करते हुए, उन्हें एक अत्यंत सफल आयोजन पर बधाई देता हूँ।