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Thursday, August 9, 2018

हमारी धार्मिक आस्था के नाम पर अराजकता फ़ैलाने पर रोक लगनी चाहिए --


सावन के उमस भरे महीने में कंधे पर गंगा जल से भरे लोटे का भार उठाये हुए, पैरों में पड़े छालों की परवाह किये बिना, नंगे पांव २५० किलोमीटर पैदल चलते हुए, अपनी मंज़िल तक पहुंचना, सचमुच दिल की गहराइयों में बसी शिव भक्ति और श्रद्धा भावना का प्रतीक है। यह देखकर कांवड़ियों के प्रति प्रेम और सहानुभूति की मिली जुली भावना मन में आना स्वाभाविक है। कुछ युवक तो साल दर साल इस यात्रा में सम्मिलित होकर गर्वान्वित मह्सूस करते हैं। यह और बात है कि इस बेहद कष्टदायक प्रक्रिया को पूर्ण करने से व्यक्ति विशेष को सिवाय मन की आंतरिक प्रसन्नता के कुछ और हासिल नहीं होता।

लेकिन शिव भक्ति की आड़ में कुछ असामाजिक तत्त्व समाज और कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी मनमानी करते नज़र आते हैं। यह समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। ज़रा सोचिये,
* ट्रकों पर हज़ारों वाट का म्यूजिक सिस्टम लगाकर, शराब पीकर, रास्ते में भांगड़ा करते १२ साल से लेकर २०-२२ साल तक की आयु के युवा क्या कहलायेंगे !
* या फिर एक बाइक या स्कूटर पर गेरुआ टी शर्ट और कच्छा पहनकर, हाथों में बेसबॉल बैट पकड़े, बिना हेलमेट के  तीन तीन युवा बैठकर सडकों के बीचों
  बीच सीधी उलटी दिशा में बेधड़क ड्राईव करते हुए क्या शिव भक्त कहलायेंगे ! 
* कानून भी ऐसे में धार्मिक आस्था के नाम पर मनमानी करने के लिए खुली छूट दे देता है।
* इसी कारण इन दिनों में दिल्ली की सडकों पर कोई भी गेरुए वस्त्र पहनकर बाइक पर बिना हेलमेट मस्ती करता हुआ घूम सकता है क्योंकि उसे विश्वास होता
  है कि कोई ट्रैफिक पुलिस वाला उसका चालान नहीं काट पायेगा। 
*  देखा जाये तो यह धार्मिक सहिष्णुता का दुरूपयोग है जिसका दुष्परिणाम आम जनता को भुगतना पड़ता है।     
कुछ लोग इसे विभिन्न धर्मों से जोड़कर दलील देते हैं कि जब अन्य धर्मों के लोग धर्म का दुरूपयोग करते हैं, तब कोई शोर नहीं मचता। धर्म चाहे कोई भी हो , कोई भी धर्म अनुयायियों को गलत रास्ते पर चलने का निर्देश नहीं देता, न ही बाध्य करता है। एक दूसरे को देखकर गलतियाँ करते रहना धर्म का ही विनाश है। धर्म हमारा सही रास्ते पर चलने का मार्गदर्शन करता है। इसलिए धर्म और धार्मिक आस्था की आड़ में अमानवीय व्यवहार सहन नहीं किया जाना चाहिए और इसे रोकने के लिए प्रशासन को ठोस और कठोर कदम उठाने चाहिए।         

Friday, January 11, 2013

डाक्टर अच्छा मिले , तो और बात है --


कहते हैं , हँसना और गाल फुलाना एक साथ नहीं होता। लेकिन लगता है कवियों के जीवन में ये प्रक्रियाएं साथ साथ ही चलती हैं। तभी तो ख़ुशी हो या ग़म, एक कवि का धर्म तो कविता सुनाना ही है। विशेषकर हास्य कवियों के लिए यह दुविधा और भी महत्त्वपूर्ण होती है। भले ही दिल रो रहा हो, लेकिन हास्य कवि को तो श्रोताओं को हँसाना होता है। यही उसका कर्म है , यही कवि धर्म है।

कुछ ऐसा ही हुआ गत सप्ताह। सांपला सांस्कृतिक मंच, हरियाणा में एक हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया था जिसमे हमें मुख्य अतिथि बनाया गया था। लेकिन उसी दिन सुबह ही पता चला कि बहादुरी के साथ जीवन संघर्ष कर रही दामिनी की सिंगापुर में मृत्यु हो गई थी। अचानक यह खबर सुनकर एक पल को ऑंखें नम हो गईं। ऐसा लगा जैसे अचानक कुछ ढह सा गया। उस दिन शाम को ही तो कवि सम्मेलन में जाना था। भला ऐसे में हँसना हँसाना क्या उचित होता। आयोजक को फोन किया तो पता चला कि सारी तैयारियां हो चुकी थी , इसलिए स्थगित करना संभव नहीं था। हमने भी सम्मिलित होने का वचन दिया था, इसलिए अब पीछे नहीं हटा जा सकता था। आखिर भारी मन से हमने प्रस्थान किया।        







कवि सम्मेलन में एक से बढ़कर एक धुरंधर कवि अलग अलग राज्यों से आए हुए थे। साथ ही सांपला के क्षेत्रिय निवासियों में भी कई लोग थे जिन्हें कविता का शौक था। इनमे से कई तो डॉक्टर ही थे। रात 8 बजे शुरू हुआ कार्यक्रम आधी रात के बाद ढाई बजे तक चला। हैरानी की बात थी कि कड़ाके की ठण्ड के बावजूद , रात 2 बजे तक एक भी श्रोता पंडाल छोड़कर नहीं गया और सब तन्मयता से कवितायेँ सुनते रहे। हालाँकि हमें तो इतनी देर तक बैठे रहने की आदत नहीं थी लेकिन 6 घंटे कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। 

कवियों की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि उन्हें देखकर यह पता नहीं लगाया जा सकता कि यह कवि हास्य रस का है या वीर रस का , या फिर श्रृंगार या प्रेम रस का। एक दम शांत सा दिखने वाला कवि मंच पर माईक के सामने आते ही जब दहाड़ने लगता है तब उसके ओजस्वी होने का अहसास होता है। इसी तरह साधारण सा इन्सान दिखने वाला बंदा जब हर वाक्य पर हास्य की फुलझड़ियाँ छोड़ता है तब उसकी असाधारण प्रतिभा का बोध होता है। किसी को हँसाना बड़ा मुश्किल काम है। वास्तव में यह एक गंभीर काम है। हम तो पहले से ही मानते आए है कि जब लोग हँसते हैं तब वे अपना तनाव हटाते हैं। और जो लोग हंसाते हैं, वे दूसरों के तनाव मिटाते हैं। इस तरह हँसाना वास्तव में एक परोपकार का कार्य है। और एक कला भी है जो सब के पास नहीं होती ।

ज्यादातर कवि सम्मेलन अक्सर रात में ही आयोजित किये जाते हैं। समाप्त होते होते आधी रात से भी ज्यादा गुजर जाती है। फिर खाना और अक्सर 3-4 बजे प्रस्थान। ज़ाहिर है, कवियों की जिंदगी खतरों और मुश्किलों से भरी होती है। रात में सडकों पर ड्राईव करना खतरे से खाली नहीं होता, विशेषकर दूर दराज़ के क्षेत्रों में। 2009 में हुए एक सड़क हादसे में श्री ओम प्रकाश आदित्य समेत कई जाने माने प्रसिद्द कवियों को जान से हाथ धोना पड़ा था। जिन कवियों की डिमांड ज्यादा रहती है , वे विशेष अवसरों पर लगभग रोज़ाना कवि सम्मेलनों में हिस्सा लेते हैं। ऐसे में नींद भी पूरी नहीं हो पाती होगी। बेशक, इनसे होने वाली कमाई ज्यादातर कवियों के लिए बहुत अहमियत रखती है। कई कवियों की तो रोजी रोटी ही कवि सम्मेलनों से चलती है। लेकिन निसंदेह , समाज में कवियों का योगदान न सिर्फ मनोरंजन के लिहाज़ से बल्कि सामाजिक चेतना जागरूक करने में भी महत्त्वपूर्ण होता है।   





आजकल सभी कवि सम्मेलन हास्य कवि सम्मेलन ही कहलाते हैं। हालाँकि सभी कार्यक्रमों में कविगण मिश्रित रस के ही होते हैं। लेकिन सभी कवि अपनी विधा की कविता के साथ हंसाने में भी सफल रहते हैं। इसी से पता चलता है कि लगभग सभी कवि विनोदी स्वाभाव के होते हैं। दूसरे शब्दों में यदि आप विनोदी स्वाभाव के हैं तो आप भी कवि हो सकते हैं। एक तरह से कवि हमें जिंदगी को सही मायने में जीना सिखाते हैं। अक्सर कवियों की हाज़िरज़वाबी तो कमाल की होती है। मंच पर भी एक दूसरे पर फब्तियां कसते रहते हैं। लेकिन सब इसे हास परिहास के रूप में ही लेते हैं। हालाँकि कभी कभार मामला हद से गुजर जाता है।




सांपला हास्य कवि सम्मेलन में सभी कवियों से मिलकर बहुत अच्छा लगा। हमारे लिए तो यह एक नया अनुभव था। मंजे हुए कवियों के बीच बैठकर बिना हूट हुए कविता आदि सुनाकर हमने भी अपना निशुल्क योगदान दिया। वापसी में कई अन्य कवियों को दिल्ली बस अड्डा छोड़कर हम सुबह साढ़े पांच बजे जब घर पहुंचे तो घर में एंट्री मुश्किल से ही मिली। आखिर यह भी कोई वक्त होता है घर आने का !   

अंत में एक सवाल : यदि कवि सम्मेलनों का आयोजन दिन में किया जाये तो क्या बुराई है। इससे सभी को सुविधा रहेगी, विशेषकर कवियों की मुश्किलें कम हो सकती हैं। या शायद बढ़ भी सकती हैं। 

नोट :  हमें सुनने के लिए कृपया यहाँ चटका लगायें।   
कवि सम्मेलन के मुख्य आयोजक भाई अंतर सोहिल का आभार प्रकट करते हुए, उन्हें एक अत्यंत सफल आयोजन पर बधाई देता हूँ।    



Tuesday, April 3, 2012

क्या एक आम आदमी को अपने ही घर में शांति के साथ रहने की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार नहीं होना चाहिए--


बचपन में गाँव में रहते थेबाद में शहर आने के बाद भी गर्मियों की छुटियाँ गाँव में ही बीततीमई जून के महीने गाँव में शादियों के दिन होते थेइसका कारण यही रहा होगा कि अप्रैल मई तक सारी फसल कटकर , घर में गेहूं के रूप में जाती थी जिसमे से कुछ हिस्सा बेचकर कुछ पैसे हाथ में जाते थेफिर होती थी शादी की तैयारियां

उन दिनों मनोरंजन के नाम पर भजनी बुलाये जाते थेभजनी यानि संगीत मंडली जिसमे सब पुरुष होते थे जो क्षेत्रीय भाषा में क्षेत्रीय लोक गीत और कहानी किस्से सुनातेइनमे प्रमुख होते थे राजा हरीश चन्द्र का किस्सा , नल दमयंती का किस्सा आदि आदि


उस दिन गाँव के दो मोहल्लों में एक ही दिन दो शादियाँ थी । उस
दिन भी दोनों परिवारों ने भजनी बुला रखे थेदोनों खेमे करीब १०० मीटर के फासले पर जम गए और शुरू हो गया गानों का दौरसारी रात निकल गई , लेकिन दोनों मंडलियों ने बंद करने का नाम नहीं लियाजिद यही थी कि कौन पहले हार मान ले

गाँव के भोले भालेअनपढ़ लोग इस प्रतिस्पर्धा का भरपूर आनंद लेते रहेहालाँकि एक पार्टी में हम भी शामिल थेआखिर पौ फटनेके साथ ही दोनों का शोरगुल बंद हुआलेकिन किसी को कोई शिकायत नहीं थी

शहर में :

स्कूल के दिनों में घर के पास एक गुरुद्वारा थाजहाँ रोज सुबह लाउड स्पीकर पर गुरबाणी सुनने को मिलतीबोले सो निहाल का नारा पहली बार तभी सुना थालेकिन नींद में विघ्न पड़ता था
इसलिए लोगों की शिकायत पर लाउड स्पीकर को बंद कर दिया गया

दिल्ली में हर कॉलोनी में एक मस्जिद भी होती है जहाँ रोज अज़ान की जाती हैयहाँ भी लाउड स्पीकर का प्रयोग प्रतिबंधित है

गिरजाघर में तो वैसे ही परम शांति का वास रहता है

१ अप्रैल २०१२ :

कल से हमारी सोसायटी के दायीं ओर से एक अखंड पाठ की आवाज़ रही थीआज रामनवमी को बायीं ओर से संगीत की आवाज़ आने लगी
पहले धुन शुरू हुई --तुम अगर साथ देने का वादा करो -- हमने सोचा सुबह सुबह किस का मूड रोमांटिक हो गया । लेकिन फिर जाना कि यह तो फ़िल्मी धुन पर भजन गाया जा रहा हैपहले तो सारी रात पाठ ने नींद ख़राब की , फिर सुबह से ऐसा आलम पैदा हुआ कि हमें वही गाँव का दृश्य नज़र आने लगाऐसा लग रहा था जैसे कोई कॉम्पिटिशन हो रहा होसबसे ख़राब बात तो यह रही कि एक छोटा सा शामियाना लगाकर एक नौकर गानों के टेप बदलता जा रहा था और कोई सुनने वाला भी नहीं था

दोनों कानों से अलग अलग संगीत सुनते सुनते कान पक चुके हैं -- दोपहर होने को आई लेकिन कोई थकने का नाम ही नहीं ले रहा । सारे खिड़की दरवाज़े बंद कर देता हूँ -- शोर कुछ कम लगता है -- श्रीमती जी ने रामनवमी के अवसर पर विशेष भोजन की व्यवस्था की है -- देसी घी का हलवा , पूरी भाजी और काले चने ।
शुद्ध सात्विक भोजन देखकर मन प्रसन्न हो गया --एक पल के लिए आँखें बंद कर ईश्वर का धन्यवाद किया --फिर सभी प्रतिबन्ध भूलकर डटकर खाया --जल्दी ही उसका असर आने लगता है और मैं सो जाता हूँ , वहीँ कार्पेट पर , टी वी के सामने ।

दो घंटे बाद नींद खुलती है -- बायीं ओर का शोर अब बंद हो चुका है -- दायीं ओर से आती हुई आवाज़ अब थक चुकी है -- फटी फटी सी बेसुरी आवाज़ -- गाँव का वो किस्सा याद आने लगता हैअखंड पाठ में घर के लोग बारी बारी बैठते हैं -- गायक मंडली भी बारी बांध लेती है -- लेकिन वाद्य यंत्र कभी नहीं थकते -- इन्सान नहीं हैं ना -- अब बस हौर्मोनियम की आवाज़ आ रही है --- पुराने हिंदी फिल्म के एक रोमांटिक गाने की धुन -- इक परदेसी मेरा दिल ले गया -- अब कोई नहीं पहचान सकता , भजन है या फ़िल्मी गीत - - वाद्य यंत्र संगीत के साथ छेड़ छाड़ नहीं करते -- इन्सान नहीं हैं ना

शाम के ६ बज चुके हैं -- मैं तैयार होने लगता हूँ --- आज शाम ७ बजे डॉक्टर्स की एक मीटिंग है -- नवरात्रे ख़त्म जो हो गए हैं ।