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Monday, December 19, 2016

परिवर्तन तो अवश्यम्भावी है ---


सोच बदल रही है , देश बदल रहा है , आप माने या ना माने। हम यह जानते थे और रोज देखते थे कि कैसे हमारे देखते देखते युवा वर्ग की सोच बदल रही है।देश की लगभग आधी आबादी युवा वर्ग से बनती है। हम चाहे जितना मर्ज़ी जोर लगा लें , सोशल मीडिया पर बहस करते रहें , मोदी जी समेत नेताओं को भला बुरा कहते रहें, लेकिन यह सच है कि देश का भविष्य तो यह युवा वर्ग ही निर्धारित करेगा। और हिंदुस्तान टाइम्स के एक सर्वेक्षण ने यह साबित भी कर दिया।

इस सर्वेक्षण के अनुसार  :
* आधे से ज्यादा युवा देश में रहना नहीं चाहते क्योंकि उनको अपना भविष्य विदेशों में ज्यादा उज्जवल नज़र आता है।
* आधे से ज्यादा युवा शादी के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं। इसीलिए शिक्षित वर्ग में शादी की औसत आयु बढ़ती जा रही है।
* आधे से ज्यादा युवा सोचते हैं कि यदि शादी कर भी लें तो पुरानी पीढ़ी की तरह अंत तक चलने वाली नहीं लगती।
* आधे से ज्यादा युवा शादी से पहले यौन सम्बन्ध रखने में कोई बुराई नहीं समझते।
* आधे से ज्यादा युवा लिव इन रिलेशशिप में कोई बुराई नहीं समझते।
* आधे से ज्यादा अपने पार्टनर के प्रति फेथफुल रहना नहीं चाहते हैं।
* जबकि आधे से कुछ ही कम समलैंगिकता को बुरा नहीं समझते।
* आधे से कुछ ही कम अंतर्जातीय विवाह का अनुमोदन करते हैं।

यह सोच हमारे शहरी, सुशिक्षित , सभ्य समाज में रहने वाले उपरिगामी गतिशील युवा वर्ग की सोच है। और निश्चित ही इस सोच को बदला नहीं जा सकता। क्योंकि जिस तरह कोरे कागज़ पर तो रंग चढ़ा सकते हैं लेकिन रंगीन पर नहीं। कुम्हार कच्ची मिट्टी से ही मनचाहे बर्तन बना सकता है , आग में पकने के बाद नहीं। इसी तरह सांस्कारिक शिक्षा मासूम बच्चों को ही दी जा सकती है , शिक्षित युवाओं को नहीं। अब हमें इसी सोच के साथ जीना होगा , स्वीकार करना होगा और देश को बदलते देखना होगा।

वधु बिन शादी , शादी बिन प्यार ,
बिन शादी के लिव इन यार !
इस व्यवहार ने कर दी ,
संस्कार की , ऐसी की तैसी !    
     

Thursday, December 18, 2014

जितनी स्कूल कॉलेज की औपचारिक शिक्षा आवश्यक होती है , उतनी ही अनौपचारिक शिक्षा भी आवश्यक होती है ---


आजकल के बच्चे हमारे ज़माने के बच्चों से ज्यादा भाग्यशाली होते हैं ! न सिर्फ आजकल सुख सुविधाएं ज्यादा उपलब्ध हैं , बल्कि शिक्षा के क्षेत्र मे भी अब अभिभावकों द्वारा बच्चों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है ! ६० और ७० के दशक मे मात पिता जीविका उपार्जन मे ही इतने व्यस्त रहते थे कि बच्चों की पढ़ाई की ओर ध्यान ही नहीं जा पाता था ! बच्चा विधालय मे क्या कर रहा है , होम वर्क करता है या नहीं या फिर वह अपना समय कैसे व्यतीत करता है , इस ओर उनका ध्यान ही नहीं जा पाता था ! शिक्षा के क्षेत्र मे भी मेधावी छात्रों के लिये मेडिकल और इंजीनियरिंग के अलावा कोई विकल्प नहीं होता था ! जो बच्चे इन दो क्षेत्रों मे नहीं जा पाते थे और जिन्हे कुछ कर दिखाने का ज़ुनून होता था , वे अक्सर कॉलेज मे आर्ट्स सब्जेक्ट लेकर सिविल सर्विसिज की तैयारी करते थे ! इसके अलावा विधालय मे मास्टर बनना ही एक विकल्प रह जाता था ! 

लेकिन आजकल शिक्षा और व्यवसाय के मामले मे बच्चों और युवाओं के सामने अनेक विकल्प होते हैं ! मेडिकल की पढ़ाई तो अत्यंत सख्त होती है और बहुत से बच्चे इसे पसंद ही नहीं करते ! लेकिन इंजीनियरिंग मे बच्चों की रुचि दिन पर दिन बढ़ती जा रही है ! हालांकि अधिकतर बच्चे इसके बाद एम बी ए करने की कोशिश करते हैं और अपना कार्य क्षेत्र ही बदल लेते हैं ! अब अभिभावक भी बच्चों की पढ़ाई मे बच्चों जितना ही शामिल होते हैं ! होम वर्क करना हो , या ट्यूशन ले जाना हो , यहाँ तक कि परीक्षा दिलाने के लिये भी अभिभावक काम से छुट्टी लेकर बच्चों के भविष्य के प्रति चिंतित रहते हैं ! 

इन सब के रहते , आश्चर्य नहीं कि अब हमारे बच्चे शिक्षा के क्षेत्र मे विश्व भर मे अग्रणी रहते हैं ! बहुत से बच्चे अब विदेशों मे जाकर शिक्षा ग्रहण करने लगे हैं ! लेकिन आधुनिक शिक्षा प्रणाली के साथ साथ इससे जुड़ी समस्याएं भी सामने आने लगी हैं ! अब बच्चे अपने संस्कार भूलते जा रहे हैं ! कहते हैं , जितनी स्कूल कॉलेज की औपचारिक शिक्षा आवश्यक होती है , उतनी ही अनौपचारिक शिक्षा भी आवश्यक होती है , जो घर मे बड़ों से मिलती है ! औपचारिक शिक्षा से जहां भौतिक विकास होता है , वहीं अनौपचारिक शिक्षा से नैतिक विकास होता है ! असली विकास वही होता है जब आधुनिकता के साथ साथ हम अपने संस्कारों को भी जीवित रख सकें ! वर्ना आधुनिकता की आंधी मे संस्कार खत्म होकर हम अपनी पहचान ही खो जायेंगे ! 

१७ - १८ की उम्र मे शिक्षा के अलावा कुछ और बातों का भी ध्यान रखना ज़रूरी है ! इनमे सबसे महत्त्वपूर्ण है किसी भी नशे की लत से बचना ! इस उम्र मे प्रभावित होना बहुत सहज और सरल होता है ! इसलिये अक्सर युवा अपने संगी साथियों के प्रभाव मे आकर धूम्रपान जैसी आदत का शिकार हो जाते हैं ! धूम्रपान एक ऐसा मीठा ज़हर है जो धीरे धीर अपना प्रतिकूल प्रभाव छ्ड़ता है और हमारे शरीर को हानि पहुंचाता है ! जब तक हम इसका अहसास करते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है ! इसलिये इन व्यसनों से बचे रहना अत्यंत आवश्यक होता है ! 

याद रखिये, धूम्रपान करने से क्या हस्र होता है :

सिगरेट पीते थे हमदम , हम दम भरकर, 
अब हरदम हर दम पर दम निकलता है !