सोच बदल रही है , देश बदल रहा है , आप माने या ना माने। हम यह जानते थे और रोज देखते थे कि कैसे हमारे देखते देखते युवा वर्ग की सोच बदल रही है।देश की लगभग आधी आबादी युवा वर्ग से बनती है। हम चाहे जितना मर्ज़ी जोर लगा लें , सोशल मीडिया पर बहस करते रहें , मोदी जी समेत नेताओं को भला बुरा कहते रहें, लेकिन यह सच है कि देश का भविष्य तो यह युवा वर्ग ही निर्धारित करेगा। और हिंदुस्तान टाइम्स के एक सर्वेक्षण ने यह साबित भी कर दिया।
इस सर्वेक्षण के अनुसार :
* आधे से ज्यादा युवा देश में रहना नहीं चाहते क्योंकि उनको अपना भविष्य विदेशों में ज्यादा उज्जवल नज़र आता है।
* आधे से ज्यादा युवा शादी के प्रति प्रतिबद्ध नहीं हैं। इसीलिए शिक्षित वर्ग में शादी की औसत आयु बढ़ती जा रही है।
* आधे से ज्यादा युवा सोचते हैं कि यदि शादी कर भी लें तो पुरानी पीढ़ी की तरह अंत तक चलने वाली नहीं लगती।
* आधे से ज्यादा युवा शादी से पहले यौन सम्बन्ध रखने में कोई बुराई नहीं समझते।
* आधे से ज्यादा युवा लिव इन रिलेशशिप में कोई बुराई नहीं समझते।
* आधे से ज्यादा अपने पार्टनर के प्रति फेथफुल रहना नहीं चाहते हैं।
* जबकि आधे से कुछ ही कम समलैंगिकता को बुरा नहीं समझते।
* आधे से कुछ ही कम अंतर्जातीय विवाह का अनुमोदन करते हैं।
यह सोच हमारे शहरी, सुशिक्षित , सभ्य समाज में रहने वाले उपरिगामी गतिशील युवा वर्ग की सोच है। और निश्चित ही इस सोच को बदला नहीं जा सकता। क्योंकि जिस तरह कोरे कागज़ पर तो रंग चढ़ा सकते हैं लेकिन रंगीन पर नहीं। कुम्हार कच्ची मिट्टी से ही मनचाहे बर्तन बना सकता है , आग में पकने के बाद नहीं। इसी तरह सांस्कारिक शिक्षा मासूम बच्चों को ही दी जा सकती है , शिक्षित युवाओं को नहीं। अब हमें इसी सोच के साथ जीना होगा , स्वीकार करना होगा और देश को बदलते देखना होगा।
वधु बिन शादी , शादी बिन प्यार ,
बिन शादी के लिव इन यार !
इस व्यवहार ने कर दी ,
संस्कार की , ऐसी की तैसी !

