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Sunday, July 27, 2014

हर सुबह की शाम होती है, लेकिन हर शाम के बाद सुबह भी आती है ---


रोजमर्रा की भाग दौड़ की ज़िदगी से हटकर यदि कुछ दिनों  के लिये भी आप शहर से दूर किसी पर्वतीय स्थल पर चले जाएं , तो तन और मन मे नई ऊर्ज़ा और स्फूर्ति का संचार हो जाता है 


पर्वतों की रानी मसूरी मे एक सुहानी सुबह , धुंध भरी ! वृक्ष भी जैसे मिलकर हमारा मनोरंजन करने के लिये तैयार थे !  




लेकिन शाम का धुंधलका सूर्य और बादलों के साथ आंख मिचौली खेलता हुआ , पर्वतीय धरा पर अपना रंगई जादू बिखेर रहा था ! 




पर्वतों मे कुछ ही दिन का आराम और सुबह की सैर , और रास्ते मे खोखे की चाय , जीवन को असली आनंद से भर देती है ! 




इस छोटे से स्तूप को अक्सर हम मिस कर जाते थे ! लेकिन देखिये तस्वीर मे कितना भव्य लग रहा है ! 





ये टेढ़े मेढ़े पहाड़ी रास्ते हमे बताते हैं कि जिंदगी कभी सीधी नहीं चलती ! इसमे ना जाने कितने मोड़ , उतार चढ़ाव और पड़ाव आते हैं !   




हमारे लिये तो हर यात्रा एक हनीमून जैसी होती है ! फिर आपकी शादी को तीन दिन हुए हों या तीस साल , क्या फर्क पड़ता है ! यह फोटो एक नवविवाहित युग्ल द्वारा ली गई है ! 




इस वृक्ष ने हमे सिखाया कि कैसे हर विपरीत परिस्थिति का सामना करते हुए अपने अस्तित्व को कायम रखा जा सकता है ! बहारें फिर भी आती हैं , फिर भी आयेंगी , बस हौसला बनाये रखना आवश्यक होता है ! 





अब पहाड़ी पर्यटक स्थलों पर भी ध्यान दिया जा रहा है ! यह अच्छी बात है ! 





दिल को सकूं पहुंचाती एक और सुहानी शाम ढलने वाली है !  




अगली भोर ने फिर अपनी सुंदरता बिखेर दी ! 




यहाँ मौसम भी घड़ी घड़ी अंगडाई लेता है ! कभी धूप कभी छाँव ! यही तो खूबसूरती है मसूरी की ! 




शहर मे ही घना जंगल हो तो वायु भी शुद्ध ही होती है ! बस इसे अशुद्ध ना कर दें , यह हमारा फ़र्ज़ है ! 





एक पैरामिलिट्री फोर्स के गेट के पास से मसूरी का यह नज़ारा बड़ा मनमोहक होता है ! कुछ देर तक निहारने के बाद जब हमने एक ज़वान से फोटो लेने का अनुरोध किया तो उसने बड़े प्यार से कहा कि सर मैं तो कब से इंतज़ार कर रहा था कि आप मुझे फोटो खींचने के लिये कहें ! फिर उसने धड़ाधड़ कई फोटो खींच डाले ! शायद उसे हम मे अपने माँ पिता नज़र आ रहे थे !  





हर सुबह की शाम होती है ! लेकिन हर शाम के बाद सुबह भी आती है ! यही संदेश देती हुई इस शाम के सुनहरे नज़ारे को आँखों मे भरकर हमने अगले दिन दिल्ली के लिये प्रस्थान करने की तैयारी की , मन मे एक बार फिर मसूरी आने की तमन्ना के साथ ! 

Wednesday, June 25, 2014

मसूरी की सैर पर एक कवितामयी चित्रकथा ----


दिल्ली की गर्मी की मज़बूरी ,
ऐसे मे याद आ गई मसूरी ! 
मोदी प्रभाव कहें या यू पी सरकार की समझदारी ,
दो घंटे मे तय हो गई मुज़फ़्फरनगर तक की दूरी !



आठ बजे थे नाश्ते का क्या वक्त था, 
ढाबे पर खाना भी कहाँ उपयुक्त था ! 
खटिया पर बैठ चाय पीना भला लगा , 
शायद ढाबे वाला भी मोदी भक्त था ! 






मसूरी मे सुबह का मौसम सुहाना था,
अपने हाथों मे वक्त का ख़ज़ाना था ! 
सुबह की सैर पर हमे हुआ ये अहसास, 
धुंध से आए हैं इक धुंध मे जाना था ! 




यूं पहाड़ों की जिंदगी ज़रा सुस्त होती है , 
लेकिन पहाड़ियों की चाल चुस्त होती है ! 
हम दो किलोमीटर पैदल चले तो जाना,
कि खोखे की चाय भी बड़ी मस्त होती है ! 



दिन मे मस्ती का चाव छा गया , 
दिल मे साहस का भाव आ गया ! 
डरते डरते पहली बार हमने भी , 
कमर कसी और हवा मे समा गया ! 





शाम को जब सांझ होने को आई , 
आसमान मे थी काली बदली छाई ! 
रंग बिरंगे रंगों ने फिर आसमां मे , 
आधुनिक कला की कलाकृति बनाई ! 





सूरज ने जब पर्वतों पर अंतिम किरणें डाली , 
फैल गई किसी पहाडिन के गालों सी लाली !
दूर किसी चोटी पर बज उठी एक बांसुरिया ,   
और चहकने लगी चिड़ियाँ भी डाली डाली ! 





मॉल की दुकान पर सजी थी मिठाईयां , 
रंगों की छटा लिये ज्यों पंजाबी लुगाईयां ! 
छोटे मोटे पतले लम्बे खाते पीते हंसते , 
मस्ती करते पकड़े बच्चों की कलाईयाँ ! 





हमारा नव विवाहित जोड़ी सा गर्म खून था , 
हम पर भी फोटो खिंचवाने का ज़ुनून था ! 
ना कजरा ना गजरा ना पायल ना सिन्दूर ,
भई आखिर ये हमारा पचासवां हनीमून था ! 




इन वादियों ने देखे होंगे जाने कितने सावन , 
इस मौसम मे गुजरे होंगे जाने कितने यौवन ! 
कहीं वक्त की मार ठूंठ न कर दे इस वादी को, 
आओ हम मिलकर रखें पर्यावरण को  पावन ! 


Thursday, June 21, 2012

पहाड़ों पर भी चलने लगे हैं ऐ सी -- वैभव सम्पन्नता या निर्धनता !


रोजमर्रा की भाग दौड़ की जिंदगी और दिल्ली की गर्मी से परेशान लोग जिनके पास समय , साधन और शौक होता है , वे मई जून में पहाड़ों का रुख कर लेते हैं कुछ दिनों के लिए . यही कारण है , इन दिनों में मसूरी , शिमला और नैनीताल जैसे पर्वतीय स्थलों पर दिल्ली और एन सी आर की गाड़ियाँ बहुतायत में दिखाई देती हैं . थके हुए तन और मन को तरो ताज़ा करने के लिए यह आवश्यक भी है .

समय , साधन और शौक के साथ स्वास्थ्य भी :

पहाड़ों पर जाने से पहले अपना शारीरिक मुआयना ज़रूर कर लेना चाहिए . यदि आप हृदय रोग से पीड़ित हैं , या बी पी हाई रहता है , या दमा है, या फिर मोटापे से ग्रस्त हैं तो आपको सावधान रहना पड़ेगा .
क्योंकि भले ही आप गाड़ी से जाएँ लेकिन पहाड़ों के ऊंचे नीचे रास्तों पर तो पैदल ही चलना पड़ेगा . और यदि आप स्टर्लिंग रिजौर्ट्स जैसे किसी बड़े होटल / रिजॉर्ट में ठहरे तो समझिये आ गई शामत .


यहाँ ठहरने वाले सभी मेहमानों को कम से कम १०० सीढ़ियों से रोजाना बार बार ऊपर नीचे होना पड़ेगा . ज़ाहिर है , यहाँ सभी की साँस फूलती नज़र आती है . कूदते फांदते यदि कोई नज़र आते हैं तो वो यहाँ के कर्मचारी ही हैं जो बिना किसी दिक्कत के सीढियां
चढ़ते उतरते नज़र आयें
गे .
ऐसे में सलाह यही दी जाती है की पहाड़ों पर जाने से पहले कम से कम १५ दिन पहले से सुबह सैर पर जाना शुरू कर दें . तभी स्टेमिना बन सकता है और आप पहाड़ों पर पैदल चलने का आनंद ले सकते हैं .


रिजॉर्ट के गेट से निकलते ही बायीं ओर जाती यह सड़क करीब दो किलोमीटर तक जाती है जिसके एक तरफ पहाड़ है , दूसरी ओर घाटी है जिसमे कई बोर्डिंग स्कूल बने हैं . जब बाकि लोग रात की मदिरा की खुमारी में बेहोश खर्राटे भरते, हम सुबह उठकर यहाँ पैदल सैर को निकल जाते . कहीं धूप , कहीं छाँव की आँख मिचौली में वादियों को निहारते हुए विचरने में स्वर्गिक आनंद का अनुभव होता . गेट के दायीं ओर से आने वाली सड़क लाइब्रेरी चौक से आती है . इस सड़क पर शाम के समय एक डेढ़ किलोमीटर टहलना भी बड़ा आनंददायक रहता है .

अंजान से जान पहचान :

रिजॉर्ट के सामने जो पहाड़ है , उस की चोटी पर बना है राधा भवन जो इस इस्टेट के मालिक का खँडहर हुआ आलिशान बंगला है . रिजॉर्ट से यहाँ तक ट्रेकिंग का इंतजाम किया जाता है . लेकिन हमें तो वैसे भी घुमक्कड़ी का शौक है , इसलिए एक सुबह स्वयं ही निकल पड़े अनजानी राहों पर . रास्ते में एक वृद्ध कुर्ता पायजामा पहने खड़े होकर कसरत कर रहे थे. जब उनसे रास्ता पूछा तो बोले --मैं भी बाहर से ही हूँ . परिचय का आदान प्रदान होने पर उन्होंने पूछा -आप क्या करते हैं ? मैंने कहा --बस यूँ ही छोटा सा जॉब करता हूँ . इस पर वो बोले --लगता तो नहीं है .

अब इसके बाद जो विचारों का आदान प्रदान हुआ तो उनके घर जाकर चाय बिस्कुट आदि के साथ ही समाप्त हुआ. घर भी रिजॉर्ट के बिल्कुल साथ ही था जो उन्होंने ग्रीष्म निवास के रूप में हाल ही में खरीदा था . पता चला वो देहरादून में चकराता रोड पर एक बोर्डिंग स्कूल चलाते हैं , जिसके वे चेयरमेन हैं . उन्हें देखकर हमें भी यही लगा --लगता तो नहीं है .

ट्रेक करते हुए रास्ते में एक और मुसाफिर नज़र आया तो हमने उसका फायदा उठाते हुए एक फोटो खिंचवा लिया .
कहते हैं चालीस की उम्र के बाद पति पत्नी --भाई बहन जैसे नज़र आने लगते हैं .
हम तो यही कहेंगे --नज़र जो भी आयें , व्यवहार तो पति पत्नी जैसा ही होना चाहिए .


राधा भवन :

एक पहाड़ की चोटी पर समतल स्थान पर बना यह विशाल बंगला अब खँडहर बन चुका है . लेकिन यहाँ से मसूरी और आस पास के क्षेत्रों का ३६० डिग्री बड़ा मनोरम दृश्य नज़र आता है . इस बंगले में आगे की ओर दो बड़े हॉल हैं जो बैठक यानि ड्राइंग रूम रहे होंगे . पीछे एक लॉबी और कई बेडरूम थे जो अब टूट चुके हैं . नीचे की मंजिल में अनेक छोटे कमरे हैं जो शायद नौकरों के लिए रहे होंगे .

यहाँ के केयरटेकर ने बताया --इसे कभी एक काबुल के सेठ ने बनवाया था . अंग्रेजों ने इस पर कब्ज़ा कर लिया . फिर किसी सेठ ने इसे खरीद लिया .उसकी संतानें निकम्मी निकली . इसलिए अब इसकी कोई देख रेख नहीं हो पा रही . करीब ९० एकड़ में फैला यह एस्टेट आज २०० करोड़ रूपये का है .


तिब्बती बाज़ार :

२८ साल पहले भी यहाँ तिब्बतियों की अनेक दुकानें सजती थी जिन पर इम्पोर्टेड सामान मिलता था . दुकानों पर अक्सर १८-२० साल की युवा लड़कियां ही बैठती थी , मां के साथ. मर्द लोग बहुदा नदारद रहते.
अब भी इन दुकानों पर वैसा ही नज़ारा था . अब भी वहां वैसी ही युवा लड़कियां बैठी थीं . फर्क बस इतना था -- पहले जो युवा लड़की थी , अब वो मां थी और अब जो लड़की है वो उस लड़की की बेटी है .
हालाँकि , मर्द अब भी बहुत कम ही नज़र आये . लेकिन अब इन दुकानों पर स्थानीय लोग भी दुकानदारी में शामिल थे .



पर्यावरण :

समर्थता और सम्पन्नता के साथ साथ अब मिडिल क्लास आदमी भी पर्यटन पर पैसा खर्च करने की स्थिति में आ गया है . लेकिन इस बढ़ते ट्रैफिक का खामियाज़ा निश्चित ही पर्वतों और वातावरण को भुगतना पड़ रहा है . नंगे होते पहाड़ अब शीतल वायु की लहर प्रदान नहीं करते . यही वज़ह है की अब यहाँ भी कमरों में पंखे चलने लगे हैं . एक अपार्टमेन्ट की छत पर रखे दो ऐ सी देख कर दिल धक् से रह गया .

इस तस्वीर को देख कर लगता है --पर्यावरण विभाग तो अपना काम बखूबी कर रहा है . भूस्खलन से नंगे हुए पहाड़ पर फिर से पेड़ लगाकर हरियाली लाने का प्रयत्न सफल होता नज़र आ रहा है .

लेकिन क्या हम सभ्य, सुशिक्षित आधुनिक मानव अपना काम सही से कर रहे हैं ?

जगह जगह कूड़े के ढेर देखकर ऐसा तो नहीं लगता . बिना सोचे , बेदर्दी से हम पानी की बोतल , चिप्स के पेकेट , प्लास्टिक की थैलियाँ ऐसे फैंक देते हैं जैसे हमें पर्यावरण से हमें कोई लेना देना नहीं . यदि ऐसे ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब ताज़ा ठंडी हवा खाने के लिए पहाड़ों पर नहीं, घर में ही अपने कमरे में कैद रहकर ऐ सी की बासी हवा खाते रहना पड़ेगा .

नोट : मसूरी की कुछ दिलचस्प और मनभावन तस्वीरें देखने के लिए यहाँ और यहाँ क्लिक कर देख सकते हैं .


Sunday, June 17, 2012

कुछ जानी पहचानी , कुछ अंजानी , पर्वतों की रानी --- मसूरी .


दिल्ली से करीब पौने तीन सौ और देहरादून से २५ किलोमीटर की लगातार चढ़ाई के बाद आती है क्वीन ऑफ़ हिल्स ( पर्वतों की रानी ) मसूरी. यहाँ पहली बार १९८४ में आना हुआ था शादी के बाद जिसे पहला हनीमून भी कह सकते हैं . वैसे तो इन २८ वर्षों के बाद भी मसूरी वैसी की वैसी है लेकिन वातावरण में बहुत परिवर्तन आ गया है . जहाँ पहले गर्मियों में भी लोग रंग बिरंगे स्वेटर्स पहने नज़र आते थे, अब सभी कम से कम कपड़ों में दिखाई देते हैं . यह परिवर्तन बदलते वातावरण के साथ साथ बदलती जीवन शैली के कारण भी है.पहले हिल स्टेशन पर भी लोग बन ठन कर थ्री पीस सूट पहन कर घूमते थे. अब लड़कियां भी हाफ पेंट्स में नज़र आती हैं .

एक छोर पर पिक्चर पैलेस और दूसरे छोर पर लाइब्रेरी चौक के बीच करीब दो किलोमीटर लम्बी माल रोड यहाँ का मुख्य आकर्षण है . आधे से ज्यादा रास्ते पर बड़ी बड़ी दुकाने और शोरूम शाम के समय बिजली की रौशनी में मसूरी की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं . सैलानियों से भरी माल रोड पर घूमकर ही आनंद आ जाता है . भारत में और किसी हिल स्टेशन पर ऐसा नज़ारा देखने को नहीं मिलेगा जब सुहानी धूप में चलते अचानक बादलों की सफ़ेद चादर आकर आपको लपेट लेती है और लगता है जैसे मौसम बहुत ख़राब हो गया है लेकिन फिर थोड़ी ही देर में सब बिल्कुल साफ . इसीलिए मसूरी को पर्वतों की रानी कहा जाता है .

पहली बार जब यहाँ आये तो एक होटल में १५ रूपये में कमरा मिला था . अब उसी होटल में वही कमरा २५०० में मिल रहा था . लेकिन अब हमारे पास थी स्टर्लिंग रिजोर्ट्स की बुकिंग जो लाइब्रेरी चौक से ढाई किलोमीटर की दूरी पर पाइन हिल पर बना है . पहली बार यहाँ १९९७ में आये थे . तब वहां तक जाने वाली पतली सी सड़क टूटी फूटी सी थी और घाटी की तरफ कोई रेलिंग न होने से ड्राईव करने में बड़ा डर लगा था . लेकिन अब सारी सड़क पक्की बनी है और पूरे रास्ते रेलिंग लगे होने से ड्राईव करना भी सुरक्षित हो गया है .


इसी सड़क के एक मोड़ से नज़र आ रहा है , खड़ी ढलान पर बना स्टर्लिंग रिजोर्ट. यहाँ बने १ बी एच के अपार्टमेन्ट में टी वी , फ्रिज , डाइनिंग टेबल और सोफा सेट से सुसज्जित सभी सुख सुविधाओं का इस्तेमाल करते हुए एक सप्ताह के लिए घर जैसा बन जाता है .



घर की शानदार बालकनी से घाटी और दूर देहरादून नज़र आता है . दायीं ओर के पहाड़ को देखकर बड़ा भ्रम हो रहा था की इस पर बनी यह जिग जैग सड़क कहाँ जाती है . कोई घर भी नहीं दिखा . या फिर ये पहाड़ी खेत हैं ? बहुत देर तक सोचने पर समझ आया की वास्तव में यहाँ कभी भूस्खलन हुआ था . अब पर्यावरण विभाग ने यहाँ फिर से पेड़ लगाकर इसे हरा भरा बनाने का प्रयास किया है . जिग जैग सड़क दरअसल एक पगडण्डी थी जिस के साथ पेड़ लगाये गए थे . यानि मसूरी का पर्यावरण विभाग तो अपने काम में मुस्तैद है . बस हम दिल्ली वाले ही बुद्धि का इस्तमाल नहीं करते और जहाँ अवसर मिला प्लास्टिक की थैलियाँ फैंक देते हैं .


पहली बार मसूरी आने वालों के लिए यहाँ के मुख्य आकर्षण हैं :
* केम्पटी फाल -- शहर से १०-११ किलोमीटर दूर जहाँ तक गाड़ी से ही जाया जा सकता है . ऊँचाई से गिरता झरना खूबसूरत तो लगता है लेकिन यहाँ होने वाले ट्रैफिक जाम और झरने में नहाते मोटे पेट वाले लोगों को देखकर मूड रोमांटिक तो नहीं रह सकता .
* लाल टिब्बा --- यहाँ का सबसे ऊंचा पॉइंट जहाँ से चारों ओर का नज़ारा देखा जा सकता है यदि मौसम साफ हो तो जो कभी नहीं होता . यहाँ गाड़ी और पैदल दोनों तरह से जाया जा सकता है.
* धनोल्टी -- मसूरी से २८ किलोमीटर दूर एक सुनसान पिकनिक स्पॉट होता था लेकिन अब वहां ढेरों होटल बन गए हैं . यहाँ का मुख्य आकर्षण है सुरखंडा देवी का मंदिर जिसके लिए घने जंगल से एक किलोमीटर ट्रेक कर ही पहुंचा जा सकता है . हालाँकि यहाँ भी बहुत भीड़ होती है लेकिन वापसी पर फ्री के लंगर में हलवा पूरी खाकर बड़ा आनंद आएगा .

इन सब जगहों पर कई बार जा चुके हैं इसलिए इस बार जाने का मूड नहीं था . लेकिन हमें तो प्रकृति से प्यार है इसलिए ऐसी जगह जहाँ से प्रकृति के समीप महसूस किया जा सके , हम जाना नहीं छोड़ते .



कैमल बैक रोड

मसूरी के उत्तर की ओर ढाई किलोमीटर लम्बी यह समतल सड़क पहाड़ के साथ साथ चलती है और घाटी के मनोरम दृश्यों के दर्शन कराती है .


इस दर्शक दीर्घा में बैठकर चाय की चुस्की लेते हुए पहाड़ों की चोटियों को निहारने हुए घंटों गुजर सकते हैं लेकिन फिर भी दिल नहीं भरेगा .


यहाँ पैदल चलना ही एक मेडिटेशन जैसा लगता है .



इस तस्वीर को ध्यान से देखिये , इस सड़क को कैमल बैक रोड क्यों कहते हैं , यह अपने आप समझ आ जायेगा .

लेकिन यह जादू सिर्फ एक पॉइंट से ही नज़र आता है .


गनहिल : एक और पहाड़ की चोटी जहाँ से चारों ओर नज़र आता है . लेकिन यहाँ भी मौसम साफ होने पर ही जाने का फायदा है वर्ना बस पिकनिक बन कर रह जाता है . यहाँ जाने के लिए हम जैसे शौक़ीन तो पैदल मार्ग की खड़ी चढ़ाई कर लेते हैं लेकिन जिनके घुटने हल्के और जेब भारी होती है , वे यहाँ ट्रॉली द्वारा ही जाते हैं .



मसूरी से तीन किलोमीटर दूर है कंपनी गार्डन. हरा भरा यह बाग़ अब एक बढ़िया फैमिली पिनिक स्पॉट बन गया है .

बाग की शोभा बढ़ा रहा था यह फव्वारा .


यहाँ बना यह कृत्रिम झरना पर्यटकों को बहुत लुभा रहा था .



अंत में यह कृत्रिम झील बच्चों और बड़ों सभी के लिए सुन्दर आकर्षण थी जिसमे सभी तरह की रंग बिरंगी बोट्स में बोटिंग का आनंद लिया जा सकता है .
अब यहाँ एक फ़ूड कोर्ट भी खुल गया है जिसमे सेल्फ सर्विस के साथ अच्छा खाना उचित दाम पर मिल रहा था .

ये थी मसूरी की कुछ आम बातें . अगली और अंतिम किस्त में पढियेगा कुछ खास और दिलचस्प बातें जिनका हमें भी पहली बार अनुभव हुआ .





Wednesday, June 13, 2012

हाईवे हो या हिल्स , लेन ड्राईविंग इज सेन ड्राईविंग -- लेकिन सुनता कौन है !

एक समय था जब दिल्ली जैसे बड़े शहर में सड़क पर वाहनों के लिए कोई गति सीमा नहीं थी । नियम अनुसार सबसे तेज वाहन दायीं लेन में चलते थे , मध्यम गति वाले वाहन बीच की लेन में और सबसे धीमे वाहन बायीं लेन में । लेकिन हकीकत में होता उल्टा था । यानि धीमे चलने वाले दायीं लेन में चलते थे । यदि किसी को ओवरटेक करना होता था तो वो या तो हॉर्न बजाकर साईड मांगता था या बायीं ओर से रोंग साईड से निकल जाता था ।

फिर शहर में गति सीमा निर्धारित कर दी गई । अब लेन ड्राईविंग को अपनाने पर जोर दिया जाने लगा । लेकिन लेन ड्राइविंग का अर्थ क्या होता है , यह कभी नहीं बताया गया । इसलिए अभी भी अधिकांश ड्राइवर्स को शायद यह नहीं पता कि लेन ड्राईविंग क्या होती है ।
हालाँकि शहर हो या हाईवे , अब सब जगह सडकों पर इस तरह की लाईनें देखने को मिलेंगी :


आइये देखते हैं , इन लाइनों का क्या मतलब होता है ।
साईड की लाइन -- यह लेन की बाहरी सीमा रेखा है । इससे बाहर नहीं जा सकते ।
बीच की लाइन --- अक्सर यह लाइन या तो सीधी होती है या टूटी होती है ( ब्रोकन लाइन ) । सीधी लाइन का मतलब है कि आप इसे क्रॉस नहीं कर सकते यानि दूसरी ओर नहीं जा सकते । ब्रोकन लाइन का अर्थ है कि आप चाहें तो लेन बदल सकते हैं । लेन बदलने के लिए पहले देखिये कि रास्ता साफ है या नहीं । फिर इंडिकेटर देते हुए लेन बदल लीजिये लेकिन ध्यान रखिये कि कोई गाड़ी उस लेन में तेजी से तो नहीं आ रही ।

ऊपर दिखाए गए फोटो में बीच में दो लाईनें हैं -- एक सीधी और दूसरी ब्रोकन । दायीं तरफ सीधी लाइन का अर्थ है कि आप दायीं से लेन बदल कर बायीं लेन में नहीं जा सकते । लेकिन सामने से आता हुआ ट्रैफिक लाइन बदल कर अपने बायीं वाली लेन में जा सकता है । यदि यह एक तरफ़ा सड़क होती तो बायीं लेन से दायीं लेन में आया जा सकता है लेकिन दायीं से बायीं लेन में नहीं ।
हालाँकि यह सड़क विदेश की है लेकिन लेन सिस्टम में लाइन का अर्थ सब जगह एक ही होता है ।
लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि हमारे प्यारे देशवासी लेन ड्राईविंग में विश्वास नहीं रखते । या फिर उन्हें इसका मतलब ही नहीं पता होता । इसीलिए यहाँ दुर्घटना होने की सम्भावना ज्यादा रहती है । लेकिन यदि लेन ड्राइविंग की जाए तो न तो साईड मांगने की ज़रुरत पड़ेगी , न हॉर्न बजाने की ।

हाईवे ड्राईविंग :

कुछ वर्ष पहले तक जब हाईवे पर लेन सिस्टम नहीं बना था तब ओवरटेक करने के लिए या तो हॉर्न बजाते थे या फिर डिपर का इस्तेमाल कर साईड मांगी जाती थी । इससे धीमे चलने वाले वाहनों को बड़ी दिक्कत होती थी । उन्हें बार बार साईड देनी पड़ती थी । लेकिन अब लेन बनने से यह परेशानी ख़त्म हो गई है । अब न साईड मांगने की ज़रुरत है , न ही हॉर्न देने की ।

हिल ड्राईविंग :

पहाड़ों में ड्राईव करने के लिए कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना ज़रूरी होता है । यहाँ भी अब लेन सिस्टम बना है । अपनी लेन में ही चलना चाहिए । लेकिन यहाँ एक सबसे बड़ी दिक्कत होती है सड़क का सीधा न होना । अक्सर पहाड़ों में हर ५०-६० मीटर पर एक मोड़ आ जाता है । इसलिए ओवरटेक करना बड़ा रिस्की रहता है । मोड़ पर हॉर्न बजाना ज़रूरी है ताकि सामने से आने वाले को आपकी मोजूदगी का अहसास हो जाए । मोड़ पर कभी ओवरटेक नहीं करना चाहिए। अपहिल ड्राईविंग धीमी रहती है लेकिन कंट्रोल बेहतर रहता है । ढलान पर उतरने में गाड़ी अपने आप दौड़ती है इसलिए स्पीड कंट्रोल बहुत ज़रूरी है ।

लेकिन हाईवे हो या पहाड़ , सड़क पर आधे से ज्यादा गाड़ियाँ कमर्शियल होती हैं इनके ड्राईवर अक्सर बहुत तेज ड्राईव करते हैं और नियमों का पालन नहीं करते । इसलिए दूसरों से भी बचकर चलना पड़ता है ।
अक्सर हम हिन्दुस्तानियों की आदत होती है कि ज़रा सी रुकावट आते ही हम अपनी लेन छोड़कर जहाँ जगह मिली वहीँ घुस जाते हैं । इसीलिए अक्सर पलक झपकते ही ट्रैफिक जाम हो जाते हैं । इस मामले में स्वयं ड्राईव करने वाले पढ़े लिखे लोग भी पीछे नहीं हैं ।

दिल्ली में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप चल रहा है ऐसे में हम हर वर्ष पहाड़ों की ओर रुख कर लेते हैं । ५-७ दिन के लिए ही सही , न सिर्फ गर्मी से निजात पा जाते हैं बल्कि पहाड़ों की शुद्ध हवा में पैदल सैर कर स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त होता है । घर से बाहर निकलने के लिए तीन चीज़ों की ज़रुरत होती है । साधन , समय और शौक । बहुत से लोगों के पास पैसा तो होता है लेकिन समय नहीं । या फिर समय और साधन तो होते हैं लेकिन शौक नहीं ।
हमारे पास कम से कम शौक की तो कोई कमी नहीं । इसलिए सीमित साधन होते हुए भी ऐसा कोई अवसर नहीं छोड़ते ।

इस बार पहली बार ऐसा हुआ कि गर्मियों में दोनों बच्चे घर से बाहर थे । इसलिए इस बार हम पति पत्नी ही चल पड़े मसूरी की ओर । पिछले बीस सालों में अक्सर पहाड़ों में अपनी गाड़ी से ही जाना हुआ है । मसूरी , शिमला , नैनीताल, चंबा और मनाली तक स्वयं ड्राईव किया है । सबसे लम्बा सफ़र तो मनाली तक का ही रहा -- १५ घंटे और ६६० किलोमीटर । रोहतांग पास तक १४००० हज़ार मीटर की ऊँचाई तक ड्राईव करना अपने आप में एक अत्यंत रोमांचक अनुभव था ।

लेकिन इन सब ट्रिप्स में एक बात कॉमन थी -- ये सब हिल स्टेशन किसी न किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ते हैं । इसलिए अक्सर सड़कें बहुत बढ़िया होती हैं । इसलिए ड्राईविंग भी बड़ी आनंद दायक रहती है । इस बार भी मेरठ बाईपास से लेकर मुजफ्फर नगर बाईपास का करीब ७०-८० किलोमीटर का रास्ता बहुत सुन्दर था । रूडकी से देहरादून भी सही है । लेकिन देहरादून के पहाड़ शुरू होते ही चढ़ाई पर देखा कि सड़क हर मोड़ पर बुरी तरह से टूटी थी । अंत में करीब ५-६ किलोमीटर की चढ़ाई के बाद जब ढलान आई तो पता चला कि यह चढ़ाई वाला क्षेत्र यू पी के सहारनपुर जिले में आता है । जबकि ढलान शुरू होते ही उत्तराखंड शुरू हो जाता है । और उत्तराखंड शुरू होते ही सड़क मक्खन मलाई जैसी नज़र आई ।

क्या इसमें भी कोई राजनीति है ?

नोट : अगली पोस्ट में मसूरी के कुछ दिलचस्प संस्मरण तस्वीरों के साथ