एक समय था जब दिल्ली जैसे बड़े शहर में सड़क पर वाहनों के लिए कोई गति सीमा नहीं थी । नियम अनुसार सबसे तेज वाहन दायीं लेन में चलते थे , मध्यम गति वाले वाहन बीच की लेन में और सबसे धीमे वाहन बायीं लेन में । लेकिन हकीकत में होता उल्टा था । यानि धीमे चलने वाले दायीं लेन में चलते थे । यदि किसी को ओवरटेक करना होता था तो वो या तो हॉर्न बजाकर साईड मांगता था या बायीं ओर से रोंग साईड से निकल जाता था ।
फिर शहर में गति सीमा निर्धारित कर दी गई । अब लेन ड्राईविंग को अपनाने पर जोर दिया जाने लगा । लेकिन लेन ड्राइविंग का अर्थ क्या होता है , यह कभी नहीं बताया गया । इसलिए अभी भी अधिकांश ड्राइवर्स को शायद यह नहीं पता कि लेन ड्राईविंग क्या होती है ।
हालाँकि शहर हो या हाईवे , अब सब जगह सडकों पर इस तरह की लाईनें देखने को मिलेंगी :

आइये देखते हैं , इन लाइनों का क्या मतलब होता है ।
साईड की लाइन -- यह लेन की बाहरी सीमा रेखा है । इससे बाहर नहीं जा सकते ।
बीच की लाइन --- अक्सर यह लाइन या तो सीधी होती है या टूटी होती है ( ब्रोकन लाइन ) । सीधी लाइन का मतलब है कि आप इसे क्रॉस नहीं कर सकते यानि दूसरी ओर नहीं जा सकते । ब्रोकन लाइन का अर्थ है कि आप चाहें तो लेन बदल सकते हैं । लेन बदलने के लिए पहले देखिये कि रास्ता साफ है या नहीं । फिर इंडिकेटर देते हुए लेन बदल लीजिये लेकिन ध्यान रखिये कि कोई गाड़ी उस लेन में तेजी से तो नहीं आ रही ।
ऊपर दिखाए गए फोटो में बीच में दो लाईनें हैं -- एक सीधी और दूसरी ब्रोकन । दायीं तरफ सीधी लाइन का अर्थ है कि आप दायीं से लेन बदल कर बायीं लेन में नहीं जा सकते । लेकिन सामने से आता हुआ ट्रैफिक लाइन बदल कर अपने बायीं वाली लेन में जा सकता है । यदि यह एक तरफ़ा सड़क होती तो बायीं लेन से दायीं लेन में आया जा सकता है लेकिन दायीं से बायीं लेन में नहीं ।
हालाँकि यह सड़क विदेश की है लेकिन लेन सिस्टम में लाइन का अर्थ सब जगह एक ही होता है ।
लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि हमारे प्यारे देशवासी लेन ड्राईविंग में विश्वास नहीं रखते । या फिर उन्हें इसका मतलब ही नहीं पता होता । इसीलिए यहाँ दुर्घटना होने की सम्भावना ज्यादा रहती है । लेकिन यदि लेन ड्राइविंग की जाए तो न तो साईड मांगने की ज़रुरत पड़ेगी , न हॉर्न बजाने की ।
हाईवे ड्राईविंग : कुछ वर्ष पहले तक जब हाईवे पर लेन सिस्टम नहीं बना था तब ओवरटेक करने के लिए या तो हॉर्न बजाते थे या फिर डिपर का इस्तेमाल कर साईड मांगी जाती थी । इससे धीमे चलने वाले वाहनों को बड़ी दिक्कत होती थी । उन्हें बार बार साईड देनी पड़ती थी । लेकिन अब लेन बनने से यह परेशानी ख़त्म हो गई है । अब न साईड मांगने की ज़रुरत है , न ही हॉर्न देने की ।
हिल ड्राईविंग :पहाड़ों में ड्राईव करने के लिए कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना ज़रूरी होता है । यहाँ भी अब लेन सिस्टम बना है । अपनी लेन में ही चलना चाहिए । लेकिन यहाँ एक सबसे बड़ी दिक्कत होती है सड़क का सीधा न होना । अक्सर पहाड़ों में हर ५०-६० मीटर पर एक मोड़ आ जाता है । इसलिए ओवरटेक करना बड़ा रिस्की रहता है । मोड़ पर हॉर्न बजाना ज़रूरी है ताकि सामने से आने वाले को आपकी मोजूदगी का अहसास हो जाए । मोड़ पर कभी ओवरटेक नहीं करना चाहिए। अपहिल ड्राईविंग धीमी रहती है लेकिन कंट्रोल बेहतर रहता है । ढलान पर उतरने में गाड़ी अपने आप दौड़ती है इसलिए स्पीड कंट्रोल बहुत ज़रूरी है ।
लेकिन हाईवे हो या पहाड़ , सड़क पर आधे से ज्यादा गाड़ियाँ कमर्शियल होती हैं । इनके ड्राईवर अक्सर बहुत तेज ड्राईव करते हैं और नियमों का पालन नहीं करते । इसलिए दूसरों से भी बचकर चलना पड़ता है ।
अक्सर हम हिन्दुस्तानियों की आदत होती है कि ज़रा सी रुकावट आते ही हम अपनी लेन छोड़कर जहाँ जगह मिली वहीँ घुस जाते हैं । इसीलिए अक्सर पलक झपकते ही ट्रैफिक जाम हो जाते हैं । इस मामले में स्वयं ड्राईव करने वाले पढ़े लिखे लोग भी पीछे नहीं हैं ।
दिल्ली में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप चल रहा है । ऐसे में हम हर वर्ष पहाड़ों की ओर रुख कर लेते हैं । ५-७ दिन के लिए ही सही , न सिर्फ गर्मी से निजात पा जाते हैं बल्कि पहाड़ों की शुद्ध हवा में पैदल सैर कर स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त होता है । घर से बाहर निकलने के लिए तीन चीज़ों की ज़रुरत होती है । साधन , समय और शौक । बहुत से लोगों के पास पैसा तो होता है लेकिन समय नहीं । या फिर समय और साधन तो होते हैं लेकिन शौक नहीं ।
हमारे पास कम से कम शौक की तो कोई कमी नहीं । इसलिए सीमित साधन होते हुए भी ऐसा कोई अवसर नहीं छोड़ते ।
इस बार पहली बार ऐसा हुआ कि गर्मियों में दोनों बच्चे घर से बाहर थे । इसलिए इस बार हम पति पत्नी ही चल पड़े मसूरी की ओर । पिछले बीस सालों में अक्सर पहाड़ों में अपनी गाड़ी से ही जाना हुआ है । मसूरी , शिमला , नैनीताल, चंबा और मनाली तक स्वयं ड्राईव किया है । सबसे लम्बा सफ़र तो मनाली तक का ही रहा -- १५ घंटे और ६६० किलोमीटर । रोहतांग पास तक १४००० हज़ार मीटर की ऊँचाई तक ड्राईव करना अपने आप में एक अत्यंत रोमांचक अनुभव था ।
लेकिन इन सब ट्रिप्स में एक बात कॉमन थी -- ये सब हिल स्टेशन किसी न किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ते हैं । इसलिए अक्सर सड़कें बहुत बढ़िया होती हैं । इसलिए ड्राईविंग भी बड़ी आनंद दायक रहती है । इस बार भी मेरठ बाईपास से लेकर मुजफ्फर नगर बाईपास का करीब ७०-८० किलोमीटर का रास्ता बहुत सुन्दर था । रूडकी से देहरादून भी सही है । लेकिन देहरादून के पहाड़ शुरू होते ही चढ़ाई पर देखा कि सड़क हर मोड़ पर बुरी तरह से टूटी थी । अंत में करीब ५-६ किलोमीटर की चढ़ाई के बाद जब ढलान आई तो पता चला कि यह चढ़ाई वाला क्षेत्र यू पी के सहारनपुर जिले में आता है । जबकि ढलान शुरू होते ही उत्तराखंड शुरू हो जाता है । और उत्तराखंड शुरू होते ही सड़क मक्खन मलाई जैसी नज़र आई ।
क्या इसमें भी कोई राजनीति है ? नोट : अगली पोस्ट में मसूरी के कुछ दिलचस्प संस्मरण तस्वीरों के साथ ।