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Sunday, October 26, 2014

दमन से सिलवासा , एक खूबसूरत सफ़र , जहां झील और पहाड़ आपका मन मोह लेते हैं ...


मुंबई से दमन हालांकि मात्र १८० किलोमीटर दूर है लेकिन एक रात रुकने के बाद आपको देखने को कुछ विशेष नहीं मिलेगा ! यदि आप दो रात रुकने के लिये आये हैं तो एक बढिया विकल्प है सिलवासा की सैर ! दमन से सिलवासा मात्र २५ किलोमीटर दूर है और उसी सड़क पर पड़ता है जिससे होकर आप हाईवे से दमन पहुंचते हैं ! दमन से सीधी सड़क हाईवे को पार कर दादरा होती हुई सिलवासा को जाती है ! दादरा भी दमन की तरह केन्द्रशासित प्रदेश है जबकि सिलवासा गुजरात मे पड़ता है !   



यूँ तो दादरा सिलवासा सड़क काफी धूल भरी लगी लेकिन सिलवासा के बायीं ओर का क्षेत्र बहुत हरा भरा है ! शहर से पहले ही एक पार्क है जिसमे एक सुन्दर झील बनी है ! विश्वास नहीं होता कि एक वर्णनातीत शहर मे इतना खूबसूरत पार्क कैसे अनुरक्षित है !        





झील के चारों ओर और हरी भरी घास के मध्य फुटपाथ बने हैं जिस पर चलकर यूँ लगता है जैसे हम मेडिटेशन कर रहे हों ! हालांकि बाहर सड़क पर वतावरण धूल मिश्रित था , लेकिन हरी हरी घास और उसके बीच धोलपुर स्टोन मे बना फुटपाथ ऐसा लग राहा था जैसे बारिश मे नहाया हुआ हो !  




सिलवासा शहर से बाहर निकलते ही बायीं ओर ही एक छोटी सी सड़क जाती है जो मधुबन रिजर्वायर को जाती है ! घनी हरियाली के बीच से होकर एक पतली सी सड़क डैम तक जाती है जिसके पास के छोर पर एक सरकारी रेस्ट हाउस बना है जिसके बाहर से आम जनता रिजर्वायर से बनी सुन्दर विशाल झील का सुन्दर नज़ारा देख सकती है ! क्योंकि हम स्वयं एक सरकारी अफसर हैं , इसलिये हमने यह लुत्फ अंदर जाकर उठाया ! यहीं पर बने रेगुलेटर से निकलती है दमन गंगा नाम की नदी जो दमन जाकर अरब सागर से मिलती है !     
डैम से वापस आते हुए रास्ते मे एक छोटा सा टाईगर सफारी है जो बड़ा निराशाज़नक लगा ! बहुत कम क्षेत्र मे एक अकेली मरियल सी शेरनी को देखने के लिये एक रिकेटी गाड़ी मे बैठकर घूमना २५ रुपये प्रति सवारी भी समय और धन की बर्बादी ही लगी ! ज़ाहिर है , इसे आसानी से छोड़ा जा सकता है ! मेन रोड पर आकर थोड़ा आगे बढ़ने पर एक डियर पार्क भी बना है जहां यदि फालतू समय हो तो जाया जा सकता है ! हालांकि लंच के बाद शाम को ३-६ बजे तक ही  खुला रहता है !  




इस रिज़रवायर से बनी झील इतनी विशाल है कि मीलों तक बस पानी ही पानी दिखाई देता है जिसके बीच हरे भरे टापू भी नज़र आते हैं ! झील के आखिरी छोर तक जाने के लिये और ३० किलोमीटर आगे जाना पड़ता है ! मेन रोड़ से मुड़ने के बाद जल्दी ही घनी हरियाली से होती हुई सुन्दर सड़क छोटे छोटे गांवों से होती हुई पहाड़ी क्षेत्र मे आ जाती है ! यहाँ ऐसा लगता है जैसे हम किसी खूबसूरत हिल स्टेशन पर जा रहे हों ! एक जगह पर सबसे ऊंचे स्थान से झील का नज़ारा अत्यंत रमणीक दिखाई देता है !      




घने पेडों के बीच से झील का एक और दृष्य ! 




पहाड़ से सड़क धीरे धीरे ढलान पर होती हुई घाटी मे आ जाती है जहाँ हरे भरे समतल क्षेत्र से होती हुई कभी उपर कभी नीचे होती हुई हिचकोले खिलाती हुई सड़क पर गाड़ी सरपट दौड़ती है ! यहाँ आकर सफ़र और भी सुहाना हो जता है ! ऐसा लगता है जैसे हम किसी सुनसान इलाके मे जा रहे हों ! लेकिन अन्तत : दूधनी नाम का एक कस्बा दिखाई देता है जहाँ स्कूल , चिकित्सा केन्द्र और अन्य सरकारी दफ्तर दिखाई देते हैं जिन्हे देखकर लगता है जैसे जंगल मे मंगल हो गया हो !     




इक्के दुक्के मकानों से बने दूधनी कसबे के अन्त मे बना है यह पर्यटन विभाग का रेस्ट हाउस जिसके खूबसूरत हरे भरे लॉन को देखकर ही यहाँ एक रात बिताने का मन करने लगता है ! इसमे कई कोटेजिज बनी हुई हैं , हालांकि हमने इसमे रुकने के लिये सम्बन्धित जानकारी हासिल नहीं की ! लेकिन झील किनारे बने इस रेस्ट हाउस को देखकर ही आनंद आ जाता है ! 




और यह है झील का किनारा दूधनी एंड पॉइंट , जहाँ से आप झील मे बोटिंग करने के लिये बोट और शिकारा किराए पर ले सकते हैं ! चार व्यक्तियों की बोट का किराया था २०० रुपए , आधे घंटे के लिये ! बोटिंग के लिये इतना खूबसूरत प्लेटफार्म हमने पहले कभी नहीं देखा !   




यूँ तो डैम से बनी झील काफी बड़ी है और विशाल क्षेत्र मे फैली है , लेकिन पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण झील के आस पास अनेक गांव और खेत खलिहान नज़र आते हैं ! झील भी छोटे छोटे टुकडों मे बटी नज़र आती है ! लेकिन हौले हौले बहती पवन झील के पानी मे छोटी छोटी लहरें पैदा करती हैं जिन पर जब सूर्य की किरणें गिरती हैं तो ऐसा लगता है जैसे झील के पानी मे सोने के टुकडे बिखर गए हों !       




चप्पू से चलने वाली बोट करीब आधे घंटे मे एक टापू पर पहुंच जाती है जहाँ हम आधे घंटे तक रुक कर प्रकृति का आनंद ले सकते हैं ! इसके लिये टोटल किराया २५० रुपए है ! यहाँ एक खूबसूरत बगीचा बनया गया है जिसके चारों ओर खूबसूरत कोटेज बनी हैं जहाँ आप रात के लिये रुक सकते हैं !      



यह स्थान बहुत खूबसूरत लगा और यदि पहले पता होता तो यहा रुकने का प्रबन्ध किया जा सकता था जो अपने आप मे एक अनुपम अनुभव होता ! चारों ओर पहाड़ और उनके बीच मे झील जैसे एक स्वर्गिक अहसास देती हुई !  




इस सुहाने सफ़र से वापस आकर शाम को समुद्र किनारे बने रेस्ट्रां के बार मे बैठकर चिल्ड बियर पीते हुए सागर की लहरों को देखना वास्तव मे शब्दों मे अवर्णनीय एक सुखद अहसास है ! लेकिन यह तभी सम्भव है जब आप अपने किसी खास के साथ हों और दिलों मे प्यार हो ! इसलिये यदि संभव हो या कभी अवसर मिले तो अपनी इच्छाओं का दमन न करते हुए आप दमन जाइये और मुंबई के करीब एक पर्यटक स्थल का आनंद लीजिये !     


Saturday, June 15, 2013

कितने पास , कितने दूर -- ट्रेक टू ट्रीउंड ।


यूँ तो हर पर्वतीय पर्यटन स्थल की तरह धर्मशाला में भी कई ट्रेक्स हैं जहाँ आप ट्रेकिंग का शौक पूरा कर सकते हैं। लेकिन एक ट्रेक जो आम सैलानियों में बहुत लोकप्रिय है , वह है  ट्रीउंड का ट्रेक। धर्मशाला से १० किलोमीटर दूर है मैकलॉयड गंज जहाँ से डेढ़ किलोमीटर पर धरमकोट और ३ किलोमीटर आगे गलू मंदिर है जहाँ तक गाड़ी जा सकती है। गलू मंदिर से ट्रीउंड का ट्रेक शुरू होता है जो ७ किलोमीटर लम्बा है। ट्रीउंड से स्नो लाइन शुरू होती है यानि यह बर्फीले पहाड़ों की तलहटी में स्थित है। यहाँ टूरिज्म विभाग का एक रेस्ट हाउस बना है तथा ठहरने के लिए टेंट भी आसानी से किराये पर मिल जाते हैं।


पिछली बार १८ साल पहले जब यहाँ आए थे तब बच्चे छोटे थे। फिर हमने गलू मंदिर तक ही ४ - ५ किलोमीटर पैदल चलकर रास्ता तय किया था। इसलिए ऊपर जाने की सम्भावना ख़त्म हो गई थी। इसलिए हमने यहीं रूककर पिकनिक मनाई। उन दिनों माधुरी दीक्षित की एक फिल्म आई थी -- राजा -- जिसमे एक गाना था -- अँखियाँ मिली , दिल धड़का , मेरी धड़कन ने कहा , लव यु राजा -- इस गाने पर बिटिया ने बढ़िया डांस किया और हमने भी उसे देखकर स्टेप मिलाने की कोशिश की थी। ये सब यादें मन में लिए इस बार हमने ट्रेक पूरा करने का निर्णय लिया।

टूरिज्म विभाग में गए तो कोई नहीं मिला। लेकिन केयरटेकर ने हमें देखकर कहा कि साब आप तो दोनों फिट हैं , ट्रेकिंग पर जा सकते हैं। लेकिन बिना गाइड के मत जाइये। पता चला गाइड का खर्च था ८०० रूपये प्रति व्यक्ति जिसे सुनकर हमें बड़ी हंसी आई। हमने श्रीमती जी से कहा -- चलिए आप ट्रेकर बनिए और हम गाइड। आखिर हमने बड़े बड़ों को घुमाया है।  




हमने एक गाड़ी किराये पर ली और पहुँच गए गलू मंदिर। वहीँ जहाँ से पिछली बार वापस मुड़ लिए थे लेकिन इस बार तैयार थे आगे बढ़ने के लिए।




आरम्भ में रास्ता बड़ा सुगम था। हलकी सी चढ़ाई थी और घने पेड़ों की छाया थी।




लेकिन फिर रास्ता पथरीला होने लगा और धूप भी लगने लगी। ट्रेकिंग पर जाने के लिए आपके कपड़े और जूते हल्के और आरामदायक होने चाहिए। कभी भी नए कपड़ों और जूतों में ट्रेकिंग न करें। साथ ही ज़रूरत का सामान एक रकसक में रख लेना चाहिए, विशेषकर खाना और पानी।  




रकसक को कमर पर बांधने का भी एक विशेष तरीका होता है जिससे चलने में कठिनाई नहीं होती।
इस फोटो में कुछ विशेष दिखाई दिया ? 

करीब सवा घंटा चलने के बाद हम पहुँच गए मिड पॉइंट पर यानि ७ किलोमीटर का आधा रास्ता तय हो गया था। देखा जाए तो यह स्पीड बड़ी अच्छी ही कहलाएगी। लेकिन एक तो हमने ट्रेकिंग शुरू की ११ बजे जबकि हमें बताया गया था कि एक दिन में वापस आना है तो सुबह ७ बजे तक शुरू हो जाना चाहिए। दूसरे हम गाड़ी लेकर आए थे और ड्राइवर को रुकने के लिए कहा था ३ घंटे, यह कहकर कि हम डेढ़ घंटे की ट्रेकिंग के बाद वापस मुड़ लेंगे। ऊपर से अब बादल छाने लगे थे और हल्की हल्की बारिस शुरू हो गई थी। इसलिए सोच में पड़ गए कि क्या करना चाहिए।    



मौसम अब बहुत खुशगवार हो गया था। चाय की इच्छा थी और सामने चाय की सबसे पुरानी दुकान।




२५०० मीटर की ऊँचाई पर बनी दुकान में बैठकर चाय पीने का मज़ा आ गया। चाय वाले ने चाय भी बहुत बढ़िया बनाई और पूरा गिलास भरकर पिलाई। हमारी नज़र कहाँ है ,  आइये अब यह देखते हैं।




जी हाँ , यही वो जगह है जहाँ हमें जाना था -- ट्रीउंड। साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी से भी गेस्ट हाउस साफ दिखाई दे रहा था।  इतना पास , फिर भी इतना दूर।




आगे का रास्ता ज्यादा पथरीला दिख रहा था। ऊपर की ओर जाने वाले और लौटने वाले लगभग सभी लोग एक रात रुकने का प्रोग्राम बना कर आये थे जिनमे आधे से ज्यादा फिरंगी थे। हमें लगा कि वापस आने वाले हम अकेले ही रह जायेंगे। फिर शाम और बारिस , दोनों ही विपरीत परिस्थितियां बन रही थी। इसलिए अंतत: यही निर्णय लिया कि इस बार यहीं से मुड़ लिया जाये।

लेकिन मन में तय किया कि अगली बार जल्दी ही लौटेंगे और रात को ट्रीउंड में ही रुकेंगे। इस फैसले के साथ ही हम लौट पड़े वापसी के लिए।            




एक ही फोटो में -- ऊपर बायीं ओर एक मंजिल जो पानी थी , नीचे दायीं ओर मंजिल जो पा सके। फासला साढ़े तीन किलोमीटर का।  




रास्ते में ऊँचाई से बड़े मनमोहक दृश्य दिखाई दे रहे थे। यह वही झरने वाली नदी है जहाँ दो दिन पहले गए थे। दायीं ओर नज़र आ रहा है भाग्सू नाथ मंदिर वाली जगह।



इस फोटो में -- दायीं ओर धरमकोट जहाँ अधिकतर विदेशी पर्यटक महीनों तक पेईंग गेस्ट बन कर रहते हैं। बायीं ओर है भाग्सू मंदिर वाला क्षेत्र , मध्य में  मैकलॉयड गंज और दूर क्षितिज में बायीं ओर धर्मशाला शहर।



और इस तरह पूरा हुआ हमारा ट्रीउंड का अर्ध ट्रेक। लेकिन ३ घंटे में ७ किलोमीटर का पहाड़ी सफ़र तय कर भी हम तरो ताज़ा महसूस कर रहे थे।    


ट्रेकिंग के लिए कुछ टिप्स : 

* ट्रेकिंग पर जाने से पहले कम से कम १५ दिन पहले रोजाना आधे घंटे तक ब्रिस्क वॉक करें ताकि स्टेमिना बन सके।
* एक बार डॉक्टर से जाँच ज़रूर करा लें , विशेषकर जिन्हें शुगर या बी पी का रोग है।
* सामान कम से कम रखें लेकिन खाने पीने का सामान उचित मात्रा में ज़रूर रखना चाहिए।
* धीरे चलें लेकिन स्पीड मेंटेन रखें।
* एक बार में २ - ४ मिनट का ही रेस्ट लें।
* पानी पीते रहें लेकिन एक बार में दो सिप से ज्यादा नहीं।
* ट्रेकिंग के दौरान पर्यावरण का ध्यान रखें। कोई भी प्लास्टिक वस्तु रास्ते में न फेंके, बल्कि अपने बैग में डालकर वापस ले आयें।
*रास्ते में आने वाले द्रश्यों का अवलोकन कर आनंद उठायें।

नोट : ट्रेकिंग पर जाने के लिए फिजिकल फिटनेस का होना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन यह भी सच है कि यदि आप पहाड़ों में पैदल घूमने के शौक़ीन हैं तो फिटनेस अपने आप आ जाएगी।   



Monday, June 10, 2013

दिल कहे रुक जा रे रुक जा , यहीं पे कहीं -- धर्मशाला रीविजिटेड -- १८ साल के बाद।


दिल्ली से बाहर निकल पहाड़ों की ओर रुख पहली बार मेडिकल कॉलेज के तृतीय बर्ष की छुट्टियों में हुआ था। पहली ही नज़र में जैसे पहाड़ों से प्यार सा हो गया था। शादी के बाद तो गर्मियों में यह नियम सा ही बन गया। दिल्ली जैसे बड़े शहर में बढती जनसँख्या का प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ता है। इसलिए कुछ दिनों के लिए स्वच्छ वातावरण में साँस लेना और भी आवश्यक हो जाता है।

इस वर्ष कार्यक्रम बना हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला का , जहाँ पहली और आखिरी बार १८ साल पहले जाना हुआ था। तब एक मित्र की नई नई शादी के बाद हम भी बच्चों समेत यहाँ पधारे थे। उस वर्ष पैदा हुए बच्चे अब व्यस्क होकर और वोट का अधिकार पाकर देश के भाग्य विधाता बनने लायक हो गए हैं। इसी तरह इस बीच धर्मशाला में भी कितना कुछ बदल गया है , इस बारे में अगली पोस्ट में बात करेंगे। फ़िलहाल तो आइये देखते हैं , पहाड़ों की खूबसूरती जो बरबस किसी का भी मन मोह सकती है और मन मयूर नाचने लगता है।

दिल्ली से धर्मशाला जाने के लिए सर्वोत्तम साधन है , वॉल्वो बस यात्रा। शाम ७ बजे चलकर सुबह ६ बजे पहुँच जाती है , हालंकि देर से चलना जैसे इनका नियम सा है। बाहर से अत्यंत सुन्दर दिखने वाली वॉल्वो बस अन्दर से भी उतनी ही सुन्दर और आरामदेह हो , यह कतई आवश्यक नहीं। फिर भी , यह हवाई यात्रा का बढ़िया विकल्प है। यह अलग बात है कि सुबह ६- ७ बजे पहुँच कर होटल में चेक-इन की समस्या हो सकती है।

धर्मशाला शहर की समुद्र तल से ऊँचाई मात्र १२५० मीटर होने से यहाँ आपको गर्मी मिल सकती है लेकिन इतनी नहीं जितनी दिल्ली में। वैसे भी पर्यटकों के लिए यहाँ विशेष कुछ नहीं है। यहाँ का असली आकर्षण है मैक्लौड गंज जो धर्मशाला से करीब १० किलोमीटर दूर १९०० मीटर की ऊँचाई पर होने से अपेक्षाकृत ठंडा महसूस होता है। साथ ही यहीं के आस पास कई खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं जो मन को सकूं प्रदान करते हैं।   

ठहरने के लिए हमारा आशियाना था स्टर्लिंग रिजॉर्ट जो धर्मशाला से करीब १ किलोमीटर दूर पालम पुर जाने वाली सड़क से बाएं मुड़कर एक नदी किनारे बहुत ही खूबसूरत वादी के बीच बना है। ढाई किलोमीटर लम्बी सड़क के साथ साथ बहती नदी अंत में एक पहाड़ की तलहटी पर पहुँच कर अपना रुख मोड़ लेती है और सड़क नदी को पार कर दूसरी ओर से वापस मुड़ लेती है। इस तरह नदी के दोनों ओर सड़क के साथ साथ कई गाँव बसे हैं जो अब शहरीकृत हो चुके हैं। अब यहाँ सेवा निवृत लोगों ने सुन्दर बंगले और  कॉटेज बना रखे हैं। देखा जाये तो यह स्थान शांतिपूर्ण सेवा निवृत जीवन व्यतीत करने के लिए सर्वोत्तम प्रतीत होता है।  



स्टर्लिंग रिजॉर्ट की पार्किंग और अधिकारिक निवास अवम कार्यालय। प्रष्ठभूमि में धौलाधार रेंजिज जो कभी बर्फ से ढकी होती थी लेकिन अब बर्फ नाममात्र को दिखाई दे रही थी। दायीं ओर रिजॉर्ट बना है जिसके बाद नदी है।    




यह रिजॉर्ट एक होटल के रूप में है लेकिन रिजॉर्ट की सभी सुविधाएँ यहाँ उपलब्ध हैं। एक तरफ कमरों से धौलाधार चोटियाँ नज़र आती हैं जबकि पीछे की ओर बने कमरों से नदी का शानदार नज़ारा। पहले दिन नदी में पानी ज्यादा नहीं था लेकिन अगले दिन हुई बारिस की वज़ह से अचानक नदी में बहुत सारा पानी एक साथ आ गया। यहाँ पानी में जल क्रीड़ा कर रहे कई पर्यटकों को जान बचाकर भागना पड़ा क्योंकि पानी का बहाव एकदम तेज हो गया था और पानी भी गदला हो गया था।
पहाड़ी नदियों में नहाते समय यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि बारिस के समय नदी से दूर रहें। ऐसे में कब अचानक पानी का बहाव तेज हो जाये , पता ही नहीं चलेगा और दुर्घटना हो सकती है।    

 
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नदी के उत्तर की ओर का नज़ारा। बारिस के बाद मौसम साफ होने पर पहली बार बर्फीली चोटियाँ नज़र आई।  




रिजॉर्ट के आगे से जाने वाली सड़क करीब १ किलोमीटर तक जाती है जिस के साथ बने हैं अनेकों मकान। फोटो में जो बिल्डिंग नज़र आ रही है वह सरकारी लॉ कॉलेज है जो अभी चालू नहीं हुआ है लेकिन द्रश्य को भव्यता प्रदान कर रहा है।
  



आगे जाकर ऊँचाई से दक्षिण की ओर देखने पर यह नज़ारा मन मोह लेता है।




इसे देख कर हमें कनाडा के क्यूबेक शहर की याद आ गई।




यह सड़क ऊपर की ओर गावों में जाती है। अक्सर शाम को यहाँ गावों के लोग पिकनिक मनाते हुए नज़र आते हैं। कहीं कोई युवक गिटार पर धुन बजाता हुआ, कहीं अबोध बालाएं मासूमियत से खीं खीं करती हुई। प्रोढ़ महिलाएं बोतलों और जरिकेन में नदी से पीने का पानी लाती हुई। कुल मिलाकर यहाँ शाम का समय अद्भुत होता है ।

   



शाम ढलने को है। सूरज की अंतिम किरणें अब बस चोटियों को चूम रही हैं।  





सूर्यास्त का एक नज़ारा। फिर सब चल पड़ते हैं अपने अपने घरों की ओर और हम अपने होटल की ओर।  

इस जगह पर आकर जो शांति और मन को सकून मिला वह बड़े शहरों के आलिशान होटलों और भव्य भवनों में कभी नहीं मिलता। बारिस के बाद तो मन जैसे स्वत: गाने लगा फिल्म -- मन की आँखें -- का धर्मेन्द्र पर फिल्माया और लक्ष्मी कान्त प्यारे लाल का संगीतबध किया यह सुन्दर गीत जिसके बोल किस गीतकार ने लिखे हैं , यह जान नहीं पाया। लेकिन रह रह कर यह याद आता रहा और हमने भी कोशिश की इस माहौल पर एक कविता लिखने की।  लेकिन हम कोई साहित्यकार नहीं , इसलिए लफ़्ज़ों की खूबसूरती को बस तलाशते ही रह गए। आइये सुनते और देखते हैं यह सुरीला तराना , मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में :     


वीडियो नेट से साभार।

नोट : अगली पोस्ट में धर्मशाला के कुछ सुन्दर स्थलों की सैर करना न भूलें।  


Wednesday, June 13, 2012

हाईवे हो या हिल्स , लेन ड्राईविंग इज सेन ड्राईविंग -- लेकिन सुनता कौन है !

एक समय था जब दिल्ली जैसे बड़े शहर में सड़क पर वाहनों के लिए कोई गति सीमा नहीं थी । नियम अनुसार सबसे तेज वाहन दायीं लेन में चलते थे , मध्यम गति वाले वाहन बीच की लेन में और सबसे धीमे वाहन बायीं लेन में । लेकिन हकीकत में होता उल्टा था । यानि धीमे चलने वाले दायीं लेन में चलते थे । यदि किसी को ओवरटेक करना होता था तो वो या तो हॉर्न बजाकर साईड मांगता था या बायीं ओर से रोंग साईड से निकल जाता था ।

फिर शहर में गति सीमा निर्धारित कर दी गई । अब लेन ड्राईविंग को अपनाने पर जोर दिया जाने लगा । लेकिन लेन ड्राइविंग का अर्थ क्या होता है , यह कभी नहीं बताया गया । इसलिए अभी भी अधिकांश ड्राइवर्स को शायद यह नहीं पता कि लेन ड्राईविंग क्या होती है ।
हालाँकि शहर हो या हाईवे , अब सब जगह सडकों पर इस तरह की लाईनें देखने को मिलेंगी :


आइये देखते हैं , इन लाइनों का क्या मतलब होता है ।
साईड की लाइन -- यह लेन की बाहरी सीमा रेखा है । इससे बाहर नहीं जा सकते ।
बीच की लाइन --- अक्सर यह लाइन या तो सीधी होती है या टूटी होती है ( ब्रोकन लाइन ) । सीधी लाइन का मतलब है कि आप इसे क्रॉस नहीं कर सकते यानि दूसरी ओर नहीं जा सकते । ब्रोकन लाइन का अर्थ है कि आप चाहें तो लेन बदल सकते हैं । लेन बदलने के लिए पहले देखिये कि रास्ता साफ है या नहीं । फिर इंडिकेटर देते हुए लेन बदल लीजिये लेकिन ध्यान रखिये कि कोई गाड़ी उस लेन में तेजी से तो नहीं आ रही ।

ऊपर दिखाए गए फोटो में बीच में दो लाईनें हैं -- एक सीधी और दूसरी ब्रोकन । दायीं तरफ सीधी लाइन का अर्थ है कि आप दायीं से लेन बदल कर बायीं लेन में नहीं जा सकते । लेकिन सामने से आता हुआ ट्रैफिक लाइन बदल कर अपने बायीं वाली लेन में जा सकता है । यदि यह एक तरफ़ा सड़क होती तो बायीं लेन से दायीं लेन में आया जा सकता है लेकिन दायीं से बायीं लेन में नहीं ।
हालाँकि यह सड़क विदेश की है लेकिन लेन सिस्टम में लाइन का अर्थ सब जगह एक ही होता है ।
लेकिन अक्सर यह देखा जाता है कि हमारे प्यारे देशवासी लेन ड्राईविंग में विश्वास नहीं रखते । या फिर उन्हें इसका मतलब ही नहीं पता होता । इसीलिए यहाँ दुर्घटना होने की सम्भावना ज्यादा रहती है । लेकिन यदि लेन ड्राइविंग की जाए तो न तो साईड मांगने की ज़रुरत पड़ेगी , न हॉर्न बजाने की ।

हाईवे ड्राईविंग :

कुछ वर्ष पहले तक जब हाईवे पर लेन सिस्टम नहीं बना था तब ओवरटेक करने के लिए या तो हॉर्न बजाते थे या फिर डिपर का इस्तेमाल कर साईड मांगी जाती थी । इससे धीमे चलने वाले वाहनों को बड़ी दिक्कत होती थी । उन्हें बार बार साईड देनी पड़ती थी । लेकिन अब लेन बनने से यह परेशानी ख़त्म हो गई है । अब न साईड मांगने की ज़रुरत है , न ही हॉर्न देने की ।

हिल ड्राईविंग :

पहाड़ों में ड्राईव करने के लिए कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना ज़रूरी होता है । यहाँ भी अब लेन सिस्टम बना है । अपनी लेन में ही चलना चाहिए । लेकिन यहाँ एक सबसे बड़ी दिक्कत होती है सड़क का सीधा न होना । अक्सर पहाड़ों में हर ५०-६० मीटर पर एक मोड़ आ जाता है । इसलिए ओवरटेक करना बड़ा रिस्की रहता है । मोड़ पर हॉर्न बजाना ज़रूरी है ताकि सामने से आने वाले को आपकी मोजूदगी का अहसास हो जाए । मोड़ पर कभी ओवरटेक नहीं करना चाहिए। अपहिल ड्राईविंग धीमी रहती है लेकिन कंट्रोल बेहतर रहता है । ढलान पर उतरने में गाड़ी अपने आप दौड़ती है इसलिए स्पीड कंट्रोल बहुत ज़रूरी है ।

लेकिन हाईवे हो या पहाड़ , सड़क पर आधे से ज्यादा गाड़ियाँ कमर्शियल होती हैं इनके ड्राईवर अक्सर बहुत तेज ड्राईव करते हैं और नियमों का पालन नहीं करते । इसलिए दूसरों से भी बचकर चलना पड़ता है ।
अक्सर हम हिन्दुस्तानियों की आदत होती है कि ज़रा सी रुकावट आते ही हम अपनी लेन छोड़कर जहाँ जगह मिली वहीँ घुस जाते हैं । इसीलिए अक्सर पलक झपकते ही ट्रैफिक जाम हो जाते हैं । इस मामले में स्वयं ड्राईव करने वाले पढ़े लिखे लोग भी पीछे नहीं हैं ।

दिल्ली में इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप चल रहा है ऐसे में हम हर वर्ष पहाड़ों की ओर रुख कर लेते हैं । ५-७ दिन के लिए ही सही , न सिर्फ गर्मी से निजात पा जाते हैं बल्कि पहाड़ों की शुद्ध हवा में पैदल सैर कर स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त होता है । घर से बाहर निकलने के लिए तीन चीज़ों की ज़रुरत होती है । साधन , समय और शौक । बहुत से लोगों के पास पैसा तो होता है लेकिन समय नहीं । या फिर समय और साधन तो होते हैं लेकिन शौक नहीं ।
हमारे पास कम से कम शौक की तो कोई कमी नहीं । इसलिए सीमित साधन होते हुए भी ऐसा कोई अवसर नहीं छोड़ते ।

इस बार पहली बार ऐसा हुआ कि गर्मियों में दोनों बच्चे घर से बाहर थे । इसलिए इस बार हम पति पत्नी ही चल पड़े मसूरी की ओर । पिछले बीस सालों में अक्सर पहाड़ों में अपनी गाड़ी से ही जाना हुआ है । मसूरी , शिमला , नैनीताल, चंबा और मनाली तक स्वयं ड्राईव किया है । सबसे लम्बा सफ़र तो मनाली तक का ही रहा -- १५ घंटे और ६६० किलोमीटर । रोहतांग पास तक १४००० हज़ार मीटर की ऊँचाई तक ड्राईव करना अपने आप में एक अत्यंत रोमांचक अनुभव था ।

लेकिन इन सब ट्रिप्स में एक बात कॉमन थी -- ये सब हिल स्टेशन किसी न किसी राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ते हैं । इसलिए अक्सर सड़कें बहुत बढ़िया होती हैं । इसलिए ड्राईविंग भी बड़ी आनंद दायक रहती है । इस बार भी मेरठ बाईपास से लेकर मुजफ्फर नगर बाईपास का करीब ७०-८० किलोमीटर का रास्ता बहुत सुन्दर था । रूडकी से देहरादून भी सही है । लेकिन देहरादून के पहाड़ शुरू होते ही चढ़ाई पर देखा कि सड़क हर मोड़ पर बुरी तरह से टूटी थी । अंत में करीब ५-६ किलोमीटर की चढ़ाई के बाद जब ढलान आई तो पता चला कि यह चढ़ाई वाला क्षेत्र यू पी के सहारनपुर जिले में आता है । जबकि ढलान शुरू होते ही उत्तराखंड शुरू हो जाता है । और उत्तराखंड शुरू होते ही सड़क मक्खन मलाई जैसी नज़र आई ।

क्या इसमें भी कोई राजनीति है ?

नोट : अगली पोस्ट में मसूरी के कुछ दिलचस्प संस्मरण तस्वीरों के साथ