Saturday, December 11, 2010
शराब एक अभिशाप --बेटे की पुकार, मां के नाम ---
ऐसे में एक पुत्री ने पिता को ई मेल भेजी , जिसका हिंदी अनुवाद कर प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
आज एक पार्टी थी माँ
मुझे याद था तुम्हारा कहा
शराब नहीं पीना बेटा
मैंने खाली सोडा लिया माँ ।
मुझ पर तुम्हारे भरोसे पर
मुझे गर्व हुआ था माँ
लोग कहते ही रहे पर
मैंने पीकर गाड़ी नहीं चलाई माँ ।
जानता हूँ मैंने सही किया माँ
जानता हूँ तुम हमेशा सही होती हो
पार्टी अब ख़त्म होने को है माँ
सब चल दिए हैं अपने घर को।
कार में बैठते सोचता हूँ माँ
घर आ जाऊँगा सही सलामत
तुमने जो संस्कार दिए हैं माँ
जिम्मेदार बनाया है मुझे हर वक्त ।
जब मैं गाड़ी लेकर निकला माँ
और सड़क किनारे पर आया
दूसरी गाड़ी ने नहीं देखा माँ
और पत्थर की तरह टकराया ।
अब मैं सड़क पर पड़ा हूँ माँ
सुन रहा पुलिस वाले की पुकार
दूसरे ने पी रखी है यार
पर भुगतना पड़ा मुझे है माँ ।
मैं यहाँ पड़ा मर रहा हूँ माँ
काश कि तुम आ पाती
ऐसा क्यों हुआ माँ
क्यों बुझ गई मेरी जीवन बाती ।
चारों ओर खून बिखरा है माँ
सारा ही मेरा अपना है
डॉक्टर कह रहा है माँ
मुश्किल मेरा बचना है ।
बस इतना जान लो माँ
मैंने नहीं पी थी एक भी घूँट
उसी ने पी थी उसी पार्टी में
लेकिन खतरा मेरी जान को माँ ।
यह सही नहीं है माँ
मैं यहाँ मरने को हूँ पड़ा
मुझे मारने वाला खड़ा खड़ा
बस मुझे देख रहा है माँ ।
भैया को बोलना रोये नहीं माँ
पापा को सहारा देना अपना
और जब मैं स्वर्ग में जाऊं माँ
मेरी कब्र पर अच्छा बच्चा लिखना।
किसी ने उसे बोला क्यों नहीं माँ
कि पीकर गाड़ी नहीं चलाते
काश किसी ने बोला होता
तो आज मैं जिन्दा होता माँ ।
अब सांस रुकने लगी है माँ
डर सा लग रहा है अभी
पर तुम रोना नहीं कभी
तुम हमेशा मेरे साथ रही माँ ।
मरने से पहले मेरा
एक आखिरी सवाल है माँ
मैंने पीकर कभी गाड़ी नहीं चलाई
फिर मरने की मेरी ही बारी क्यों आई ?
क्यों माँ , आखिर क्यों माँ ?
नोट : यह सन्देश है जो सब तक पहुंचे और पालन हो तो कुछ जिंदगियां असमय ही काल की ग्रास होने से बच सकती हैं ।
Thursday, December 9, 2010
जो दोस्त मुसीबत के वक्त काम न आये , क्या वह दोस्त कहलाने के लायक है ?
वैसे तो थोडा बहुत आलसी हम सब होते हैं । लेकिन भला कोई इतना अलसी भी हो सकता है !
दो दोस्त एक जामुन के पेड़ के नीचे लेटे हुए थे। पेड़ पर पकी हुई जामुनें लगी थी , जो हवा के झोंके के साथ टप टप गिर रही थी । दोनों दोस्त बड़े आलसी थे । इसलिए मूंह खोलकर लेटे हुए थे ताकि कोई जामुन मूंह में गिरे तो खा लें । लेकिन जामुनें थी कि कोई यहाँ गिरे कोई वहां , बस मूंह में ही नहीं गिर रही थी ।
इतने में एक दोस्त बोला --यार तू कैसा दोस्त है । दोस्त वह होता है जो वक्त पर काम आये । इतनी अच्छी अच्छी जामुनें गिर रही हैं । तुझसे इतना नहीं होता कि कुछ जामुन मुझे खिला दे।
दूसरा दोस्त बोला --छोड़ यार । दोस्त वह होता है जो मुसीबत में काम आए । अभी अभी वो कुत्ता मेरे कान में पेशाब कर के चला गया । तुझसे इतना भी नहीं हुआ कि उसे भगा देता ।
अब उन दोस्तों की ये बातें एक सज्जन पुरुष खड़े सुन रहे थे । उन्हें उनके आलस्य पर बड़ा तरस आया । उसने दो जामुन उठाई और दोनों के मूंह में एक एक डाल दी ।
अभी वह चलने ही लगा था कि दोनों एक साथ चिल्लाये --अबे रुक , मूंह से गुठली कौन निकालेगा ?
मित्रो, सुख हो या दुःख , दोस्तों की ज़रुरत हमेशा रहती है ।
लेकिन जो दोस्त मुसीबत के वक्त काम न आये , क्या वह दोस्त कहलाने के लायक है ?
नोट : उपरोक्त लतीफ़ा ओशो रजनीश के सौजन्य से ।
Monday, December 6, 2010
ये दुनिया नहीं ज़ागीर किसी की ---
जैसे :
पति से पत्नी को हुआ संक्रमण ।
गर्भवती मां से शिशु को संक्रमण ।
ब्लड ट्रांसफ्यूजन से हुआ संक्रमण ।
ये रोगी ऐसे होते हैं , जिनकी कोई गलती नहीं होती , फिर भी रोगी बन जाते हैं ।
केवल अनैतिक यौन संबंधों द्वारा एड्स का होना सामाजिक तौर पर भर्त्सनीय है ।
अब ज़रा इन दुष्कर्मियों पर भी नज़र डालें :
अख़बारों में भरे समाचार ,चारों ओर भृष्टाचार ही भृष्टाचार ।
आधी रात में सड़क से उठा कर सामूहिक बलात्कार ।
स्विस बैंकों में जमा लाखों करोड़ ,
कहीं शादी में कर रहे खर्च करोड़ ।
सोचता हूँ कि आदमी कुकर्म करने से पहले सोचता क्यों नहीं ।
आदमी क्यों सोचता है कि ये दुनिया उसकी ज़ागीर है ?
या उसे किसी का डर ही नहीं है ?
इसी को ध्यान में रखकर एक भजन लिखा है । गुनगुनाने में आनंद आएगा ।
कितना भी कतराये सजना , इक दिना तो जाना है
जिस धन पर इतराये इतना , सब यहीं रह जाना है ।
सारा जीवन रिश्वतखोरी , कर रहे सीनाज़ोरी
फिर काहे घबराये भैया , क़र्ज़ यहीं भर जाना है ।
काले धन से काले धंधे , बे धड़क करता बन्दे
मुख ढक कर शरमाये कैसे , अब सज़ा तो पाना है ।
जिसको तू अपना माने है , वो कहाँ ये जाने है
जो बोये थे कांटे तूने , खुद तुझे चुग जाना है ।
शुभ कर्मों का लेखा जोखा , पुल बंधे "तारीफ़ों" का
जो इंसां को इंसां समझे , सुर वही कहलाना है ।
( सुर = देवता )
इस रचना में मात्रिक शुद्धि का विशेष ख्याल रखते हुए सभी पंक्तियों में मात्रिक क्रम एक जैसा ही रखा है जो इस प्रकार है --२ २ २ २ २ २ २ २ , २ १ २ २ २ २ २ , सिर्फ तकनीकि जानकारी के लिए ।
नोट : कृपया यह मत सोचियेगा कि हमने सन्यास लेने की सोच ली है । बस दो दिन की बात और है ।
Friday, December 3, 2010
ज़रा याद उन्हें भी कर लें , जो एड्स से बच न पाए --
करीब तीस साल पहले उजागर हुई इस भयंकर बीमारी से अब तक ३ करोड़ लोग अकाल मौत के मूंह में जा चुके हैं ।
अभी भी ३.३ करोड़ लोग , जिनमे 2५ लाख बच्चे हैं , इस रोग से ग्रस्त हैं ।
लेकिन इस बात से थोड़ी सांत्वना मिलती है कि जहाँ पहले इसका कोई उपचार नहीं था और रोगी एक साल से ज्यादा जिन्दा नहीं रहता था , वहीँ अब सही समय पर सही इलाज़ किया जाए तो ७० साल तक भी जिन्दा रहा जा सकता है ।
करीब ३० से ज्यादा तरह की दवाएं, एक या एक से अधिक कम्बीनेशन में उपलब्ध होने से अब इलाज़ संभव है ।
इसके अलावा इसके रोकथाम के लिए भी कई साधन उपलब्ध हो रहे हैं जैसे एड्स वैक्सीन , टोपीकल ज़ेल्स , एंटी रिट्रो वाइरल ड्रग्स रोक थाम के लिए ।
लेकिन इनसे करीब ४०-६० % लोगों को ही एड्स होने से रोका जा सकता है ।
इसलिए बचाव में ही बचाव है ।
एड्स कैसे होता है ?
* असुरक्षित यौन सम्बन्ध से ।
* संक्रमित रक्त से।
* नशा करने वालों में संक्रमित सूई से ।
* गर्भवती मां से शिशु को ।
एड्स के लक्षण :
* हल्का बुखार रहना ।
* लगातार वज़न घटना ।
* लगातार या बार बार दस्त लगना ।
* खून की कमी होना ।
* गिल्टी निकलना ।
एड्स के रोगी को ये रोग भी पकड़ लेते हैं :
तपेदिक , न्युमोनिया , कई तरह के opurtunistic infections तथा लिम्फोमा जैसे ट्यूमर ।
एड्स के साथ ये रोग भी ट्रांसमिट होते हैं :
Hepatitis -B और C।
निदान :
रक्त की जांच तीन बार की जाती है । यदि तीनों टेस्ट पोजिटिव हों तो एड्स का निदान होता है ।
विंडो पीरियड :
एड्स का संक्रमण होने से रोग के टेस्ट में पोजिटिव आने में ३ सप्ताह से लेकर ३ महीने तक का समय लगता है । इसे विंडो पीरियड कहते हैं ।
इसीलिए संभावित घटना से तीन महीने बाद ही टेस्ट करने का फायदा होता है ।
ऐसे एड्स नहीं फैलता :
* हाथ मिलाने से।
* साथ खाना खाने से ।
* स्विमिंग पूल में ।
* नाई से बाल कटवाने से सम्भावना काफी कम होती है । लेकिन एहतियात बरतने में ही फायदा है ।
* चूमने से --साधारण किस से नहीं होता लेकिन डीप किसिंग से हो सकता है, विशेषकर यदि मूंह में छाले या जख्म हों ।
बचाव में ही बचाव है ।
* जीवन में संयम बरतें ।
* रक्त लेते समय सावधानी बरतें ।
* नशे से दूर रहें ।
* कोई भी शक होने पर अपनी जाँच करवाएं ।
सभी बड़े अस्पतालों में स्वैच्छिक जांच और परामर्श केंद्र खुले हैं ।
यहाँ इलाज़ भी मुफ्त किया जाता है ।
वैसे न ही ज़रुरत पड़े तो अच्छा है ।
Tuesday, November 30, 2010
पहले ख़ुशी , फिर ग़म --हाईपरथायरायडिज्म------
शुभकामनाओं सहित
राजेन्द्र स्वर्णकार
हालाँकि मन तो नहीं था , लेकिन अनुज राजेन्द्र स्वर्णकार के विनम्र निवेदन ने समय से पहले ही लिखने पर मज़बूर कर दिया । ऐसे में और क्या लिखता , इसलिए जो काम कर रहे हैं , उसी पर लिख रहा हूँ ।
सोचिये यदि आप डाइटिंग और कसरत द्वारा वज़न घटाने की कोशिश कर रहे हों , और वज़न कम न हो रहा हो । ऐसे में एक दिन निराश होकर आप दोनों काम करना छोड़ देंगे । फिर एक दिन आपको अहसास होता है कि --अरे वज़न थोडा कम हो गया ।
ऊपर से किसी ने कह दिया कि भई वाह क्या फिगर मेंटेन की है, तो आप फूलकर कुप्पा हो जायेंगे ।
लेकिन फिर और वज़न कम होने पर आपको थोड़ी चिंता होने लगती है कि बिना कुछ प्रयास किये वज़न कम क्यों हो रहा है ।
दूसरे भी अब कहने लगते हैं कि क्या बात है , बड़े कमज़ोर दिख रहे हो ।
जी हाँ , यह चिंताज़नक बात हो सकती है । क्योंकि हो सकता है , आप हाईपरथायरायडिज्म के शिकार हो गए हों ।
हाईपरथायरायडिज्म क्या है ?
यह थायरायड ग्रंथि की बीमारी है और हाइपोथायरायडिज्म का बिल्कुल उल्टा है । यानि इसमें थायरायड हॉर्मोन की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाने से शरीर में कई विकार आ जाते हैं ।
हाईपरथायरायडिज्म के कारण :
अक्सर यह ऑटो इम्युनिटी की वज़ह से होती है । यानि शरीर में ऐसी थायरायड एंटीबोड़ीज बन जाती हैं जो हॉर्मोन की मात्रा को बढ़ा देती हैं । कुछ ऐसे भी रसायन होते हैं जो थायरायड को उत्तेजित करते हैं , ज्यादा हॉर्मोन बनाने के लिए ।
इस दशा को ग्रेव्ज डिसीज ( Graves desease) कहते हैं ।
इसके अलावा थायरायड में गांठ बन जाने से भी अधिक हॉर्मोन पैदा हो सकता है ।
लक्षण :
थायरायड हॉर्मोन की मात्रा अधिक होने से शरीर के सभी अंग उत्तेजित होकर तेजी से काम करने लगते हैं । इसलिए ऐसे लक्षण नज़र आ सकते हैं :-
* वज़न कम होते जाना ।
* अधिक भूख लगना ।
* नींद कम आना ।
* अधिक गर्मी लगना , अधिक पसीना आना ।
* घबराहट , दिल में धड़कन , हाथ कांपना ।
* आँखों में जलन और सूजन ।
* बाल पतले होकर झड़ना ।
* माहवारी का कम होना या रुक जाना ।
यदि आपको खूब भूख लगती है , फिर भी वज़न कम होता जा रहा है , गर्मी की अपेक्षा सर्दी अच्छी लगती है और घबराहट रहने लगी है , तो थायरायड की जाँच कराना न भूलें ।
जांच :
१) रक्त की जांच ---फ्री टी-३ , फ्री टी-४ , टी एस एच ( हॉर्मोन बढ़ जाते हैं , टी एस एच कम हो जाता है )।
२) रेडियो एक्टिव आयोडीन अपटेक ( बढ़ जाता है ), और स्केन ।
उपचार :
अत्यधिक हॉर्मोन से होने वाली परेशानियों को दवाओं से कंट्रोल किया जा सकता है । लेकिन पूर्ण उपचार के लिए ये तीन विकल्प होते हैं :
१) दवाएं --एंटी थायरायड दवाएं ।
आसान लेकिन असंतोषजनक ।
इनको १.५ से २ वर्ष तक लेना पड़ता है ।
ज़ाहिर है इलाज़ लम्बा होता है । छोड़ने के बाद दोबारा होने की सम्भावना रहती है । साइड इफेक्ट्स का भी खतरा रहता है ।
२) ऑप्रेशन :
यदि थायरायड काफी बढ़ी हुई है , तो सर्जरी कराना सही रहता है ।
दोबारा होने की सम्भावना काफी कम रहती है ।
लेकिन सर्जरी के कॉम्प्लीकेशंस भी रहते हैं ।
हाइपो होने की सम्भावना ४०-५० % रहती है ।
३) रेडियो आयोडीन थेरापी :
यह सबसे आसान और सुरक्षित इलाज़ है । बस एक बार रेडियो आयोडीन की दवा कैप्सूल या द्रव के रूप में दी जाती है और कुछ ही दिनों में सारे लक्षण ठीक होने लगते हैं ।
दोबारा होने की सम्भावना कम से कम होती है ।
हाइपो होने की सम्भावना अत्यधिक होती है । यानि बाद में आगे चलकर हॉर्मोन की कमी होने से परेशानी हो सकती है ।
लेकिन मात्र एक गोली रोज खाने से यह समस्या ख़त्म हो जाती है ।
आजकल यह तरीका सबसे ज्यादा प्रयोग में लाया जा रहा है ।
हालाँकि , कौन सा इलाज़ सही रहेगा , इसका फैसला तो डॉक्टर ही कर सकता है । फिर भी रोगी को भी उपचार का विकल्प दिया जाता है ।
नोट : इस रोग का उपचार किसी एंडोक्राइनोलोजिस्ट (endocrinologist) या न्यूक्लियर मेडिसिन स्पेशलिस्ट से ही कराना चाहिए ।
दिल्ली में इंस्टिट्यूट ऑफ़ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज ( इनमास ), लखनऊ रोड तिमारपुर में स्थित है , जहाँ देश भर से रोगी उपचार के लिए आते हैं । यह देश का पहला न्यूक्लियर मेडिसिन इंस्टिट्यूट है ।
Saturday, November 27, 2010
जाने मुसीबत कभी अकेली क्यों नहीं आती---
मैं भी माहौल को बदलने के लिए एक हलकी फुलकी पोस्ट लिखने की सोच ही रहा था ।
वैसे भी एक हरियाणवी ज्यादा देर तक गंभीर कहाँ रह सकता है ।
लेकिन मनुष्य सोचता कुछ और है , होता कुछ और है ।
अभी एक क्रियाक्रम पूर्ण हुआ ही था कि हमारे साले साहब के ससुर जी , जो काफी दिन से गंभीर रूप से बीमार थे और अस्पताल में भर्ती थे , दो दिन पहले उनका निधन हो गया ।
आज ही सूचना मिली कि हमारी चचेरी बहन के पति का सुबह हार्ट अटैक होने से देहांत हो गया ।
जाने मुसीबत कभी अकेली क्यों नहीं आती ।
सोच रहा हूँ अब इसके बाद मैं भी ललित शर्मा जी की तरह भारत भ्रमण पर निकल जाऊं ।
आखिर स्वयं को भी तो सही रखना है ।
लेकिन आज ही खुशदीप सहगल की पोस्ट पर पता चला कि ललित जी की नानी का देहांत होने से वे दिल्ली से वापस लौट रहे हैं । उनका दिल्ली में मिलने का वादा भी पूरा न हो सका ।
भला ऊपर वाले की मर्ज़ी के खिलाफ कौन जा सकता है ।
अब कुछ समय के लिए ब्लोगिंग को पूर्ण विराम देना पड़ेगा ।
नोट : यह पोस्ट केवल सूचनार्थ है । इसलिए टिप्पणी बंद है ।

