Saturday, November 27, 2010

जाने मुसीबत कभी अकेली क्यों नहीं आती---

पिछली पोस्ट पर आदरणीया हरकीरत जी ने पिताजी को श्रधांजलि देते हुए कामना की कि मैं जल्दी ही अपने पुराने रूप में लौटूं ।

मैं भी माहौल को बदलने के लिए एक हलकी फुलकी पोस्ट लिखने की सोच ही रहा था ।

वैसे भी एक हरियाणवी ज्यादा देर तक गंभीर कहाँ रह सकता है

लेकिन मनुष्य सोचता कुछ और है , होता कुछ और है ।

अभी एक क्रियाक्रम पूर्ण हुआ ही था कि हमारे साले साहब के ससुर जी , जो काफी दिन से गंभीर रूप से बीमार थे और अस्पताल में भर्ती थे , दो दिन पहले उनका निधन हो गया ।

आज ही सूचना मिली कि हमारी चचेरी बहन के पति का सुबह हार्ट अटैक होने से देहांत हो गया ।

जाने मुसीबत
कभी अकेली क्यों नहीं आती ।

सोच रहा हूँ अब इसके बाद मैं भी ललित शर्मा जी की तरह भारत भ्रमण पर निकल जाऊं ।

आखिर स्वयं को भी तो सही रखना है ।

लेकिन आज ही खुशदीप सहगल की पोस्ट पर पता चला कि ललित जी की नानी का देहांत होने से वे दिल्ली से वापस लौट रहे हैं । उनका दिल्ली में मिलने का वादा भी पूरा न हो सका ।

भला ऊपर वाले की मर्ज़ी के खिलाफ कौन जा सकता है ।


अब कुछ समय के लिए ब्लोगिंग को पूर्ण विराम देना पड़ेगा ।

नोट : यह पोस्ट केवल सूचनार्थ है । इसलिए टिप्पणी बंद है