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Sunday, October 27, 2013

कॉरपॉरेट कल्चर ने परिवारों को अकेला बना दिया है --


बच्चों को खिला पिला कर,
पोंछती जब माथे का पसीना ! 
एक चमक होती चेहरे पर,
आत्मसंतुष्टि से भर जाता सीना !
रात मे खाना खाते समय वो 
अब सोचा करती है ख्यालों मे कहीं, 
क्या खाया होगा आज बच्चों ने ! 
जाने खाया भी होगा या नहीं !!
लाल के गाल थे कम लाल,
कुछ पतला भी हो गया था ,
जब घर आया था पिछले साल ! 
बिटीया भी अब कहाँ चहकती है , 
भूल सी गई है खिलखिलाना !
सोने लगते हैं जब हम यहाँ ,
तब होता है उसका घर आना !   
ना अम्मा है वहां ना दादी ,
अकेलेपन के हो गए हैं आदी !
महेनों तक बच्चे, अब घर नहीं आते,  
ये मुए कॉरपॉरेट दफ़्तर वाले  
काम कुछ कम क्यों नहीं कराते ! 
क्या ज़माना आ गया है ,
मात पिता की दी हुई शिक्षा ने ही 
बच्चों को मात पिता से दूर करा दिया है !


Friday, October 18, 2013

सुपात्र को दिया गया दान ही सात्विक और सार्थक दान होता है --


आज से २५ -३० वर्ष पूर्व जब हमने गृहस्थ जीवन मे प्रवेश किया तब इंपोर्टेड इलेक्ट्रॉनिक संयंत्रों की बहुत मांग होती थी. क्योंकि तब आर्थिक उदारीकरण लागू नहीं था, इसलिये अधिकतर सामान बाहर से मंगाया जाता था जो अवैधानिक तौर पर ज्यादा होता था. इसीलिये जगह् जगह इंपोर्टेड सामान बेचने की ग्रे मार्केट्स खुली थी जिनमे सारा सामान महंगे सस्ते दाम पर मोल भाव कर खरीदा बेचा जाता था. लेकिन हम जैसे कानून के दायरे मे रहने वालों के लिये सस्ता और इंपोर्टेड सामान खरीदने का एक और तरीका भी था . वह था , एम्बेसी सेल्स का . अक्सर जब कोई विदेशी राजनयिक स्थानांतरित होकर देश छोड़कर जाता तो वह अपने घर के सारे सामान की सेल लगाकर सस्ते दाम पर बेच जाता . हालांकि हमने भी कई बार इन सेल्स के चक्कर लगाये लेकिन खरीद कभी नहीं पाये क्योंकि इस्तेमाल किया हुआ पुराना सामान खरीदने का मन ही नहीं किया . फिर आहिस्ता आहिस्ता घर गृहस्थी का सारा सामान जुटा लिया. इस बीच सरकार की आर्थिक नीतियाँ भी बदली और देश मे ही सभी तरह का सामान मिलने लगा . अब हालात ऐसे हैं कि पुराना सामान आप बेचना भी चाहें तो कोई खरीदार नहीं मिलता क्योंकि अब मध्यम वर्गीय समाज की सामर्थ्य भी नया सामान खरीदने की हो गई है .  

लेकिन एक समाज ऐसा भी है जिन्हे आज भी पुराने सामान की कद्र होती है क्योंकि न उनकी इतनी सामर्थ्य होती है कि वे नया सामान खरीद सकें , न ही उन्हे आवश्यकता होती है . हमे घरेलू सेवाएं प्रदान करने वाले ये निम्नवर्गीय लोग जैसे काम वाली बाई , सुरक्षा कर्मचारी तथा सफाई कर्मचारी आदि लोग पुराने सामान को भी पाकर स्वयं को धन्य समझते हैं. ऐसे मे भाग्यशाली धनाढ्य लोगों का फ़र्ज़ है कि वे अपने पुराने सामान को फेंकने के बजाय इन गरीबों को ही दान कर दें ताकि उनके बच्चे भी इन आधुनिक संयत्रों का आनंद ले सकें . 

हमारी काम वाली भले ही छोटे से किराये के मकान मे रहती हो , लेकिन उसके ठाठ बाठ देख कर उसके गावं वाले बड़े प्रभावित होते हैं . उसका कहना है कि उसके गांव मे उसकी इज़्ज़त और रुतबा एक सेठानी जैसा है . हमे भी लगता है कि कहीं उसके घर पर इनकम टैक्स वालों की रेड ही न पड़ जाये ! क्योंकि घर मे २९ इंच का रंगीन टी वी , १००० वॉट का थ्री इन वन म्यूजिक सिस्टम , और कम्प्यूटर समेट सुख सुविधाओं का सारा साजो सामान मौजूद है . यह अलग बात है कि यह अधिकांश सामान हमारा ही दिया हुआ है.  

हमे भी लगता है कि पुराने समान का जब कोई खरीदार ही नहीं तो क्यों ना ऐसे व्यक्ति को दे दिया जाये जिसके लिये वह भी एक उपलब्धि सी हो. आखिर दान करना भी एक पुण्य का काम है . लेकिन सही मायने मे दान तभी सार्थक होता है जब वह सुपात्र को किया जाये .
गीता अनुसार दान भी तीन प्रकार के होते हैं -- सात्विक , राजसी और तामसी . 

सात्विक दान : जो दान उत्तम ब्राह्मण को किया जाये , जिसे संसारी कामना की इच्छा न हो, स्वयं बिना इच्छा के किया जाये, वह सात्विक दान कहलाता है .  
राजसी दान : किसी इच्छा की कामना करते हुए किया गया दान जिसमे दान के बदले उपकार की अपेक्षा हो, वह राजसी दान कहलाता है . 
तामसी दान : क्रोध और गाली देकर कुपात्र को दिया गया दान तामसी होता है . 

वर्तमान परिवेश मे अधिकांश लोग राजसी प्रवृति के तहत इच्छा पूर्ति के लिये दान करते हैं. अक्सर लोग मंदिरों मे दान बाद मे करते हैं , मन्नत पहले मांग लेते हैं . यानि यह दान सशर्त होता है . यह अज्ञानता की निशानी है . इसी तरह कई बार देखा जाता है कि दान किया गया धन न तो ज़रूरतमंद के पास पहुंच पाता है और ना ही उसका सही उपयोग हो पाता है . ऐसा दान वास्तव मे धन को नष्ट करना है .  

सभी मध्यम वर्गीय परिवारों के घरों मे अनेक सामान ऐसे होते हैं जो वर्षों से या तो पेकेट मे बंद पड़े होते हैं या जिन्हे सालों तक इस्तेमाल कर दिल भर जाता है. विशेषकर पुराने सामान को अब कोई नहीं खरीदता. ऐसे सामान को यदि किसी गरीब और ज़रूरतमंद को दान कर दिया जाये तो निश्चित ही पाने वाले को अपार खुशी का अहसास होगा। और यही सार्थक दान होगा. 
      
नोट : त्यौहारों के इस मौसम मे अपना घर साफ करके भी आप दूसरों के घर रौशन कर सकते हैं ! 
         

Monday, October 14, 2013

मोटरसाइकल चलाते समय सर के बालों से ज्यादा सर की सुरक्षा आवश्यक है --


चौराहे पर जैसे ही बत्ती लाल हुई और गाडी स्टॉप लाइन से पहले रुकी, तभी एक छोटी बच्ची ज़ेब्रा क्रॉसिंग पर खडी होकर तमाशा दिखाने लगी. पतली दुबली मैली कुचैली , उम्र यही कोई ६ वर्ष रही होगी , हालांकि कुपोषित बच्चों मे सही आयु का पता लगाना लगभग असंभव सा होता है. बच्ची कलाबाज़िया खाती हुई सड़क पर उछल कूद मचा रही थी। अब तक उसके आस पास कई मोटरसाइकल आकर रुक गई थी.
एक दो मिनट नटबाज़ी दिखा कर फिर उसने हाथ फैलाने शुरू कर दिये. इस बीच एक और बच्ची जो मुश्किल से दो साल की रही होगी , भीख मांगने का काम शुरू कर चुकी थी. वह सर उठाये और एक हाथ फैलाये एक मोटरसाइकल सवार के आगे खडी थी. कुछ पल उसे निहारने के बाद युवक ने ज़ेब से निकाल कर एक सिक्का बच्ची के हाथ मे रख दिया. सिक्का हाथ मे आते ही बच्ची ने सर झुका कर हाथ मे रखे सिक्के को देखा और उसके चेहरे पर अनायास ही एक मासूम सी संतुष्ट मुस्कान फै़ल गई. ज़ाहिर था , दो साल की मासूम बच्ची भी पैसे की ताकत को पहचानती थी. 

वह मोटरसाइकल सवार युवक अब एक हाथ मे मोबाइल पकड कर उसे दर्पण की तरह प्रयोग करते हुए मोबाइल के स्क्रीन मे अपना चेहरा देख रहा था. उसने हैलमेट को उतार कर हेंडल पर टांग दिया था और दूसरे हाथ से बालों को संवार रहा था. वह एक हाथ से एक कुशल कारीगर की तरह अपने बालों को ऐसे सेट कर रहा था जैसे कोई मूंगफली बेचने वाला मूंगफलियों को आग की हांडी के चारों ओर सजाता है. पूर्ण रूप से संतुष्ट होने के बाद उसने जेब से एक रुमाल निकाला और एक मंजे हुए जादूगर की तरह उसकी तह खोली. हमने सोचा शायद मोबाइल के स्क्रीन को साफ करना चाहता है. लेकिन उसने बड़ी सफाई से रुमाल को सर पर बिछाया और इतमिनान से सर के पीछे गांठ लगाई. फिर हैलमेट उठाकर सर पर रख लिया. लेकिन हैलमेट को बांधने के लिये कोई प्रायोजन नहीं था. यह देख कर हम तो सकते मे आ गए। क्योंकि युवक ने हैलमेट सर पर रख कर अपने माल की रक्षा का प्रबन्ध तो कर लिया था , लेकिन जान की सुरक्षा के बारे मे उसने सोचा ही नहीं. ज़ाहिर था, उसे सर से ज्यादा सर के बालों की चिन्ता थी. इस बीच बत्ती हरी हो गई और वह युवक फर्राटे से हवा से बातें करने लगा. हम तो बस उसकी सलामती की दुआ करते हुए आगे बढ गए.        

नोट : दो पहिये वाहन चालकों को हैलमेट पहन कर ड्राइव करना चाहिये. लेकिन हैलमेट को मजबूती से बांधना भी आवश्यक है. किसी भी दुर्घटना के समय यह जीवन रक्षक साबित हो सकता है.   

Sunday, October 6, 2013

छत पर भूल भुलैया , गाइड संग जाना भाभी भैया --


लखनऊ यात्रा के दौरान कुछ घंटों का समय था , इसलिये शहर घूमने के लिये निकल पड़े. देखने के लिये एक ही एतिहासिक जगह थी -- बड़ा इमामबाड़ा. शहर के पुराने क्षेत्र मे इस शानदार कृति को लखनऊ के नवाब असफ़ उद् दौला ने अठारहवीं सदी मे बनवाया था.  





१८ मीटर ऊंचे रूमी दरवाज़े से होकर जब आप अंदर आते हैं तो यह नज़ारा दिखाई देता है.   


 हरे भरे लॉन के चारों ओर रास्ता बना है.  




दायीं ओर एक मस्जिद है.  




इसे आसफ़ी मस्जिद कहते हैं.  



मुख्य इमामबाड़ा मे एक करीब ५० मीटर लम्बा हॉल बना है जिसकी खूबसूरती यह है कि इसमे एक भी बीम का सहारा नहीं लिया गया है. इस हॉल मे आसफा उद् दोला का मक़बरा बना है और साथ ही इसके आर्किटेक्ट की कब्र भी. कहते हैं इसे नवाब साहब ने उस समय बनवाया था जब वहां अकाल पड़ा हुआ था. इसे बनवा कर उन्होने लोगों को काम दिया जिससे गुजर बसर हो सके. इस हॉल के चारों ओर अनेक चेम्बर बने हैं जिनमे विभिन्न प्रकार के ताज़िये रखे हैं। इन चेंबर्स के उपर जो भवन है , उसे भूल भुलैया कहते हैं क्योंकि इसमे इतने रास्ते और सीढ़ियाँ बनी हैं कि यदि बिना गाइड के घुस गए तो थक कर चूर हो जायेंगे लेकिन बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलेगा.     




यहाँ गाइड तो वैसे भी अनिवार्य है.  




इमामबाड़ा के आगे और पीछे वाली दीवारों मे इस तरह की गैलरी बनी हैं जिनमे सारे रास्ते खुलते हैं. ज़ाहिर है , यदि भूल हुई तो एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने मे ३३० फुट पैदल चलना पड़ेगा. अंदर गर्मी भी होती है और सीढ़ियाँ चढ़ने से पसीना आता है , इसलिये पानी की बोतल साथ ले जाना एक अच्छा विकल्प है.    



छत का एक दृश्य.  




छत से पीछे की ओर नज़र आ रहा है , किंग ज्योर्ज मेडिकल कॉलेज.  




चारों ओर बनी आर्चेज से शहर का सुन्दर नज़ारा दिखाई देता है.  





मुख्य भवन के बाहर बनी है एक बावली. इसके सबसे निचले तल मे पानी भरा है जो सीधा गोमती नदी से आता है. इसमे कई मंज़िलें हैं जिनमे छत की ऊँचाई को बस ५ फुट रखा गया है. गाइड ने बताया कि पुराने ज़माने मे अंग्रेज़ जो लम्बे होते थे , उन्हे झुकाने के लिये ऐसा किया गया था. लेकिन सच तो यही था कि जो भी यहाँ आयेगा , उसे सर झुकाना ही पड़ेगा वर्ना सर फूट जायेगा. सर झुकवाने का यह तरीका भी बड़ा दिलचस्प लगा. बावली की उपरी मंज़िल पर पीछे से निचले तल के पानी मे द्वार पर खड़े लोग साफ नज़र आते हैं. इसके अनेक झरोखों से गुप्त रूप से द्वार पर नज़र रखी जा सकती है.       




घूमते घूमते धूप निकल आई थी. सुहानी धूप मे रूमी दरवाजे का एक फोटो ले कर हम निकल पड़े सीधे एयरपोर्ट की ओर.   

नोट : फोटो मोबाइल कैमरे से. यहाँ के कुछ और मेघ आच्छादित फोटो यहाँ देख सकते हैं.   




Sunday, September 29, 2013

यहाँ आम आदमी भी आम से ज्यादा खास होता है ---


गत सप्ताह लखनऊ का दौरा कर, इस सप्ताह चंडीगढ़ में दो दिवसीय सी एम् ई कम वर्कशौप में शामिल होने का अवसर मिला जिसमे स्वास्थ्य सेवाओं से सम्बंधित कानूनी विषयों पर चर्चा और विचार विमर्श का कार्यक्रम था। सुबह ७ .१० की स्पाइस जेट की फ्लाईट ७ बजे ही हवा में थी और जहाँ पहुँचने का समय ८.१५ का था ,  वहीँ पौने आठ बजे ही चंडीगढ़ पहुँच गई थी। समय से पहले ही उड़ान भरने और गंतव्य स्थान पर पहुँचने को निश्चित ही समयानुकूल तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक सुखद अनुभव तो रहा।
दो दो की पंक्तियों में छोटी छोटी सीटों वाला यह विमान छोटा सा लेकिन बड़ा क्यूट सा था। साफ सुथरा विमान देखकर सचमुच बड़ी प्रसन्नता हुई। हालाँकि इसमें एयर हॉस्टेस की जगह सवा छै फुट की हाईट के दो ज़वान विमान परिचारिका का काम कर रहे थे। यदि उनकी ऊंचाई और एक आध इंच ज्यादा होती तो शायद विमान की छत से टकरा जाते। पौन घंटे की फ्लाईट में खाने की भी कोई विशेष आवश्यकता न होने से समय यूँ ही पेटी बंद करने और खोलने में कब निकल गया , पता ही नहीं चला।

वापसी में कालका शताब्दी से आने का कार्यक्रम था। प्रथम श्रेणी की टिकेट न मिलने के कारण चेयर कार से ही काम चलाना पड़ा। सोचा तो यही था कि ट्रेन की सीटें विमान की इकोनोमी श्रेणी की सीटों जितनी तो होंगी ही। साइज़ तो बेशक उतना ही था लेकिन सीटों पर चढ़े कवर्स की हालत देखकर बड़ा खराब लगा। ज़ाहिर है , हमारे देश में आम और खास में सदा ही अंतर रहा है। इस श्रेणी में यूँ तो सफ़र करने वाले निश्चित ही आम आदमी ही थे लेकिन शायद हमारे देश में असली आम आदमी वे होते हैं जो द्वितीय श्रेणी या अनारक्षित डिब्बों में यात्रा करते हैं।

ट्रेन का सफ़र मनोरंजक भी हो सकता है और कष्टदायी भी। साढ़े तीन घंटे के पूरे सफ़र में एक बच्चे और एक युवक ने तमाशा बनाये रखा। दो साल की बच्ची ने अपने मां पिताजी की नाक में दम कर दिया। कभी मां की उंगली पकड़ डिब्बे के एक सिरे से दूसरे सिरे तक की सैर , कभी पिता के साथ। उस पर तलवार की धार सी पैनी आवाज़ में चीं चीं करती बच्ची ने सचमुच हमें भी नानी याद दिला दी। कहने को तो बच्चे भगवान का ही रूप होते हैं और अच्छे और प्यारे भी लगते हैं , लेकिन असमय और अवांछित प्यार भी कहाँ हज्म होता है। उधर पीछे वाली सीट पर बैठा एक युवक जो बिजनेसमेन था , लगातार मोबाईल पर बात किये जा रहा था।  कुछ समय बाद वह खड़ा हो गया और द्वार के पास खड़ा होकर बात करता रहा। लगभग ढाई घंटे तक वह लगातार बात करता रहा। उसका और उसके फोन का स्टेमिना देखकर एक ओर हम हैरान भी थे , वहीँ दूसरी ओर उस पर दया सी भी आ रही थी क्योंकि फोन पर वह बिजनेस की परेशानियाँ भुगत रहा था। इस बीच बाकि यात्री तो तरह तरह के पकवानों का आनंद लेते रहे और वह बेचारा माल की सप्लाई , ट्रकों का प्रबंध और पैसे के इंतज़ाम की ही बात करता रहा। आखिर उसके फोन की बैटरी जब ख़त्म हो गई , तभी वह अपनी सीट पर बैठा। तब भी उसने मोबाइल को चार्जर पर लगाया और फिर बात करने लगा। न खाया , न पीया , बस बात ही करता रहा।

हम भी ढाई घंटे तक बच्ची के मात पिता और युवक के माथे पर पड़ी एक जैसी शिकन को देखते रहे और सोचते रहे कि जिंदगी भी कितनी कठिन हो सकती है। यह दृश्य तो ऐ सी चेयर कार का था, फिर जाने साधारण श्रेणी के डिब्बों के यात्रियों का क्या हाल होता होगा। यह सोचकर ही असहज सा महसूस होने लगता है।

              

Sunday, September 22, 2013

एक दिन अवध के नाम जहाँ लोग करते थे पहले आप , पहले आप --


आज से लगभग तीस वर्ष पहले जब पहली बार एयर इंडिया के महाराजा से हवाई यात्रा की थी तब स्वयं को एक वी आई पी जैसा महसूस किया था. यह एयरलाइन भी तब यात्रियों के साथ शाही मेहमान की तरह ही व्यवहार करती थी. सबसे पहले तो विमान में बैठते ही अत्यंत सुन्दर परियों सी एयर होस्टेस के दर्शन होते थे. फिर वो अपने सुन्दर हाथों से टॉफी परोसती थीं. हमें याद है जब पहली बार हमने हवाई यात्रा की और एयर होस्टेस जब एक ट्रे में इयर प्लग और टॉफियाँ लेकर आई तब हमने तो डरते डरते एक ही टॉफी उठाई, लेकिन साथ वाली सीट पर बैठे एक महानुभव ने जब मुट्ठी भरकर टॉफियाँ उठाई तब एयर हॉस्टेस ने उसे अजीब सी निगाहों से देखा था. उसके बाद आरंभिक औपचारिकताओं के बाद जब प्लेन उड़ान भर चुका और बेल्ट खोलने का संकेत हुआ तो फ़ौरन एयर हॉस्टेस प्लेट में कुछ लेकर हाज़िर थी. हमने सुना था कि एयर इंडिया वाले उड़ान के दौरान बहुत खातिरदारी करते हैं. लेकिन जब प्लेट में अनेक क्रीम रोल्स रखे नज़र आये तो यह देखकर बड़ी हैरानी हुई कि खाने की शुरुआत क्रीम रोल से ! लेकिन जब हाथ में आया तब समझ में आया कि वे सफ़ेद रंग के रोल्स खाने के क्रीम रोल्स नहीं बल्कि मूंह पोंछने के लिए गर्म गीले तौलिये थे. खैर , हाथ मूंह पोंछकर हम खाने के लिए तैयार थे और खाना भी खूब खिलाया गया. 

लेकिन अभी जब एक बार फिर एयर इंडिया से यात्रा करने का अवसर मिला तो लगा कि वक्त कितना बदल गया है. एयर हॉस्टेस तो अब भी थीं लेकिन आकर्षक सिर्फ साड़ियाँ ही थीं. खाने पीने के नाम पर बस एक दो सौ एम् एल की जूस की बोतल और दो बिस्कुट। दो सौ एम् एल की पानी की बोतल भी बस मांगने पर ही. वापसी में तो बिस्कुट की जगह २ ५ ग्राम भुनी हुई मूंगफली जिसे खाकर सभी ऐसे आनंदित हो रहे थे जैसे रेगिस्तान में बिसलेरी मिल गई हो. लगता है अब वो दिन भी दूर नहीं जब अगली बार भुने हुए चने खाकर ही संतोष करना पड़ेगा।                 
 


अगली सीट की बैक पर लगे मोनिटर में यह सन्देश उड़ान के पूरे समय आता रहा. लेकिन गंतव्य शहर आ गया पर कार्यक्रम आरम्भ नहीं हुआ. आखिर आते जाते दोनों समय द्वार पर हाथ जोड़े खड़ी एयर हॉस्टेस की मधुर मुस्कान से ही महाराजा होने का क्षणिक अहसास हुआ.

बेड टी घर पर , नाश्ता और लंच लखनऊ में , फिर डिनर वापस घर आकर. अक्सर ऐसा कार्यक्रम कॉर्पोरेट जगत में देखा जाता है. लेकिन कुछ ऐसा ही हुआ हमारे साथ , जीवन में पहली बार. गुजरे ज़माने में नवाबों की नगरी लखनऊ के बारे में सुना था कि यह कोई विशेष शहर नहीं। हालाँकि लखनवी तहज़ीब के बारे में बहुत सुना था. लेकिन पता चला कि सुश्री मायावती जी ने इस शहर की कायापलट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।       


गोमती नदी के किनारे बने डॉ भीम राव अम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल द्वार से होकर नदी पार कर पहुँचते हैं धोलपुर पत्थर से बने  स्थल पर.



गोमती नदी के पार एक बहुत बड़े क्षेत्र में बना है यह पत्थरों का शहर जो निश्चित ही देखने में बड़ा चक्षु प्रिय लगता है. इस भवन में बना है एक ऑडिटोरियम।



नदी के किनारे किनारे यह सड़क जिसके दोनों ओर शाम के समय बैठकर निश्चित ही रोजमर्रा की भाग दौड़ की जिंदगी से काफी राहत मिलती होगी।

इसी के दूसरी ओर कई दुकानें बनाई गई थी जो अब खाली पड़ी थी. पता चला यहाँ शाम को शानदार मेला सा लगता है. वास्तव में यह स्थान लखनऊ वासियों के लिए एक नया जीवन दान देने वाला लगता है.

बेशक इसे बनाने में सरकार या यूँ कहिये की पब्लिक फंड को भारी मात्रा में लगाया गया होगा। लेकिन अब इन्हें यूँ बेकद्री से पड़े देखकर आजकल की राजनीति पर क्षोभ ही होता है. राजनीतिक पार्टियों के  बीच फंसकर यदि कोई बेवकूफ़ बनता है तो वह आम जनता ही है. नेता लोग तो अपने व्हिम्स और फेंसी के तहत अपनी मनमर्जी करते हैं और जनता बेचारी खड़ी बस तमाशा देखती रह जाती है.


Sunday, September 15, 2013

रंग जो लाई हैं दुआएं , अब उतरने न पाए --

ब्लॉगिंग और फेसबुक की जंग में फेसबुक जीतता नज़र आ रहा है. इसका कारण है लगभग सभी ब्लॉगर्स का फेसबुक की ओर प्रस्थान करना।  हमने जान बूझकर फेसबुक पर भी अधिकांश ब्लॉगर्स को ही मित्र बनाया है. लेकिन सभी ब्लॉगर मित्र फेसबुक पर नहीं हैं , इसलिए उनके लिए प्रस्तुत हैं , फेसबुक पर प्रकाशित कुछ एकल पंक्तियाँ जो कम शब्दों में ज्यादा बात कह रही हैं :
   
* अब तो अडवाणी जी को भी समझ आ गया होगा कि भा ज पा में सिर्फ कुंवारे ही पी एम बन सकते हैं !

   यह अलग बात है कि यह फ़ॉर्मूला अब उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी भी अपना रहे हैं.  

* कभी कभी ऐसा लगता है , कि हम इस समाज में रहने योग्य ही नहीं !        
                                                                                                
  लेकिन जाएँ तो जाएँ कहाँ !                                                             
                                                                                                
* लखनऊ में : पहले आप ! पहले आप !  दिल्ली में : पहले मैं ! पहले मैं !      
                                                                                               
  जाने दिल्लीवाले इतने मिमियाते क्यों हैं !                                          
                                                                                                                                                                                              
* टी वी पर देखा तो ये ख्याल आया : क्यों न डॉक्टरी छोड़कर हम भी कृपा       दृष्टि से ही उपचार करना शुरू कर दें !                                                   
                                                                                                 
 लेकिन सोचते हैं यदि कृपा नहीं आई तो पब्लिक क्या हस्र करेगी !                
                                                                                                
* यदि ज़रूरी मीटिंग के बीच पत्नी का फोन आ जाये तो आप क्या करेंगे ?   
                                                                                                क्या करेंगे जब एक ओर कुआँ हो और दूसरी ओर खाई !                        
                                                                                              
* अक्सर दंगों में मरने वाले मासूम ही होते हैं.                                      
                                                                                              
   नामासूम ना मालूम किस जहाँ में छुप जाते हैं !                                 
                                                                                              
* आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे !                                        
                                                                                              
   दुआ तो रंग ले आई. अब यही देखना है कि यह रंग कब तक टिकता है !    
                                                                                              
* कितना आसां है आसाराम बन जाना।                                              
                                                                                              
   हम तो राम बनने की आस में जीते हैं !                                            
                                                                                              
* दुनिया में दिमाग वाले तो बहुत मिल जायेंगे, लेकिन व्यापक दिमाग वाले   बहुत कम मिलते हैं.                                                                      
                                                                                               
   आखिर दिमाग की बात है , समझने के लिए दिमाग लगाना पड़ेगा।          
                                                                                              
* फेसबुक ही एक ऐसा माध्यम है जहाँ अक्सर लाइक का मतलब लाइक नहीं होता !                                                                                        
                                                                                               
फेसबुक ने हर हालात में हमें खुश रहना सिखा दिया है.                            
                                                                                               
* यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं पर काबू पा ले, तो सीधा मोक्ष को प्राप्त करता है।                                                                                           
                                                                                              
यह अलग बात है कि मोक्ष धाम में करने को कोई काम नहीं होता।             
                                                                                              
* बापू की ज़वानी का राज़ क्या है --- हम भी आश्चर्यचकित हैं !                 

आश्चर्यचकित तो इस बात से भी हैं कि अब बापुओं पर भी ज़वानी रहती है.  


और अंत में एक सवाल जिस पर आपने पूरा शब्द कोष ही सामने ला कर रख दिया --सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल को हिंदी में क्या कहेंगे ! इस पर चर्चा अगली पोस्ट में.    



नोट : ब्लॉगिंग और फेसबुक में जंग अभी जारी है.देखते हैं आगे क्या होता है !