बच्चों को खिला पिला कर,
पोंछती जब माथे का पसीना !
एक चमक होती चेहरे पर,
आत्मसंतुष्टि से भर जाता सीना !
रात मे खाना खाते समय वो
अब सोचा करती है ख्यालों मे कहीं,
क्या खाया होगा आज बच्चों ने !
जाने खाया भी होगा या नहीं !!
लाल के गाल थे कम लाल,
कुछ पतला भी हो गया था ,
जब घर आया था पिछले साल !
बिटीया भी अब कहाँ चहकती है ,
भूल सी गई है खिलखिलाना !
सोने लगते हैं जब हम यहाँ ,
तब होता है उसका घर आना !
ना अम्मा है वहां ना दादी ,
अकेलेपन के हो गए हैं आदी !
महेनों तक बच्चे, अब घर नहीं आते,
ये मुए कॉरपॉरेट दफ़्तर वाले
काम कुछ कम क्यों नहीं कराते !
क्या ज़माना आ गया है ,
मात पिता की दी हुई शिक्षा ने ही
बच्चों को मात पिता से दूर करा दिया है !

