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Sunday, October 27, 2013

कॉरपॉरेट कल्चर ने परिवारों को अकेला बना दिया है --


बच्चों को खिला पिला कर,
पोंछती जब माथे का पसीना ! 
एक चमक होती चेहरे पर,
आत्मसंतुष्टि से भर जाता सीना !
रात मे खाना खाते समय वो 
अब सोचा करती है ख्यालों मे कहीं, 
क्या खाया होगा आज बच्चों ने ! 
जाने खाया भी होगा या नहीं !!
लाल के गाल थे कम लाल,
कुछ पतला भी हो गया था ,
जब घर आया था पिछले साल ! 
बिटीया भी अब कहाँ चहकती है , 
भूल सी गई है खिलखिलाना !
सोने लगते हैं जब हम यहाँ ,
तब होता है उसका घर आना !   
ना अम्मा है वहां ना दादी ,
अकेलेपन के हो गए हैं आदी !
महेनों तक बच्चे, अब घर नहीं आते,  
ये मुए कॉरपॉरेट दफ़्तर वाले  
काम कुछ कम क्यों नहीं कराते ! 
क्या ज़माना आ गया है ,
मात पिता की दी हुई शिक्षा ने ही 
बच्चों को मात पिता से दूर करा दिया है !