घर के आँगन में एक २५ -३० वर्ष की महिला ज़मीन पर बैठी जोर जोर से हिल रही है और हाथ पैर पटकती हुई सर को गोल गोल घुमाती हुई भर्राई हुई आवाज़ में बडबडा रही है --मैं सबको देख लूँगा ---अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी--- आज से हर सोमवार मेरे लिए हलवा पूरी बनाया करो---- पहले घर की बहु को खिलाओ , फिर सब लोग खाओ--वगैरह वगैरह .
सारे गाँव में खबर फ़ैल जाती है --फलाने की बहु में फलाना दादा आ गया .
अक्सर ऐसे किस्से सुनने में आते रहते थे . एक परिवार के पूर्वज जो रिश्ते में हमारे परदादा लगते थे --अक्सर उनके नाम का भूत उन्ही के परिवार के किसी न किसी व्यक्ति में आ जाता था . अक्सर वह व्यक्ति घर की कोई बहु होती थी .
फिर गाँव के ओझा को बुलाया जाता . ओझा गाँव के निम्न जाति के समुदाय से होता था जिसका दावा था की उसने शमशान में घोर तपस्या करने के बाद भूतों से छुटकारा दिलाने की सिद्धि प्राप्त की है .
वह आता और अपने तंत्र मन्त्र से बहु में आए भूत को बोतल में बंद कर ले जाता और दबा देता कहीं दूर ज़मीन के नीचे .
यह और बात है की कुछ दिन बाद वही भूत फिर किसी बहु के शरीर में प्रवेश कर तहलका मचा देता .
शहर में आने के बाद मैं अक्सर सोचा करता --यहाँ शहर में कभी किसी में भूत क्यों नहीं आता ?
दृश्य २ : ( अस्पताल के आपातकालीन विभाग में )
एक २५-३० वर्षीय महिला को उसके रिश्तेदार लेकर आते हैं . महिला प्रत्यक्ष में बेहोश दिख रही है लेकिन हाथ पैर पटक रही है . टेबल पर लिटाकर उसके पतिदेव जुट जाते हैं उसकी सेवा करने में --हाथ पैरों को मसल रहे हैं . दूसरा रिश्तेदार आकर घबराई आवाज़ में कहता है --डॉक्टर जल्दी कीजिये --देखिये इसे क्या हुआ --बेहोश हो गई है --बैठी बैठी अचानक बेहोश हो गई . पूछने पर पता चलता है की पति पत्नी में कुछ कहा सुनी हुई , उसके बाद वह बेहोश हो गई .
पति बताता है --इसको अक्सर ऐसे दौरे पड़ जाते हैं .
पूरा मुआयना करने के बाद डॉक्टर उसका मर्ज़ समझ जाता है . वह उसे एक मेडिकल ईत्र सुंघाता है . महिला पहले तो साँस रोक लेती है लेकिन जल्दी ही उसका साँस टूट जाता है और वह आँख खोल देती है और होश में आ जाती है . उसकी आँखों के कोर से आंसू की एक बूँद बह निकलती है .
रोगी आज के लिए ठीक हो गई है .
डॉक्टर उसके पति को समझाता है --जितनी सेवा तुम आज कर रहे थे , घर में यदि इसकी आधी भी करो तो यह ठीक रहेगी . इसका ख्याल रखा करो .
निष्कर्ष :
मनुष्य के व्यक्तित्त्व पर परिस्तिथियों का बहुत प्रभाव पड़ता है . बहुत सी बातें हमारे सब्कौन्शिय्स ( अर्धचेतन ) मस्तिष्क में जमा होती रहती हैं . विपरीत परिस्तिथियों में ये बातें अन्जाने ही बाहर आने लगती हैं . अक्सर अज्ञानतावश हम इन्हें कोई विकार मान लेते हैं . इन्ही बातों का नाजायज़ फायदा उठाकर कई तरह के ओझा , बाबा , तथाकथित साधू महात्मा तंत्र मन्त्र का नाटक कर सीधे सादे लोगों को बेवक़ूफ़ बनाते हैं .
सच तो यह है --भूत प्रेत नाम की कोई चीज़ होती ही नहीं .
ऐसे हालातों में अक्सर तीन तरह के रोगी आते हैं :
१ ) मैलिंगर्स :
ये वे रोगी होते हैं जो जान बूझ कर बीमार होने का नाटक करते हैं . इसका सबसे कॉमन उदहारण है --जेब कतरे .
यदि पकडे जाएँ तो उनका नाटक देखने लायक होता है .
वैसे बड़े बड़े नेता , धर्म गुरु या पहुंचे हुए लोग भी इस विद्या में कुछ कम नहीं .
२ ) फंक्शनल :
चिकित्सा की भाषा में ये वे रोगी होते हैं जैसा दृश्य १ और २ में दिखाया गया है .
मन में दबी हुई भावनाओं और इच्छाओं को लिए ये लोग अक्सर विपरीत परिस्तिथियों में बीमार होने का बहाना करते हैं लेकिन इनको पता नहीं होता की ये बहाना कर रहे हैं . यानि ये अर्ध चेतन अवस्था में बीमार होते हैं . कभी कभी इसका इलाज करना भी बहुत सरल नहीं होता जैसे हिस्टीरिया .
इन्हें सायकोथेरपी की ज़रुरत होती है .
हालात सुधरने पर सुधार की आशा की जा सकती है .
३) सिजोफ्रेनिक :
ये वास्तव में मानसिक रोगी होते हैं . अक्सर इनका रोग हालातों पर निर्भर नहीं करता . लेकिन फिर भी हालात का थोडा रोल रह सकता है . इन्हें यथोचित उपचार द्वारा ही ठीक किया जा सकता है . इन्हें पागल कहना या पागल समझ कर दुत्कारना सही नहीं .
निश्चित ही दुनिया का कोई ओझा , बाबा ,या सिद्ध पुरुष इनका इलाज नहीं कर सकता. इनके धोखे में न आएं .