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Wednesday, October 24, 2012

जल जायेगा रावण बेचारा -- क्या मन के रावण को मारा !


और एक बार फिर रावण जल जायेगा। बड़ा बेहया है ये वाला रावण। हर वर्ष जलता है , फिर अगले वर्ष पहले से भी बड़ा होकर फिर मूंह उठाकर खड़ा हो जाता है। जलाने वाले भी ऐसे हैं कि थकते ही नहीं। पूरे नौ दिनों तक विविध रूप के कर्मकांड करते हुए दसवें दिन धूम धाम से ज़नाज़ा निकालते हैं और जला कर राख कर खाक में मिला देते हैं . एक बार फिर अन्याय, अधर्म और पाप की हार होती है और न्याय, धर्म और पुण्य की जीत होती है जिसका जश्न भी तुरंत मना लिया जाता है।

यह दुनिया भी अजीब है। जब एक देश में दिन होता है , उसी समय किसी दूसरे देश में रात होती है। इसी तरह एक धर्म के पर्व दूसरे धर्मों के लिए कोई विशेष अर्थ नहीं रखते। यहाँ तक कि एक ही धर्म के लोगों में भी विविधता देखने को मिलती है। एक ही पर्व को एक क्षेत्र के लोग एक तरीके से मनाते हैं,  दूसरे क्षेत्र के लोग दूसरे प्रकार से।

अब दशहरा पर्व को ही लीजिये। समस्त उत्तर भारत में दशहरा से पहले नवरात्रे मनाये जाते हैं जिनमे लोग उपवास रखते हैं , सामान्य अन्न खाना छोड़ देते हैं , एक विशेष प्रकार के आहार पर गुजारा करते हैं। इस दिनों में सब लोग मांसाहार छोड़ शुद्ध सात्विक भोजन करने लगते हैं। यहाँ तक कि मदिरा पान पर भी स्वयंभू प्रतिबन्ध लगा देते हैं। दसवें दिन रावण की आहुति देते ही सारे प्रतिबन्ध समाप्त हो जाते हैं।

उत्तर भारत में इन दिनों में सारी पार्टियाँ, भोज और जश्न आदि स्वत: ही प्रतिबंधित हो जाते हैं। लेकिन कुछ लोग तो दिल ही दिल में एक एक दिन गिन गिन कर काटते हैं। फिर जैसे ही रावण वध होता है , सबसे पहले उसका ही जश्न मनाया जाता है। अक्सर अधिकतम पार्टियाँ नवरात्रों से एक दिन पहले और तुरंत बाद आयोजित की जाती हैं। आखिर , एक नहीं दो नहीं , पूरे नौ दिनों तक संयम जो रखना पड़ता है।

मत कहो,कि चीज़ अच्छी नहीं शराब 
बस नवरात्रों में ही होती है, यह खराब .     

दूसरी ओर बंगाली समाज इसी समय दुर्गा पूजा का पर्व मनाता है। खूबसूरत रंगों और साज सजावट से बनी दुर्गा माँ की मूर्ति की प्रतिदिन पूजा की जाती है। और अंत में उसे यमुना नदी में बहा दिया जाता है। इस बीच स्वादिष्ट पकवानों से जिव्हा की भी पूर्ण संतुष्टि का विशेष ख्याल रखा जाता है। खाने में नाना प्रकार की मच्छलियाँ और अन्य मांसाहार शौक से उदरित किये जाते हैं।

यह देखकर कई सवाल मन में उठते हैं।

* ऐसा क्यों कि इस पर्व में कुछ लोगों के लिए मांसाहार वर्जित हो जाता है,जबकि दूसरे लोग शौक से खाते हैं ?
* क्या शराब और मांसाहार इतने ख़राब हैं कि नवरात्रों में इनका सेवन वर्जित है ?
* यदि हाँ, तो फिर बाकि पूरे साल इनका सेवन क्यों किया जाता है ?
* क्या नौ दिन तक सात्विक रहकर पूरे साल के लिए आत्मिक शुद्धि हो जाती है ?

हमारे लिए तो हर दिन नया दिन और हर रात नई रात होती है। यह अलग बात है कि इन पर्वों से जीवन में विविधता आती है। औरों की खातिर हम भी इन व्यसनों से दूर रहते हैं। हालाँकि वैसे भी हम तो शुद्ध शाकाहारी हैं और मदिरापान कभी कभार ही करते हैं।

काश कि मानसिक पवित्रता का जो ज़ज्बा हम अपने पर्वों में दिखाते हैं , वही सम्पूर्ण जीवन में भी उतार लें। 

नोट : रावण वस्तुत: एक मनोदशा होती है। हमारे मन के अहंकार और हठधर्म का नाम ही रावण है। इन मनोभावों को जीतना ही वास्तविक विजय है। जो अपने मन के रावण पर विजय प्राप्त कर लेता है , वही राम कहलाने योग्य है . दशहरा की शुभकामनायें।   



Saturday, October 8, 2011

एक बार फिर व्यर्थ मारा गया --बेचारा रावण

विजयदशमी के साथ ही एक बार फिर रावण दहन संपन्न हुआ . कहीं रावण को फूंका गया , कहीं पैरों तले रौंदा गया . कहीं नेता ने मारा , कहीं राम के अभिनेता ने मारा . हर हाल में रावण को मरना पड़ा . सदियों से यही परंपरा चली आ रही है . रावण को तो मरना ही पड़ता है --बार बार, लगातार हर वर्ष .

कभी कभी सोचता हूँ क्या सचमुच रावण ने इतना बड़ा अपराध किया था जो उसे यूँ बार बार मारा जाता है .
जहाँ तक पढने सुनने में आता है , रावण एक सुशिक्षित , ज्ञानी , विद्वान पंडित था . साथ ही अति पराक्रमी , बहादुर , शक्तिशाली और वरदान प्राप्त योद्धा भी था .

उसके चरित्र में भी कोई दाग नहीं था .

उससे बस एक भूल हो गई जो उसने सीता मैया का अपहरण किया और उन्हें कैद में रखा . इसके अलावा तो कोई और अपराध नहीं किया था . उसने कभी सीता मैया को छुआ तक नहीं .

रावण अपनी जिद्द पर ज़रूर अड़ा रहा और बहुत समझाने के बावजूद भी टस से मस नहीं हुआ . अंतत : यही अहंकार उसे ले डूबा .

लेकिन क्या जब तक धरती पर जीवन रहेगा , रावण को यूँ ही मारा जाता रहेगा ?
एक छोटी सी भूल की इतनी बड़ी सजा !
या अहंकार का होना इतना बड़ा गुनाह है ?

यदि हकीकत की दुनिया में देखें तो जाने कितने ही दुष्कर्मी सड़कों पर आज़ाद घूम रहे हैं और उन्हें कोई सजा नहीं मिलती .

दिल्ली जैसे शहर में रोज लड़कियों का अपहरण होता है. रेप की कितनी ही घटनाएँ होती हैं . महिलाओं से छेड़ छाड़ तो आम बात है . कामकाजी महिलाओं का शोषण हो रहा है . दहेज़ के लालची लोगों द्वारा बहुओं को सरे आम जला दिया जाता है .

बड़े सेठों के बच्चे , नेताओं के बच्चे , आला अफ़सरों के बच्चे --शराब के नशे में सड़क पर निरीह जनता को कुचल देते हैं , रोड़ रेज़ में सरे आम हत्या कर देते हैं, शराब न मिलने पर गोली मार देते हैं .

क्या यह अहंकार की निशानी नहीं है ?

लेकिन उनके विरुद्ध अक्सर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती . उन्हें कोई सज़ा नहीं मिल पाती .
यदि मिलती भी है तो बस नाम मात्र .

बिल्ला रंगा को फाँसी हुई , लेकिन फिर सब भूल गए .

निर्दोष जनता को बम से उड़ाने वाले आतंकवादी या तो पकडे नहीं जाते या फिर उन्हें सज़ा ही नहीं हो पाती .

कुछ तो सरकारी मेहमान बन जनता के पैसे पर ऐश कर रहे हैं .

ऐसे में क्या सचमुच रावण को बार बार मार कर हम कुछ हासिल कर रहे हैं ?

लगता है , अब समय आ गया है , हम अपनी परम्पराओं का निष्पक्ष रूप से निरीक्षण करें और समयानुसार संभावित संशोधन करें .

नोट : थोड़ी देर तक धार्मिक भावनाओं और आस्थाओं को भूलकर यदि हम निष्पक्ष चिंतन करें , तो शायद कोई सार्थक बात निकल कर आए .

Sunday, October 17, 2010

कितना आसान होता है --उंच नीच और छोटे बड़े का भेद भाव मिटाने की बात करना--

कल शनिवार था । साथ ही नवमी भी थी । शनिवार को आधी छुट्टी होती है । अस्पताल से निकला तो सड़कों पर जगह जगह शामियाने गड़े मिले । वहां सैकड़ों की तादाद में पत्तल के डोंगों में लोग पूरी भाज़ी और हलवा खा रहे थे । नवमी का प्रसाद था ।

इन नज़ारों को देखकर बड़ा मन हुआ कि क्यों न हम भी ऐसा ही करें । हलवा पूरी देखकर मूंह में पानी आ रहा था ।

लेकिन फिर देखा कि खाने वाले ज्यादातर निम्न वर्ग के लोग थे --

रिक्शा चालक , मजदूर , फैक्टरी में काम करने वाले इत्यादि ।

और हम ठहरे चमचमाती कार में बैठे , सूटेड बूटेड , चेहरे से चिकने चुपड़े बड़े साहब जी ।

भला ये तौहीन कैसे सह सकते थे ।

बस इसी तरह ललचाई नज़रों से ये नज़ारे देखते हुए, ख्वाबों ख्यालों में हलवा पूरी का मज़ा लेते हुए हम घर पहुँच गए ।

कितना आसान होता है --उंच नीच और छोटे बड़े का भेद भाव मिटाने की बात करना ।
और कितना मुश्किल होता है --इस भेद भाव को मिटाना ।

आज दशहरे के दिन हम हर वर्ष रावण को जलाते है । यदि अपने अन्दर के अहंकार को भी मिटा पायें , तभी यह पर्व सार्थक होगा ।