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Monday, June 10, 2013

दिल कहे रुक जा रे रुक जा , यहीं पे कहीं -- धर्मशाला रीविजिटेड -- १८ साल के बाद।


दिल्ली से बाहर निकल पहाड़ों की ओर रुख पहली बार मेडिकल कॉलेज के तृतीय बर्ष की छुट्टियों में हुआ था। पहली ही नज़र में जैसे पहाड़ों से प्यार सा हो गया था। शादी के बाद तो गर्मियों में यह नियम सा ही बन गया। दिल्ली जैसे बड़े शहर में बढती जनसँख्या का प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ता है। इसलिए कुछ दिनों के लिए स्वच्छ वातावरण में साँस लेना और भी आवश्यक हो जाता है।

इस वर्ष कार्यक्रम बना हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला का , जहाँ पहली और आखिरी बार १८ साल पहले जाना हुआ था। तब एक मित्र की नई नई शादी के बाद हम भी बच्चों समेत यहाँ पधारे थे। उस वर्ष पैदा हुए बच्चे अब व्यस्क होकर और वोट का अधिकार पाकर देश के भाग्य विधाता बनने लायक हो गए हैं। इसी तरह इस बीच धर्मशाला में भी कितना कुछ बदल गया है , इस बारे में अगली पोस्ट में बात करेंगे। फ़िलहाल तो आइये देखते हैं , पहाड़ों की खूबसूरती जो बरबस किसी का भी मन मोह सकती है और मन मयूर नाचने लगता है।

दिल्ली से धर्मशाला जाने के लिए सर्वोत्तम साधन है , वॉल्वो बस यात्रा। शाम ७ बजे चलकर सुबह ६ बजे पहुँच जाती है , हालंकि देर से चलना जैसे इनका नियम सा है। बाहर से अत्यंत सुन्दर दिखने वाली वॉल्वो बस अन्दर से भी उतनी ही सुन्दर और आरामदेह हो , यह कतई आवश्यक नहीं। फिर भी , यह हवाई यात्रा का बढ़िया विकल्प है। यह अलग बात है कि सुबह ६- ७ बजे पहुँच कर होटल में चेक-इन की समस्या हो सकती है।

धर्मशाला शहर की समुद्र तल से ऊँचाई मात्र १२५० मीटर होने से यहाँ आपको गर्मी मिल सकती है लेकिन इतनी नहीं जितनी दिल्ली में। वैसे भी पर्यटकों के लिए यहाँ विशेष कुछ नहीं है। यहाँ का असली आकर्षण है मैक्लौड गंज जो धर्मशाला से करीब १० किलोमीटर दूर १९०० मीटर की ऊँचाई पर होने से अपेक्षाकृत ठंडा महसूस होता है। साथ ही यहीं के आस पास कई खूबसूरत पर्यटन स्थल हैं जो मन को सकूं प्रदान करते हैं।   

ठहरने के लिए हमारा आशियाना था स्टर्लिंग रिजॉर्ट जो धर्मशाला से करीब १ किलोमीटर दूर पालम पुर जाने वाली सड़क से बाएं मुड़कर एक नदी किनारे बहुत ही खूबसूरत वादी के बीच बना है। ढाई किलोमीटर लम्बी सड़क के साथ साथ बहती नदी अंत में एक पहाड़ की तलहटी पर पहुँच कर अपना रुख मोड़ लेती है और सड़क नदी को पार कर दूसरी ओर से वापस मुड़ लेती है। इस तरह नदी के दोनों ओर सड़क के साथ साथ कई गाँव बसे हैं जो अब शहरीकृत हो चुके हैं। अब यहाँ सेवा निवृत लोगों ने सुन्दर बंगले और  कॉटेज बना रखे हैं। देखा जाये तो यह स्थान शांतिपूर्ण सेवा निवृत जीवन व्यतीत करने के लिए सर्वोत्तम प्रतीत होता है।  



स्टर्लिंग रिजॉर्ट की पार्किंग और अधिकारिक निवास अवम कार्यालय। प्रष्ठभूमि में धौलाधार रेंजिज जो कभी बर्फ से ढकी होती थी लेकिन अब बर्फ नाममात्र को दिखाई दे रही थी। दायीं ओर रिजॉर्ट बना है जिसके बाद नदी है।    




यह रिजॉर्ट एक होटल के रूप में है लेकिन रिजॉर्ट की सभी सुविधाएँ यहाँ उपलब्ध हैं। एक तरफ कमरों से धौलाधार चोटियाँ नज़र आती हैं जबकि पीछे की ओर बने कमरों से नदी का शानदार नज़ारा। पहले दिन नदी में पानी ज्यादा नहीं था लेकिन अगले दिन हुई बारिस की वज़ह से अचानक नदी में बहुत सारा पानी एक साथ आ गया। यहाँ पानी में जल क्रीड़ा कर रहे कई पर्यटकों को जान बचाकर भागना पड़ा क्योंकि पानी का बहाव एकदम तेज हो गया था और पानी भी गदला हो गया था।
पहाड़ी नदियों में नहाते समय यह ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि बारिस के समय नदी से दूर रहें। ऐसे में कब अचानक पानी का बहाव तेज हो जाये , पता ही नहीं चलेगा और दुर्घटना हो सकती है।    

 
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नदी के उत्तर की ओर का नज़ारा। बारिस के बाद मौसम साफ होने पर पहली बार बर्फीली चोटियाँ नज़र आई।  




रिजॉर्ट के आगे से जाने वाली सड़क करीब १ किलोमीटर तक जाती है जिस के साथ बने हैं अनेकों मकान। फोटो में जो बिल्डिंग नज़र आ रही है वह सरकारी लॉ कॉलेज है जो अभी चालू नहीं हुआ है लेकिन द्रश्य को भव्यता प्रदान कर रहा है।
  



आगे जाकर ऊँचाई से दक्षिण की ओर देखने पर यह नज़ारा मन मोह लेता है।




इसे देख कर हमें कनाडा के क्यूबेक शहर की याद आ गई।




यह सड़क ऊपर की ओर गावों में जाती है। अक्सर शाम को यहाँ गावों के लोग पिकनिक मनाते हुए नज़र आते हैं। कहीं कोई युवक गिटार पर धुन बजाता हुआ, कहीं अबोध बालाएं मासूमियत से खीं खीं करती हुई। प्रोढ़ महिलाएं बोतलों और जरिकेन में नदी से पीने का पानी लाती हुई। कुल मिलाकर यहाँ शाम का समय अद्भुत होता है ।

   



शाम ढलने को है। सूरज की अंतिम किरणें अब बस चोटियों को चूम रही हैं।  





सूर्यास्त का एक नज़ारा। फिर सब चल पड़ते हैं अपने अपने घरों की ओर और हम अपने होटल की ओर।  

इस जगह पर आकर जो शांति और मन को सकून मिला वह बड़े शहरों के आलिशान होटलों और भव्य भवनों में कभी नहीं मिलता। बारिस के बाद तो मन जैसे स्वत: गाने लगा फिल्म -- मन की आँखें -- का धर्मेन्द्र पर फिल्माया और लक्ष्मी कान्त प्यारे लाल का संगीतबध किया यह सुन्दर गीत जिसके बोल किस गीतकार ने लिखे हैं , यह जान नहीं पाया। लेकिन रह रह कर यह याद आता रहा और हमने भी कोशिश की इस माहौल पर एक कविता लिखने की।  लेकिन हम कोई साहित्यकार नहीं , इसलिए लफ़्ज़ों की खूबसूरती को बस तलाशते ही रह गए। आइये सुनते और देखते हैं यह सुरीला तराना , मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में :     


वीडियो नेट से साभार।

नोट : अगली पोस्ट में धर्मशाला के कुछ सुन्दर स्थलों की सैर करना न भूलें।  


Wednesday, September 26, 2012

जहाँ सूखे में भी बहार है -- दुबई ...



वर्षों पहले हम मित्रों ने एक ख्वाब बुना था -- बाल बच्चों समेत विदेश यात्रा पर जाने का . ख्वाब पूरा हुआ पूरे ३२ साल बाद जब तीन मित्रों को इक्कट्ठा कर पाए और कार्यक्रम बना पाए, हालाँकि अब बाल तो सभी के कम ही बचे थे . जैसे ही ऑफिस से अनुमति आई , हमने टिकेट कटाई , वीज़ा की अर्जी लगाई, हबीब सैलून से कटिंग कराई और भाई चल दिए दुबई . विमान से नीचे का नज़ारा ऐसा दिख रहा था जैसे रेगिस्तान में जगह जगह घर बने हों , कोई पेड़ नज़र नहीं आया . लेकिन शहर में पहुंचते ही भूल से गए की पेड़ों की भी ज़रुरत होती है .

ठहरने के लिए बढ़िया होटल था -- दुबई में चार / पांच सितारा होटल्स की भरमार है . आखिर , उनकी सारी कमाई टूरिज्म से जो होती है .

होटल की लॉबी से बाहर सड़क नज़र आ रही है .

दुबई जाने के लिए आसानी से पॅकेज टूर मिल जाते हैं जो हवाई टिकेट के साथ खाने , ठहरने और घुमाने का पूरा प्रबंध खुद कर देते हैं . इसी में शामिल होता है -- दुबई धोव क्रूज . रात में रंग बिरंगी नाव में बैठकर शहर के बीचों बीच बनाई गई नदी में सैर करते हुए , रात में शहर की खूबसूरती देखने जैसी होती है . बोट में ही ऐ सी हॉल में संगीत के साथ बुफे डिनर परोसा जाता है . बाद में एक जादूगर ने भी अपने जौहर दिखाकर सबका मन मोह लिया .


दुबई रात में .


अगले दिन सिटी टूर में दिन के समय उसी स्थान पर . नदी के पार ऊंची ऊंची बिल्डिंग्स एक से एक अलग डिजाइन में दिखाई देती हैं .
यहाँ से निकल कर बस पहुंची मीना बाज़ार -- जहाँ दुबई की सबसे बड़ी और शायद उचित दामों वाली मार्केट है . लेकिन हम तो यहाँ रुके म्युज़ियम में जहाँ अंडर ग्राउंड ऐ सी म्यूजियम सचमुच अम्युजिंग लगी .
यहाँ से आगे बस पहुँच गई जुमैरा रोड पर जो दुबई के वेस्ट कोस्ट ( पश्चिमी घाट ) के साथ साथ चलती हुई सारजाह तक जाती है .


इसी सड़क पर बनी है यह दुबई की सबसे बड़ी मस्जिद . दुबई में करीब ५०० मस्जिदें हैं . एक आश्चर्य्ज़नक बात यह थी -- यहाँ लगभग सभी बिल्डिंग्स बाहर से गोल्डन ब्राउन या केमल कलर में नज़र आई . खाली पड़ी जगहों पर रेत भी इसी रंग का होता है . लेकिन यह रेत भारी होता है , इसलिए धूल बिल्कुल नहीं उडती. इसीलिए वहां कपडे भी मैले नहीं होते . ज़ाहिर है , दुबई की वायु में प्रदुषण न के बराबर है .


जुमैरा रोड पर चलते हुए दायें हाथ की ओर समुद्र है -- अरब महासागर . समुद्र और सड़क के बीच बस १०० मीटर की दूरी है . लेकिन इस भूमि पर सड़क और समुद्र के बीच अनेक होटल्स , मस्जिदें और निजी बंगले हैं . यु ऐ ई के शासक शेखों के भी आलिशान बंगले यहीं बने हैं , हालाँकि शासन तो अबू धाबी से होता है . सागर किनारे बना है -- यह सात सितारा होटल , बुर्ज़ अल अरब . इसकी चोटी पर बायीं तरफ जो डिस्क सी नज़र आ रही है , वह हेलीपेड है . यहाँ एक टेनिस कोर्ट भी है जहाँ इवान लेंडल जैसे टेनिस प्लेयर मैच खेल चुके हैं . दायीं तरफ एक गैलरी नुमा रेस्तरां बार है जहाँ से दुबई की कोस्ट लाइन का खूबसूरत नज़ारा देख सकते हैं . लेकिन कीमत मत पूछिए .


अरब महासागर में बुड्ढा महामस्ती . यहाँ पानी काफी गर्म था . वैसे भी दुबई में दिन में अगस्त में तापमान ४० डिग्री के करीब होता है और धूप बहुत तेज़ होती है .



अल बुर्ज़ से थोडा आगे बना है -- विश्व का प्रथम कृत्रिम मानव निर्मित टापू -- पाम आईलेंड जुमैरा. पाम यहाँ का राष्ट्रीय वृक्ष है . पाम की शक्ल में बना यह आईलेंड सड़क से करीब ६-७ किलोमीटर दूर तक जाता है जिसके दोनों ओर शुरू में बहु मंजिला आवासीय इमारतें बनी हैं जिनमे विश्व के जाने माने और सेलेब्रिटी लोगों के अपार्टमेन्ट हैं . एक अपार्टमेन्ट की कीमत -- छोडिये क्या करेंगे जानकर , दिल में दर्द होने लगेगा . शाहरुख़ खान ने भी खरीदा है लेकिन ९९ वर्ष की लीज़ पर . यानि स्वामित्त्व तो उनका ही रहेगा . अपार्टमेंट्स के बाद पाम की लीव्स के रूप में शाखाएं सी बनी हैं जिनपर व्यक्तिगत घर बने हैं -- एक तरफ सड़क , दूसरी तरफ स्वयं की प्राइवेट बीच -- हर घर के लिए . अब तक रस्क होने लगा था . आखिर में जाकर बना है यह सात सितारा होटल -- एटलानटिस .

आर्च के ऊपर छै सुइट्स बने हैं जिनका किराया है -- २५००० डॉलर प्रतिदिन . ,यह अलग बात है , हर सुइट में अपना स्वयं का स्विमिंग पूल , सौना आदि बने हैं . इस होटल में खाना खायेंगे तो आपको खर्च करने पड़ेंगे -- ६०० दिरहम यानि करीब १०,००० रूपये प्रति व्यक्ति . लेकिन आप यहाँ से पूरे पाम आईलेंड को आसमान से देख सकते हैं.
पाम आईलेंड से निकलकर पहुंचते हैं दुबई के नए क्षेत्र में जहाँ गगन चुम्बी इमारतें देखकर सर घूमने लगता है .


यह है , विश्व की सबसे ऊंची बिल्डिंग -- बुर्ज़ खलीफा . इसकी १२४ वीं मंजिल तक आप जा सकते हैं .


यह फोटो हमारे गाइड ने लगभग सड़क पर लेटकर खींचा था .

सिटी टूर के बाद अगले दिन हमने दुबई की मेट्रो की सवारी की . यहाँ की मेट्रो बहुत बढ़िया है और १६ दिरहम में सारे दिन का पास मिल जाता है . मेट्रो में बैठकर शहर की अच्छी घुमाई हो जाती है , विशेषकर खूबसूरत इमारतें देखकर मन रेगिस्तान में भी बाग़ बाग़ हो जाता है .

दिन में धूप बहुत तेज़ थी . लेकिन इस भेष में काफी राहत मिली . वैसे भी वहां के मूल निवासियों में पुरुष सफ़ेद रंग का लम्बा सा कुर्ता पहनते हैं एक पीस में, और महिलाएं पूरी तरह से बुर्के में ढंकी रहती हैं . शायद यह उन्हें वहां की तेज़ धूप से सुरक्षित रखता है .

एक शानदार मॉल में घूमकर जब थक गए तो वापस आ गए , दुबई मॉल में जहाँ से बुर्ज़ खलीफा के लिए एंट्री होती है . ( टिकेट १०० दिरहम मात्र )  

एक के बाद एक कई गेट्स से होते हुए हम गुजरे इन शानदार गलियारों से .

लेकिन लिफ्ट में घुसते ही एक मिनट में ही हम खड़े थे विश्व की सबसे ऊंची ईमारत की १२४ वीं मंजिल पर बने दर्शक दीर्घा में .
बर्ड्स आई व्यू ऑफ़ दुबई -- बुर्ज़ खलीफा से .


एक और दृश्य -- यहाँ शाम के समय फव्वारे चलते हैं जिन्हें देखने हजारों लोग इक्कट्ठे हो जाते हैं .


टॉप पर लगी यह ऐ टी एम् मशीन नोट नहीं सोने के सिक्के निकालती है , दिरहम के बदले .

बुर्ज़ से उतरकर दुबई मॉल में घूमते हुए पहली बार भारी भीड़ मिली . बेशक यह दुबई का सबसे लोकप्रिय मॉल है जहाँ सभी तरह के लोग मौज मस्ती करते हुए नज़र आते हैं . यहीं पर बना है इनडोर इक्वेरियम . विशालकाय इक्वेरियम में नीचे एक टनल बनी है, और ऊपर बोटिंग कर सकते हैं . लेकिन टिकेट ८०-११० दिरहम .


मॉल के बाहर शाम को हर आधे घंटे में म्यूजिकल फाउन्टेन शो होता है जो फ्री है . हालाँकि यह हमारे दिल्ली में बने अक्षरधाम में होने वाले शो के आगे कुछ भी नहीं था .


आखिरी दिन हमने तपती धूप में बीच का मज़ा भी लिया . समुद्र में नहाने का अपना ही मज़ा है . लेकिन यहाँ नहाने और कपडे बदलने की सुविधा देखकर मन प्रसन्न हो गया .

और इस तरह पूरा हुआ हमारा दुबई दर्शन . अगली पोस्ट में दुबई से हमने क्या सीखा , यह बताएँगे . फिर इसके बाद डेजर्ट सफ़ारी का आनंद लेना न भूलें .

Thursday, June 21, 2012

पहाड़ों पर भी चलने लगे हैं ऐ सी -- वैभव सम्पन्नता या निर्धनता !


रोजमर्रा की भाग दौड़ की जिंदगी और दिल्ली की गर्मी से परेशान लोग जिनके पास समय , साधन और शौक होता है , वे मई जून में पहाड़ों का रुख कर लेते हैं कुछ दिनों के लिए . यही कारण है , इन दिनों में मसूरी , शिमला और नैनीताल जैसे पर्वतीय स्थलों पर दिल्ली और एन सी आर की गाड़ियाँ बहुतायत में दिखाई देती हैं . थके हुए तन और मन को तरो ताज़ा करने के लिए यह आवश्यक भी है .

समय , साधन और शौक के साथ स्वास्थ्य भी :

पहाड़ों पर जाने से पहले अपना शारीरिक मुआयना ज़रूर कर लेना चाहिए . यदि आप हृदय रोग से पीड़ित हैं , या बी पी हाई रहता है , या दमा है, या फिर मोटापे से ग्रस्त हैं तो आपको सावधान रहना पड़ेगा .
क्योंकि भले ही आप गाड़ी से जाएँ लेकिन पहाड़ों के ऊंचे नीचे रास्तों पर तो पैदल ही चलना पड़ेगा . और यदि आप स्टर्लिंग रिजौर्ट्स जैसे किसी बड़े होटल / रिजॉर्ट में ठहरे तो समझिये आ गई शामत .


यहाँ ठहरने वाले सभी मेहमानों को कम से कम १०० सीढ़ियों से रोजाना बार बार ऊपर नीचे होना पड़ेगा . ज़ाहिर है , यहाँ सभी की साँस फूलती नज़र आती है . कूदते फांदते यदि कोई नज़र आते हैं तो वो यहाँ के कर्मचारी ही हैं जो बिना किसी दिक्कत के सीढियां
चढ़ते उतरते नज़र आयें
गे .
ऐसे में सलाह यही दी जाती है की पहाड़ों पर जाने से पहले कम से कम १५ दिन पहले से सुबह सैर पर जाना शुरू कर दें . तभी स्टेमिना बन सकता है और आप पहाड़ों पर पैदल चलने का आनंद ले सकते हैं .


रिजॉर्ट के गेट से निकलते ही बायीं ओर जाती यह सड़क करीब दो किलोमीटर तक जाती है जिसके एक तरफ पहाड़ है , दूसरी ओर घाटी है जिसमे कई बोर्डिंग स्कूल बने हैं . जब बाकि लोग रात की मदिरा की खुमारी में बेहोश खर्राटे भरते, हम सुबह उठकर यहाँ पैदल सैर को निकल जाते . कहीं धूप , कहीं छाँव की आँख मिचौली में वादियों को निहारते हुए विचरने में स्वर्गिक आनंद का अनुभव होता . गेट के दायीं ओर से आने वाली सड़क लाइब्रेरी चौक से आती है . इस सड़क पर शाम के समय एक डेढ़ किलोमीटर टहलना भी बड़ा आनंददायक रहता है .

अंजान से जान पहचान :

रिजॉर्ट के सामने जो पहाड़ है , उस की चोटी पर बना है राधा भवन जो इस इस्टेट के मालिक का खँडहर हुआ आलिशान बंगला है . रिजॉर्ट से यहाँ तक ट्रेकिंग का इंतजाम किया जाता है . लेकिन हमें तो वैसे भी घुमक्कड़ी का शौक है , इसलिए एक सुबह स्वयं ही निकल पड़े अनजानी राहों पर . रास्ते में एक वृद्ध कुर्ता पायजामा पहने खड़े होकर कसरत कर रहे थे. जब उनसे रास्ता पूछा तो बोले --मैं भी बाहर से ही हूँ . परिचय का आदान प्रदान होने पर उन्होंने पूछा -आप क्या करते हैं ? मैंने कहा --बस यूँ ही छोटा सा जॉब करता हूँ . इस पर वो बोले --लगता तो नहीं है .

अब इसके बाद जो विचारों का आदान प्रदान हुआ तो उनके घर जाकर चाय बिस्कुट आदि के साथ ही समाप्त हुआ. घर भी रिजॉर्ट के बिल्कुल साथ ही था जो उन्होंने ग्रीष्म निवास के रूप में हाल ही में खरीदा था . पता चला वो देहरादून में चकराता रोड पर एक बोर्डिंग स्कूल चलाते हैं , जिसके वे चेयरमेन हैं . उन्हें देखकर हमें भी यही लगा --लगता तो नहीं है .

ट्रेक करते हुए रास्ते में एक और मुसाफिर नज़र आया तो हमने उसका फायदा उठाते हुए एक फोटो खिंचवा लिया .
कहते हैं चालीस की उम्र के बाद पति पत्नी --भाई बहन जैसे नज़र आने लगते हैं .
हम तो यही कहेंगे --नज़र जो भी आयें , व्यवहार तो पति पत्नी जैसा ही होना चाहिए .


राधा भवन :

एक पहाड़ की चोटी पर समतल स्थान पर बना यह विशाल बंगला अब खँडहर बन चुका है . लेकिन यहाँ से मसूरी और आस पास के क्षेत्रों का ३६० डिग्री बड़ा मनोरम दृश्य नज़र आता है . इस बंगले में आगे की ओर दो बड़े हॉल हैं जो बैठक यानि ड्राइंग रूम रहे होंगे . पीछे एक लॉबी और कई बेडरूम थे जो अब टूट चुके हैं . नीचे की मंजिल में अनेक छोटे कमरे हैं जो शायद नौकरों के लिए रहे होंगे .

यहाँ के केयरटेकर ने बताया --इसे कभी एक काबुल के सेठ ने बनवाया था . अंग्रेजों ने इस पर कब्ज़ा कर लिया . फिर किसी सेठ ने इसे खरीद लिया .उसकी संतानें निकम्मी निकली . इसलिए अब इसकी कोई देख रेख नहीं हो पा रही . करीब ९० एकड़ में फैला यह एस्टेट आज २०० करोड़ रूपये का है .


तिब्बती बाज़ार :

२८ साल पहले भी यहाँ तिब्बतियों की अनेक दुकानें सजती थी जिन पर इम्पोर्टेड सामान मिलता था . दुकानों पर अक्सर १८-२० साल की युवा लड़कियां ही बैठती थी , मां के साथ. मर्द लोग बहुदा नदारद रहते.
अब भी इन दुकानों पर वैसा ही नज़ारा था . अब भी वहां वैसी ही युवा लड़कियां बैठी थीं . फर्क बस इतना था -- पहले जो युवा लड़की थी , अब वो मां थी और अब जो लड़की है वो उस लड़की की बेटी है .
हालाँकि , मर्द अब भी बहुत कम ही नज़र आये . लेकिन अब इन दुकानों पर स्थानीय लोग भी दुकानदारी में शामिल थे .



पर्यावरण :

समर्थता और सम्पन्नता के साथ साथ अब मिडिल क्लास आदमी भी पर्यटन पर पैसा खर्च करने की स्थिति में आ गया है . लेकिन इस बढ़ते ट्रैफिक का खामियाज़ा निश्चित ही पर्वतों और वातावरण को भुगतना पड़ रहा है . नंगे होते पहाड़ अब शीतल वायु की लहर प्रदान नहीं करते . यही वज़ह है की अब यहाँ भी कमरों में पंखे चलने लगे हैं . एक अपार्टमेन्ट की छत पर रखे दो ऐ सी देख कर दिल धक् से रह गया .

इस तस्वीर को देख कर लगता है --पर्यावरण विभाग तो अपना काम बखूबी कर रहा है . भूस्खलन से नंगे हुए पहाड़ पर फिर से पेड़ लगाकर हरियाली लाने का प्रयत्न सफल होता नज़र आ रहा है .

लेकिन क्या हम सभ्य, सुशिक्षित आधुनिक मानव अपना काम सही से कर रहे हैं ?

जगह जगह कूड़े के ढेर देखकर ऐसा तो नहीं लगता . बिना सोचे , बेदर्दी से हम पानी की बोतल , चिप्स के पेकेट , प्लास्टिक की थैलियाँ ऐसे फैंक देते हैं जैसे हमें पर्यावरण से हमें कोई लेना देना नहीं . यदि ऐसे ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब ताज़ा ठंडी हवा खाने के लिए पहाड़ों पर नहीं, घर में ही अपने कमरे में कैद रहकर ऐ सी की बासी हवा खाते रहना पड़ेगा .

नोट : मसूरी की कुछ दिलचस्प और मनभावन तस्वीरें देखने के लिए यहाँ और यहाँ क्लिक कर देख सकते हैं .


Thursday, June 23, 2011

ऊटी की ब्यूटी --भाग -२

उत्तर में शिमला , सराहन, मसूरी , चंबा, नैनीताल, रानीखेत , कसौनी , कसौली, डलहौजी , धरमशाला , और मनाली --पूर्व में दार्जिलिंग और गैंगटॉक --दक्षिण में कोडाईकनाल और ऊटी -ये हैं भारत के मुख्य हिल स्टेशन । इनमे बस ऊटी ही था जहाँ अब तक नहीं जा पाए थे । लेकिन हमने ऊटी को इनमे सबसे सुन्दर जगह पाया ।

मुदुमलाई से करीब ५० किलोमीटर दूर ,एक तो साफ सुन्दर पहाड़ी सड़क जिसके दोनों ओर बड़े बड़े पेड़ सुरक्षा का अहसास देते हुए । घनी हरियाली के बीच मनमोहक घाटी के द्रश्य मन को लुभाते हुए नज़र आयेंगे ।

ऊटी की एक खासियत यह भी लगी कि यह शहर एक वैली में बसा है न कि पहाड़ की ढलान पर । इसलिए २२५० मीटर की ऊँचाई पर भी समतल ज्यादा नज़र आता है ।

पता चला यहाँ पानी की बहुतायत होने की वज़ह से अंग्रेजों ने यहाँ यूकेलिप्टस के पेड़ बहुत लगाये थे जो आज भी सारी पहाड़ियों और चोटियों पर घने जंगल के रूप में मौजूद हैं ।

एक और विशेष बात यह लगी कि जहाँ १० साल पहले तक दक्षिण में उत्तर भारतियों को अज़ीब सी निगाह से देखा जाता था , वहीँ अब ऐसा कुछ नज़र नहीं आया । अब तो ज्यादातर लोग भी हिंदी बोलने लगे हैं और भाषा की कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई ।

यह अलग बात है कि वहां छोटे छोटे बच्चे भी अंग्रेजी बोलते हैं ।

ऊटी जाने के लिए जून का महीना सर्वोत्तम है क्योंकि इस समय यहाँ ऑफ़ सीजन शुरू हो जाता है । इसकी वज़ह यह है कि एक तो यहाँ स्कूल जून में जल्दी खुल जाते हैं । दूसरे मिड जून में बारिस आ जाती है । इसलिए लोकल टूरिस्ट कम हो जाते हैं जिससे भीड़ भाड़ कम लगती है ।

मिड जून तक न ज्यादा बारिस मिलेगी न धूप । बस होगा तो सुहाना मौसम और गर्मी से राहत देती ठण्ड ।

ऊटी शहर तो पैदल ही घूमा जा सकता है । लेकिन बाहर के इलाके घूमने के लिए टैक्सी या प्राइवेट कार बड़ी उपयोगी रहेगी । रेट सबके एक जैसे ही हैं और कोई लूट पाट नहीं है ।

आइये सैर करते हैं ऊटी शहर की ।



ऊटी पहुँचने से पहले ढलान पर बने ये मकान बड़े अद्भुत लग रहे थे । पीला रंग एक मोबाईल कंपनी ने किया हुआ है ।


जिस दिन पहुंचे , बस उसी दिन धूप खिली थी । लेकिन बिना धूप के भी आपका गोरा रंग काला पड़ सकता है यदि आपने एंटी सन लोशन नहीं लगाया तो । यहाँ के साफ वातावरण में अल्ट्रा वोय्लेट रेज़ अपना असर दिखाएंगी ही ।


ऊटी के मेन चौराहे पर बना है रेलवे स्टेशन । यहीं पास में बस स्टेशन है । और ऊटी लेक --बोट क्लब । यहाँ पैडल बोट और मोटर बोट दोनों मिलती हैं बोटिंग के लिए ।



बोट क्लब के प्रवेश द्वार के सामने बना है यह थ्रेड गार्डन । इसकी विशेषता यह है कि यहाँ प्रदर्षित सभी फूल पौधे रेशम के धागों से बने हैं । इतने खूबसूरत कि यदि बताया न जाए तो पहचान ही न पायें । इसीलिए इसका नाम लिम्का बुक ऑफ़ रिकोर्ड्स में शामिल है ।



खुद ही पढ़ लें ।


शहर के दूसरे सिरे पर बना है यह अत्यंत सुन्दर बाग --बोटेनिकल गार्डन ।

प्रवेश द्वार ।



महा वृक्ष ।



बाग का एक दृश्य ।



हरियाली और रंगों की बहार देखकर गर्मी तो वैसे ही उड़नछू हो गई । ऊपर से झीनी झीनी पड़ती फुहार वातावरण को और रंगीन बना रही थी ।


शहर से १२ किलोमीटर दूर घने जंगल से होकर रास्ता जाता है ऊटी के सबसे ज्यादा ऊंचे स्थल पर --डोडाबेट्टा ।
२६०० मीटर की ऊँचाई पर बने इस व्यूइंग गैलरी से एक तरफ ऊटी शहर , दूसरी तरफ कुन्नूर शहर नज़र आता है ।


व्यूइंग गैलरी । यहाँ एक दूरबीन भी रखी है ।



व्यूइंग गैलरी से ऊटी की तरफ का एक नज़ारा ।


शहर के एक किनारे यह रोज गार्डन भी बहुत बड़े क्षेत्र में फैला है ।

बहुत खूबसूरत ढंग से बना या गया यह गुलाब पार्क गुलाबों की अलग अलग किस्मों से भरा है ।




इसे बनाया भी बहुत आकर्षक ढंग से है ।


ऊटी के बस स्टेशन के सामने ही है यहाँ का रेस कोर्स मैदान जहाँ हर शनिवार और रविवार में घुडदौड़ होती हैं ।

क्या यह अरबी घोड़ा है ?



दिल्ली में रहते हुए हमने कभी होर्स रेस नहीं देखी । लेकिन यहाँ पहली बार देखी । और लोगों को दांव लगाते हुए भी । एक बार तो किसी बात पर लड़ाई हो गई और लोग भड़क गए । तब हमने वहां से खिसकना ही बेहतर समझा ।



ऊटी का मेन बाज़ार उत्तर भारत के हिल स्टेशंस के मॉल जैसा ग्लेमरस तो नहीं है । लेकिन यहाँ पहुँच कर श्रीमती जी को यह आभूषण की दुकान नज़र आ गई । फिर क्या था घुस गई और हम आधे घंटे तक पोस्टर में बनी तस्वीर को ही देखते रहे यह सोचते हुए कि यह तस्वीर किस हिरोइन या मोडल की है ।

वो तो शुक्र रहा कि मेडम ने आधे घंटे में सवा लाख के कड़े पसंद ही किये , खरीदे नहीं ।



पैदल घूमते हुए भूख लगने पर बीच बाज़ार में स्थित है यह --नाहर होटल -- जहाँ सभी तरह का स्वादिष्ट खाना उचित दाम पर मिलता है ।

आज के लिए बस इतना ही । क्योंकि घूम घूम कर अब तक आपके भी घुटनों में दर्द होने लग गया होगा ।
अब अगली पोस्ट में पहले घुटनों के दर्द से छुटकारा पाएंगे , फिर आगे सैर पर बढ़ेंगे ।