Sunday, June 17, 2012

कुछ जानी पहचानी , कुछ अंजानी , पर्वतों की रानी --- मसूरी .


दिल्ली से करीब पौने तीन सौ और देहरादून से २५ किलोमीटर की लगातार चढ़ाई के बाद आती है क्वीन ऑफ़ हिल्स ( पर्वतों की रानी ) मसूरी. यहाँ पहली बार १९८४ में आना हुआ था शादी के बाद जिसे पहला हनीमून भी कह सकते हैं . वैसे तो इन २८ वर्षों के बाद भी मसूरी वैसी की वैसी है लेकिन वातावरण में बहुत परिवर्तन आ गया है . जहाँ पहले गर्मियों में भी लोग रंग बिरंगे स्वेटर्स पहने नज़र आते थे, अब सभी कम से कम कपड़ों में दिखाई देते हैं . यह परिवर्तन बदलते वातावरण के साथ साथ बदलती जीवन शैली के कारण भी है.पहले हिल स्टेशन पर भी लोग बन ठन कर थ्री पीस सूट पहन कर घूमते थे. अब लड़कियां भी हाफ पेंट्स में नज़र आती हैं .

एक छोर पर पिक्चर पैलेस और दूसरे छोर पर लाइब्रेरी चौक के बीच करीब दो किलोमीटर लम्बी माल रोड यहाँ का मुख्य आकर्षण है . आधे से ज्यादा रास्ते पर बड़ी बड़ी दुकाने और शोरूम शाम के समय बिजली की रौशनी में मसूरी की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं . सैलानियों से भरी माल रोड पर घूमकर ही आनंद आ जाता है . भारत में और किसी हिल स्टेशन पर ऐसा नज़ारा देखने को नहीं मिलेगा जब सुहानी धूप में चलते अचानक बादलों की सफ़ेद चादर आकर आपको लपेट लेती है और लगता है जैसे मौसम बहुत ख़राब हो गया है लेकिन फिर थोड़ी ही देर में सब बिल्कुल साफ . इसीलिए मसूरी को पर्वतों की रानी कहा जाता है .

पहली बार जब यहाँ आये तो एक होटल में १५ रूपये में कमरा मिला था . अब उसी होटल में वही कमरा २५०० में मिल रहा था . लेकिन अब हमारे पास थी स्टर्लिंग रिजोर्ट्स की बुकिंग जो लाइब्रेरी चौक से ढाई किलोमीटर की दूरी पर पाइन हिल पर बना है . पहली बार यहाँ १९९७ में आये थे . तब वहां तक जाने वाली पतली सी सड़क टूटी फूटी सी थी और घाटी की तरफ कोई रेलिंग न होने से ड्राईव करने में बड़ा डर लगा था . लेकिन अब सारी सड़क पक्की बनी है और पूरे रास्ते रेलिंग लगे होने से ड्राईव करना भी सुरक्षित हो गया है .


इसी सड़क के एक मोड़ से नज़र आ रहा है , खड़ी ढलान पर बना स्टर्लिंग रिजोर्ट. यहाँ बने १ बी एच के अपार्टमेन्ट में टी वी , फ्रिज , डाइनिंग टेबल और सोफा सेट से सुसज्जित सभी सुख सुविधाओं का इस्तेमाल करते हुए एक सप्ताह के लिए घर जैसा बन जाता है .



घर की शानदार बालकनी से घाटी और दूर देहरादून नज़र आता है . दायीं ओर के पहाड़ को देखकर बड़ा भ्रम हो रहा था की इस पर बनी यह जिग जैग सड़क कहाँ जाती है . कोई घर भी नहीं दिखा . या फिर ये पहाड़ी खेत हैं ? बहुत देर तक सोचने पर समझ आया की वास्तव में यहाँ कभी भूस्खलन हुआ था . अब पर्यावरण विभाग ने यहाँ फिर से पेड़ लगाकर इसे हरा भरा बनाने का प्रयास किया है . जिग जैग सड़क दरअसल एक पगडण्डी थी जिस के साथ पेड़ लगाये गए थे . यानि मसूरी का पर्यावरण विभाग तो अपने काम में मुस्तैद है . बस हम दिल्ली वाले ही बुद्धि का इस्तमाल नहीं करते और जहाँ अवसर मिला प्लास्टिक की थैलियाँ फैंक देते हैं .


पहली बार मसूरी आने वालों के लिए यहाँ के मुख्य आकर्षण हैं :
* केम्पटी फाल -- शहर से १०-११ किलोमीटर दूर जहाँ तक गाड़ी से ही जाया जा सकता है . ऊँचाई से गिरता झरना खूबसूरत तो लगता है लेकिन यहाँ होने वाले ट्रैफिक जाम और झरने में नहाते मोटे पेट वाले लोगों को देखकर मूड रोमांटिक तो नहीं रह सकता .
* लाल टिब्बा --- यहाँ का सबसे ऊंचा पॉइंट जहाँ से चारों ओर का नज़ारा देखा जा सकता है यदि मौसम साफ हो तो जो कभी नहीं होता . यहाँ गाड़ी और पैदल दोनों तरह से जाया जा सकता है.
* धनोल्टी -- मसूरी से २८ किलोमीटर दूर एक सुनसान पिकनिक स्पॉट होता था लेकिन अब वहां ढेरों होटल बन गए हैं . यहाँ का मुख्य आकर्षण है सुरखंडा देवी का मंदिर जिसके लिए घने जंगल से एक किलोमीटर ट्रेक कर ही पहुंचा जा सकता है . हालाँकि यहाँ भी बहुत भीड़ होती है लेकिन वापसी पर फ्री के लंगर में हलवा पूरी खाकर बड़ा आनंद आएगा .

इन सब जगहों पर कई बार जा चुके हैं इसलिए इस बार जाने का मूड नहीं था . लेकिन हमें तो प्रकृति से प्यार है इसलिए ऐसी जगह जहाँ से प्रकृति के समीप महसूस किया जा सके , हम जाना नहीं छोड़ते .



कैमल बैक रोड

मसूरी के उत्तर की ओर ढाई किलोमीटर लम्बी यह समतल सड़क पहाड़ के साथ साथ चलती है और घाटी के मनोरम दृश्यों के दर्शन कराती है .


इस दर्शक दीर्घा में बैठकर चाय की चुस्की लेते हुए पहाड़ों की चोटियों को निहारने हुए घंटों गुजर सकते हैं लेकिन फिर भी दिल नहीं भरेगा .


यहाँ पैदल चलना ही एक मेडिटेशन जैसा लगता है .



इस तस्वीर को ध्यान से देखिये , इस सड़क को कैमल बैक रोड क्यों कहते हैं , यह अपने आप समझ आ जायेगा .

लेकिन यह जादू सिर्फ एक पॉइंट से ही नज़र आता है .


गनहिल : एक और पहाड़ की चोटी जहाँ से चारों ओर नज़र आता है . लेकिन यहाँ भी मौसम साफ होने पर ही जाने का फायदा है वर्ना बस पिकनिक बन कर रह जाता है . यहाँ जाने के लिए हम जैसे शौक़ीन तो पैदल मार्ग की खड़ी चढ़ाई कर लेते हैं लेकिन जिनके घुटने हल्के और जेब भारी होती है , वे यहाँ ट्रॉली द्वारा ही जाते हैं .



मसूरी से तीन किलोमीटर दूर है कंपनी गार्डन. हरा भरा यह बाग़ अब एक बढ़िया फैमिली पिनिक स्पॉट बन गया है .

बाग की शोभा बढ़ा रहा था यह फव्वारा .


यहाँ बना यह कृत्रिम झरना पर्यटकों को बहुत लुभा रहा था .



अंत में यह कृत्रिम झील बच्चों और बड़ों सभी के लिए सुन्दर आकर्षण थी जिसमे सभी तरह की रंग बिरंगी बोट्स में बोटिंग का आनंद लिया जा सकता है .
अब यहाँ एक फ़ूड कोर्ट भी खुल गया है जिसमे सेल्फ सर्विस के साथ अच्छा खाना उचित दाम पर मिल रहा था .

ये थी मसूरी की कुछ आम बातें . अगली और अंतिम किस्त में पढियेगा कुछ खास और दिलचस्प बातें जिनका हमें भी पहली बार अनुभव हुआ .





58 comments:

  1. रानी का खिताब तो बना रहेगा, हम प्रजाजनों ने ही उसका मान नहीं रखा..

    ReplyDelete
  2. मसूरी-भ्रमण का आनंद आप ले पाए,भाग्यशाली हैं.प्रकृति के नजदीक जितना समय गुजर जाए,बहुमूल्य है.
    ...पिछले हफ्ते एक मौका था मुझे भी मसूरी जाने का पर जा नहीं पाया.

    ...तीस साल की टीस कम से कम अब निकल तो गई !!

    ReplyDelete
    Replies
    1. संतोष जी , कोशिश करते हैं अगले वर्ष एक ब्लॉगर मिलन मसूरी में ही किया जाये . :)

      Delete
  3. इसे कहते हैं जले पर नमक छिड़कना। हम यहाँ आतप में तप रहे हैं आप हमें ललचिया रहे हैं।:) सुंदर तश्वीरें तो हैं ही लेकिन का करें..! अभी जा सकते नहीं। (:
    ..जानमारू पोस्ट।:)

    ReplyDelete
    Replies
    1. पाण्डे जी , कहते हैं कांटे को कांटा ही निकालता है . इसलिए एक झलक यहाँ ( http://tdaral.blogspot.in/2012/06/blog-post_15.html)भी देखें , शायद दर्द कुछ कम हो जाये . :)

      Delete
    2. देख लिया..दर्द बढ़ गया।:)

      Delete
    3. ओह ! यानि नुस्खा नकली निकला ! :)

      Delete
  4. मसूरी की सैर दिल्ली में बैठे वैठे करनी है तो तस्वीरों से ही सुकून करना पड़ेगा. सुंदर तस्वीरें मसूरी की यादें ताज़ा कर गयी. मसूरी मैं भी इतनी बार गयी हूँ पर हर बार आनन्द आता है.

    ReplyDelete
  5. इसीलिये तो कहा गया है पर्वतों की रानी मसूरी.चलिए इसी बहाने ३० साल पुरानी यादे ताजा हो गई,तस्वीरे अच्छी लगी,,,,,,

    RECENT POST ,,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,

    ReplyDelete
  6. सुंदर चित्रों ने पोस्ट को मनमोहक बना दिया है सर । देवेंद्र जी ने बिल्कुल ठीक कहा कि आप जले पे नमक छिडक के जानमारू पोस्ट लगा दिए हैं जी । "जिसे पहला हनीमून भी कह सकते हैं" ...ई पहला दूसरा तीसरा , सबके बारे में विस्तार पूर्वक प्रकाश डालें आचार्यवर । ओईसे अगिला भाग का इंतज़ार लगा गए । बहुत ही मनमोहक पोस्ट बन पडी है , इसे साझा कर रहा हूं

    ReplyDelete
    Replies
    1. ई पहला दूसरा तीसरा--- ई के वास्ते तो आत्म कथा ही लिखनी पड़ेगी भाई . :)
      वैसे कल कहाँ थे -- मेरे गीत के विमोचन पर ? पुस्तक चाहिए तो हमारे पास है आपकी कॉपी .

      Delete
  7. JCJune 17, 2012 10:26 AM
    यद्यपि अपने जीवन का एक बड़ा भाग दिल्ली में ही बीता है, अल्मोड़ा- नैनीताल/ जन्म-स्थान शिमला के पहाड़, पहाड़ी परिवार में पैदाइश के कारण देखे हैं - सर्पाकार सड़कें, चीड, बाँझ आदि के हरे भरे वृक्ष, झरने, ताल आदि के अतिरिक्त गर्मी के मौसम में शीतल पवन का आनंद का अनुभव किया... काम के चक्कर में भूटान और असम के पहाड़ों का भी
    इस कारण पहाड़ की चर्चा हो तो भले ही स्वयं न जाएँ, मन में जा आनंद तो उठा ही सकते हैं!!! धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. सही कहा जे सी जी . हमें तो जब भी गर्मी सताती है -- गाँव में बब्बे पढ़ते थे -- शहर में पहाड़ों को याद करने लगते हैं .

      Delete
    2. JCJune 18, 2012 11:15 AM
      पहली बार सन १९५१ में मेरे गुरु बड़े भाई के साथ नैनीताल पहुंचा था रास्ते भर प्लेन्स की गर्मी से और बस के पेट्रोल की बदबू सूंघ मतली को किसी प्रकार रोक... किन्तु जब बस ताल के किनारे, बस स्टैंड और पार्किंग एरिया में, तल्ली ताल में रुकी तो नीले आकाश और पानी, ताल के किनारे भिन्न भिन्न पहाड़ी पर उगे हरे वृक्ष, और ऐ सी की सी ठंडी हवा ने मन को बाग़ बाग़ कर दिया - उस आनंद को शब्दों में लिखना संभव नहीं है! उन तीन सप्ताह के अपने निवास के दौरान हम चीना पीक आदि विभिन्न चोटियों पर तो चढ़े ही, किन्तु हर दिन ताल में दो बार नाव भी चलाई, भले ही हाथ में छाले पड़ कर फूट भी गए!!! रोलर स्केटिंग भी एक दिन की, और एक दिन घुडसवारी भी!!!
      उस के बाद भी बीच बीच में भी कुछेक बार जाना हुआ, किन्तु निरंतर बढ़ती भीड़ और 'भौतिक विकास' के कारण आनंद कम होता चला गया!!!

      Delete
    3. जी हाँ , अब गाड़ियों की वज़ह से ट्रैफिक जाम तक हो जाता है . लेकिन नैनीताल में मौसम तो अब भी सुहाना रहता है .

      Delete
  8. इस पोस्‍ट में भी बहुत मनमोहक चि‍त्र हैं

    ReplyDelete
  9. आपकी पोस्ट देखने के बाद अनजानी कहाँ रही मसूरी............

    पहाड़ वैसे ही हमें बड़ा फेसिनेट करते हैं.....फिर आपका अंदाज़े बयाँ........................
    क्या बात..क्या बात...क्या बात....
    :-)

    सादर

    ReplyDelete
  10. अरे....
    हमारा कमेन्ट....
    शायद मसूरी चला गया ????

    ReplyDelete
  11. अनु जी , मसूरी के कुछ अनजाने पहलु जो हमें भी पहली बार अनुभव हुए --अगली पोस्ट में प्रस्तुत होंगे !

    ReplyDelete
  12. यादें ताज़ा कर दीं आपकी पोस्ट ने तो

    ReplyDelete
  13. डाक्टर साहब,
    यह तो चिंता का कारण लगता है कि लोग पहले वहां की गर्मियों में पूरे कपड़े / स्वेटर वगैरह पहनते थे अब कम कपड़ों में काम चला रहे हैं , कहीं ऐसा तो नहीं कि मौसम का बदलाव ( दुनिया के लोग कोई भी कारण कहें ) कम कपड़ों की वज़ह से हो रहा हो :)

    हमेशा की तरह खूबसूरत फोटोग्राफ्स ! बढ़िया पोस्ट ! दिल जलाऊ पोस्ट :)

    ReplyDelete
    Replies
    1. अली सा , ग्लोबल वार्मिंग के कारणों में ऐ सी और गाड़ियों के एक्स्होस्ट के अलावा मनुष्यों की सांसों की गर्मी भी है . पहाड़ों पर सांसें और भी गर्म हो जाती हैं . :)

      Delete
  14. एक बारी हम भी गए थे जी रानी से मिलने, जद गाडी मसूरी पहुंची तो गाईड बोल्या - " मसूरी के मौसम और दिल्ली की लड़की का कोई भरोसा नहीं कब बरस जाए"…… मेरे से तो रहया नहीं गया, मन्ने कहया - सुसरे! हमने बेरा था, अड़े आके तूं नुए कहवेगा। देख हम दिल्ली ते लड़की और छतरी दोनो साथ लाए सां। :)

    राम राम

    ReplyDelete
  15. बहुत खूब ...
    हमें तो दिल्ली की गर्मी ही झेलनी है

    ReplyDelete
  16. चलिये आपकी पोस्ट के बहाने हम भी यहाँ बैठे-बैठे ही इंडिया के बेहतरीन पर्यटक स्थलों का लुफ़्त उठा लिया करते है। :)

    ReplyDelete
  17. beautiful to enjoy and nice post shown all in pictures .

    ReplyDelete
  18. मौसम तो तभी गरमाने लगा था जब हम बरसों पहले वहां गए थे जिस दिन लौट रहे थे बस पकड़ते हुए पसीना नहा गए थे मई का महीना था .पहाड़ से ठंडक गायब थी अब क्या हाल है पता नहीं हाँ दूर दर्शन टावर पर जाके देखा था सबसे ऊंचा स्थान वही है .वहां परिचय था सूचना प्रसारण मंत्रालय के मार्फ़त .

    ReplyDelete
  19. मुझे यह जगह बहुत पसनद है भाई जी ...

    ReplyDelete
  20. हम तो पहले से जले-भुने बैठे हैं इस गर्मी से। ऊपर से आप झरनों,नदियों,झीलों की ये तस्वीरें दिखाकर और मौज ले रहे हैं!

    ReplyDelete
  21. बहुत सुंदर पोस्ट .... मंसूरी गए तो अब ज़माना बीत गया ... अंतिम चित्र कुछ नयी जगह के लगे ..... बढ़िया पोस्ट

    ReplyDelete
    Replies
    1. संगीता जी , ये चित्र कंपनी गार्डन/ बाग़ के हैं जहाँ कई नई सुविधाएँ जुटाई गई हैं .

      Delete
  22. उमस भरी गर्मी के इस मौसम की तल्खी को रानी की तस्वीरों ने कम किया ...
    सुन्दर तस्वीरें !

    ReplyDelete
  23. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..! सुप्रभात...!
    आपका दिन मंगलमय हो....!

    ReplyDelete
  24. मेरी मसूरी यात्रा की यादें ताजा हो गयीं -बहुत खूबसूरत वर्णान और चित्र भी

    ReplyDelete
  25. **♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**
    ~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~
    *****************************************************************
    बेहतरीन रचना

    केरा तबहिं न चेतिआ,
    जब ढिंग लागी बेर



    ♥ आपके ब्लॉग़ की चर्चा ब्लॉग4वार्ता पर ! ♥

    ♥ संडे सन्नाट, खबरें झन्नाट♥


    ♥ शुभकामनाएं ♥
    ब्लॉ.ललित शर्मा
    **************************************************
    ~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~^~
    **♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**♥**

    ReplyDelete
  26. JCJune 18, 2012 11:13 AM
    P.S. काम के सिलसिले में भी, पहले कम चौड़े, १०० किलोमीटर हाइवे (१००० से लगभग ४०००+ फूट) के सर्वे (उस के हर मोड़ और हर पुलिया / पुल का नीचे जा निरीक्षण) के दौरान जोंक के विभिन्न रूप, आकार और रंग (काले/ नारंगी, लाल), आदि भी देखने को मिले (और उनको छुडाने के लिए सिगरेट का उपयोग सीख)!... और एक पुल के नीचे तो एक लगभग बीस फुट के काले अजगर के भी दर्शन हुए! जब हम पुल के नीचे उतर ही रहे थे, वो भयभीत हो और हमको भयभीत कर, जान बचाने के लिए जितनी जोर से भाग सकता था पहाड़ी में नीचे की और भाग गया)! जिस कारण हम फिर अगले पुलों के नीचे उतरने से पहले पत्थर नीचे फेंकते थे!

    ReplyDelete
    Replies
    1. जे सी जी , जोंक को छुड़ाने के लिए जलती तीली या नमक का इस्तेमाल भी किया जा सकता है . यह बात हमने ट्रेकिंग के दौरान सीखी थी . हालाँकि कभी ज़रुरत नहीं पड़ी .

      Delete
    2. JCJune 18, 2012 5:43 PM
      बरसात के समय गीले जंगल में पगडण्डी से गुजरते समय एक अकेली जोंक नहीं दर्जनों पकड़ लेती थीं मोज़े के छेदों के बीच से!... तब अनुभवी लोकल खलासी आदि उन्हें एक सांस में ही फ़टाफ़ट पकड़ और निकाल दूर फेंक देते थे! वे हम पर हँसते थे जब हम बांयीं तरफ वाली को अंगूठे और ऊँगली के बीच आराम से पकड़ते थे तो वो मौक़ा मिलने पर बांये शरीर को छोड़ दांये अंगूठे अथवा ऊँगली को चिपक जातीं थीं - और यह सिलसिला, दांये-बांये, चल पड़ता था...:)
      गेस्ट हाउस में एक मित्र के शरीर में खून पी फूले बैलून समान मोटी जोंक जब भार से नीचे गिर पड़ी तो क्या होता है देखने के लिए हमने उस पर नमक मंगा जैसे ही डाला, वो फूट पड़ी और सारा खून फर्श पर फ़ैल गया... कहते हैं कि किसी समय खराब खून आदि निकालने के लिए जोंक को प्राचीन चिकित्सकों द्वारा उपयोग में लाया जता था!

      Delete
  27. बहुत ही खुबसूरत जगह है .....
    आप अपने ये आर्टिकल किसी पत्रिका में क्यों नहीं भेजते तस्वीरों के साथ .....???

    ReplyDelete
    Replies
    1. जी भेज तो दें पर छापता कौन है !
      आपको भी तो भेजी थी कुछ क्षणिकाएं पिछले वर्ष :)

      Delete
  28. हम १९९७ में गए थे मसूरी. वो भी फरवरी की ठण्ड में. अब इस मौसम में जरुर जन्नत जैसा अहसास रहा होगा.

    ReplyDelete
    Replies
    1. शिखा जी , जिस समय हम वहां थे , ठीक उसी समय लेह और मनाली में बर्फ पड़ रही थी . और हम पंखा चलाकर कम चला रहे थे . मौसम अब बदल सा गया है . फिर भी सुहाना तो होता है .

      Delete
  29. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (19-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
  30. आजकल मंसूरी ना सही, धनौल्टी का कुदरती रूप तो अभी तक बचा हुआ है ही अगर आप वहाँ गए होंगे तो जरुर देखा होगा,

    ReplyDelete
    Replies
    1. धनोल्टी पहले बिल्कुल खाली होता था . अब वहां भी होटल्स बन गए हैं . लेकिन सुरखंडा देवी मंदिर जाने वाली गाड़ियों से ट्रैफिक जाम लगा रहता है .

      Delete
  31. आपने मसूरी के बारे में विस्तृत फोटो सहित बढ़िया जानकारी दी है ... पढ़कर मसूरी की यादें फिर से तरोताजा हो उठी हैं ... आभार

    ReplyDelete
  32. आपने तो मेरी यादें भी ताज़ा करा दीन ... ट्रोली के पास वाली जगह पे किसी होटल में रुके थे हम ...
    अब तो बहुत बदला बदला लग रहा है ये शहर ... पर जगह के नाम वही हैं ... फोटो सभी कमाल के हैं हमेशा की तरह ...

    ReplyDelete
  33. साधु-संत लोग भाग के पहाड़ों पर ऐसे ही थोड़ी न जाते थे!

    ReplyDelete
  34. JCJune 19, 2012 6:57 PM
    जिस गति से पृथ्वी पर जमी बर्फ पिघल रही है, और स्नोलाइन निरंतर ऊपर- ऊपर बढ़ती जा रही है, वैज्ञानिक भी चिंतित हैं कि सागर-जल का स्तर ऊपर बढेगा... और इस कारण सबसे पहले समुद्र के किनारे के क्षेत्र जल-मग्न हो सकते हैं... और यदि सही उपाय तुरंत न किये जाएँ पृथ्वी का एक बड़ा भाग कुछ वर्ष में डूब सकता है... उस स्थिति में शायदजो ऊंचे पहाड़ी स्थानों में रहते हैं वे ही डूबने से बच पाएं... (संभव है कि भूत में भी यह कारण रहा हो मानव जाति के आदि काल से पहाड़ी क्षेत्र में निवास पाए जाने का - विशेषकर जो लद्दाख आदि स्थानों पर आज भी पाए जाते हैं???!!!)...

    ReplyDelete
  35. डॉ साहब सारा मामला gut bacteria में एक ख़ास जीवाणु की तादाद के बे -तहाशा बढ़ जाने जुडा है . अच्छी प्रस्तुति .कृपया यहाँ भी पधारें -


    बुधवार, 20 जून 2012
    क्या गड़बड़ है साहब चीनी में
    क्या गड़बड़ है साहब चीनी में
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

    ReplyDelete
  36. सुंदर चित्र और उनसे भी अच्छा वर्णन, मसूरी जाने की इच्छा हो रही है।

    ReplyDelete
  37. पुनश्च - यदि पीछे मुड के भारत देश और इस के पडौसी पहाड़ी क्षेत्रों के इतिहास में देखें, तो ऐसा लगता है कि किसी काल में हिमालय, रक्षा की दृष्टि से, एक दुर्ग/ किले, अथवा देश के सर पर एक सफ़ेद ताज समान देखा जाता रहा...
    किन्तु, वैसे तो व्यापार हेतु भारत से सिल्क रूट जैसे मार्गों से पैदल गए-आये व्यापारी आदि के माध्यम से भारत प्रसिद्द हुआ विभिन्न क्षेत्र में आदि काल से ऑल राउंड प्रगति के लिए... किन्तु तथाकथित वैदिक काल के दौरान उपलब्ध की गयी आध्यात्मिक और भौतिक प्रगति का आपस में ही क्षेत्रीय राजाओं आदि के बौद्धिक पतन, और इस कारण झगड़े बढ़ते जाने के कारण, शक्ति हीन होने से, कह सकते हैं कि हाल ही में इस के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित खैबर पास के रूप में इस 'सोने की चिड़िया' को बुरी नज़र लग गयी...
    और फिर छोटी-बड़ी विदेशी फौजें ही निरंतर यहाँ आ राज करने लगे... और जल-मार्ग से फिर अंग्रेजों का आगमन इस के इतिहास का एक टर्निंग पॉइंट सिद्ध हुवा... उन्होंने सुख-समृद्धि हेतु भौतिक विकास के साथ साथ इस गर्म देश में निज स्वार्थ में - अपने आवास को सुखद बनाने हेतु - जब स्बोलाइन लगभग १२,००० फुट थी, पांच-छः हजार फुट के लगभग जहां जहां संभव हुवा कई हिल-स्टेशन बनाए... और, (जैसे शेर शिकार को मार अपना पेट भर लेता है तो अनेक अन्य निम्न श्रेणी के मांस-भक्षी आ जाते हैं??) उनके जाने के पश्चात हमें भी भौतिक सुख का भागी होने का थोड़ा सौभाग्य प्राप्त हुवा है - कुछ को अधिक तो कुछेक को कम... और दूसरी ओर, किन्तु जो दीखता नहीं है, हमारे पूर्वजों द्वारा अर्जित आध्यत्मिक ज्ञान लगभग चौपट हो गया...:)

    ReplyDelete
    Replies
    1. चलिए अंग्रेजों के जाने के बाद कुछ तो फायदा हमें भी हुआ . अब कोई नहीं कह सकता --- --- --- नोट अलाउड !
      आध्यत्मिक ज्ञान के चौपट होने के लिए किसी और को क्यों दोष दें जब हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं .

      Delete
  38. आपकी ब्लॉग दस्तक हमेशा नवीनीकृत कर जाती है ऊर्जा को लेखन की .

    ReplyDelete
  39. मसूरी वाकयी में बहुत ही सुन्‍दर जगह है। आपने केम्‍पटी फाल में मोटे तोंदवाले लोगों को नहाने पर लिखा है, वाकयी में मुझे भी स्‍वीमिंग पूल या ऐसे सार्वजनिक स्‍थानों पर अपनी आंखे गन्‍दी करने में बहुत गुस्‍सा आता है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. अजित जी , क्या करें , सिक्स पैक वाले बस फिल्मों में ही नज़र आते हैं .

      Delete