Tuesday, November 30, 2010

पहले ख़ुशी , फिर ग़म --हाईपरथायरायडिज्म------

परम आदरणीय डॉ. टी एस दराल जी
प्रणाम !
आशा है, श्रद्धेय पिताश्री के बिछोह के दुःख से उबरने का क्रम जारी होगा ।
अब फिर से दैनिक क्रिया क्रीड़ाओं में मन रमाएं … छोटे भाई के नाते यही निवेदन है …

शुभकामनाओं सहित

राजेन्द्र स्वर्णकार

शस्वरं


हालाँकि मन तो नहीं था , लेकिन अनुज राजेन्द्र स्वर्णकार के विनम्र निवेदन ने समय से पहले ही लिखने पर मज़बूर कर दिया । ऐसे में और क्या लिखता , इसलिए जो काम कर रहे हैं , उसी पर लिख रहा हूँ ।


सोचिये यदि आप डाइटिंग और कसरत द्वारा वज़न घटाने की कोशिश कर रहे हों , और वज़न कम न हो रहा हो । ऐसे में एक दिन निराश होकर आप दोनों काम करना छोड़ देंगे । फिर एक दिन आपको अहसास होता है कि --अरे वज़न थोडा कम हो गया ।
ऊपर से किसी ने कह दिया कि भई वाह क्या फिगर मेंटेन की है, तो आप फूलकर कुप्पा हो जायेंगे

लेकिन फिर और वज़न कम होने पर आपको थोड़ी चिंता होने लगती है कि बिना कुछ प्रयास किये वज़न कम क्यों हो रहा है ।
दूसरे भी अब कहने लगते हैं कि क्या बात है , बड़े कमज़ोर दिख रहे हो

जी हाँ , यह चिंताज़नक बात हो सकती है । क्योंकि हो सकता है , आप हाईपरथायरायडिज्म के शिकार हो गए हों ।


हाईपरथायरायडिज्म क्या है ?


यह थायरायड ग्रंथि की बीमारी है और हाइपोथायरायडिज्म का बिल्कुल उल्टा है । यानि इसमें थायरायड हॉर्मोन की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाने से शरीर में कई विकार आ जाते हैं ।


हाईपरथायरायडिज्म के कारण :



अक्सर यह ऑटो इम्युनिटी की वज़ह से होती है । यानि शरीर में ऐसी थायरायड एंटीबोड़ीज बन जाती हैं जो हॉर्मोन की मात्रा को बढ़ा देती हैं । कुछ ऐसे भी रसायन होते हैं जो थायरायड को उत्तेजित करते हैं , ज्यादा हॉर्मोन बनाने के लिए ।

इस दशा को ग्रेव्ज डिसीज ( Graves desease) कहते हैं ।


इसके अलावा थायरायड में गांठ बन जाने से भी अधिक हॉर्मोन पैदा हो सकता है ।


लक्षण :

थायरायड हॉर्मोन की मात्रा अधिक होने से शरीर के सभी अंग उत्तेजित होकर तेजी से काम करने लगते हैं । इसलिए ऐसे लक्षण नज़र आ सकते हैं :-

* वज़न कम होते जाना ।
* अधिक भूख लगना ।
* नींद कम आना ।
* अधिक गर्मी लगना , अधिक पसीना आना ।
* घबराहट , दिल में धड़कन , हाथ कांपना ।
* आँखों में जलन और सूजन ।
* बाल पतले होकर झड़ना ।
* माहवारी का कम होना या रुक जाना ।

यदि आपको खूब भूख लगती है , फिर भी वज़न कम होता जा रहा है , गर्मी की अपेक्षा सर्दी अच्छी लगती है और घबराहट रहने लगी है , तो थायरायड की जाँच कराना भूलें

जांच :

१) रक्त की जांच ---फ्री टी- , फ्री टी- , टी एस एच ( हॉर्मोन बढ़ जाते हैं , टी एस एच कम हो जाता है )।

२) रेडियो एक्टिव आयोडीन अपटेक ( बढ़ जाता है ), और स्केन

उपचार :

अत्यधिक हॉर्मोन से होने वाली परेशानियों को दवाओं से कंट्रोल किया जा सकता है । लेकिन पूर्ण उपचार के लिए ये तीन विकल्प होते हैं :

) दवाएं --एंटी थायरायड दवाएं

आसान लेकिन असंतोषजनक ।
इनको १.५ से २ वर्ष तक लेना पड़ता है ।
ज़ाहिर है इलाज़ लम्बा होता है । छोड़ने के बाद दोबारा होने की सम्भावना रहती है । साइड इफेक्ट्स का भी खतरा रहता है ।

) ऑप्रेशन :

यदि थायरायड काफी बढ़ी हुई है , तो सर्जरी कराना सही रहता है ।
दोबारा होने की सम्भावना काफी कम रहती है ।
लेकिन सर्जरी के कॉम्प्लीकेशंस भी रहते हैं ।
हाइपो होने की सम्भावना ४०-५० % रहती है ।

) रेडियो आयोडीन थेरापी :

यह सबसे आसान और सुरक्षित इलाज़ है । बस एक बार रेडियो आयोडीन की दवा कैप्सूल या द्रव के रूप में दी जाती है और कुछ ही दिनों में सारे लक्षण ठीक होने लगते हैं ।
दोबारा होने की सम्भावना कम से कम होती है ।
हाइपो होने की सम्भावना अत्यधिक होती है । यानि बाद में आगे चलकर हॉर्मोन की कमी होने से परेशानी हो सकती है ।

लेकिन मात्र एक गोली रोज खाने से यह समस्या ख़त्म हो जाती है
आजकल यह तरीका सबसे ज्यादा प्रयोग में लाया जा रहा है

हालाँकि , कौन सा इलाज़ सही रहेगा , इसका फैसला तो डॉक्टर ही कर सकता है । फिर भी रोगी को भी उपचार का विकल्प दिया जाता है ।

नोट : इस रोग का उपचार किसी एंडोक्राइनोलोजिस्ट (endocrinologist) या न्यूक्लियर मेडिसिन स्पेशलिस्ट से ही कराना चाहिए

दिल्ली में इंस्टिट्यूट ऑफ़ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज ( इनमास ), लखनऊ रोड तिमारपुर में स्थित है , जहाँ देश भर से रोगी उपचार के लिए आते हैंयह देश का पहला न्यूक्लियर मेडिसिन इंस्टिट्यूट है




Saturday, November 27, 2010

जाने मुसीबत कभी अकेली क्यों नहीं आती---

पिछली पोस्ट पर आदरणीया हरकीरत जी ने पिताजी को श्रधांजलि देते हुए कामना की कि मैं जल्दी ही अपने पुराने रूप में लौटूं ।

मैं भी माहौल को बदलने के लिए एक हलकी फुलकी पोस्ट लिखने की सोच ही रहा था ।

वैसे भी एक हरियाणवी ज्यादा देर तक गंभीर कहाँ रह सकता है

लेकिन मनुष्य सोचता कुछ और है , होता कुछ और है ।

अभी एक क्रियाक्रम पूर्ण हुआ ही था कि हमारे साले साहब के ससुर जी , जो काफी दिन से गंभीर रूप से बीमार थे और अस्पताल में भर्ती थे , दो दिन पहले उनका निधन हो गया ।

आज ही सूचना मिली कि हमारी चचेरी बहन के पति का सुबह हार्ट अटैक होने से देहांत हो गया ।

जाने मुसीबत
कभी अकेली क्यों नहीं आती ।

सोच रहा हूँ अब इसके बाद मैं भी ललित शर्मा जी की तरह भारत भ्रमण पर निकल जाऊं ।

आखिर स्वयं को भी तो सही रखना है ।

लेकिन आज ही खुशदीप सहगल की पोस्ट पर पता चला कि ललित जी की नानी का देहांत होने से वे दिल्ली से वापस लौट रहे हैं । उनका दिल्ली में मिलने का वादा भी पूरा न हो सका ।

भला ऊपर वाले की मर्ज़ी के खिलाफ कौन जा सकता है ।


अब कुछ समय के लिए ब्लोगिंग को पूर्ण विराम देना पड़ेगा ।

नोट : यह पोस्ट केवल सूचनार्थ है । इसलिए टिप्पणी बंद है






Thursday, November 25, 2010

कितनी अज़ीब रिवाज़ें हैं यहाँ पर --

किसी तकनीकि वज़ह से इस पोस्ट पर कमेन्ट बंद हो गए हैं । कृपया पिछली पोस्ट पढ़कर आप अपने विचार यहाँ प्रकट कर सकते हैं ।

कितनी अज़ीब रिवाज़ें हैं यहाँ पर --

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैसभी प्राणियों में मनुष्य ही उन्नत प्राणी है
इसीलिए हमारे समाज में विभिन्न नियम , रीति रिवाज़ें , प्रथायें और धारणाएं बनी हैं , जिनका लोग श्रधा से पालन करते हैं ।

जन्म हो या मृत्यु , नामकरण या गृह प्रवेश या फिर शादियाँ --जाने कितनी ही रस्में और रीति रिवाज़ें हैं जो निभानी पड़ती हैं ।
इनमे से कुछ तो तर्कसंगत लगती हैं । लेकिन कुछ ऐसी भी हैं जिनका वर्तमान परिवेश में औचित्य समझ नहीं आता ।

अभी तक ऐसे अवसरों पर पिताजी ही सब कुछ किया करते थे । लेकिन उनकी मृत्यु पर बड़ा होने के नाते मुझे ही सब कुछ झेलना पड़ा ।

कहीं कहीं थोड़ी परेशानी भी हुई । कुछ को माना , कुछ को नहीं ।
आजकल क्या सही है क्या गलत , फैसला करना मुश्किल है ।
अब ज़रा इन रस्मों , रिवाजों को देखिये और बताइये क्या सही है ।

हमारी रीति रिवाज़ें :

* मृत्यु पर दहाड़े मार कर रोना । फिर थोड़ी देर बाद बैठकर गपियाना और ठहाके लगाना ।

* बरसी से पहले न कोई जश्न , न पार्टी या शादी में जाना ।

* तेरह दिन तक शोक मनाना ।

* जिसके घर में शादी हो , उसका मृत्यु पर न जाना --न तो दाह संस्कार पर , न शोक प्रकट करने और न ही क्रिया पर ।

* बड़े बेटे के बाल कटवाना , उस पर तरह तरह की पाबंधियाँ लगाना ।

* रिश्तेदारों का राशन लेकर आना ।

* पंडितों द्वारा बताई गई विभिन्न रस्मों को निभाना ।

इनमे से कई रस्में ऐसी हैं जिन्हें समयानुसार मनुष्यों की सहूलियत के लिए बनाया गया होगा । जैसे आर्थिक रूप से मदद देना ।

कई ऐसी रिवाज़ें हैं जो पंडितों ने बनाई हैं , अपनी पूर्ति के लिए ।
आखिर पंडिताई करने वाले पंडित के लिए तो यही रस्में रिवाज़ें गुजर बसर का साधन हैं ।

लेकिन सोचता हूँ कि वर्तमान परिवेश में इन रीतियों का कितना सार्थक औचित्य रह गया है
क्या इन्हें बंद कर देना चाहिए ?
या इनमे संशोधन करने की ज़रुरत है

फैसला आपका ।

जानने की उत्सुकता रहेगी ।

नोट : व्यक्तिगत तौर पर मैं इनमे से कुछ को ही सही मानता हूँ

Monday, November 22, 2010

आपके स्नेह और सम्मान से अभिभूत हूँ ---

जीवन में अगर छाँव है तो धूप भी है । सुख है , तो दुःख भी है । आराम है , तो काम भी है ।

कुछ ऐसे ही अनुभव हुए , अभी पिछले दिनों ।

अचानक ब्लॉगजगत में ऐसा हो गया जैसा पिछले वर्ष काव्य जग में हुआ था ।

शायद अदा जी की पिछली पोस्ट --हिंदी ब्लॉग जगत के स्वर्णिम दिन काहे को उकताए हैं ?--- का यही ज़वाब है ।

अपनों से बिछुड़ने का ग़म तो होता ही है ।
और जब बिछुड़ने वाला ऐसा हो तो , कुछ ज्यादा ही होता है --


अस्सी के बुजुर्ग या अस्सी के ज़वान !

ऐसे में सभी मित्रों, रिश्तेदारों और हितैषियों द्वारा दिया गया समर्थन ही इंसान को यह दुःख बर्दास्त करने का हौसला देता है ।

मैं उन सभी मित्रों का आभारी हूँ जिन्होंने इस समय अपनी टिप्पणी , ईमेल , एस एम् एस , फोन या व्यक्तिगत रूप से मुझे बल प्रदान किया


और भी बहुत से मित्र हैं जो व्यक्तिगत अतिव्यस्तता के रहते संपर्क नहीं कर पाए । लेकिन मैं जानता हूँ , उनकी दुआएं हमारे साथ हैं ।

नोट : कृपया इस पोस्ट पर टिप्पणी दें

Wednesday, November 17, 2010

एक शेर दिल इंसान , जिन्होंने जिंदगी एक शेर की तरह जी --

पिछली पोस्ट में --
तो मूढ़ था , परिस्थितियां लेकिन अवसर ही ऐसा था कि हम न कह ही नहीं सकते थे । इसलिए राम का नाम लेते हुए हम भी पहुँच ही गए ब्लोगर मिलन में ---
----- विवरण आज ही पोस्ट कर दिया है , क्योंकि क्या जाने कल अवसर मिले मिले

ये पंक्तियाँ थीं पिछली पोस्ट में पहली और आखिरी ।

अब यह पूर्वाभास था या अंतर्मन की आवाज़ , या फिर चिकित्सीय दृष्टिकहना मुश्किल है

लकिन अगले दिन गुडगाँव जाते हुए , रास्ते में ही भाई का फोन आया कि पिताजी नहीं रहे ।

लगा जैसे एक युग का अंत हो गया

पिताजी का १४ नवम्बर को दिन के ११-२५ बजे स्वर्गवास हो गया

गत वर्ष जन्मदिन के अवसर पर ।
वो जो कार्यरत रहते हुए , परिवार के उत्थान के लिए कार्य करते रहे । सेवा निवृत होकर समाज के लिए काम करते रहे ।
जिन्होंने अपने साहस और मज़बूत इरादों से न सिर्फ अपने गाँव में विकास कार्यों में अपना योगदान दिया , बल्कि शहर में भी एक मज़बूत स्तम्भ की तरह सामाजिक कार्यों को अपना सर्वस्व प्रदान किया ।

गाँव में १९६० में पक्की सड़क , १९८० में फिरनी ( बाई पास ) का रुका हुआ कार्य , १९९० में गाँव के लोगों की फंसी हुई ज़मीन को डीनोटिफाई कराना आदि ऐसे कार्य थे जिनमे उनका भरपूर योगदान रहा

शहर में सेवा निवृत होकर पहले १० साल मयूर विहार और सन २००० से गुडगाँव के सेक्टर २३ में रहकर वे समाज के लिए ही कार्य करते रहे ।
सभी तरह की सामाजिक संस्थाओं से जुड़े रहकर उन्होंने गुडगाँव के सबसे बड़े सेक्टर को विकसित करने में जी जान से कोशिश की ।

रोज सुबह शाम चार किलोमीटर में फैले सेक्टर का राउंड लेना , कहीं कोई समस्या नज़र आने पर तुरंत कार्यवाही करना , किसी के भी दुःख तकलीफ में आगे बढ़कर मदद करना , मजदूरों और छोटे छोटे दुकानदारों के हितों का ख्याल रखना , सुबह पार्क में सैर करते हुए एक एक व्यक्ति से मिलकर उसका हाल चाल पूछना ---ये ऐसे कार्य थे जिनकी वज़ह से उन्हें सेक्टर का एक एक व्यक्ति जानता और सम्मान करता है

पिछली कई दिनों से सैकड़ों लोगों से मिलकर यही लगा कि वो सेक्टर की जान थे ।
उनके गाए भजन औरों के साथ हमें भी याद हैं ।
बड़े सुरीले स्वर में गाते थे --

सुनता ना कोई रे , यूँ रोवना फ़िज़ूल है
विपदा की मारी तेरे , ममता की भूल है
खाली पड़ा पिंज़रा हंसा , चला गया उड़ कर
जाये पीछे फिर कोई , आया नहीं मुड़कर
पांच तत्व जुड़कर सारी काया का स्थूल है ---

उन्होंने अपनी जिंदगी में साहस और हिम्मत का जो परिचय दिया , उससे यही लगता है कि उन्होंने जिंदगी एक शेर की तरह जी ।

रविवार २१-११-२०१० को .०० बजे , इस दिवंगत आत्मा को श्रधांजलि देने के लिए परिवार ने प्रार्थना सभा का आयोजन किया है , निवास स्थान पर
और तद्पश्चात , उनकी इच्छानुसार भोजन का आयोजन किया है

Saturday, November 13, 2010

एक शाम --दो मुकाम --कठिन काम ---

तो मूढ़ था , परिस्थितियां लेकिन अवसर ही ऐसा था कि हम न कह ही नहीं सकते थे ।

जी हाँ , कनाडा से श्री समीर लाल जी आए हुए थे अब मिलना तो तय था । इसलिए राम का नाम लेते हुए हम भी पहुँच ही गए ब्लोगर मिलन में ।



यहाँ परिचय चल रहा है



विशिष्ठ अतिथिगण वैसे यहाँ अतिथि कोई नहीं था



समारोह के मेज़बान , अपना बखान सुनाते हुए पक्के कीबोर्ड खटरागी हैं , यह तो दिख ही रहा है



वर्मा जी बड़े ध्यानमग्न दिख रहे हैं आखिर अध्ययन और अध्यापन इनका काम जो है भाई



बहार ही बहार , जब खड़े हो जाएँ चार यार यहाँ चौथे श्री तनेजा जी फोटो खींच रहे हैं इसलिए कोरम पूरा करने के लिए मिसेज तनेजा ने साथ दिया


आज ही के दिन कविराज श्री अशोक चक्रधर जी का निमंत्रण था--काका हाथरसी पुरस्कार समारोह के लिए । उनका निमंत्रण मैं कभी नहीं ठुकराता , लेकिन जा भी नहीं पाता । परन्तु आज अवसर मिल ही गया ।

इसलिए ब्लोगर मिलन से फारिग होते ही हम दौड़ पड़े इस सम्मान समारोह की ओर ।

आज युवा कवि श्री प्रवीण शुक्ल को काका हाथरसी पुरस्कार से नवाज़ा गया , जिसमे उन्हें काका हाथरसी ट्रस्ट की ओर से एक लाख रूपये की धनराशी का चेक भेंट किया गया


कार्यक्रम के आरम्भ में काका पर एक पावर प्रेजेंटेशन करते हुए श्री अशोक चक्रधर



मुख्य अतिथि श्री बलराम जाखड , श्री अशोक चक्रधर और प्रवीण शुक्ल के साथ साथ में डॉ कुंवर बेचैन भी



चेक भेंट करते हुए श्री बलराम जाखड



इस अवसर पर श्री प्रवीण शुक्ल की पुस्तक --गाँधी और मेनेजमेंट --का विमोचन भी किया गया


अंत में डायमंड बुक्स की तरफ से सभी के लिए भोजन की व्यवस्था भी थी

इस तरह यह शाम , राम राम करते हुए दो मुकाम तक ले गईविवरण आज ही पोस्ट कर दिया है , क्योंकि क्या जाने कल अवसर मिले मिले

Thursday, November 11, 2010

चिकित्सा जगत की कुछ ख़ास चटपटी खबरें---

आज प्रस्तुत हैं चिकित्सा जगत की कुछ ख़ास चटपटी ख़बरें ।

* आपको जिन्दगी में चिकनगुन्या बुखार एक बार , डेंगू चार बार और मलेरिया बार बार हो सकता है । यह कहना है डॉ के के अगरवाल का ।

* चिकनगुनिया और डेंगू में एक अंतर है जोड़ों के दर्द का जो चिकनगुन्या में हफ़्तों , महीनों या साल तक भी रह सकता है ।

* डेंगू में एस्पिरिन कभी नहीं लेनी चाहिए , यदि ले रहे हैं , तो बंद कर देनी चाहिए । बुखार के लिए पेरासिटामोल ही काफी है ।

* पीलिया कोई बीमारी नहीं है । यह किसी बीमारी का लक्षण है ।

* गर्भवती महिला में आयोडीन की कमी से होने वाला बच्चा मंद बुद्धि हो सकता है । इसलिए आयोडीन युक्त नमक ही खाएं ।

* यदि किसी को अचानक हार्ट अरेस्ट हो जाये तो सी पी आर में माउथ टू माउथ साँस देते हैं । लेकिन अस्पताल से बाहर सिर्फ सी आर ही काफी है । यानि माउथ टू माउथ साँस की ज़रुरत नहीं है

* बोटोक्स के इंजेक्शन सिर्फ झुर्रियां मिटाने के ही काम नहीं आते । इनसे क्रोनिक माइग्रेन को ठीक किया जा सकता है । इसे ३ महीने में एक बार लगाया जाता है । हालाँकि महंगा तो पड़ता है ।

* हमारे देश की जनसँख्या सन २०४५ के बजाय २०७० तक स्थायी हो पाएगी । उस समय यह होगी १७० करोड़ ।
यह कहना है हमारे स्वास्थ्य मंत्री जी का ।

* नींद की गोलियों की एक बोतल पर लेबल --सावधान ! इनके सेवन से नींद आ सकती है ।

अंत में :

पत्नी , पति से : क्या बात है आजकल आप एक दो घंटे के बजाय ५-६ घंटे ब्लोगिंग करते रहते हैं ?
पति : क्या करूँ , आजकल ऑफिस का कंप्यूटर खराब पड़ा है ।
ज़रा सोचिये कहीं आप ही वो पति तो नहीं !

नोट : उपरोक्त ख़बरें विभिन्न मेडिकल जर्नल्स से ली गई हैं

Sunday, November 7, 2010

दीवाली के आफ्टर इफेक्ट्स और साइड इफेक्ट्स---

यह दीवाली भी चली गई और रह गए दीवाली के आफ्टर इफेक्ट्स और साइड इफेक्ट्स

उपहार :

* दफ्तर के बड़े बाबू का हुआ बड़ा खराब मूढ़ दीवाली पर।
दीवाली से एक महीना पहले फर्टाइल सीट से हो गया ट्रांसफर

दीवाली के उपहारों की संख्या १०% रह गई घटकर


* दीवाली गिफ्ट्स का हाल भी ब्लॉग पोस्ट पर टिप्पणियों जैसा होता है ।
एक हाथ दे , एक हाथ ले

* जो माल कभी नहीं बिकता , वो दीवाली पर आसानी से निकल जाता है ।
बस पैकेजिंग सुन्दर होनी चाहिए ।


* दीवाली गिफ्ट्स तभी तक सुन्दर लगती हैं , जब तक पेपर में लिपटी रहती हैं ।
उसके बाद खोदा पहाड़ , निकला चूहा ।

बधाईयाँ :

पहले देते थे लोग बधाईयाँ मिलकर
अब बनाकर भेज देते हैं मोबाइल पर
ग्रुप एस एम् एस ।


दीवाली पर जगमगाहट :

दीवाली से पहले

दीवाली की सुहानी संध्या

दीवाली के बाद

दीवाली से अगले दिन की वीरानी भोर

जाने कितनी सांसें समय से पहले ही थम जाएँगी
जब साफ़ हवा में सांस ले सकें
वो सुबह जाने कब आएगी ?

क्यों नहीं मना सकते
हम दीवाली बिना शोर शराबा और प्रदूषण के ?


कुछ इस तरह ।

आखिर लक्ष्मी जी को भी तो यही पसंद है ।