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Saturday, November 13, 2010

एक शाम --दो मुकाम --कठिन काम ---

न तो मूढ़ था , न परिस्थितियां । लेकिन अवसर ही ऐसा था कि हम न कह ही नहीं सकते थे ।

जी हाँ , कनाडा से श्री समीर लाल जी आए हुए थे । अब मिलना तो तय था । इसलिए राम का नाम लेते हुए हम भी पहुँच ही गए ब्लोगर मिलन में ।



यहाँ परिचय चल रहा है ।



विशिष्ठ अतिथिगण । वैसे यहाँ अतिथि कोई नहीं था ।



समारोह के मेज़बान , अपना बखान सुनाते हुए । पक्के कीबोर्ड खटरागी हैं , यह तो दिख ही रहा है ।



वर्मा जी बड़े ध्यानमग्न दिख रहे हैं । आखिर अध्ययन और अध्यापन इनका काम जो है भाई ।



बहार ही बहार , जब खड़े हो जाएँ चार यार । यहाँ चौथे श्री तनेजा जी फोटो खींच रहे हैं । इसलिए कोरम पूरा करने के लिए मिसेज तनेजा ने साथ दिया ।


आज ही के दिन कविराज श्री अशोक चक्रधर जी का निमंत्रण था--काका हाथरसी पुरस्कार समारोह के लिए । उनका निमंत्रण मैं कभी नहीं ठुकराता , लेकिन जा भी नहीं पाता । परन्तु आज अवसर मिल ही गया ।

इसलिए ब्लोगर मिलन से फारिग होते ही हम दौड़ पड़े इस सम्मान समारोह की ओर ।

आज युवा कवि श्री प्रवीण शुक्ल को काका हाथरसी पुरस्कार से नवाज़ा गया , जिसमे उन्हें काका हाथरसी ट्रस्ट की ओर से एक लाख रूपये की धनराशी का चेक भेंट किया गया ।


कार्यक्रम के आरम्भ में काका पर एक पावर प्रेजेंटेशन करते हुए श्री अशोक चक्रधर ।



मुख्य अतिथि श्री बलराम जाखड , श्री अशोक चक्रधर और प्रवीण शुक्ल के साथ । साथ में डॉ कुंवर बेचैन भी ।



चेक भेंट करते हुए श्री बलराम जाखड ।



इस अवसर पर श्री प्रवीण शुक्ल की पुस्तक --गाँधी और मेनेजमेंट --का विमोचन भी किया गया ।


अंत में डायमंड बुक्स की तरफ से सभी के लिए भोजन की व्यवस्था भी थी ।

इस तरह यह शाम , राम राम करते हुए दो मुकाम तक ले गई । विवरण आज ही पोस्ट कर दिया है , क्योंकि क्या जाने कल अवसर मिले न मिले ।

Wednesday, February 10, 2010

क्या इतने सारे इत्तेफाक होना भी एक इत्तेफाक है ?

यह भी एक इत्तेफाक है की बहुत पहले , शायद तब हम नए नए डॉक्टर बने थे , हमने स्वर्गीय काका हाथरसी को सुना और उनकी हास्य कविताओं के दीवाने हो गए ।

बरसों बाद २००७ में दिल्ली हंसोड़ दंगल में कविराज अशोक चक्रधर का सामना हुआ, ज़ज़ के रूप में । इत्तेफाक।

फिर २००८ में फिर एक बार अशोक जी के ही प्रोग्राम ---नव कवियों की कुश्ती ---के दंगल में उतर कर कुश्ती जीतने का इत्तेफाक।

एक जनवरी २००९ में मैंने अपना ब्लॉग बनाया । इत्तेफाक देखिये , यह भी श्री अशोक चक्रधर जी के आह्वान पर ।
अशोक जी द्वारा आयोजित जयजयवंती मासिक काव्य गोष्ठी में श्री अविनाश वाचस्पति जी का ब्लॉग पाठ किया जा रहा था । अशोक जी ने सभी से हिंदी ब्लॉग बनाने का अनुरोध किया , और हमने भी साहस कर एक ब्लॉग बना डाला।

क्या इतने सारे इत्तेफाक होना भी एक इत्तेफाक था ?

पता नहीं , पर यह पोस्ट समर्पित है , अशोक चक्रधर जी को , जिनके इत्तेफाक से मिले मार्गदर्शन में हम आज यहाँ तक पहुंचे हैं।

आइये आपको अपने कुछ संस्मरण सुनाते हैं ।

द्रश्य I

एक दिन मेरे पास एक फोन आया ---हम दिल्ली आज तक से बोल रहे हैं। क्या आपने हमारे प्रोग्राम में ऑडिशन दिया था ?
मैंने डरते डरते कहा --हाँ, भई दिया तो था । कोई गलती हुई क्या?
नहीं नहीं , हमने तो ये बताने के लिए फोन किया है की आपको फाइनल्स के लिए सलेक्ट कर लिया गया है।
मैंने कहा --कमाल है , सीधे फाइनल्स में ! अच्छा फाइनल्स का ऑडिशन अलग से होगा?
वो बोला --नहीं सर आप समझे नहीं । आपको ऑडिशन के लिए नहीं , ऑडियंस के लिए सलेक्ट किया गया है ।
मैंने कहा , अरे भाई तो ये कहो न की फ्री में तालियाँ बजाने के लिए बुला रहे हो।

खैर, पहले हमने दूसरों के लिए तालियाँ बजाई ,फिर अगली बार दूसरों ने हमारे लिए बजाई।

द्रश्य II :

शूटिंग के लिए स्टूडियो में --किसी तरह भागते दोड़ते स्टूडियो पहुंचे --जाते ही किसी ने पकड़ लिया ---सर आप मेकप कराना चाहेंगे ?
मैंने कहा --भाई आज तक तो किया नहीं , लेकिन अगर आपको चेहरे में कोई दिफेक्ट्स नज़र आ रहे हों तो
ले चलो। खैर एक छोटे से कमरे में ---इधर उधर दो तीन ब्रश --और हो गया मेकप।
बाद में हमने देखा हमसे ज्यादा मेकप तो ऑडियंस ने कर रखा था ।

स्टूडियो में :
पहला सवाल : सर आपका नाम ?
डॉ टी एस दराल ।
सर ये दराल तो हमने सुना नहीं , टी एस से क्या बनता है , यही बता दीजिये ।

मैंने कहा भाई, अगर जानना इतना ही ज़रूरी है तो आप इण्डिया गेट जाइए , अमर ज़वान ज्योति पर फूल मालाएं चढ़ाइये , और इण्डिया गेट के दक्षिण में खड़े होकर दीवार पर लिखे शहीदों के नाम पढ़िए । दायें किनारे की ओर सबसे नीचे हमारा नाम लिखा है , आपको पता चल जायेगा।
सुनते सुनते उसका सांस फूल गया , और बोला --सर मुझे नहीं पता था इतनी मेहनत करनी पड़ेगी , छोडिये हम टी एस दराल से ही काम चला लेते हैं।

इण्डिया गेट
दूसरा सवाल : सर आपका निवास स्थान कहाँ है ?
मैंने कहा , भैया शुद्ध हिंदी में पूछ रहे हो तो सुनो---मेरा निवास स्थान है ---पप्गिप एक्सटेंशन।
सर ये कैसा नाम है, ये तो हमने कभी सुना ही नहीं।
मैंने कहा, भैया सुना तो मैंने भी नहीं, बस पढ़ा ही है ।
जी समझा नहीं , क्या मतलब ?
मैंने कहा --अरे भाई , ये इंग्लिश के शोर्ट फॉर्म का हिंदी अनुवाद है , जो ऍम टी एन एल के टेलीफोन बिल पर लिखा रहता है,---- पप्गिप एक्सटेंशन डी एल आई ९२ ।
वो बेचारा इतना कन्फ्यूज्ड हुआ , उसने आगे कुछ पूछा ही नहीं।

अब आपके लिए दो सवाल छोड़ रहे हैं।

पहला : हमारा पूरा नाम ?
दूसरा :
निवास स्थान आपको बताना है। यानि पप्गिप से क्या बनता है ?
हिंट
इसी पोस्ट में है।

दोनों सवालों का सही ज़वाब देने वाले को हमारी तरफ से एक कॉकटेल / मॉकटेल डिनर अपने ऑफिसर्स क्लब में ।

तब तक --शुभकामनायें।