Thursday, November 25, 2010

कितनी अज़ीब रिवाज़ें हैं यहाँ पर --

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैसभी प्राणियों में मनुष्य ही उन्नत प्राणी है
इसीलिए हमारे समाज में विभिन्न नियम , रीति रिवाज़ें , प्रथायें और धारणाएं बनी हैं , जिनका लोग श्रधा से पालन करते हैं ।

जन्म हो या मृत्यु , नामकरण या गृह प्रवेश या फिर शादियाँ --जाने कितनी ही रस्में और रीति रिवाज़ें हैं जो निभानी पड़ती हैं ।
इनमे से कुछ तो तर्कसंगत लगती हैं । लेकिन कुछ ऐसी भी हैं जिनका वर्तमान परिवेश में औचित्य समझ नहीं आता ।

अभी तक ऐसे अवसरों पर पिताजी ही सब कुछ किया करते थे । लेकिन उनकी मृत्यु पर बड़ा होने के नाते मुझे ही सब कुछ झेलना पड़ा ।

कहीं कहीं थोड़ी परेशानी भी हुई । कुछ को माना , कुछ को नहीं ।
आजकल क्या सही है क्या गलत , फैसला करना मुश्किल है ।
अब ज़रा इन रस्मों , रिवाजों को देखिये और बताइये क्या सही है ।

हमारी रीति रिवाज़ें :

* मृत्यु पर दहाड़े मार कर रोना । फिर थोड़ी देर बाद बैठकर गपियाना और ठहाके लगाना ।

* बरसी से पहले न कोई जश्न , न पार्टी या शादी में जाना ।

* तेरह दिन तक शोक मनाना ।

* जिसके घर में शादी हो , उसका मृत्यु पर न जाना --न तो दाह संस्कार पर , न शोक प्रकट करने और न ही क्रिया पर ।

* बड़े बेटे के बाल कटवाना , उस पर तरह तरह की पाबंधियाँ लगाना ।

* रिश्तेदारों का राशन लेकर आना ।

* पंडितों द्वारा बताई गई विभिन्न रस्मों को निभाना ।

इनमे से कई रस्में ऐसी हैं जिन्हें समयानुसार मनुष्यों की सहूलियत के लिए बनाया गया होगा । जैसे आर्थिक रूप से मदद देना ।

कई ऐसी रिवाज़ें हैं जो पंडितों ने बनाई हैं , अपनी पूर्ति के लिए ।
आखिर पंडिताई करने वाले पंडित के लिए तो यही रस्में रिवाज़ें गुजर बसर का साधन हैं ।

लेकिन सोचता हूँ कि वर्तमान परिवेश में इन रीतियों का कितना सार्थक औचित्य रह गया है
क्या इन्हें बंद कर देना चाहिए ?
या इनमे संशोधन करने की ज़रुरत है

फैसला आपका ।

जानने की उत्सुकता रहेगी ।

नोट : व्यक्तिगत तौर पर मैं इनमे से कुछ को ही सही मानता हूँ