top hindi blogs

Sunday, May 25, 2014

रोक सको तो रोक लो, जिंदगी और ज़वानी पल पल हाथ से फिसलती जाती है ---


आजकल टी वी पर चल रहे महाराणा प्रताप के सीरियल को देखकर जिज्ञासा हुई तो पता चला कि महाराणा उदय सिंह और महाराणा प्रताप, दोनो की मृत्यु ५० + की आयु मे ही हो गई थी .    वैसे भी उस समय औसत आयु ५० के आस पास ही रही होगी . १९७० - ८० के दशक मे मनुष्य की औसत आयु ६० के करीब थी . ज़ाहिर है , इस बीच औसत आयु मे बहुत कम ही बढ़त हुई . आजकल यह ७० वर्ष है . यह संभव हुआ है वर्तमान मे स्वास्थ्य सेवाओं मे सुधार के कारण . लेकिन अभी भी और शायद कभी भी मनुष्य मृत्यु पर काबू नहीं पा सकता . जहां मृत्यु एक सच है , वहीं एजिंग यानी बुढ़ापा आना भी एक निश्चितता है . बचपन से बुढापे का यह सफ़र कब पूरा हो जाता है, पता भी नहीं चलता. 

यूं तो आने वाले एक पल का भी कोई भरोसा नहीं , लेकिन औसत आयु के हिसाब से आज हम और हमारी उम्र के लोग लगभग तीन चौथाई जिंदगी जी चुके हैं . सोचा जाये तो कल की ही बात लगती है जब १९८४ मे हमारी शादी हुई थी और जिंदगी की एक नई शुरुआत .  



                                                                              १९८४  


देखते देखते तीस साल बीत गए और हम जाने कहाँ कहाँ से गुजर गए . वैसे तो जिंदगी मे बहुत से उतार चढ़ाव आते हैं लेकिन यह हमारा सौभाग्य रहा कि हमने जिंदगी को ऊँचाई की ओर चढ़ते ही पाया . एक गांव के साधारण से वातावरण मे पैदा होकर आज जिस मुकाम पर पहुंचे हैं , वह स्वयं के लिये आत्मसंतुष्टि प्रदान करता है . एक तरह से मैं स्वयं को सौभाग्यशाली महसूस करता हूँ . बेशक , हमने जिंदगी को भरपूर जीया है . 



                                                                          २०१४ 


कहते हैं सौभाग्य पिछले जन्म के अच्छे कर्मों का फल होता है . लेकिन यदि यह पिछले जन्म का फल हुआ तो फिर हमारे हाथ मे क्या रहा. फिर तो भाग्यशाली होना भी भाग्य की ही बात हुई . क्या आपके वर्तमान जीवन का भाग्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता ? 

बचपन मे एक कहानी सुनी थी . एक सज्जन पुरुष जो जिंदगी भर अच्छे कर्म करता रहा , रास्ते से गुजर रहा था कि अचानक उसके पैर मे एक मोटी सी शूल घुस गई . वह दर्द से कराह उठा . तभी वहां से एक दुराचारी व्यक्ति गुजरा जो बड़ा खुश नज़र आ रहा था . उसने बताया कि वो खुश इसलिये है कि उसे २००० रुपये का ख़ज़ाना मिला था . यह देखकर सज्जन पुरुष बड़ा दुखी हुआ और रोने लगा . तभी वहां एक साधु आया तो सज्जन पुरुष को रोते देखकर रोने का कारण पूछा . उसने बताया कि वह सारी जिंदगी अच्छे कर्म करता रहा , फिर भी उसके पैर मे इतनी मोटी शूल घुस गई और वह दुर्जन सारी जिंदगी पाप करता रहा फिर भी उसको २००० रुपये का इनाम मिला , यह कैसा न्याय है . साधु ने कहा भैया , तुम्हारे पिछले जन्म के कर्म इतने बुरे थे कि तुम्हे आज सूली पर चढ़ना था लेकिन तुम्हारे इस जन्म के अच्छे कर्मों ने तुम्हारी सज़ा को घटाकर शूल तक सीमित कर दिया . जबकि इस दुर्जन के पिछले कर्म इतने अच्छे थे कि इसे आज २ लाख का इनाम मिलना था , लेकिन इसके इस जन्म के बुरे कर्मों ने इसके इनाम की राशि को घटाकर २००० कर दिया . यह सुनकर सज्जन पुरुष अपना सारा दर्द भूल गया और उसने शूल को पकड़कर खींच कर निकाल दिया और संतुष्ट भाव से अपने रास्ते चला गया . 



                                                                          २०३४ 

कहने को तो जिंदगी इतनी लम्बी होती है लेकिन ज़वानी कब हाथ से फिसल जाती है , पता ही नहीं चलता . यदि जिंदगी रही तो एक दिन ऐसा रूप होना स्वाभाविक है . 

इसलिये आवश्यक है कि वर्तमान का एक एक दिन भरपूर जीया जाये क्योंकि वर्तमान को ही जीया जा सकता है . भूतकाल अच्छा था या बुरा , वह बीत गया . अब उस पर क्या पछताना ! भविष्य अन्जान और अनिश्चित होता है , हालांकि एक निश्चितता की ओर निश्चित ही बढ़ता है . हमारे वर्तमान के अच्छे कर्म ना सिर्फ वर्तमान को सुधारते हैं , बल्कि अगले जन्म के लिये भी सौभाग्य का आरक्षण कराते हैं .   

नोट : एक पुराने मित्र की ई मेल से प्रेरित . तीसरा फोटो मित्र की मेल से साभार . 

Sunday, May 18, 2014

जब हम रात के अंधेरे मे सुनसान सड़क पर फंस गए थे --- एक संस्मरण !


सन १९८१ की बात है. हम नए नए डॉक्टर बने थे . तभी कुछ मित्रों ने वैष्णों देवी जाने का प्रोग्राम बना लिया . एक चार्टर्ड बस कर मित्र समूह और कुछ अन्य परिवारों से बस भरी और रात के समय हम रवाना हो गए कटरा की ओर . रात मे १४ किलोमीटर की ट्रेकिंग , फिर आइस कोल्ड वाटर मे स्नान कर , भीड़ मे लाइन लगाकर गुफा मे प्रवेश और अंत मे क्या देखा , यह सोचते हुए वापसी , सब कुछ बड़ा एडवेन्चरस और मनोरंजक लगा था . बस मे भी क्योंकि युवाओं की भरमार थी , इसलिये पूरा सफ़र भी मज़ेदार रहा . 

लेकिन वापसी मे विचार बना कि चलो अमृतसर मे स्वर्ण मंदिर होकर आया जाये . शाम ढल चुकी थी , रात का खाना भी नहीं खाया था . प्रोग्राम यही था कि अमृतसर चलकर ही भोजन करेंगे . कटरा से निकलकर जल्दी ही सड़क सुनसान होने लगी थी . धीरे धीरे अंधेरा भी होने लगा था . युवा दिलों ने अंताक्षरी खेलनी शुरू कर दी . भक्ति भावना के बीच थोड़ी मस्ती भावना किसी को भी बुरी नहीं लग रही थी . सभी एन्जॉय कर रहे थे . तभी सरपट दौड़ती बस अचानक एक झटके के साथ रुक गई . उस वक्त रात के करीब ८ बजे थे . बाहर घनघोर अंधकार था . सड़क पर भी कहीं कोई लाइट नहीं थी . दूर दूर तक बस अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा था . ड्राईवर ने नीचे उतरकर चेक किया और बताया कि गाड़ी के इंजिन मे कोई पार्ट टूट गया है जो ठीक नहीं हो सकता . अब सुबह होने पर गेराज को ढूंढा जायेगा . तब तक वहीं रुकना पड़ेगा . 

यह सुनकर सब सकते मे आ गए . हालांकि खाना किसी ने नहीं खाया था , लेकिन सबके पास खाने का समान था . इसलिये खाने की चिंता किसी को नहीं थी . हमने भी उदारता दिखाते हुए सबसे पूछा कि यदि किसी को खाने के लिये कुछ चाहिये तो हमसे ले सकता है . लेकिन किसी को ज़रूरत नहीं थी , इसलिये हम अपना सा मूँह लेकर बैठ गए . आखिर सबने अपना अपना खाना निकाला और भोजन किया . लेकिन फिर जल्दी ही समस्या आई कि अब क्या किया जाये . बाहर ठंड थी , इसलिये गाड़ी के शीशे बंद थे . ऐसे मे लोगों ने सोना शुरू कर दिया . जल्दी ही सारी बस खर्राटों से गूंज रही थी . जिंदगी मे इतने विविध प्रकार के खर्राटे हमने कभी ना सुने थे , ना फिर कभी कही सुने . लेकिन थोड़ी देर बाद अंदर सांस घुटने लगा तो हमने सोचा कि चलो बाहर निकलकर देखते हैं . लेकिन बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी . 

एक तो ठंड , उपर से बारिश और घनघोर अंधेरा. ट्रैफिक भी बिल्कुल नहीं था . बिल्कुल सुनसान सड़क पर आधी रात मे हम समझ नहीं पा रहे थे कि जाएं तो कहाँ जाएं . यह भी नहीं पता था कि आस पास क्या है , है भी या नहीं . थोड़ा डर भी लगने लगा था . हालांकि उस वक्त पंजाब मे डर की कोई बात नहीं थी . किसी तरह तड़प तड़प कर रात गुजारी . सुबह हुई तो पता चला कि हम एक सुनसान इलाके मे खड़े थे जहां दूर दूर तक कोई इंसानी बस्ती नहीं थी . एक ट्रक वाले से पता चला कि वहां से दो किलोमीटर दूर एक ढाबा है जिस पर चाय मिल सकती है . अब तक सबके नक्शे ढीले हो चुके थे . अब हमारे चाय के प्रस्ताव को तुरंत स्वीकार कर लिया गया और हम भी रॉबिन हुड की तरह दिलेर होकर निकल पड़े ढाबे की ओर . हम तीन चार लड़कों ने एक बाल्टी मे चाय भरी , ढाबे मे जितनी भी ब्रेड थी , सभी थैले मे भरी और एक ट्रक मे लिफ्ट लेकर पहुंच गए अपनी बस मे जहां सब बेसब्री से हमारा या यूं कहिये चाय नाश्ते का इंतज़ार कर रहे थे . अब सबने चाय और ब्रेड ऐसे खाई जैसे बरसों के भूखे हों . दिन के ढाई बजे बस ठीक हुई और हम रात के दस बजे अमृतसर पहुंचे . हमारी किस्मत अच्छी थी या ये कहें कि गुरुद्वारे के लोग अच्छे थे , उन्होने हमे बंद होने के बावज़ूद अंदर प्रवेश करने दिया और हम पूरा गोल्डन टेम्पल देख सके . साथ ही हरमिंदर साहब के दर्शन भी कर सके . 

यह समय समय की ही बात होती है कि यही पृथ्वी कभी स्वर्ग , कभी नर्क नज़र आने लगती है . लेकिन स्वर्ग को नर्क मे परिवर्तित करने वाले भी हम ही होते हैं . यदि सौहार्दपूर्वक रहा जाये तो यही पृथ्वी स्वर्ग से कम नहीं है .   





Sunday, May 4, 2014

मेरी किस्मत मे तू ही है शायद ----


बहुत दिनों से कोई हास्य कविता लिखने का समय नहीं मिला ! आज विश्व हास्य दिवस के अवसर पर फ़ेसबुक पर आधारित एक पैरोडी लिखने का प्रयास किया है ! यह अभी तक की दूरी पैरोडी है जो इत्तेफाक़ से फिर से सुरेश वाडकर के गाने पर ही आधारित है : 


मेरी किस्मत मे तू ही है शायद ,
दिन निकलने का इंतज़ार करता हूँ ! 
पहले अपडेट एक बार करता था ,
अब दिन मे तीस बार करता हूँ ! 

आज समझा हूँ लाइक का मतलब ,
आज टिप्पणीयां मैं भेंट करता हूँ ! 
कल मैं ब्लॉग पोस्ट लिखता था ,
आज मैं स्टेटस अपडेट करता हूँ ! -----------

सोचता हूँ के मेरे स्टेटस पर 
क्यों नहीं लगते लाइक के चटके ! 
मैने मांगी थी इक टिप्पणी लेकिन 
पोस्ट पे आये ना कोई भूले भटके ! 

हो ना जाउँ कहीं मैं फेसबुकिया 
इसकी लत पड़ने से डरता हूँ !
पहले अपडेट एक बार करता था ,
अब दिन मे तीस बार करता हूँ ! ----------

दिन गुजरा फ़ेसबुक पे सारा ,
रात आधी लाइक करते करते ! 
कैसे बुलायें पेज पे उनको ,
चैट करते हैं डरते डरते ! 

लत शायद इसी को कहते हैं ,
हर घड़ी बेकरार रहता हूँ !
रात दिन फ़ेसबुक पे कटते हैं , 
घर बार से बेज़ार रहता हूँ ! -----------

मेरी किस्मत मे तू ही है शायद ,
दिन निकलने का इंतज़ार करता हूँ ! 
पहले अपडेट एक बार करता था ,
अब दिन मे तीस बार करता हूँ ! 

Tuesday, April 29, 2014

क्या स्वर्ग या नर्क मे आत्माओं का जमावड़ा है ---एक सवाल !


हाल ही मे हुई एक धार्मिक चर्चा मे शामिल हुए तो कुछ प्रश्न अनुत्तरित रह गए : 

सनातन धर्मानुसार आत्मा अमर है ! आत्मा का पुनर्जन्म होता रहता है जिससे उसका संसार मे आवागमन चलता रहता है ! 
करोड़ों मे से कुछ ही आत्माएं मोक्ष को प्राप्त होती होंगी ! ज़ाहिर है , बाकी सब आत्माएं आती जाती रहती हैं ! 

यदि आत्मा अमर है तो एनेर्जी ( ऊर्जा ) की तरह वह न तो पैदा की जा सकती है , न ही नष्ट हो सकती है ! सिर्फ एक रूप से दूसरे रूप मे परिवर्तित हो सकती है ! 

लेकिन सवाल यह उठता है कि फिर इतनी नई आत्माएं आती कहाँ से हैं ! अकेले हमारे देश मे ही हर वर्ष करीब २ करोड़ लोगों का जन्म होता है ! ये अतिरिक्त आत्माएं कहाँ से आती हैं ? 
दूसरे , स्विड्न और स्पेन जैसे देशों मे , जहां जनसंख्या की वृद्धि दर शून्य से भी कम है , यानि जितने लोग मरते हैं , उनसे कम पैदा होते हैं , वहां की आत्माएं कहाँ जाती हैं ? 
यदि सभी देशों का लेखा जोखा भी मिला दिया जाये तो भी सच यही निकलता है कि पूरे संसार मे जनसंख्या बढ़ रही है ! 
फिर ये आत्माएं कहाँ से आती हैं ? 
क्या स्वर्ग या नर्क मे आत्माओं का जमावड़ा है , जहां से समय समय पर भगवान जी छटनी कर आत्माओं को पृथ्वी पर भेजते रहते हैं ? 

क्या है इन सवालों का ज़वाब ?

Saturday, April 12, 2014

कोई जीते या हारे, हमने अपना फ़र्ज़ पूर्णतया सौहार्दपूर्ण वातावरण मे पूर्णतया पूर्ण कर दिया ....


पिछले आम चुनाव मे हम वोट डालने से वंचित रह गए थे . लेकिन कुछ महीने पहले हुए दिल्ली के विधान सभा चुनाव मे लोगों का उत्साह देखकर हम भी आश्वस्त हो गए थे कि अब घर बैठे रहने का समय नहीं रहा . और कुछ हो ना हो , 'आप' के चुनावी मैदान मे आने से दिल्ली और सम्पूर्ण देश मे चुनावों मे वोटों की % संख्या तो निश्चित ही बढ़ गई है . इसलिये इस बार हमने भी द्रढ निश्चय और पक्का इरादा बना लिया था कि अपने मताधिकार का पूर्ण उपयोग करेंगे . 

लेकिन एक छोटी सी समस्या आ रही थी कि वोट किसे दिया जाये . क्या पार्टी के नाम पर वोट दें , या पी एम उम्मीदवार के नाम पर . या फिर व्यक्ति विशेष के गुणों के आधार पर वोट दी जाये . इस बार सवाल ज़रा कठिन सा लग रहा था . आखिर देश के भविष्य का सवाल था . देश को चलाने के लिये एक स्थायी सरकार चाहिये , एक योग्य प्रधान मंत्री और उनकी पार्टी को पूर्ण बहुमत चाहिये . लेकिन हमारे इकलौते वोट से तो हार जीत का फैसला होना नहीं था . उस पर श्रीमती जी का भी पता नहीं था कि किसे वोट देंगी . अब डर यही था कि यदि हम दोनो ने अलग अलग वोट दिये तो दोनो की वोट ही आपस मे कट जाएंगी . 

जब श्रीमती जी से हमने इसका ज़िक्र किया तो उन्होने मानव अधिकारों का हवाला देते हुए कहा कि अपनी मर्ज़ी से वोट देने का अधिकार उन्हे भी प्राप्त है . आखिर स्वतंत्र भारत मे उन्हे भी तो यह स्वतंत्रता होनी चाहिये कि वो अपनी पसंद के उम्मीदवार को वोट दे सकें . हमने कहा भाग्यवान , आपको पूर्ण अधिकार है लेकिन हम तो बस यह कह रहे थे कि कृपया आप हमारी वोट ना काटें . यह तभी संभव है जब आप उन्ही को वोट दें जिन्हे हम चाहते हैं . और क्योंकि उन्होने स्वयं अभी तक यह निर्णय नहीं लिया था कि किसे वोट दें , इसलिये बेहतर तो यही था कि हमारी बात मान लें . 

वैसे हमने भी जिंदगी मे कई चुनाव लड़े हैं और लड़वाये भी हैं . इसलिये वोट मांगने का अनुभव हमे भी बहुत रहा है . लेकिन पत्नी से वोट मांगना वास्तव मे बड़ा मुश्किल और एक चुनौतीपूर्ण काम था . फिर भी , हमने अपने सारे अनुभव का उपयोग करते हुए और घर मे ही चुनाव प्रचार करते हुए आखिर श्रीमती जी को मना ही लिया कि वो हमारे कहे अनुसार ही वोट देंगी . सरकार ने चुनावी दिन को छुट्टी का दिन घोषित कर दिया था , लेकिन उसे छुट्टी मे परिवर्तित करना हमारे हाथ मे था . इसलिये हमने निर्णय लिया कि सुबह सैर करने के पश्चात ७ बजे मतदान केन्द्र खुलते ही सबसे पहले वोट डालकर हम निवृत हो जायेंगे . वैसे भी यह आवश्यक नहीं कि नहा धोकर ही वोट डाली जा सकती थी . लेकिन केन्द्र पर जाकर देखा कि हमारे पड़ोसी तो हमसे भी पहले वोट डाल कर जा चुके थे . फिर भी , वोट डालकर ९ बजे तक हमने भी अपनी स्याही सुसज्जित उंगली का फोटो फ़ेसबुक के कहने पर फ़ेसबुक पर डाल कर अपनी देशभक्ति की अमिट छाप अंकित करा दी . 
अब कोई जीते या हारे, हमने अपना फ़र्ज़ पूर्णतया सौहार्दपूर्ण वातावरण मे पूर्णतया पूर्ण कर दिया

Sunday, April 6, 2014

कुछ रिश्तों का कोई नाम नहीं होता -- भूली बिसरी यादें ...


तब हम नए नए डॉक्टर बने थे . ऊर्जा , जोश और ज़वानी के उत्साह से भरपूर दिल , दिमाग और शरीर मे जैसे विद्युत धारा सी प्रवाह करती थी . काम भी तत्परता से करते थे . सीखने की भी तमन्ना रहती थी . उन दिनों ६ महीने का पहला जॉब सर्जरी डिपार्टमेंट मे किया था . सप्ताह मे दो दिन ओ पी डी होती थी, दो दिन वार्ड मे काम और दो दिन ओ टी जाना होता था . ऐसी ही किसी एक ओ पी डी मे एक दिन एक युवा लड़की अपनी मां के साथ दिखाने आई . सांवली सलोनी सी , घबराई सी , उम्र यही कोई १८ वर्ष . सिख परिवार से थी . उसके एक स्तन मे गांठ थी जिसके उपचार के लिये आई थी . हमने उसे एग्जामिनेशन रूम मे जाकर स्तन दिखाने के लिये कहा तो वह रोने लगी . हालांकि साथ ही उसकी माँ भी खड़ी थी और एकांत का भी पूरा ध्यान रखा गया था , लेकिन लड़की थी कि कपड़े हटाने को तैयार ही नहीं थी . ऐसे मे किसी भी डॉक्टर को गुस्सा आ सकता था क्योंकि ओ पी डी मे भीड़ बहुत थी और एक एक मिनट कीमती था . 

लेकिन समझा बुझा कर आश्वस्त करने की पूरी कोशिश के बावज़ूद भी जब उसने रोना बंद नहीं किया तो हमे जाने क्यों उससे सहानुभूति सी हुई . हमने उसे वहीं रुकने के लिये कहा और बाहर आकर अपने सीनियर कन्सल्टेंट को सारी बात बताई और उनसे अनुरोध किया कि वो खुद लड़की को देख लें . सफेद बालों वाले कन्सल्टेंट लगभग बुजुर्ग से थे और शक्ल से भी शरीफ दिखते थे . उन्होने उसका मुआयना किया और उसे आपरेशन के लिये भर्ती कर लिया . आपरेशन सही सलामत हो गया और जैसा कि अनुमान था , कोई गंभीर रोग भी नहीं निकला 


लेकिन जाने क्या हुआ कि उसके बाद ना सिर्फ वो लड़की बल्कि उसका सारा परिवार हमारा भक्त सा बन गया . लड़की ने तो किसी और डॉक्टर को हाथ लगाने से भी मना कर दिया . अब उसकी सारी देखभाल हमे ही करनी पड़ रही थी . अन्तत : पूर्णतया ठीक होने पर उसे छुट्टी दे दी गई . लेकिन उसके बाद फॉलोअप मे वह हमारे पास ही आती रही और उसका पूरा परिवार भी आत्मीयता दिखाता रहा . ऐसा लगता था जैसे वे हमारे एक सामान्य से व्यवहार से बहुत प्रभावित हुए थे . 

१३ अप्रैल १९८४ को हमारी शादी हो गई . फिर भी यदा कदा उनका आना जाना चलता रहा था हालांकि अब हम भी काम मे बहुत व्यस्त हो गए थे . फिर ३१ अक्टूबर १९८४ को सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए . उसके बाद उसकी और उनके परिवार की हमे कभी कोई खबर नहीं मिली . आज भी जब कभी याद आ जाती है तो उसका मासूम सा चेहरा आँखों के सामने आ जाता है . राम जाने ---

Tuesday, March 25, 2014

एक जंगल ऐसा जहां शेर खुले मे और इंसान पिंजरे मे बंद होते हैं ---


दिल्ली जैसे शहर मे रहते हुए ऐसा लगता है जैसे हम कंक्रीट जंगल मे रह रहे हैं . इसलिये अक्सर शहरी लोग जंगल भ्रमण का आनंद लेने के लिये असली जंगलों की ओर अग्रसर होते हैं . हम भी कई जंगलों की खाक छान चुके हैं , इस उम्मीद मे कि कहीं कोई जंगली जानवर अपने क्षेत्र मे स्वतंत्र विचरण करता हुआ नज़र आ जाये . लेकिन तेंदुए को छोड और कोई जानवर आज तक नज़र नहीं अया , जबकि वह तो यूँ भी कई बार शहरों मे घुस कर खलबली मचा देता है .   

अपनी बैंगलोर यात्रा के दौरान हमे पता चला कि वहां भी शहर से मात्र २५ किलोमीटर दूर एक जंगल है जहाँ जंगली जानवर देखे जा सकते हैं . हालांकि उम्मीद कम ही थी, फिर भी एक और जंगल देखने का प्रलोभन हम छोड नहीं सके .  


प्रवेश टिकेट मे वहां बने चिडियाघर का प्रवेश भी शामिल था . इसलिये सभी पहले वहां जा रहे थे . हमने भी सोचा कि चलो पहले यहीं शेर देख लें ताकि जंगल मे निराश ना होना पड़े . 




लेकिन बिग केट्स के रूप मे यहां बस ये तेंदुए ही मिले . इनके अलावा कुछ मगरमच्छ, एक शतुर्मुर्ग और अनेक बेबी कछुए देखकर कुछ संतोष मिला .  




जंगल सफ़ारी के लिये करीब २० से ज्यादा हरे रंग की बसें लाइन मे लगी थी . खिड़कियों मे जाली लगाई गई थी . हमने सोचा , अवश्य ही यहाँ शेर नज़र आयेंगे . शायद इसीलिये सुरक्षा का पूरा इंतज़ाम किया गया है . 





जंगल मे घुसते ही सबसे पहले हमेशा की तरह ये चीतल हिरण नज़र आये . हालांकि यह संभावित ही था क्योंकि ये हिरण सभी जगह दिख जाते हैं . लेकिन सड़क किनारे ही पानी का प्रबन्ध किया गया था जिससे कि लोगों को इंतज़ार ना करना पड़े . 




लेकिन जल्दी ही हाथियों का एक बड़ा झुंड देखकर रोमांच महसूस हुआ और लगा कि ये सफ़ारी तो बहुत लाभदयक सिद्ध होने वाली है . फिर ध्यान से देखा तो पाया कि सभी हाथियों को चेन से बांधा गया था . यानि आँखों को धोखा दिया गया था . अब तो हमे कुछ कुछ आभास होने लगा था कि आगे क्या होने वाला है . 




तभी सामने एक गेट नज़र आया जिस पर लिखा था -- भालू . यानि अब हम भालू के बाड़े मे जा रहे थे . फिर जल्दी ही हमे एक भालू सड़क पर टहलता नज़र आ गया . देखने मे तो यही लगा जैसे हम अफ्रिका के जंगलों मे घूम रहे हैं . 

अब तक हम समझ चुके थे कि दरअसल हम एक बड़ी ज़ू मे गाड़ी मे बैठकर घूम रहे थे . फर्क बस इतना था कि यहाँ हम गाड़ी मे जालियों के पीछे बैठे थे और जंगली जानवर आराम से खुले मे विचरण कर रहे थे . 




फिर भी इन बब्बर शेरों को खुले मे यूँ इतने पास से देखना और फोटो खींचना एक सुखद और रोमांचक अहसास था . 




अगला बाड़ा टाईगर यानि बाघ का था . हालांकि यह बेचारा सुस्त और बीमार सा लग राहा था . 




यह सफ़ेद टाईगर शायद बच्चा था . लगा जैसे भूखा था और खाने का इंतज़ार कर रहा था . इसलिये अपने भोजनालय के आस पास ही चक्कर लगा रहा था . 




एक अकेला बन्दर मनुष्यों की बस्ती के आस पास खाना ढूंढ रहा था . यहाँ आम के पेड थे जिन पर कच्चे आम लगे थे . 

जंगल मे स्वछंद विचरण करते जंगली जानवरों को इंसानों को दिखाने का यह तरीका हमे भी पसंद आया . यहाँ अलग अलग प्रजाति के जानवरों के लिये अलग अलग बड़े बड़े बाड़े बनाये गए थे . एक तरह से सब के लिये अलग अलग फार्म हॉउस से बने थे . उनके डाइनिंग हॉल भी सड़क के पास ही बनाये गए थे ताकि बस मे बैठे लोगों के लिये इनका दर्शन सुनिश्चित हो सके . लेकिन लगभग सभी जानवर सुस्त से लग रहे थे जैसे उन्हे हल्का नशा हो . एक टाईगर तो बीमार सा ही लग रहा था . निश्चित ही ये जानवर चिड़ियाघर के जानवरों की अपेक्षा ज्यादा सुखी रहे होंगे क्योंकि यहाँ इनको खाने के साथ साथ विचरण के लिये प्राकृतिक वातावरण मिल रहा था . हालांकि मुफ्त का खाना खाकर ये निकम्मे तो अवश्य हो गए होंगे और इनकी शिकार करने की स्वाभाविक प्रवृति कुंठित हो गई होगी . 



सफ़ारी के अंत मे यह एक छोटी सी जंगली झील फोटो मे ज्यादा सुन्दर दिख रही है जैसे एक साधारण सी लोकेशन भी फिल्मों मे बड़ी सुन्दर दिखाई देती है . कुल मिलाकर यही लगा कि यह सफ़ारी लोगों को जंगली जानवरों को समीप से बेखौफ़ देखने के लिये एक अच्छा अवसर प्रदान करती है .