भाई तिलक राज कपूर जी का लेख पढ़कर ग़ज़ल लिखना सीखने का प्रयास किया है । इस में मत्ला और मक्ता सहित सिर्फ पांच शेर (अश`आर ) कहे हैं । इसमें काफिया --आत है जैसे गात , रात , बात आदि । रदीफ़ है --नहीं आती । पहले शेर यानि मत्ला में काफिया और रदीफ़ दोनों मिसरों (पंक्तियाँ ) में हैं । बाकि में सिर्फ दूसरे मिसरा में । सभी शेर स्वतंत्र हैं । इसलिए इसे ग़ज़ल ही कहेंगे ।
पसीने की गंध गात नहीं आती
नींद उनको सारी रात नहीं आती ।
वो काम करते नहीं जब तलक
काम के बदले सौगात नहीं आती ।
क्या बताऊँ उनको मैं जात अपनी
सिवा इंसानियत कोई जात नहीं आती ।
नेता हम भी बन जाते लेकिन
सच को छोड़ बात नहीं आती ।
ज़ज्बा लड़ने का बहुत है `तारीफ`
शैतान को देनी मात नहीं आती ।
अब यह प्रयास कैसा रहा , यह तो ग़ज़ल के जानकार ही बता सकते हैं । आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा ।
Thursday, June 10, 2010
Monday, June 7, 2010
कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे ---एक शाम वरिष्ठ कवि गोपाल दास नीरज जी के साथ ---
२८ मई को दिल्ली के हिंदी भवन में सुप्रसिद्ध वरिष्ठ कवि एवम गीतकार श्री गोपाल दास नीरज का एकल काव्य पाठ सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । ८६ वर्ष की आयु में भी नीरज जी का कविता के प्रति उत्साह देखकर दंग रह जाना पड़ा ।
उनके लिखे गीत हिंदी फिल्मो में अपनी धूम मचा चुके हैं ।
१९६५ में बनी फिल्म --नई उम्र की नई फसल --में मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाया गया ये गाना आज भी जब मैं सुनता हूँ तो रोमांचित हो उठता हूँ ---
स्वपन झरे फूल से
मीत चुभे शूल से
लुट गए श्रृंगार सभी
बाग़ के बबूल से
और हम खड़े खड़े --बहार देखते रहे
कारवां गुजर गया , गुबार देखते रहे ।
एक छोटी सी मुलाकात नीरज जी के साथ --

काव्य पाठ शुरू हुआ और चलता रहा , चलता रहा । एक के बाद एक , एक से बढ़कर एक कवितायेँ , गीत और दोहे सुनाकर नीरज जी ने सब का मन मोह लिया ।
कुछ नमूने --
तन से भारी सांस है , इसे जान लो खूब
मुर्दा जल में तैरता , जिन्दा जाता डूब ।
ज्ञानी हो फिर भी न कर , दुर्जन संग निवास
सर्प सर्प है भले ही , मणि हो उसके पास ।
कभी कभी कवि सीधे सादे शब्दों में कितनी बड़ी बात कह जाते हैं , इसका एक उदाहरण देखिये --
जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा
जितना भारी बक्सा होगा
उतना तू हैरान रहेगा ।
अब सफ़र रेल का हो या जिंदगी का , दोनों पर यह बात लागू होती है ।
आपके लिए ये वीडियो भी है । सुनिए और आनंद लीजिये ।
तो कैसी रही यह काव्य संध्या ?
उनके लिखे गीत हिंदी फिल्मो में अपनी धूम मचा चुके हैं ।
१९६५ में बनी फिल्म --नई उम्र की नई फसल --में मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाया गया ये गाना आज भी जब मैं सुनता हूँ तो रोमांचित हो उठता हूँ ---
स्वपन झरे फूल से
मीत चुभे शूल से
लुट गए श्रृंगार सभी
बाग़ के बबूल से
और हम खड़े खड़े --बहार देखते रहे
कारवां गुजर गया , गुबार देखते रहे ।
काव्य पाठ शुरू हुआ और चलता रहा , चलता रहा । एक के बाद एक , एक से बढ़कर एक कवितायेँ , गीत और दोहे सुनाकर नीरज जी ने सब का मन मोह लिया ।
तन से भारी सांस है , इसे जान लो खूब
मुर्दा जल में तैरता , जिन्दा जाता डूब ।
ज्ञानी हो फिर भी न कर , दुर्जन संग निवास
सर्प सर्प है भले ही , मणि हो उसके पास ।
कभी कभी कवि सीधे सादे शब्दों में कितनी बड़ी बात कह जाते हैं , इसका एक उदाहरण देखिये --
जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा
जितना भारी बक्सा होगा
उतना तू हैरान रहेगा ।
अब सफ़र रेल का हो या जिंदगी का , दोनों पर यह बात लागू होती है ।
आपके लिए ये वीडियो भी है । सुनिए और आनंद लीजिये ।
तो कैसी रही यह काव्य संध्या ?
Thursday, June 3, 2010
दिल्ली की गर्मी और बब्बे का चमत्कार ---
गर्मियों के दिन । दिल्ली की भीषण गर्मी । ऐसे में यदि बिजली भी गुल हो जाये तो फिर सब भगवान भरोसे ।
बचपन में जब गाँव में रहते थे तो उन दिनों बिजली भी नहीं होती थी । जेठ की तपती रातों में गरमागर्म लू के थपेड़े, घर के आँगन में बिछी चारपाई से टकराते , तो लगता जैसे किसी भट्टी के आगे लेटे हैं । लेकिन किसी दिन हवा भी चलनी बंद हो जाती थी तो मारे गर्मी के बुरा हाल हो जाता था । हाथ से पंखा झलते झलते कभी नींद आती भी तो कुछ ही पल में खुल जाती ।
ऐसे में सब उठ कर बैठ जाते और हमारे दादाजी कहते --चलो सब मिलकर बब्बे बोलना शुरू करते हैं । इससे हवा चलने लगेगी। अब आप सोच रहे होंगे कि ये बब्बे क्या बला है ।
बब्बे का मतलब होता है या यूँ कहिये कि होता था --बारह पेड़ पौधों के नाम लेना , जिनका नाम `ब` से शुरू होता हो । जैसे --बड़ , बरगद , बेर , बांस ---इत्यादि ।
यदि आपने बारह के बारह याद कर लिए तो हवा चलने लगेगी, ऐसा विश्वास होता था ।
अब यह तो याद नहीं कि हवा चलती थी भी या नहीं लेकिन सब बच्चे इस खेल में इतना खो जाते थे कि गर्मी के बारे में भूल ही जाते थे । फिर कभी न कभी तो हवा चलती ही थी ।
शायद यह उनका मेडिटेशन का ही एक तरीका था , गर्मी से ध्यान हटाने के लिए ।
आज जब बिजली चली जाती है , या वैसे भी गर्मी से त्रस्त होकर हम तो बब्बे ही पढने लगते हैं , लेकिन आधुनिक रूप में । जी हाँ , हमें जब गर्मी सताती है तो हम याद करने लगते हैं , पहाड़ों की हसीं वादियों को , जहाँ हम कभी हो कर आये थे ।
और सच मानिये , कुछ देर के लिए ही सही , गर्मी का अहसास ख़त्म सा हो जाता है ।
तो चलिए आज आपको ले चलते हैं --दार्जिलिंग , गंगटोक और मनाली की सैर पर ।
सिर्फ चित्र देखिये और ठंडक की अनुभूति कीजिये ----
दार्जिलिंग में स्टर्लिंग रिजोर्ट्स के बाहर अपने एक मित्र के साथ ।
दूर हिमालय की कंचनजंगा चोटियाँ नज़र आती हैं लेकिन बादलों ने सब ढक दिया है ।
दार्जिलिंग शहर में तो कुछ खास मज़ा नहीं आया लेकिन शहर के बाहर की हरियाली ने मन मोह लिया ।
चाय बागानों के बीच से होकर काफी नीचे उतरकर यह झरना बड़ा मनमोहक लग रहा था ।
नेपाल सीमा के पास यह झील इतनी खूबसूरत है कि बस यहीं बस जाने को जी चाहता है ।
इसी घोड़े पर बैठकर हमने झील का आधा चक्कर लगाया । लेकिन इसका मालिक क्या घास लेने गया है ?
और सिक्किम की यह झील शायद सबसे उंचाई पर बनी झीलों में से एक है । यह गैंगटोक से भारत चीन सीमा पर बने नाथुला पास जाने वाले रास्ते पर बिल्कुल सुनसान जगह पर है । इसकी छटा देखने लायक है ।
गैंगटोक में होटल के बाहर से सूर्योदय के समय कंचनजंगा का नज़ारा ।
मनाली
सोलंग वैली जहाँ अब पैराग्लाइडिंग कराई जाती है ।
एक बार आजमाने में क्या हर्ज़ है ? कैसा लगता होगा हवा में पक्षियों की तरह उड़ना ?
उम्मीद है कि अब तक आपकी गर्मी उड़नछू हो गई होगी ।
तो अब दीजिये एक सवाल का ज़वाब ---
यहाँ दिखाई गई इन दो झीलों के नाम क्या हैं ?
सही बताने वाले का इनाम --एक शाम हमारे टीचर्स के साथ CSOI में ।
नोट : पिछली पोस्ट में आधे सूखे आधे हरे पेड़ की लोकेशन --एलिफेंटा केवज, मुंबई --सही बताकर इनाम के हकदार बने हैं श्री गोदियाल जी और श्री समीर लाल जी ।
बचपन में जब गाँव में रहते थे तो उन दिनों बिजली भी नहीं होती थी । जेठ की तपती रातों में गरमागर्म लू के थपेड़े, घर के आँगन में बिछी चारपाई से टकराते , तो लगता जैसे किसी भट्टी के आगे लेटे हैं । लेकिन किसी दिन हवा भी चलनी बंद हो जाती थी तो मारे गर्मी के बुरा हाल हो जाता था । हाथ से पंखा झलते झलते कभी नींद आती भी तो कुछ ही पल में खुल जाती ।
ऐसे में सब उठ कर बैठ जाते और हमारे दादाजी कहते --चलो सब मिलकर बब्बे बोलना शुरू करते हैं । इससे हवा चलने लगेगी। अब आप सोच रहे होंगे कि ये बब्बे क्या बला है ।
बब्बे का मतलब होता है या यूँ कहिये कि होता था --बारह पेड़ पौधों के नाम लेना , जिनका नाम `ब` से शुरू होता हो । जैसे --बड़ , बरगद , बेर , बांस ---इत्यादि ।
यदि आपने बारह के बारह याद कर लिए तो हवा चलने लगेगी, ऐसा विश्वास होता था ।
अब यह तो याद नहीं कि हवा चलती थी भी या नहीं लेकिन सब बच्चे इस खेल में इतना खो जाते थे कि गर्मी के बारे में भूल ही जाते थे । फिर कभी न कभी तो हवा चलती ही थी ।
शायद यह उनका मेडिटेशन का ही एक तरीका था , गर्मी से ध्यान हटाने के लिए ।
आज जब बिजली चली जाती है , या वैसे भी गर्मी से त्रस्त होकर हम तो बब्बे ही पढने लगते हैं , लेकिन आधुनिक रूप में । जी हाँ , हमें जब गर्मी सताती है तो हम याद करने लगते हैं , पहाड़ों की हसीं वादियों को , जहाँ हम कभी हो कर आये थे ।
और सच मानिये , कुछ देर के लिए ही सही , गर्मी का अहसास ख़त्म सा हो जाता है ।
तो चलिए आज आपको ले चलते हैं --दार्जिलिंग , गंगटोक और मनाली की सैर पर ।
सिर्फ चित्र देखिये और ठंडक की अनुभूति कीजिये ----
दार्जिलिंग में स्टर्लिंग रिजोर्ट्स के बाहर अपने एक मित्र के साथ ।
दूर हिमालय की कंचनजंगा चोटियाँ नज़र आती हैं लेकिन बादलों ने सब ढक दिया है ।
दार्जिलिंग शहर में तो कुछ खास मज़ा नहीं आया लेकिन शहर के बाहर की हरियाली ने मन मोह लिया ।
चाय बागानों के बीच से होकर काफी नीचे उतरकर यह झरना बड़ा मनमोहक लग रहा था ।
नेपाल सीमा के पास यह झील इतनी खूबसूरत है कि बस यहीं बस जाने को जी चाहता है ।
इसी घोड़े पर बैठकर हमने झील का आधा चक्कर लगाया । लेकिन इसका मालिक क्या घास लेने गया है ?
और सिक्किम की यह झील शायद सबसे उंचाई पर बनी झीलों में से एक है । यह गैंगटोक से भारत चीन सीमा पर बने नाथुला पास जाने वाले रास्ते पर बिल्कुल सुनसान जगह पर है । इसकी छटा देखने लायक है ।
गैंगटोक में होटल के बाहर से सूर्योदय के समय कंचनजंगा का नज़ारा । मनाली
सोलंग वैली जहाँ अब पैराग्लाइडिंग कराई जाती है ।
एक बार आजमाने में क्या हर्ज़ है ? कैसा लगता होगा हवा में पक्षियों की तरह उड़ना ? उम्मीद है कि अब तक आपकी गर्मी उड़नछू हो गई होगी ।
तो अब दीजिये एक सवाल का ज़वाब ---
यहाँ दिखाई गई इन दो झीलों के नाम क्या हैं ?
सही बताने वाले का इनाम --एक शाम हमारे टीचर्स के साथ CSOI में ।
नोट : पिछली पोस्ट में आधे सूखे आधे हरे पेड़ की लोकेशन --एलिफेंटा केवज, मुंबई --सही बताकर इनाम के हकदार बने हैं श्री गोदियाल जी और श्री समीर लाल जी ।
Monday, May 31, 2010
क्या करूँ कंट्रोल नही होता ---विश्व तम्बाकू रहित दिवस पर एक रचना ----
क्या करूँ कंट्रोल नही होता ---
तम्बाकू और धूम्रपान से सम्बंधित कुछ तथ्य :-
* सबसे पहले कोलंबस ने १४९२ में दक्षिण अमेरिका के निवासियों को धूम्रपान करते देखा था।
*भारत में इसका सेवन १६ वीं शताब्दी में शुरू हुआ।
*विश्व में ११० करोड़ लोग धूम्रपान करते हैं।
*विश्व में प्रतिवर्ष ५०,००० करोड़ सिग्रेट और ८००० करोड़ बीडियाँ फूंकी जाती हैं।
*धूम्रपान से हर ८ सेकंड में एक व्यक्ति की म्रत्यु हो जाती है।
* ५० लाख लोग हर साल अकाल काल के गाल में समां जाते हैं।
*सिग्रेट के धुएं में ४००० से अधिक हानिकारक तत्व और ४० से अधिक कैंसर उत्त्पन करने वाले पदार्थ होते हैं।
*भारत में ४०% पुरूष और ३% महिलायें धूम्रपान करती हैं।
*भारत में मुहँ का कैंसर विश्व में सबसे अधिक पाया जाता है और ९०% तम्बाकू चबाने से होता है।
धूम्रपान और तम्बाकू से होने वाली हानियाँ :-
*हृदयाघात, उच्च रक्त चाप, कोलेस्ट्रोल का बढ़ना, तोंद निकलना, मधुमेह , गुर्दों पर दुष्प्रभाव ।
*स्वास रोग _ टी बी , दमा, फेफडों का कैंसर ,गले का कैंसर आदि।
* पान मसाला और गुटखा खाने से मुहँ में सफ़ेद दाग, और कैं सर होने की अत्याधिक संभावना बढ़ जाती है।
लोग धूम्रपान करते क्यों हैं?
कहते हैं पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए । वैसे तो ये बात शराब के लिए कही गई है लेकिन बीड़ी सिग्रेट पर भी उतनी ही लागू होती है । लोग कैसी कैसी हालातों में भी धूम्रपान करते हैं और क्या क्या बहाने बनाते हैं , ज़रा देखिये इस हास्य -व्यंग कविता में ।
अस्पताल के प्रांगण में
ओ पी डी के आँगन में
जेठ की धूप में जले, पेड़ तले
कुछ लोग आराम कर रहे थे ।
करना मना है , फिर भी मजे से धूम्रपान कर रहे थे ।
एक बूढ़े संग बैठा उसका ज़वान बेटा था
बूढा बेंच पर इत्मीनान से लेटा था ।
साँस भले ही धोंकनी सी चल रही थी
मूंह में फिर भी बीड़ी जल रही थी ।
बेटा भी बार बार पान थूक रहा था
बैठा बैठा वो भी सिग्रेट फूंक रहा था ।
एक बूढा तो बैठा बैठा भी हांफ रहा था
साथ बैठी बुढिया को जोर जोर से डांट रहा था ।
हांफते हांफते डांटते डांटते जैसे ही उसको खांसी आई
उसने भी जेब से निकाल, तुरंत बीड़ी सुलगाई।
मैंने कहा बाबा , अस्पताल में बीड़ी पी रहे हो
चालान कट जायेगा
वो बोला बेटा , गर बीड़ी नहीं पी
तो मेरा तो दम ही घुट जायेगा ।
डॉ ने कहा है -
सुबह शाम पार्क की सैर किया करो
खड़े होकर लम्बी लम्बी साँस लिया करो ।
लम्बे लम्बे कश लेकर वही काम कर रहा हूँ ।
खड़ा खड़ा थक गया था , लेटकर आराम कर रहा हूँ ।
मैंने बेटे से कहा --भाई तुम तो युवा शक्ति के चीते हो
फिर भला सिग्रेट क्यों पीते हो ?
वो बोला बाबा की बीमारी से डर रहा हूँ
सिग्रेट पीकर टेंशन कम कर रहा हूँ ।
मैंने कहा भैये -टेंशन के चक्कर में मत पालो हाइपर्तेन्शन
वर्ना समय से पहले ही लेनी पड़ जाएगी फैमिली पेंशन ।
एक बोला मुझे तो बीडी बिलकुल भी नहीं भाती है
पर क्या करूँ इसके बिना टॉयलेट ही नहीं आती है ।
दूसरा बोला सर मैं तो रात में पीता हूँ जब पत्नी और सास सो जाती है
एक दो सिगरेट पी लेता हूँ तो गैस पास हो जाती है ।
एक युवक गोल गोल हवा में धुएं के छल्ले बना रहा था
वो लड़का होने की ख़ुशी में खुशियाँ मना रहा था ।
कुछ लोग ग़म में पीते हैं , कुछ पीकर ख़ुशी मनाते हैं ।
कुछ लोग दम भर पीते हैं , फिर दमे से छटपटाते हैं ।
उड़ाकर बीडी सिगरेट के धुएं का ज़हर
अपनी और पूरे परिवार की जिंदगी , दांव पर लगाते हैं ।
ये धूम्रपान की आदत , आसानी से कहाँ जा पाती है
पहले सिग्रेट हम पीते हैं , फिर सिग्रेट हमें खा जाती है ।
दोस्तों धूम्रपान छोड़ने के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है।
जरा सोचिये , बड़े बड़े शहरों में जहाँ बहुत सा धुआं हम पहले ही साँस के साथ खींचते हैं, फ़िर भला सिग्रेट के धुएं की कहाँ जरूरत रह जाती है। एक बार छोड़ कर देखिये , आप कितना परिवर्तन महसूस करेंगे अपनी जिंदगी में।
Friday, May 28, 2010
कभी कभी प्रकृति भी पक्षपात कर जाती है ---
हमारा देश एक विशाल देश है। यहाँ जितनी विविधताएँ और अनेकतायें देखने को मिलती हैं , उतनी शायद कहीं और नहीं मिलेंगी। उत्तर में हिमालय पर्वत श्रंखला , दक्षिण में कन्याकुमारी में मिलते तीन तीन सागर , पश्चिम में सूखा रेगिस्तान और पूर्व में सबसे अधिक बारिस वाला क्षेत्र ।
इसीलिए हमारा देश पर्यटकों के लिए स्वर्ग समान है ।
लेकिन यही हाल आम जिंदगी में भी देखने को मिलता है ।
फर्क बस इतना है कि इस विविधता से स्वर्ग के साथ नर्क के भी यहाँ होने का अहसास होता है ।
कहीं जगमगाते शहर हैं , तो कहीं अँधेरे में डूबे झोंपड़ पट्टी वाले सूखे से गाँव ।
शहरों में भी ऊंची ऊंची आलीशान कोठियों की छाया में बसी झोंपड़ियाँ ।
कुछ इतने अमीर कि पूरा शहर खरीद लें , कुछ इतने गरीब कि एक रोटी भी नसीब नहीं ।
कहीं डिस्को पर थिरकते नौजवान , तो कहीं ३५ की उम्र में बूढ़े लगने वाले खों खों करते बीमार ।
कहीं मंदिर, मस्जिद , गुरूद्वारे और गिरिजाघर में भक्तजन तो कहीं छोटी छोटी कोठरियों में देह व्यापार करती बालाएं।
कोई मदर टेरेसा , महात्मा गाँधी , या विनोबा भावे सा सच्चा समाज सेवक , तो कोई देश को घुन और दीमक की तरह चट कर जाने वाला भृष्ट देशद्रोही ।
ये सब यहाँ एक साथ नज़र आते हैं ।
इनमे से ज्यादातर मानव निर्मित कुंठाएं हैं । हालाँकि , कुछ प्रकृति की भी देन हैं । यह जानकर आश्चर्य होता है कि कभी कभी प्रकृति भी पक्षपात कर जाती है।
अब इस नीचे वाले चित्र को ही देखिये । एक ही पेड़ का आधा भाग हरा , और आधा सूखा । यह तो ऐसा हो गया जैसे दो भाइयों में एक अमीर और दूसरा गरीब । यानि प्रकृति में भी दोहरे मांप दंड !
यह चित्र मैंने १९९४ में लिया था । इसमें दूर क्षितिज के पास समुद्र का पानी नज़र आ रहा है । बीच में घनी हरियाली । और यह पेड़ एक पहाड़ी पर था । यहाँ देश विदेश से रोज सैंकड़ों पर्यटक घूमने आते हैं । यह स्थान समुद्र के बीच में है ।
क्या आप बता सकते हैं इस जगह का नाम ? और इस वृक्ष की ऐसी दशा क्यों है ?
इसीलिए हमारा देश पर्यटकों के लिए स्वर्ग समान है ।
लेकिन यही हाल आम जिंदगी में भी देखने को मिलता है ।
फर्क बस इतना है कि इस विविधता से स्वर्ग के साथ नर्क के भी यहाँ होने का अहसास होता है ।
कहीं जगमगाते शहर हैं , तो कहीं अँधेरे में डूबे झोंपड़ पट्टी वाले सूखे से गाँव ।
शहरों में भी ऊंची ऊंची आलीशान कोठियों की छाया में बसी झोंपड़ियाँ ।
कुछ इतने अमीर कि पूरा शहर खरीद लें , कुछ इतने गरीब कि एक रोटी भी नसीब नहीं ।
कहीं डिस्को पर थिरकते नौजवान , तो कहीं ३५ की उम्र में बूढ़े लगने वाले खों खों करते बीमार ।
कहीं मंदिर, मस्जिद , गुरूद्वारे और गिरिजाघर में भक्तजन तो कहीं छोटी छोटी कोठरियों में देह व्यापार करती बालाएं।
कोई मदर टेरेसा , महात्मा गाँधी , या विनोबा भावे सा सच्चा समाज सेवक , तो कोई देश को घुन और दीमक की तरह चट कर जाने वाला भृष्ट देशद्रोही ।
ये सब यहाँ एक साथ नज़र आते हैं ।
इनमे से ज्यादातर मानव निर्मित कुंठाएं हैं । हालाँकि , कुछ प्रकृति की भी देन हैं । यह जानकर आश्चर्य होता है कि कभी कभी प्रकृति भी पक्षपात कर जाती है।
अब इस नीचे वाले चित्र को ही देखिये । एक ही पेड़ का आधा भाग हरा , और आधा सूखा । यह तो ऐसा हो गया जैसे दो भाइयों में एक अमीर और दूसरा गरीब । यानि प्रकृति में भी दोहरे मांप दंड !
यह चित्र मैंने १९९४ में लिया था । इसमें दूर क्षितिज के पास समुद्र का पानी नज़र आ रहा है । बीच में घनी हरियाली । और यह पेड़ एक पहाड़ी पर था । यहाँ देश विदेश से रोज सैंकड़ों पर्यटक घूमने आते हैं । यह स्थान समुद्र के बीच में है ।क्या आप बता सकते हैं इस जगह का नाम ? और इस वृक्ष की ऐसी दशा क्यों है ?
Tuesday, May 25, 2010
सोमवार की एक शाम --ललित शर्मा जी के नाम ---
रविवार का दिन । छुट्टी का दिन । काम से आराम का दिन । आराम --यदि नसीब हो सके तो ।
अक्सर इस मृत्युलोक में मनुष्य जीवन की दिनचर्या में इस कदर फंसा रहता है , कि आराम सिर्फ ख्वाबों ख्यालों में ही रह जाता है। इसी रविवार अविनाश जी ने एक ब्लोगर मिलन का कार्यक्रम रखा हुआ था। जाने का मन तो हमारा भी था । लेकिन मौसम , माहौल , समय , स्थान , सब ने मिलकर मूड को इस कदर हिलाया कि फिर अपनी जगह पर टिक ही नहीं पाया । बहुत कोशिश की मगर वो नहीं माना ।
हमने तो मार्केट जाकर लाल टी शर्ट भी खरीदने की सोची , लेकिन पता चला कि सब की सब बिक चुकी थी ।
खैर ललित भाई को तो हमने पहले ही बता दिया था कि भई अगर रविवार को नहीं मिल पाए तो सोमवार को निश्चित ही मुलाकात होगी।
सोमवार दोपहर को फोन किया तो पता चला कि ज़नाब राजीव तनेजा जी के साथ हैं और लंच कर रहे हैं । लगे हाथ हमने उन्हें रात्रि भोज के लिए आमन्त्रित कर लिया जो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया । समय तय हुआ शाम के ८ बजे , सिविल सर्विसिज ऑफिसर्स क्लब । क्योंकि श्रीमती संजू तनेजा भी आ रही थी , सो हमने भी श्रीमती जी को मना लिया चलने के लिये ।

अब हम तो निश्चित समय पर पहुँच गए लेकिन पता चला कि हमारे मेहमान तो अभी घर से ही बोल रहे थे । वो तो भला हो सोमवार का क्योंकि क्लब में गिने चुने लोग ही थे । सप्ताह के पहले दिन , सप्ताहांत के तूफ़ान के बाद की शांति थी । इसलिए हम भी आराम से गोष्ठी कक्ष में पसर गए और टी वी ओन कर लिया । कहते हैं , हर बुराई में अच्छाई होती है । उनको देर होने से श्रीमती जी ने अपनी पसंद के सारे सीरियल्स क्लब के विशालकाय टी वी स्क्रीन पर आराम से देख लिए ।
इसी बीच सवा नौ बजे ललित जी का फोन आया कि वो पहुँचने ही वाले हैं ।
चित्र में बाएं से --राजीव तनेजा , यशवंत मेहता , ललित शर्मा , श्रीमती संजू तनेजा और डॉ रेखा दराल
हम भी स्वागत में जाकर गेट पर खड़े हो गए । कार से उतरकर ललित जी इतनी आत्मीयता से औपचारिकतापूर्ण मिले कि पहली बार हमें अपने बुजुर्ग होने का अहसास सा हुआ । ललित जी सिल्क का कुर्ता पायजामा पहने किसी रियासत के राजकुमार जैसे लग रहे थे ।
बाद में उन्होंने स्वीकारा कि किसी दिन वो छत्तीसगढ़ के सी ऍम भी हो सकते हैं ।
वैसे तो क्लब में थोडा बहुत ड्रेस कोड लागू होता है । लेकिन ललित भाई की मूंछे देखकर भला किस की हिम्मत हो सकती थी कि कोई कुछ कह सके । उलटे वेटर्स ने ललित जी का विशेष ध्यान रखा खातिरदारी में ।
उसके बाद --न ब्लोगिंग , न कोई मुद्दे, न राजनीति पर बात हुई ।
बस एक दूसरे को जानने , पहचानने और समझने की ही बात हुई ।
रेखा और संजू तो ऐसे बात कर रही थी जैसे बरसों से एक दूसरे को जानती हों ।
फैमिली लाउंज में बैठकर ऐसा लग रहा था जैसे एक ही परिवार के तीन भाई साथ बैठे हों । बड़े भैया , सपत्निक और नौज़वान बेटा साथ में , सबसे छोटे जैसे नवविवाहित हों , और मूंछों वाले मंझले भैया जैसे बाल ब्रहमचारी । एक सुखी परिवार ।
देर हो चुकी थी , इसलिए खाना पीना सब एक साथ ही हो रहा था ।
टीचर्स से भी मुलाकात हुई । लाल परियां भी दिखाई दीं।
सबसे अंत में हमीं उठे , घंटी बज चुकी थी क्योंकि ग्यारह बज चुके थे ।
बस एक कमी खल रही थी -- अविनाश , खुशदीप , अजय और वर्मा जी की । लेकिन नियमानुसार केवल चार मित्र ही आमंत्रित किये जा सकते थे ।
लेकिन क्या हुआ , सोमवार तो फिर अनेक आयेंगे ।
फिर अगले महीने पाबला जी भी तो दिल्ली आ रहे हैं न।
अक्सर इस मृत्युलोक में मनुष्य जीवन की दिनचर्या में इस कदर फंसा रहता है , कि आराम सिर्फ ख्वाबों ख्यालों में ही रह जाता है। इसी रविवार अविनाश जी ने एक ब्लोगर मिलन का कार्यक्रम रखा हुआ था। जाने का मन तो हमारा भी था । लेकिन मौसम , माहौल , समय , स्थान , सब ने मिलकर मूड को इस कदर हिलाया कि फिर अपनी जगह पर टिक ही नहीं पाया । बहुत कोशिश की मगर वो नहीं माना ।
हमने तो मार्केट जाकर लाल टी शर्ट भी खरीदने की सोची , लेकिन पता चला कि सब की सब बिक चुकी थी ।
खैर ललित भाई को तो हमने पहले ही बता दिया था कि भई अगर रविवार को नहीं मिल पाए तो सोमवार को निश्चित ही मुलाकात होगी।
सोमवार दोपहर को फोन किया तो पता चला कि ज़नाब राजीव तनेजा जी के साथ हैं और लंच कर रहे हैं । लगे हाथ हमने उन्हें रात्रि भोज के लिए आमन्त्रित कर लिया जो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया । समय तय हुआ शाम के ८ बजे , सिविल सर्विसिज ऑफिसर्स क्लब । क्योंकि श्रीमती संजू तनेजा भी आ रही थी , सो हमने भी श्रीमती जी को मना लिया चलने के लिये ।

अब हम तो निश्चित समय पर पहुँच गए लेकिन पता चला कि हमारे मेहमान तो अभी घर से ही बोल रहे थे । वो तो भला हो सोमवार का क्योंकि क्लब में गिने चुने लोग ही थे । सप्ताह के पहले दिन , सप्ताहांत के तूफ़ान के बाद की शांति थी । इसलिए हम भी आराम से गोष्ठी कक्ष में पसर गए और टी वी ओन कर लिया । कहते हैं , हर बुराई में अच्छाई होती है । उनको देर होने से श्रीमती जी ने अपनी पसंद के सारे सीरियल्स क्लब के विशालकाय टी वी स्क्रीन पर आराम से देख लिए ।
इसी बीच सवा नौ बजे ललित जी का फोन आया कि वो पहुँचने ही वाले हैं ।
चित्र में बाएं से --राजीव तनेजा , यशवंत मेहता , ललित शर्मा , श्रीमती संजू तनेजा और डॉ रेखा दरालहम भी स्वागत में जाकर गेट पर खड़े हो गए । कार से उतरकर ललित जी इतनी आत्मीयता से औपचारिकतापूर्ण मिले कि पहली बार हमें अपने बुजुर्ग होने का अहसास सा हुआ । ललित जी सिल्क का कुर्ता पायजामा पहने किसी रियासत के राजकुमार जैसे लग रहे थे ।
बाद में उन्होंने स्वीकारा कि किसी दिन वो छत्तीसगढ़ के सी ऍम भी हो सकते हैं ।
वैसे तो क्लब में थोडा बहुत ड्रेस कोड लागू होता है । लेकिन ललित भाई की मूंछे देखकर भला किस की हिम्मत हो सकती थी कि कोई कुछ कह सके । उलटे वेटर्स ने ललित जी का विशेष ध्यान रखा खातिरदारी में ।
उसके बाद --न ब्लोगिंग , न कोई मुद्दे, न राजनीति पर बात हुई ।
बस एक दूसरे को जानने , पहचानने और समझने की ही बात हुई ।
रेखा और संजू तो ऐसे बात कर रही थी जैसे बरसों से एक दूसरे को जानती हों ।
फैमिली लाउंज में बैठकर ऐसा लग रहा था जैसे एक ही परिवार के तीन भाई साथ बैठे हों । बड़े भैया , सपत्निक और नौज़वान बेटा साथ में , सबसे छोटे जैसे नवविवाहित हों , और मूंछों वाले मंझले भैया जैसे बाल ब्रहमचारी । एक सुखी परिवार ।
देर हो चुकी थी , इसलिए खाना पीना सब एक साथ ही हो रहा था ।
टीचर्स से भी मुलाकात हुई । लाल परियां भी दिखाई दीं।
सबसे अंत में हमीं उठे , घंटी बज चुकी थी क्योंकि ग्यारह बज चुके थे ।
बस एक कमी खल रही थी -- अविनाश , खुशदीप , अजय और वर्मा जी की । लेकिन नियमानुसार केवल चार मित्र ही आमंत्रित किये जा सकते थे ।
लेकिन क्या हुआ , सोमवार तो फिर अनेक आयेंगे ।
फिर अगले महीने पाबला जी भी तो दिल्ली आ रहे हैं न।
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