उनके लिखे गीत हिंदी फिल्मो में अपनी धूम मचा चुके हैं ।
१९६५ में बनी फिल्म --नई उम्र की नई फसल --में मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाया गया ये गाना आज भी जब मैं सुनता हूँ तो रोमांचित हो उठता हूँ ---
स्वपन झरे फूल से
मीत चुभे शूल से
लुट गए श्रृंगार सभी
बाग़ के बबूल से
और हम खड़े खड़े --बहार देखते रहे
कारवां गुजर गया , गुबार देखते रहे ।
काव्य पाठ शुरू हुआ और चलता रहा , चलता रहा । एक के बाद एक , एक से बढ़कर एक कवितायेँ , गीत और दोहे सुनाकर नीरज जी ने सब का मन मोह लिया ।
तन से भारी सांस है , इसे जान लो खूब
मुर्दा जल में तैरता , जिन्दा जाता डूब ।
ज्ञानी हो फिर भी न कर , दुर्जन संग निवास
सर्प सर्प है भले ही , मणि हो उसके पास ।
कभी कभी कवि सीधे सादे शब्दों में कितनी बड़ी बात कह जाते हैं , इसका एक उदाहरण देखिये --
जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा
जितना भारी बक्सा होगा
उतना तू हैरान रहेगा ।
अब सफ़र रेल का हो या जिंदगी का , दोनों पर यह बात लागू होती है ।
आपके लिए ये वीडियो भी है । सुनिए और आनंद लीजिये ।
तो कैसी रही यह काव्य संध्या ?

