top hindi blogs

Tuesday, March 18, 2014

बैंगलोर के लाल बाग़ की लाली और हरियाली दोनो देखने लायक हैं ---


पिछली पोस्ट से आगे --

एक बार तो लगा कि बैंगलोर में शायद देखने के लिए कुछ नहीं है।  लेकिन फिर लाल बाग के बारे में पता चला जो शहर के बीचों बीच है। ऑटो पकड़कर हम पहुँच गए लाल बाग़।  २४० एकड़ में बना यह पार्क वास्तव में काफी बड़ा और खूबसूरत है।


प्रवेश द्वार से गुजरते ही यह रास्ता जाता है पार्क की पार्किंग तक।




द्वार से पार्किंग तक जाने के लिए सड़क के किनारे यह हरियाली और रंगों की छटा  देखकर ही अनुमान लगाया कि क्यों इसे लाल बाग़ कहा जाता है।



पार्किंग के सामने एक छोटी सी पहाड़ी पर एक छोटा सा मंदिर बना है।  यहाँ से शहर का खूबसूरत नज़ारा नज़र आता है।



पार्क में एक मैदान जिस पर पैर रखते ही चौकीदार बैठा बैठा जोर से सीटी बजाकर बताता कि घास पर चलना मना है।



पार्क के इस हिस्से में घास को ऐसा बनाया गया था जैसे समुद्र में ज्वार भाटा आता है।




एक पिक्चर पोस्ट कार्ड दृश्य।



यह है अशोक वाटिका वाला अशोक वृक्ष जिसके नीचे कभी सीता मैया बैठी थी।  इसे १९७२ में श्रीमती इंदिरा गांधी जी ने लगाया था।  यह पेड़ श्रीलंका में भी मिलता हैं।



लाल बाग़ के अंदर एक बहुत बड़ी झील भी है जिसकी परिधि करीब १. ५ से २ किलोमीटर की है ।



झील किनारे दिखे ये जुड़वां पेड़ -- पहली बार देखे।



पार्क में सैकड़ों वर्ष पुराने पेड़ बहुत नज़र आये।




एक यह भी।





यहाँ की हरियाली तो देखने लायक थी।



तरह तरह के अंदाज़ में पेड़ पौधों को सजाया गया था।



कहते हैं , मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का होता है।





अंत में यह फूल घड़ी ( फ्लावर वाच ) बिलकुल सही समय दिखा रही थी।



Wednesday, March 12, 2014

यूँ तो अपने घर में भी है रोटी --- एक यात्रा संस्मरण !


देश विदेश में भ्रमण करने के बावज़ूद बैंगलोर कभी जाना नहीं हो पाया था।  इत्तेफ़ाक़ से यह अवसर मिला जब अभी बेटे के पास जाना हुआ। ऐसे में हम तो जो टिकेट सबसे सस्ती मिलती है , उसे ही बुक करा देते हैं।  संयोगवश इस बार आना जाना दोनों ही एयर इण्डिया से हुआ। जाते समय तो प्लेन साधारण सा ही था लेकिन वापसी में एयर इण्डिया का ड्रीमलाइनर  विमान मिला जिसमे बैठकर एक बार तो आनन्द आ गया।

एयर इण्डिया का एक लाभ तो यह मिलता है कि इसकी उड़ान टी- ३ से उड़ती है।  इसलिए एयरपोर्ट पर ही आधे पैसे वसूल हो जाते हैं।  उस पर फलाइट के दौरान जैसा भी सही , लेकिन खाना मुफ्त में मिलता है।हमें तो बैठते ही वो दिन याद आ गए जब पहली बार और तद्पश्चात एयर इण्डिया से यात्रा करते थे और बैठते ही सुन्दर सी विमान परिचारिका एक  ट्रे में टॉफियां और इयर प्लग लेकिन सेवा में हाज़िर हो जाती थी।  फिर टेक ऑफ़ करते ही पहले गर्मागर्म तौलिया हाथ मुँह पोंछने के लिए हाज़िर होता था।  और फिर खाना।  इस तरह एक महाराजा की तरह ही आपको ट्रीट किया जाता था।  लेकिन अब न महाराजा रहा , न वो आवभगत।  फिर भी , एयर इण्डिया से सफ़र करना एक सुखद अनुभव ही रहा।

यूँ तो बैंगलोर को देश  का आई टी हब कहा जाता है।  इसलिए उत्तर भारत से बहुत से युवा जॉब करने यहाँ आते हैं।  लेकिन यह  शहर बाकि बड़े शहरों की अपेक्षा थोड़ा महंगा है।  एयरपोर्ट से निकलते ही सड़क के दोनों ओर बहुत खूबसूरत हरियाली और फूलों की सजावट मिली।  हालाँकि प्री पेड़ टैक्सी बहुत महँगी थी , लेकिन बाहर टैक्सियों के रेट अपेक्षाकृत कम थे।  लेकिन शहर से दूर होने की वज़ह से समय और पैसा अतिरिक्त ही लगा।

यहाँ घूमने के लिए नेट पर कुछ स्थल अपनी पसंद के ढूंढें और हम पहुँच गए इस पैलेस में जिसे वड़ियार राजाओं ने बनवाया था।  महल में प्रवेश टिकेट ही इतना महंगा था कि एक बार तो सोचना पड़ा।  लेकिन फिर २२५ रूपये प्रति व्यक्ति देकर महल देखने का प्रलोभन छोड़ना असम्भव ही था।  आखिर , देखकर निराश तो नहीं ही हुए।  



बाहर लॉन से महल का दृश्य।





महल का एक कक्ष जो बैठक जैसा था।  गाइड के रूप में ऑडियो यंत्र दिए गए थे जिसमे रिकॉर्ड किये गए सन्देश द्वारा हर कक्ष के बारे में बताया गया था।




खूबसूरती से सजे आँगन में रखा एक आसन , सोफेनुमा।




मुख्य प्रवेश द्वार के सामने बना है यह बड़ा हॉल जिसमे शादियां होती हैं।  इसकी सजावट भी बेहद सुन्दर थी।





महल के बाहर लॉन में यह पेड़ सैकड़ों वर्ष पुराना लगता है।  इसने अपने अंदर कई और छोटे पेड़ छुपाये हुए हैं जिन्हे यह संरक्षण प्रदान करता है।

पेलेस से लौटे समय विधान सभा भवन आता है जो मेंन रोड पर ही है।



यह विधान सभा का नया भवन है।  पुरनी बिल्डिंग भी साथ ही है।





विधान सभा भवन के बाहर पेड़ों की छटा।


बैंगलोर की एक विशेषता तो यह लगी कि यहाँ कहीं भी हमें झुग्गी झोंपड़ी या अनधिकृत आवासीय कॉलोनी दिखाई नहीं दी , न ही कोई स्लम दिखा। सभी शहरों की तरह यहाँ भी एक महात्मा गांधी रोड़ है जो काफी आधुनिक साज सज्जा से परिपूर्ण है।  यह हैरानी की ही बात थी कि देश की राजधानी में भी एम् जी रोड है लेकिन वह महात्मा गांधी नहीं बल्कि मेहरौली गुडगाँव रोड कहलाती है। क्या महात्मा गांधी के नाम पर दिल्ली में इतना रोष है ?

परिवहन के रूप में यहाँ भी दिल्ली जैसी लो फलोर बसें थी लेकिन उनका किराया बहुत ज्यादा था।  टैक्सी सिर्फ फोन पर बुकिंग से ही मिलती हैं जिनका किराया भी ज्यादा ही लगा।  लेकिन सड़क पर ऑटो अवश्य मिल जाते हैं परन्तु वे कभी मीटर से चलने को राज़ी नहीं होते।  फल , सब्ज़ियाँ , दूध , खाने पीने की सभी चीज़ें दिल्ली के मुकाबले महँगी हैं।

लेकिन जो बात सबसे अच्छी है वो है यहाँ का मौसम।  लगता है यहाँ गर्मी तो कभी पड़ती ही नहीं , न ही ज्यादा ठण्ड होती है। शायद इसका कारण है इसकी समुद्र तल से ऊंचाई जो करीब ९०० मीटर है जबकि दिल्ली की ऊंचाई २०० मीटर ही है।  इसलिए यहाँ सुबह शाम मौसम बहुत सुहाना रहता है।  ठंडी हवायें जब लहरा कर आती हैं तो सारी महंगाई भूल सी जाती है।  यहाँ वायु प्रदुषण भी बहुत कम लगा। पानी और बिजली की किल्लत भी नज़र नहीं आई। लोग भी दिल्ली के मुकाबले ज्यादा सभ्य लगे।  सडकों पर थूकना भी दिखाई नहीं दिया।  विशेष तौर पर एक बात अच्छी यह लगी कि यहाँ लगभग सभी हिंदी समझते भी हैं और बोलते भी हैं।  एक ग्राहक को दुकानदार से हिंदी में बात करते हुए देखकर अति प्रसन्नता हुई क्योंकि दोनों ही दक्षिण भारतीय थे।

लेकिन वापस आते समय यही महसूस हुआ कि जहाँ हमारे पडोसी बैंगलोर से आकर दिल्ली में बसे हैं , वहीँ दिल्ली वाले जॉब करने बैंगलोर जा रहे हैं। आखिर घर में भी होती है रोटी ! लेकिन लगता है , समय के साथ यह परिवर्तन भी अनिवार्य है अब तो जिसके साथ ही जीना है।




Wednesday, March 5, 2014

सड़कों पर खेलती , कलाबाज़ी खाती जिंदगियां ----


जैसे ही गाड़ी चौराहे पर रुकी , वही मैले कुचैले बच्चे व्यस्त हो गए कलाबाज़ी दिखाने मे . तभी सड़क के दूसरी ओर एक गाड़ी आकर रुकी . ड्राईवर की सीट पर गाड़ी मे बैठे मालिक ने एक बच्चे को ईशारा किया और एक गोल सा पैकेट निकाला . लगभग पांच साल की उस बच्ची ने बड़ी हसरत भरी निगाहों से पैकेट को देखा और अपने नन्हे हाथों मे थाम लिया . फिर वहीं सड़क के बीचों बीच बैठ गई फुटपाथ के किनारे पर . हम उत्सुकतावश बड़े ध्यान से बच्ची की गतिविधियों को  देखने लगे . उसने भी जल्दी ही हमे उसे देखते हुए देख लिया . यह देखकर वह थोड़ी सी सहम गई . अब वह असमंजस मे थी कि पैकेट खोले या नहीं . लेकिन उसके साथ साथ अब तक हमे भी उत्सुकता होने लगी थी कि पैकेट मे क्या हो सकता है , हालांकि हमे कुछ कुछ आभास हो रहा था .  


कुछ झिझकते हुए उसने धीरे धीरे पैकेट खोला जैसे अक्सर दीवाली पर हम गिफ्ट के पैकेट खोलते हैं . जैसा कि अनुमान था , पैकेट मे करीने से पैक की गई चार रोटियाँ थी सब्ज़ी के साथ . उसने एक हाथ से सब्ज़ी मे से हरी मिर्च निकाली और मछली की तरह लटकाया और फेंक दिया . फिर उसने हमारी ओर देखा , हम अभी भी उसे एकटक देख रहे थे . वह फिर शरमाई . इस बीच देखने का लुका छिपी का यह खेल यूं ही चलता रहा . अन्तत: उसने हिम्मत कर रोटियों का हिसाब किया . अब उसके दोनो हाथों मे दो दो रोटियाँ थीं और दोनो पर सब्ज़ी रखी थी . वह उठी और ट्रैफिक के बीच हमारी गाड़ी के पीछे खड़ी गाड़ियों के बीच भीख मांगने की असफल कोशिश करते हुए अपने चार वर्षीय भाई के पास पहुंच गई . बच्चे की रोटियों से ज्यादा पैसों मे रुचि नज़र आ रही थी . 

ट्रैफिक सिग्नल की बत्ती हरी हुई और हम आगे बढ़ गए यह सोचते हुए कि क्या शाम के चार बजे बच्चों को भूख रही होगी !  

Saturday, March 1, 2014

दिल्ली मे हुमायूँ का मक़बरा -- एक सुन्दर पर्यटक स्थल !


रविवार को घर बैठना थोड़ा अखरता है।  फिर सुहानी धूप का आनंद तो घर से बाहर निकल कर ही लिया जा सकता है।  इसलिए इस रविवार को जाना हुआ  एक ऐसी जगह जहाँ हम एक बार कॉलेज दिनों में ही गए थे । दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र में बना है हुमायूँ का मक़बरा जिसके नवीकरण के बाद १८ सितम्बर २०१३ को प्रधान मंत्री जी ने उद्घाटन किया था ।

प्रवेश द्वार से घुसते ही दायीं ओर एक द्वार नज़र आता है जिसके अंदर बना है यह इसा ख़ान का अष्टकोणीय मकबरा जिसे हुमायूँ के मकबरे से २० साल पहले उन्ही के जीवन काल में १५४७ में बनाया गया था।


इसके अहाते में कभी एक पूरा गांव बसा था।





इसके चारों ओर चारदीवारी बनी है जिससे चारों ओर का अंदर और बाहर का नज़ारा देखा जा सकता हैं।




चारदीवारी पर पैदल पथ पर चलने में बड़ा मज़ा आया।





प्रथम द्वार से द्वितीय द्वार की ओर।  इसे बू हलीमा गेट कहते हैं।  इसकी हालत काफी बिगड़ गई थी , इसलिए मरम्मत करने के बाद इस पर सफेदी कर दी गई है जिससे इसकी खूबसूरती कम हो गई लगती है।   




बू हलीमा गेट से प्रवेश करते ही दायीं ओर यह द्वार नज़र आता है जिसे अरब की सराय गेट कहते हैं।  इसके आगे अरब की सराय थी जहाँ हुमायूँ टोम्ब बनाने वाले पर्सियन कारीगरों को ठहराया गया था।  अब यहाँ आई टी आई का कॉलेज है और यह रास्ता बंद है।






बू हलीमा गेट से दोनों ओर खूबसूरत लॉन्स से होकर सामने एक और गेट नज़र आता है जिसके अंदर म्यूजियम बनी हैं जहाँ मक़बरे से सम्बंधित सारी जानकारी और तस्वीरें दिखाई गई हैं।




इस तीसरे गेट से सामने नज़र आता है हुमायूँ का मक़बरा जिसे एक मंज़िले चबूतरे पर बनाया गया है।





सारे प्रांगण में पानी की धारायें बनाई गई हैं।  सामने एक फव्वारा भी चल रहा था।




हुमायूँ का मकबरा।




ऊपर से उत्तर पूर्व की ओर दूर नज़र आता है एक गुरुद्वारा।




चारों तरफ हरे भरे लॉन हैं जिनमे फुटपाथ बने हैं।




मक़बरे के अंदर मध्य में बनी है हुमायूँ की कब्र।  अन्य कमरों में तीन तीन कब्रें एक साथ बनी हैं जिनके बारे में पता नहीं चला।  हम तो सोचते ही रह गए कि क्या वास्तव में हुमांयू जी यहाँ लेटे होंगे !





मक़बरे से पश्चिम की ओर का दृश्य जहाँ से होकर अंदर आते हैं।




हुमायूँ के मक़बरे का एरियल फोटो जो म्यूजियम में लगा है।  

नोट : दक्षिण दिल्ली के पुराने और बहुत महंगे क्षेत्र में स्थित हुमायूँ का मक़बरा एक बहुत बड़े क्षेत्र में बना है।  यहाँ जितने अपने देश के लोग नज़र आते हैं , उतने ही विदेशी भी इसे देखने के लिए आते हैं।  मुग़लों की इस धरोहर को  सरकार ने सुव्यवस्थित ढंग से संजो कर रखने का प्रयास किया है।  


Tuesday, February 18, 2014

दिल्ली का गार्डन टूरिज्म फेस्टिवल -- बसंत बहार !


दिल्ली के महरौली  क्षेत्र में महरौली  बदरपुर सड़क पर साकेत मेट्रो स्टेशन के पास स्थित एक  गांव में बना है गार्डन ऑफ़ फ़ाईव सेंसिज।  यहाँ प्रति वर्ष मध्य फ़रवरी में दिल्ली टूरिज्म की ओर से गार्डन टूरिज्म फेस्टिवल मनाया जाता है जिसमे बसंत ऋतु में खिलने वाले रंग बिरंगे खूबसूरत फूलों की प्रदर्शनी लगाई जाती है।  साथ ही विभिन्न लोक नृत्य और गीतों की प्रस्तुति भी आयोजित होती है जो इसे एक मेले के रूप में जनता के लिए आकृषण का केंद्र बनाता है।

यहाँ तक पहुंचने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ सकती है क्योंकि गांव की कच्ची पक्की टूटी फूटी सड़क और कीचड़ में लथपथ होती हुई आपकी गाड़ी ट्रैफिक जाम में फंसने से आपकी ड्राइविंग स्किल की चरम सीमा तक परीक्षा ले लेती है।  उस पर पार्किंग का कोई विशेष प्रबंध न होने से आपको अपनी प्रिय कार बेगानी सी सड़क किनारे या जंगली क्षेत्र में छोड़नी पड़ती है।  लेकिन ऐसा करने वाले आप अकेले नहीं होते , इसलिए घबराने की कोई बात नहीं होती।  


मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही फूलों से बनी विभिन्न आकृतियां बरबस सबको अपनी और खींच लेती हैं।  लोग शौक से पोज मारकर फोटो खिंचवाते हैं।  लेकिन किसके कैमरे में कौन कैद हो रहा है , यह उस वक्त कोई नहीं देखता।  सभी फोटो खींचने में ही व्यस्त होते हैं।




बड़ी मुश्किल से इस फोटो को मानव रहित रखने में कामयाबी मिली।




एक पेड़ के चारों ओर खाली स्थान रखना आवश्यक होता है ताकि पेड़ साँस ले सके।  लेकिन यदि इसे फूलों से सजा दिया जाये तो पेड़ भी निश्चित ही मन ही मन बहुत खुश होता होगा।  




ढेरों डेहलिया एक साथ।




इकेबाना।




धूप छाँव के बीच फूलों की क्यारी।





फूल गली।





ये पौधे तो सबने अवश्य देखे होंगे।  लेकिन यहाँ बहुत ही खूबसूरत लग रहे थे।



दिल्ली जल बोर्ड की तरफ से बनाई गई एक झांकी।

गार्डन ऑफ़ फाइव सेंसिज के एक तरफ गांव है और दूसरी ओर कुछ जंगली सा क्षेत्र है।  इस पहाड़ी क्षेत्र में झाड़ी नुमा पेड़ पौधे हैं जिनमे पशु पक्षी नहीं बल्कि युवा लड़के लड़कियां विचरण करते नज़र आते हैं।  शहरी युवाओं के इस विशेष आचरण के लिए एक बार फिर जंगल ही आश्रय प्रदान करता है।  



यहाँ ऐसी अनेक मूर्तियां बनी हैं जिनका औचित्य समझ नहीं आया।




पहाड़ी की चोटी से दूर क़ुतुब मीनार नज़र आती है।




एक और कलाकृति।

कुल मिलाकर यहाँ एक मेले का वातावरण नज़र आता है।  हालाँकि बाकि दिनों में क्या होता होगा , यह कहना मुश्किल है।  लेकिन फ़िलहाल तो यह जगह पारिवारिक पिकनिक के लिए बहुत बढ़िया जगह लगी।


फूलों की कुछ चुनिंदा तस्वीरें :





















जैसे बुझने से पहले दीया खूब टिमटिमाता है , उसी तरह गार्डन फेस्टिवल बसंत ऋतु की बहार की चरम सीमा को दर्शाता है।  इस समय के बाद इन फूलों का मौसम समाप्त होने लगता है।  और हम स्वयं को तैयार करने लगते हैं , गर्मी के मौसम की जिसमे फूल तो क्या बिजली और पानी ही मिलता रहे तो गनीमत होती है। इसीलिए कहते हैं जब तक बहार है , उसका आनंद लिया जाये क्योंकि न जाने कब ये फूल मुर्झा जाएँ  और हम खाली सूखी टहनियों को देखते रह जाएँ।


Saturday, February 8, 2014

शहर की शादियों में संवेदनहीनता ---


अभी तक हमें यही अहसास परेशान कर रहा था कि आजकल लोग शादी का कार्ड तो कुरियर से भेज देते हैं लेकिन स्वयं व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित नहीं करते।  ऐसे में मेहमान के लिए बड़ी मुश्किल हो जाती है यह निर्णय लेने में कि जाया जाये या नहीं। लेकिन हाल ही में एक ऐसा  अनुभव हुआ जिसे देख कर शादियों के बारे में गम्भीरता से सोचने पर मज़बूर होना पड़ा।

हुआ यूँ कि एक मित्र सपत्नीक निमंत्रण देने आए और जोर देकर शामिल होने का आग्रह किया।  साथ में एक डिब्बा तथाकथित मिठाई भी दे गए। पुराने मित्र थे , इसलिए न जाने का कोई कारण ही नहीं था। हालाँकि घर से दूर था लेकिन समय बहुत उपयुक्त लगा।  पूरा  विवरण कुछ इस प्रकार रहा :

कार्ड पर लिखा था :

बारात असेम्बली -- शाम ६ बजे
विवाहस्थल के लिए प्रस्थान --- ७ बजे
दूरी --- २०० मीटर

घर से दूरी ---- २५ -३० किलोमीटर शहर के बीच
समय लगा --- २ घंटे
असेम्बली पॉइंट --- पौने दस बजे -- कोई नहीं मिला
विवाहस्थल पर --- रात दस बजे -- न दूल्हा , न घरवाले
साढ़े दस बजे -- दूल्हा गेट पर
रात ग्यारह बजे -- दूल्हा प्रवेश

रात ग्यारह बजे दूल्हे के प्रवेश के साथ खाना खोल दिया गया।  इस बीच मेट्रो से आने वाले बाराती प्रस्थान कर चुके थे , चाट पकोड़ी खाकर।  ज़ाहिर है , लिफाफा भी उनकी ज़ेब में ही रह गया।  अब हो सकता है कि अगले दिन घर जाकर देना पड़े।  हमने भी कुछ छुट पुट खाकर ठंडा पीया और इंतज़ार करते रहे कि कोई घरवाला दिखे तो लिफाफा सौंपें और घर का रास्ता नापें जिसमे फिर एक घंटा लगना निश्चित था और अगले दिन फिर ऑफिस जाना भी आवश्यक था।  आखिर मित्र के बेटे की शादी की ख़ुशी में सरकारी अवकाश होने की सम्भावना तो निश्चित ही नहीं थी।

बारात तो सारी की सारी पहले ही अंदर थी।  दुल्हे के साथ थी तो बस एक घोड़ी , दो चार रिश्तेदार और बाकि बैंड वाले।  लेकिन इन्ही चार रिश्तेदारों ने सड़क पर चक्का जाम कर सब का खाना ख़राब कर रखा था।  सर्दी में भी पसीना बहाते हुए ये जाँबाज़ गेट के बाहर ही आधे घंटे तक ऐसे डटे रहे जैसे लोंगोवाल की लड़ाई में हमारे रण बांकुरे अपनी जान की परवाह किये बगैर जमे रहे थे। हमने भी मित्र को उस भीड़ में ढूंढ निकाला और बड़ी आत्मीयता से बधाई देने लगे।  लेकिन मित्र न जाने किस पिनक में थे कि लगा जैसे पहचाना ही न हो।  वैसे भी हमें तो नाचने का शौक कभी नहीं रहा , इसलिए वहां से हटकर मिष्ठान खाने के लिए आगे बढ़ लिए।

लेकिन इस रिहाई से पहले एक अत्यंत आवश्यक काम भी करना था , लिफाफा सौंपने का।  अक्सर यह काम हमें सबसे कठिन काम लगता है।  एक तो वैसे ही लिफाफा देते हुए अज़ीब सा लगता है।  ऊपर से लेते हुए मेज़बान के  नखरे देखकर तो ऐसा महसूस होता है जैसे हम कोई गुनाह कर रहे हों। लेकिन इस महत्त्वपूर्ण कार्य करने के बाद ऐसा रिलीफ मिलता है जैसे सर से कोई बोझ उतर गया हो।  फिर भी हमने देखा है कि अक्सर लिफाफा देने वालों की भीड़ सी लग जाती है और पहले मैं पहले मैं की  नौबत सी आ जाती है।

आखिर उस दिन भी सफलतापूर्वक लिफाफा विसर्जन के बाद जब हमने प्रस्थान करने की सोची तो पत्नी श्री की फरमाइश आई कि अरे हमने दूल्हा दुल्हन को तो देखा ही नहीं। हमने श्रीमती जी को लगभग खींचते हुए अपनी एक कविता सुनाते हुए गाडी में बिठाया और ड्राइवर को कहा कि चलो , हो गई शादी :

इस भीड़ भाड़ में कौन है अपना कौन पराया
किसने निमंत्रण स्वीकारा,  कौन नहीं आया !

दूल्हा कैसा दिखता है, दुल्हन की कैसी सूरत है
यह न कोई देखता है , न देखने की ज़रुरत है !

आजकल मेहमानों को दूल्हा दुल्हन से प्यारा होता है खाना
और मेज़बानों को सम्बन्धियों से ज्यादा प्यारा नाच गाना !

इसी अफ़साने की शिकार प्रेम संबंधीं की ख्वाहिश हो गई है ,
और शादियां आजकल काले धन की बेख़ौफ़ नुमाइश हो गई हैं !



Sunday, January 26, 2014

इंसान इंसान पर विश्वास करने लायक हो जाये तो यह संसार रहने लायक हो जाये ---


आजकल शहरों में चिड़ियाएं लगभग गायब ही हो चुकी हैं । लेकिन ऐसा लगता है कि इनकी जगह कबूतरों ने ले ली है।  कबूतरी रंग के ये कबूतर झुण्ड के झुण्ड नज़र आते हैं।  इनकी  बहुतायत से शहरी लोग भी परेशान हो गए हैं क्योंकि ये बालकनी में बैठ कर अपनी बीट से सारी बालकनी को गन्दा कर देते हैं।  इसलिए हमारे आस पास बहुत से घरों में लोगों ने बालकनी को शीशे लगाकर बंद कर दिया है।  लेकिन हमें तो खुला आसमान , खुली हवा और खुला वातावरण ही अच्छा लगता है।  इसलिए हमने अभी तक अपनी बालकनी को खुला ही रखा है।  हालाँकि , इसकी कीमत तो अदा करनी ही पड़ती है।

जब भी घर बंद होता है , अक्सर जंगली कबूतर अपना साम्राज्य स्थापित कर लेते हैं और घर की बालकनी को ही अपनी टॉयलेट समझ लेते हैं।  हमारे सामने कोई आ भी जाये और शांति से बैठ जाये तो हमारे समीप आते ही शंकित हो उड़ जाते हैं।  इन कबूतरों का हम जैसे शरीफ़ इंसान पर भी अविश्वास अक्सर हमें बहुत खटकता है। अपनी इस असफलता पर हमें बड़ा क्षोभ होता है।



लेकिन एक शाम को अँधेरा होने के बाद जब हमने बालकनी में झाँका तो इस कबूतर को आराम से बैठा पाया। 
सफ़ेद रंग का कबूतर हमारी बालकनी में पहली बार आया था।  इसलिए कौतुहलवश हम उसे देखने के लिए बाहर आ गए।  लेकिन इसने हमारी उपस्थिति को पूर्णतया अनदेखा कर दिया।  परन्तु हम इसके रूप पर मोहित हो चुके थे । इसलिए हमने अपना मोबाइल उठाया और फोटो खींचने की कोशिश की ,लेकिन उसमे अँधेरे की वज़ह से कुछ नहीं आया। एक दूसरे कैमरे में भी फलैश नहीं थी।  अंतत : हमें अपना विश्वासपात्र कैमरा ही निकालना पड़ा जिसमे फलैश थी।  हैरानी की बात यह रही कि हमारे फोटो खींचने पर उसे बिल्कुल भी कोई एतराज़ नहीं था और वह आराम से बैठा फोटो खिंचवाता रहा।     



बालकनी की रेलिंग पर यह सफ़ेद कबूतर इत्मीनान से बैठा था।  न हिल डुल रहा था न कोई प्रतिक्रिया थी।  हमारे बहुत पास जाने पर भी उसने बस हमें ज़रा सी गर्दन घुमाकर ही देखा और अनदेखा कर दिया।  उसका यह दुस्साहस हमें चिंतित करने लगा।  हमें लगने लगा कि कहीं यह बीमार तो नहीं ! एक डॉक्टर के रूप में हमें पक्षियों से मनुष्य को लगने वाली बीमारियों का भी भान था।  इसलिए थोडा सचेत होते हुए हमने उसे हाथ न लगाने का निर्णय लिया।  वैसे भी हमने कभी किसी पक्षी को आज तक हाथ नहीं लगाया था।

रात को ११ बजे जब हम सोने के लिए आये तो देखा वह कबूतर तब भी उसी जगह उसी मुद्रा में बैठा था। हमारे किसी भी हस्तक्षेप पर उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही थी।  अब हमें वास्तव में चिंता सी सताने लगी थी क्योंकि यह निश्चित सा लग रहा था कि आसमान में स्वतंत्र उड़ान भरने वाला यह सफ़ेद कबूतर भले ही अपने मालिक के घर का रास्ता भूल गया हो लेकिन यदि यह बीमार होने की वज़ह से हुआ था तो हमारे सर पर एक और बीमार की जिम्मेदारी आ पड़ी थी। हमारे सामने एक ऐसा रोगी था जिसके रोग के बारे में हमें कुछ भी पता नहीं था।

अब दो दो चिकित्सा विशेषज्ञों के बीच मंत्रणा शुरू हुई।  लेकिन दोनों ने से कोई भी पक्षी विशेषज्ञ न होने से हम स्वयं को अनपढ़ सा ही महसूस कर रहे थे।  श्रीमती जी ने कहा कि कहीं इसे बुखार तो नहीं, आप हाथ लगाकर देखिये । हमने कहा भाग्यवान, हाथ लगाकर तो हम इंसान का भी तापमान नहीं देखते , फिर इसका कैसे देखें।इस पर उन्होंने कहा कि चलिए किसी पक्षी हॉस्पिटल को ही फोन किया जाये।  हमने कहा कि पक्षियों के हॉस्पिटल में घायल पक्षियों का ईलाज किया जाता है और यह तो घायल भी नज़र नहीं आ रहा।  वैसे भी रात के ११ बजे हम कहाँ तलाश करते। एक विचार आया कि कहीं यह ठंड में न मर जाये , इसलिए इसे एक कपड़ा उढ़ा देते हैं।  लेकिन फिर लगा कि अभी तो किसी तरह रेलिंग पर पंजे गड़ाए बैठा है , फिर कहीं ऐसा नहो कि यह कपडे के बोझ से ही मर जाये।

आखिर यही सोचा कि इसे भगवान भरोसे ही छोड़ दिया जाये और हम राम का नाम लेते हुए सो गए।  लेकिन सोने से पहले एक प्लेट में खाने के लिए दाने और एक कटोरी में पानी अवश्य उसके पास रख दिया ताकि भूख प्यास लगे तो अपना पेट भर सके।  उस रात नींद भी उचटी सी ही आई।



सुबह ६ बजे जब नींद खुली और उसे वहीं बैठा पाया तो आश्चर्यमिश्रित प्रसन्नता हुई।  थोड़ी रौशनी होने पर हमने उसका एक और फोटो लिया।  अब वह खुशमिज़ाज़ नज़र आ रहा था और पूरी तरह सजग और सचेत था । वहीँ बैठे बैठे वह नित्यप्रति क्रियाक्रम से निवृत हुआ।  लेकिन उसने दाना पानी दोनों को छुआ तक नहीं था।  उसने फोटो तो खिंचवा लिया लेकिन जब हमने उससे बात करने की कोशिश की तो उसने किसी अंजान को  मुँह लगाना उचित नहीं समझा और खिसक कर पोजिशन बदल ली।  ज़ाहिर था , उसे हमसे कोई लेना देना नहीं था।

लगभग ८ बजे उसने छलांग लगाई और खुले आसमान में उड़ान भर ली।  और हम सोचते ही रह गए उस बिन बुलाये मेहमान के  बारे में जो बिन बुलाया तो था लेकिन उसने हमारी मेहमाननवाज़ी को ठुकरा दिया था। हैरान हूँ कि उसे किस ने सिखाया होगा कि किसी अंजान व्यक्ति से लेकर कुछ नहीं खाना चाहिए -- कि मुफ्त का माल समझ कर भी नहीं -- कि किसी अंजान का विश्वास नहीं करना चाहिए !  सोचता हूँ कि क्या वह रतोंधी से ग्रस्त था जो रात होने पर देख नहीं पा रहा था ! या रात में रास्ता भटक गया था ! और यह भी कि वह पालतू था इसलिए हमसे घबरा नहीं रहा था। बेशक , इंसान अपने व्यवहार से पशु पक्षियों का भी मन जीत लेता है। बस इंसान इंसान पर विश्वास करने लायक हो जाये तो यह संसार रहने लायक हो जाये।

अंत में :



मायावती के नॉयडा स्थित हाथियों के पार्क में बैठा यह कुक्कुर हमें देख कर क्या सोच रहा है , यह सोचने की बात है।