पिछले चार सप्ताह में परिवार और सम्बन्धियों में चार लोगों का देहांत ।
इन्ही दिनों के आस पास रिश्तेदारियों में ६ शादियाँ और इतने ही मित्रों का निमंत्रण ।
जिंदगी में एक साथ ऐसे विरोधाभास का सामना पहले कभी नहीं किया था ।
लेकिन अब कोशिश करते हैं जीवन की रेल को फिर से पटरी पर लाने की ।
प्रस्तुत है , इस अवसर से चुराया एक यादगार अहसास ।
हरियाणवी लोगों का शोक प्रकट करना भी शोक नहीं होता , विशेष कर किसी बुजुर्ग के देहांत पर । एक मिनट से ज्यादा चुप बैठना उनके स्वाभाव में ही नहीं है । कभी किसी गाँव में जाकर देखें तो आप हैरान रह जायेंगे ।
लेकिन हम तो शहर में रहकर ही हैरान हो गए ।
हुआ यूँ कि पिता जी के देहांत पर गाँव से हमारे एक चाचा जी आ धमके , अपना फ़र्ज़ समझ कर ।
ठीक वैसे ही जैसे --अतिथि तुम कब जाओगे --फिल्म में परेश रावल ।
एक तो ज़नाब अस्थियों के साथ गंगा तक का सफ़र कर आए । आते ही बोले --गला ख़राब हो गया बीडी पी पी कर । अब तो यह हुक्का पीकर ही ठीक होगा । हमने कहा --यहाँ हुक्का कहाँ मिलेगा ।
बोले फ़िक्र न करो , मैं कल लेकर आऊंगा ।

अब हमारी हालत ऐसी कि काटो तो खून नहीं । हमने उन्हें बहुत समझाया कि यहाँ शहर में हुक्का कोई नहीं पीता । लेकिन वो कहाँ मानने वाले थे ।
गाँव क्योंकि दिल्ली में ही है और ज्यादा दूर नहीं है । अगले ही दिन पहुँच गए साज़ सामान के साथ ।
लम्बे पतले , छरहरे बदन के , गोरा चिट्टा रंग , मूंह पर बड़ी बड़ी कटार सी मूंछें, सफ़ेद धोती कुर्ता , उस पर काला बंद गले का कोट , सर पर साफ़ा और आँखों पर काला चश्मा --देखकर एक बार तो विश्वास ही नहीं हुआ कि ये वही चाचा जी हैं या कोई फिल्म स्टार ।
उधर करीने से सजाया हुआ हुक्का , उपलों की एक टोकरी , एक डब्बा तम्बाखू --आते ही ड्राइंग रूम के साथ वाले बेडरूम में अपना डेरा जमा लिया ।
घर के पिछले आँगन में आग जला दी गई । और शुरू हो गई हुक्के की गुडगुडाहट ।
इत्मिनान से हुक्का पीने के बाद हुआ ऐलान , उनके नित्य कार्यक्रम का ।
सुबह ७ बजे चाय , दिन में दो बार खाना --सुबह १० बजे और शाम को ७ बजे ।
मेहमानों के लिए रखे गए चाय बनाने वाले के लिए विशेष निर्देश --
चाय में चीनी डबल --चाय पत्ती डबल , मात्रा भी डबल । जिस समय कहा जाए उसी समय दी जाये --चाय के लिए पूछा नहीं जाए ।
यदि इन नियमों का उल्लंघन हुआ तो डांट खाने के लिए तैयार रहा जाए ।
७२ वर्षीय इन चाचा जी से बहुत कम ही गुफ्तगू हुई थी अभी तक ।
लेकिन इन ६-७ दिनों में उनके बारे में बहुत कुछ जानने का अवसर मिला ।
पढने का शौक है --रामायण , और कई तरह की कथा पुराणों की नई नई पुस्तकें देखकर मैं तो दंग रह गया ।
ऊंचा सुनते हैं । फिर भी पक्के घुमक्कड़ हैं । आधी जिंदगी उन्होंने घूमने में ही बिता दी ।
मैंने कहा --आपके लिए एक सुनने की मशीन ला दूँ ।
इशारा करके बताया कि काम की बात तो सुन लेता हूँ । फालतू सुनकर क्या करूँगा ।
जहाँ बाकि सब लोग तो रात को चले जाते थे , वहीँ ये चाचा जी रात में अकेले नीचे वाले फ्लोर पर ठाठ से बिस्तर लगाकर सोते थे ।
जाने कब इस अज़ीबो गरीब पात्र से प्यार सा हो गया ।
पूरे सप्ताह सब भाइयों ने मिलकर उनकी जो खातिरदारी की ,उसे वे ही नहीं हम भी कभी नहीं भूल पाएंगे ।
ठीक वैसे ही जैसे फिल्म--- अतिथि तुम कब जाओगे ---में परेश रावल को ।
अंत में एक लतीफ़ा उनकी तरफ से :
एक हरियाणवी, डॉक्टर से --डॉक्टर साहब दो साल पहले बुखार हुआ था ।
डॉ : अब क्या हुआ ?
हरियाणवी : कुछ नहीं । यहाँ से गुजर रहा था । आपने नहाने के लिए मना किया था । सोचा आप से पूछ लूँ , अब नहा लूँ क्या ?
नोट : वैसे ये चाचा जी रोज सुबह हमारे उठने से पहले ही ठंडे पानी से नहा धोकर तैयार होकर हुक्का पीते नज़र आते थे ।

